यज्ञ चिकित्सा से भी रोग नष्ट होते हैं

यज्ञ चिकित्सा से भी रोग नष्ट होते हैं सूक्ष्म में जो शक्ति है वह स्थूल में नहीं। सोने का एक रत्ती टुकड़ा किसी आदमी को खिला दो कोई लाभ न होगा। उसी को सूक्ष्म करके वर्क बनाकर खिलाओं पुष्टि देगा। पर जब उसे आग में फूँक कर भस्म बना लो तो केवल एक एक रत्ती खिलाने ही चेहरे पर लाली, शरीर में बल, मन में उत्साह उत्पन्न होकर वृद्ध भी युवा बन जायगा। वैद्यलोग जानते हैं कि एक माशे दवा की वैसे बहुत कम शक्ति होती है, उसी दवा को यदि एक सप्ताह तक घोटकर सूक्षम किया जाये तो उसकी शक्ति कई गुणा बढ़ जाती है। होमियोपैथी मे इसी नियम के आधार पर औशधियों की पोटैंसी तैयार की जाती है। जिसका प्रभाव करना अभीष्ट होता है तो खिलाने के स्थान मे औशधि सुँघाते हैं।
सुँघाने की अपेक्षा भी जली हुई औशधि का प्रभाव कितना बढ़ जाता है उसे उदारहण से समझिये। एक मिर्च सूँघने से कुछ न होगा। कूटने से पास बैठे लोगों को खाँसी आवेगी। पर यदि उसको आग में जलावें तो दूर-दूर तक के मनुश्य खांखने लगेंगे। कारण यह कि अब उसके परमाणु बहुत सूक्ष्म हो गये, अतः उनकी शक्ति बढ़ गयी। अब विचार कीजिये कि रोग के कीडे़ एक कतार में रक्खे जावें तो 25000 कीटाणु एक इच्ं स्थान घेरेगें। यदि उनको तौला जावे तो एक खस खस के दाने पर बीस अरब कीटाणु चढ़ जायँगे। इतनी सूक्ष्म वस्तु पर स्थूल कण वाली ओषधियों की बड़ी मात्राओं की पहुँच ही दुस्तर है, कीटाणुओं को समाप्त कर उन पर विजय पाना तो दूर की बात है। इसी नियम को समझने के कारण लोग तपेदिक की चिकित्सा में असफल रहते है, और उसे असाध्य समझते हैं। पर औशधियों का वह अत्यन्त सूक्ष्म भाग जो यज्ञ अग्नि द्वारा छिन्न भिन्न हुआ है कीटाणुओं को सुगमता से नष्ट कर रोग दूर कर सकता है।
पदार्थ विज्ञान से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि कोई वस्तु नष्ट नहीं होती किन्तु रूप बदल जाता है। जो ओषधि मुँह से खायी जाती है, वह रस रक्त बनने के पश्चात् क्षयरोगी के फेफड़ों तक पहुँचेगी। पर अग्नि में जलायी हुई औशधि श्वास द्वारा सीधी फेफड़ो पर पहुँच कर तत्काल प्रभाव करेगी और बहुत सूक्ष्म होने के कारण स्थायी प्रभाव करेगी। गूगूल को ही लीजिये। आयुर्वेद में इसे अन्य गुणों के साथ रसायन, बलकारक, टूटे को जोड़ने वाला और कृमिनाशक बतलाया गया है।
अन्वेषण से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जितने प्राकृतिक पदार्थ हैं उनके सूक्ष्म परमाणु हर समय गतिशील रहते है, यद्यपि प्रत्यक्ष में वे दृष्टिगोचर नहीं होते। हमारे इस मनुश्य शरीर, घर की दीवार, मेज, कुर्सी इत्यादि का प्रत्येक परमाणु गति कर रहा है। यजुर्वेद के 40 वें अध्याय के पहले मन्त्र में संसार को जगत्यां जगत् कहकर इसी नियम को बताया है। और यह गति भी ऊटपटांग नहीं किन्तु नियम पूर्वक है। प्रत्येक परमाणु गति एक सी नहीं होती। किन्हीं की गति समान होती है। और किन्हीं की एक दूसरे के प्रतिकूल। प्रकृति का नियम है कि दो समान वस्तुयें एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है और विरुद्ध वस्तएं एक दूसरे को भगाती हैं। आपने देखा होगा कि एक श्रेणी में एक साथ पढ़ने वाले कई विद्याथियों में से किन्हीं दोमें विशेष मित्रता हो जाती है। शेष में वैसी नहीं होती। रेल में सैकड़ो यात्री साथ-साथ यात्रा करते हैं पर उनमें से किन्हीं दो में ऐसी घनिष्ठता हो जाती है। जो जीवन भर निभाते हैं किन्हीं पति पत्नियों में ऐसा गहरा प्रेम होता है कि वे एक दूसरे पर प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते हैं। यह सब कुछ भी इसी नियम के आधार पर है जिस मनुश्य के शरीर के परमाणु जैसी गति करते हैं। उसे वैसी गति वाले रोग या स्वास्थ्य के परमाणुओं को उसकी ओर खिंचाव हो जाता है। और जो उसके विपरीत होते हैं वे दूर भागते हैं।
