गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी

गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी भावना और भावुकता, दयालुता और मनुश्यता की बात यदि एक तरफ कर दी जाये तब भी गाय का दूध, घी इत्यादि सर्वगुणसम्पन्न है। विषैला प्रभाव नष्ट करने में गोघृत की तुलना में अन्य किसी पशु का घी उतना उपयोगी नहीं होता। दूध घी से सैकड़ों रोग-विकार दूर होते हैं, यहाँ कुछ रोगों के नाम के साथ उपचार की संक्षिप्त विधि बतायी जा रही है। इस अमृत की शक्ति को पहचान कर पाठक लंबी आयु तक स्वस्थ और युवा बने रह सकते हैं-
अजीर्णः– जब गरिष्ठ भोजन अनपचा रह जाता है, तब शरीर की आग ठंडी पड़ जाती है, अम्लता बढ़ती जाती है, पेट पत्थर-जैसा ठोस होने लगता है, इसके प्रभाव से गुर्दे भी कमजोर पड़ने लगते हैं। इस स्थिति में दूध में सोंठ और गुड़ औटाइये ताकि पेट की सड़ांध मल-मूत्रा के रास्ते बाहर निकल जाय।
250 ग्राम दुध में 100 ग्राम पानी मिलाइये, 25 ग्राम शक्कर या गुड़ डालिये, 10-12 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाइये, जब पानी जल जाय तो हल्का गर्म रह जाने पर घूँट-घूँट पानी शुरू कर दीजिये। अनपचा भोजन सोंठ की गर्मी से पचने लगेगा और मल-मूत्रा गल-पिघल कर निकलने लगेगा, प्यास लगे तो पानी भी हलका गर्म ही पियें, पेट साफ होते ही जलन, खट्टी डकार अफारा और बेचैनी के विकार भी शान्त हो जायँगे। अजीर्ण से छुटकारा पाने के बाद भी एक दिन दूध ही पीजिये ताकि आँतें और पेट की दीवारें तक निर्मल हो जायँ। कमजोरी से न घबरायें, क्योंकि दुध प्राणों का आधार है; यदि गर्भ से निकला बालक दूध पर जी सकता है तो हम दुर्बल नहीं होंगे, मूँग की पतली दाल से चपाती खाकर आप तीसरे दिन से हलके भोजन की शुरूआत कर सकते हैं, दोपहर को दूध में पका हुआ पतला दलिया एवं शाम को दूध में शहद मिलाकर पीजिये, रात को खिचड़ी खाइये चैथे दिन से सामान्य भोजन शुरू कर दें।
अतिसारः– आयुर्वेद के ग्रन्थों में अतिसार पर काबू पाने के लिये दूध के फेन (झाग) को परमौषधि बताया गया है। मलाई और रबड़ी खाने वालों को मालूम होना चाहिये कि 25 ग्राम दुग्ध फेन, 1/2 किलो मलाई के बराबर पौष्टिक है। झाग मुँह में पहुँचते ही टॉनिक बन जाता है, जबकि रबड़ी-खोया पचाने में कई घंटे लग जाते हैं, दूध दुहने के बाद बर्तन में जितना भी झाग हो, उसे एक बड़े कटोरे में कलछी से निकाल लें, इस झाग को चम्मच से स्वाद लेते हुए चूसना शुरू कर दें, वैसे तो झाग में चूसने वाला ठोस तत्त्व होता ही नहीं, किंतु इस विधि से पेट का संकुचन होता है, गोदुग्ध के झाग से पेट की आग भड़क उठेगी और भोजन के कच्चे रस पचने लगेंगे, दूध का झाग शरीर की पेशियों को भी फुला देता है और पाचन-क्रिया तीव्र हो जाती है, बदन को गठीला और पुष्ट करने में दुग्ध-फेन अत्युत्तम औशधि है।
आँखों में जलन-भावप्रकाश निघण्टु में गाय का दूध आँखों के लिये उत्तम अंजन माना गया है, यदि आप भैंस का दूध पीते हैं तो गाय का दूध पीना शुरू कर दें, यदि गाय का दूध पीते हैं तो वह एकदम ताजा-ताजा हो। गाय ब्यायी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि शुरू का दूध जलन पैदा करता है, दूध की मलाई लेकर अँगुली से रात को सोते समय पलकों पर लगा लें, सुबह तक जलन शान्त हो जायगी, नहाने के पहले गोदुग्ध का मक्खन लगा दें, आधे घंटे में जलन जाती रहेगी, यदि मलाई की चिकनाहट को मन न मानता हो तो 4 चम्मच दूध, 1 कटोरी पानी में मिलाकर उससे खुली आँखों में छींटे मारें और स्वच्छ कपड़े से आँखें पोछकर सो जायँ। सुबह तक सारी जलन निकल चुकी होगी, जिन्हें चिकनाई से प्यार हो तो उन्हें दूध की मलाई पलकों पर लेपकर गर्मी की सूजन निकाल देनी चाहिये।
आग से जलनाः- घाव कैसा भी हो, गाय के घी से उत्तम न कोई पेनिसिलिन आदि दवा है न मरहम, कुदरत ने गोघृत को इतनी विषनाशक शक्ति से भर रखा है कि इससे बढि़या क्रीम, मरहम या एंटीसेप्टिक दवा हो ही नहीं सकती, गोघृत में पट्ठी तर करके जली हुई त्वचा पर रखकर भगवान को याद करें, जिसने आप को गोघृत के रूप में अमृत-जैसी पौष्टिक दवा दे रखी है। दूध में घी डाल कर पियें, ताकि सप्ताह भर में घाव की जगह नयी त्वचा उग जाय। गाय का दूध शरीर को त्वचा भी देता है और मांस की कमी भी शीघ्र पूरी करता है।
आधासीसीः- आधे सिर का दर्द तभी होता है, जब उस हिस्से में रक्त के संचार में रूकावट पड़ गयी हो, उस रूकावट का कारण भोजन के वे कच्चे रस होते हैं, जो कफ, लेस आदि के रूप में जमा हो जाते हैं और जुकाम-नजला भी बन जाते हैं, अगर नासिका से दुशित जल न निकले तो माथे के किसी भी हिस्से में जोरों का दर्द उठने लगता है, माथा इतने भयंकर रूप में फटने लगता है जैसे टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ जायगा। 250 ग्राम दूध में 250 ग्राम पानी डालिये, 2 पीपली, 5 लौंग और दालचीनी के 4 छोटे टुकड़े पीसकर दूध में औटाइये।
जब केवल दूध ही बचे तो 2 चम्मच शहद मिलाकर पियें और कंबल ओढ़कर सो जायँ। घूँट इस तरह पियें जैसे गर्म वस्तु चूस रहे हों, जितना अधिक पसीना आयेगा उतनी जल्दी आराम मिलेगा, दिन में 3-4 बार ऐसा दूध पीने से माथे की श्लेष्मा जल बनकर नथनों से बह जायगी या पसीने और मल-मूत्रा के रास्ते निकल जायगी।