नीम

नीम का महत्व:-

Dr.R.B.Dhawan
नीम को संस्कृत में निम्ब, नेतर नियमन, अरिष्ट, सर्वतोभद्रक, पतिसार, रविप्रिय आदि, हिन्दी में नीम, बंगला में नीमगाछ, गुजराती में लिमडी, मराठी में कडुनिम्ब, तमिल में बेबू, तेलुगु में वेषु, अंगे्रजी में इंडियन लिलाक, लैटिन में मेलिया अझाडीरेक ;डमसपं कहते हैं। यह वनस्पति जगत के मेलिएसी कुल का सदस्य है।

नीम का वृक्ष संपूर्ण भारत में सर्वत्र उपलब्ध एवं जाना-माना वृक्ष है। अपनी स्वच्छ वायु एवं गुणों के कारण प्राचीन काल से इसका सम्मान होता आया है। आयुर्वेदानुसार नीम को शीतल, कलका, कड़वा, ग्राही, व्रणशोधक, कृमि वमन, व्रण, कफ, शोध, पित्त, विष, वात, कुष्ठ, श्रम, हृदय की जलन, खाँसी, तृषा, ज्वर, अरूचि, प्रमेह तथा रूधिर विकार को नष्ट करने वाला बताया गया है।

नीम के पत्ते– नेत्रों को हितकारी, चखने में कड़वे, पित्त, कृमि अरूचि, विष विकार और कृष्ट को नष्ट करते हैं। नीम के कोमल पत्ते वातकारक, संकोचक, रक्त-पित्त, नेत्र रोग व कुष्ट रोग को दूर करते हैं।

नीम के फूल– पित्तनाशक, कड़वे तथा कृमि और कफ को नष्ट करने वाले हैं।

कच्ची निबोरी– रस में कड़वी, स्निग्ध हल्की, गरम कोढ़, बवासीर, कृमि और प्रमेह को दूर करने वाली है।

नीम के डंठल- श्वास, खाँसी, बवासीर, कृमि और प्रमेह को नष्ट करते हैं।
निम्बोली की मगज- कृमि और कुष्ठ को दूर करता है।

नीम का तेल- नीम के बीजों का तेल कड़वा होता है, यह कृमि रोग तथा कुष्ठ को दूर करता है।

नीम का पंचांग– खुजली, वृण, कृष्ठ, पित्त तथा रुधिर विकार में लाभदायक और गुणकारी हाता है।

आयुर्वेदिक चमत्कार-
(1) दाद दूर करने में– दाद में नीम के पत्तों को दही में पीसकर लेप करने से दाद अच्छा होता है।

(2) फोड़े पर– घाव में बहने वाले फोड़े पर नीम की छाल की भस्म लगाने से लाभ होता है।

(3) दमा हेतु– दमा में नीम के बीज का तेल 30-40 बूँद तक पान में डालकर खाने से दमा में लाभ होता है।

(4) बवासीर में– बवासीर में नीम की निबोरी और एलीवे को मिलाकर 6 माशा खायें, कुछ ही दिनों में बवासीर के मस्से सूख जायेंगे।

(5) जोड़ों के दर्द में– जोड़ों के दर्द में नीम के अन्तरछाल को पानी भर चन्दन की भाँति घिस कर दर्द वाले स्थान पर गाढ़ा लेप करें, सूखने पर उतार दें, ऐसा 4-5 बार करें, दर्द से लाभ होगा।

(6) पेट में कीड़े पड़ने पर– पेट में कृमी होने पर सब्जी के साथ नीम पत्तियाँ का छोंक लगाकर खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं अथवा नीम की कोपल नित्य चबाकर सेवन करने से शरीर में रक्त के दोश दूर होते हैं।

(7) दाँतो के स्वास्थ्य हेतु– नित्य नीम का दातुन करना लाभदायक है।
(8) लकवे में– पक्षाघात वाले अंगों पर नीम के बीज का तेल मलने से लाभ होता है।

(9) बिच्छू काटने पर– बर्र और बिच्छू के काटने पर जिस स्थान पर बर्र या बिच्छू ने काटा हो, वहाँ नीम की पत्तियों को मसल कर मलने से लाभ होता है।

(10) संतति नियंत्रण में– संतति निरोध के लिए सहवास से पूर्व नीम के तेल में रूई का फोहा भिगोकर योनि में कुछ देर रखने से सहवास के समय योनि में प्रवेश करने वाले शुक्राणु मर जाते हैं, जिससे गर्भ ठहर नहीं पाता। फोहा भिगोने हेतु 2 बूँद तेल पर्याप्त है तथा इस प्रयोग को 4-6 दिन के लिए गर्भाधान काल में ही करें। नित्य करें।

(11) अश्मरी हेतु– नीम की पत्तियों की राख जल के साथ दो माशे की मात्रा में नियमित लेते रहने से पथरी होने पर वह धीरे-धीरे टूट-टूट कर पथरी पूरी की पूरी निकल जाती है तथा मरीज को लाभ मिल जाता है।

(12) संसर्ग पीड़ा हेतु– नीम के पत्तों को गर्म करके स्त्री यदि नाभि के नीचे बाँधे तो पुरूष संसर्ग के समय होने वाला दर्द या मासिक धर्म के समय होने वाला दर्द में फायदा होता है।

(13) रक्त शोधन में– नित्य नीम की पत्ती पीसकर पीना हितकर है।

नीम का ज्योतिष में महत्व-
नीम का ज्योतिष शास्त्र में एक महत्व विशेष कहा गया है। तद्नुसार घर में नीम की पत्ती, सर्प की केचुली, मोरपंख की चंद्रिका, शुद्ध घी, बिनौले, बकरी के बाल तथा शिवजी पर चढ़े हुए पुष्पों की धूनी देने से बालारिष्ट का नाश होता है।

नीम का तांत्रिक महत्व-
(1) जो व्यक्ति मेष राशि के सूर्य में एक मसूर तथा दो नीम की पत्तीयों को खाता है उसे एक वर्ष तक सर्प का भय नहीं रहता है।

(2) किसी भी व्यक्ति के दाढ़ में दर्द होने पर निम्न यंत्र को एक कोरे कागज पर पेन्सिल से बनायें तथा अमुक के स्थान पर व्यक्ति का नाम लिखकर नीम के झाड़ में लोहे के कील से ठोंक दें। ऐसा करने से दाढ़ दर्द में लाभ होता है।

(3) स्वाति नक्षत्र में निकाले गयें नीम के बांदे का प्राचीन काल मे अदृष्य होने के लिए उपयोग किया जाता है।

नीम का वास्तु में महत्व-
घर के वायव्य कोण में नीम के वृक्ष का होना अति शुभ है। इसी प्रकार जो व्यक्ति सात नीम के वृक्षों का रोपण करता है उसे मृत्योपरांत शिवलोक की प्राप्ति होती है अथवा जो व्यक्ति 3 नीम के वृक्षों का रोपन करता है वह सैकड़ों वर्षों तक सूर्य लोक में सुखों का भोग करता है।

शास्त्रों में कहा गया है-

निम्बत्रयं समारोप्य नयो धर्मविचक्षणाः।

सूर्यलोकं समासाद्य वसेदब्दायुतत्रयम्।।