किसी भी रोग के कीटाणु जब मनुश्य के शरीर में प्रवेश करते हैं तो हमारे शरीर की रोगनिवारक शक्ति जिसे हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि सदा से जानते थे और प्राणयाम तथा ब्रह्मचर्य द्वारा नित्य बढ़ाया करते थे पर अब इस सम्बन्ध में वर्तमान विज्ञान में भी कुछ समय से खोज होने लगी है जिसे डाक्टरी में रोग निवारक शक्ति कहते है। रोग को दूर भगाने के लिये एक प्रकार का उफान खाया हुआ रस तथा रक्त के श्वेतकणों की सेना, जिसे डाक्टरी में चींहवबलजवेपे कहते है। भेजता है यदि ये लड़ाई में सफल हो जाते हैं तो रोग के कीटाणु वहीं समाप्त हो जाते हैं और हमें ज्ञात भी नहीं होता कि हम पर किसी रोग का आक्रमण हुआ था। हाँ, इनके निर्बल सिद्ध होने पर रोग हमारे शरीर पर अधिकार जमा लेता है। यह रोगनिवारक शक्ति कुछ तो जन्म काल से साथ आती है और कुछ मनुश्य को उत्तम भोजन, शुद्ध सुगन्धित वायु के मिलने से उत्पन्न होती है। अतः हवन यज्ञ से जहाँ रोगनिवारक शक्ति बढ़ेगी वहाँ वह उफान रस भी अधिक उत्पन्न होगा क्यूंकी गर्मी से उफान शीध्र आता ही है। इस प्रकार रोग के कृमि हवन करनेवाले पर आक्रमण करने पर भी रोग उत्पन्न करने में उसफल रहेंगे और रोग की अवस्था में हवन करने से शीध्र नष्ट हो जायँगे।
जिस प्रकार हमारे शरीर के ऊपर खाल का खोल चढ़ा है उसी प्रकार शरीर के भीतर की ओर एक मुलायम खाल का अस्तर भी लगा है। जो गले से लेकर आँतों के निचले भाग तक विशेष रूप से तर रहता है। जिस मनुश्य की यह खाल या अस्तर बिल्कुल ठीक है और उस पर कोई क्षत या खरोंच नहीं है वह स्वस्थ मनुश्य है और उस पर किसी भी संक्रामक रोग का आक्रमण नहीं हो सकता। इस वैज्ञानिक नियम को समझने वाले बुद्धिमान अनुभवी चिकित्सक सर्वदा रेचक दवा का निषेध करते हैं, क्योंकि इससे आँतों के अस्तर में खरोच उत्पन्न होती है। जब रोग-कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं तो इन्हीं खरोंच द्वारा रक्त में इस प्रकार फैल जाते हैं जिस प्रकार प्रवेश करायी हुई ओषधि। अब यदि किसी असुविधा से हमारी इस खाल या अस्तर में कोई खराश हो गयी है तो बाहर की खरोंच की चिकित्सा तो अन्य उपायों से भी सुगम है पर भीतर का प्रबन्ध कठिन है। हाँ जो ऐसी अवस्था में हवन करते हैं उनके भीतर जब घी, कपूर और गूगल इत्यादि के सूक्ष्म परमाणु पहुँचेंगे तो उस खरोंच को किस शीध्रता से भर देंगे इसको समझना कुछ कठिन नहीं है जब कि इन्हीं वस्तुओं से बाहर की खरोंच को भरने का अनुभव प्रत्येक मनुश्य करके देख सकता है।
युक्तियों के पश्चात् अब हम इस विषय में कुछ प्रमाण और अनुभव पेश करते है-
1. वेद भगवान् का प्रमाण- मूँचामि त्वा हविमा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत्र राजयक्ष्मात्।
ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्।।
हे व्याधिग्रस्त, मनुश्य तुझ को सुख के साथ चिरकालतक जीने के लिये गुप्त राजयक्ष्मा रोग से और सम्पूर्ण प्रकट राज्यक्ष्मा रोग से आहुति द्वारा छुड़ाता हूँ। जो इस समय में इस प्राणी को पीड़ाने या पुराने रोग ने ग्रहण किया है। उससे वायु तथा अग्नि देवता इसको अवश्य छुडावें।
इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि वेद भगवान् हर प्रकार के तपेदिक की चिकित्सा चाहे रोग अभी प्रकट हुआ हो या गुप्त हो, वायु और अग्निद्वारा बतलाते हैं और आहुति द्वारा रोग से छूटने का का आदेश करते हैं।
इससे अगला मन्त्र इस प्रकार है – यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव।
तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्षमेनं शतशारदाय।।
यदि रोग के कारण न्यून आयु वाला हो, अथवा संसार के सुखों से दूर हो गया हो, चाहे मृत्यु के निकट पहुँच चुका हो – ऐसे रोगी को भी महारोग के पाश से छुड़ाता हूँ। इस रोगी को सौ शरद् ऋतुओं तक जीने के लिये प्रबल किया है। इससे यह विदित होता है कि खराब से खराब अवस्था को रोगी जिसे चिकित्सक लोग असाध्य कह देते हैं हवन यज्ञ से अच्छा हो सकता है।
2. आयुर्वेद के प्रामणिक ग्रन्थ चरक का प्रमाण- यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुरा जितः।
तां वेदविहितामिष्टिमारोग्या र्थी प्रयोजयेत्।।
जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था आरोग्य चाहने वाले मनुश्य को उसी वेदविहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये।
3. होमियोपैथिक से पृष्टि-
होमियोपैथिक चिकित्सा के आविष्कार कर्ता हैनीमान साहब अधिक निर्बल रोगियों को खिलाने के स्थान में केवल औशधि सुँघाने का परामर्श देते हैं और उसके लिये वह अपनी प्रसिद्ध पुस्तक की की धारा 190 में लिखते है जो औशधि के प्रभाव को शीध्र ग्रहण करता है। सबसे अधिक प्रभाव ओषधि का सूँघने और श्वास लेने से होता है। यदि हैनीमन साहब के समय जर्मनी में यज्ञ का प्रवाह हेाता तो अवश्य ही वे इसे चिकित्सा का प्रधान अंग बनाते ।
4. ऐलोपैथिकमत से पुष्टि-
एलोपैथिक डाक्टरी में तपेदिक के रोगी ज्ञतमवेवजम और म्नबंसलचजने वपस को इत्यादि का प्दींसंजपवद बनाकर सुँघाने हैं और इसका प्रभाव तत्काल होता है। वैसे वही ज्ञतमवेवजम खिलाया भी जाता हैं पर वह इतना शीध्र प्रभाव नहीं करता। ऐसा क्यों होता है। इसीलिये कि सूँधी हुई दवा के सूक्ष्म परमाणु सीधे फेफडे़ में पहुँचकर अपना प्रभाव करते हैं। पर उनमें वह शक्ति नहीं कि स्थायी प्रभाव रख सकें, जैसा कि अग्नि से छिन्न-भिन्न हुई ओषधि के परमाणु रख सकते है।
वैद्यक के अनुसार-
मैंने अपने कई वर्षों की चिकित्सा के अनुभव से निश्चय किया है, जो महारोग ओषधिभक्षण करने से दूर नहीं होते वे वेदोक्त यज्ञों द्वारा दूर हो जाते हैं।
विद्वानो के अनुभव
फ्रांस के विज्ञानवेत्ता प्रो. टिलवर्ट कहते हैं कि जलती हुई खाँड के धुएँ में वायु शुद्ध करने की वड़ी शक्ति है। इससे हैजा, तपेदिक, चेचक इत्यादि का विष शीध्र नष्ट हो जाता है।
डाक्टर टाटलिट साहब ने मुनक्का, किशमिश इत्यादि सूखे फलों को जला कर देखा है और मालूम किया है कि इनके धुँए से टाइफायड ज्वर के कीटाणु केवल आधे धण्टे में और दूसरे रोगों के कीटाणु धण्टे, दो घण्टें में समाप्त हो जाते हैं।
मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर डाक्टर कर्नल किंग त्ण्डण् ने कालि के विद्यार्थियों को बताया कि घी, चावल में केसर मिलाकर जलाने से रोग के कीटाणुओं का नाश होता है।
फ्रांस के डाक्टर हेफकिन, जिन्होंने चेचेक की टीका ईजाद किया, कहते हैं कि घी जलाने से रोगकृति मर जाते हैं।
केमिकल प्रारपटीज की राय-
जयफल, जावित्री, बड़ी इलायची, सूखा चन्दन इत्यादि अग्नि में जलाने से मुफीद हिस्से ज्यों के त्यों रहते हैं या सूक्ष्म हो जाते हैं। पहले पहल इनसे सुगन्धित तेल गैस बनकर निकलते हैं। हवन गैस मेंयह चीजें अपने असली रूप में मिलती हैं। अग्नि इन चीजों को गैस बना देती है। उड़ाने वाले तेलों के परमाणु 1, 0000 से 1, 10000000 सेंटीमीटर व्यासवाले देखे गये हैं। अतः हवन में इन चीजों के गुण बहुत बढ़ जाते हैं और ये आसानी से कीटाणुओं का नाश करते हैं।