वायरस

अष्ठांग आयुर्वेद का एक अंग है- भूत-चिकित्सा जिसमें भूत अर्थात् विषाणु जनित रोगों की चिकित्सा का विस्तार पूर्वक वर्णन मिलता है। भूत अर्थात् विषाणु को आज का चिकित्सा विज्ञान (virus) के नाम से जानता है। विषाणु जनित रोग भी अनेक हैं, जिसकी औषधिय चिकित्सा अधुनिक चिकित्सा शास्त्रीयों के पास लगभग नहीं है। परंतु वैदिक व पौराणिक काल में यह चिकित्सा आयुर्वेदिक औषधियों तथा मंत्रों के द्वारा सहज ही उपलब्ध थी।

Medical Astrology, Ayurveda & Astrology

इस प्रकार के रोगों को जटिल रोगों की श्रेणी में रखा गया है, आज वायरस जनित रोगों के रूप में जिन रोगों को पहचाना जा चुका है उनमें- लीवर के कुछ रोग जैसे- 1. हैपेटाईटस ए, बी, सी, इत्यादि, 2. चेचक या चेचक जैसे रोग- पोक्स, चिकन-पोक्स, चिकन-गुनिया इत्यादि, 3. गलगण्ड, 4. फलू श्रेणी के कुछ रोग जैसे स्वाईन फलू इत्यादि, 5. फाईलेरिया इत्यादि प्रमुख है। और अब एक नया रोग ईबोला सामने आया है।

इस के अतिरिक्त भी अनेक रोग हैं जो कभी-कभी अनुकूल वातावरण मिलने पर तुरंत प्रकट होते हैं। इनमें से अनेक रोग तो ऐसे हैं जो सैकडों वर्षो के बाद तब प्रकट होते हैं जब उनके विषाणुओं को अनुकूल मौसम तथा परिस्थिति मिलती है। इसी लिये ऐसे रोग जब-जब प्रकट होते हैं तब-तब आधुनिक चिकित्सा शास्त्री हैरान व परेशान हो जाते हैं। क्योकि उनके लिये सामान्य रोगों से हटकर यह बिलकुल नये रोग होते हैं। जैसा की गत कुछ वर्षो में नये-नये रोग प्रकट होते दिखाई देते रहे हैं।

आज चिकित्सा विज्ञान ने बेशक अनेक रोगों की चिकित्सा में विशेषकर ऐसे रोग जिनमें शल्यक्रिया की आवश्यकता होती है, के लिये काबिले-तारीफ प्रगति की है। परंतु वहीं यह अधुनिक चिकित्सा विज्ञान अनेक ऐसे विषाणु जनित रोगों से अपरिचित भी है, जिनकी चिकित्सा का वर्णन वेद-पुराणों एवं आयुर्वेद तथा मंत्रशास्त्रों में मिलता है। परंतु इसमें भी कठिनाई यह है कि- यह विवरण तथा उपचार पद्धितियाँ वेदों में, पुराणों में, आयुर्वेदिक चिकित्सा शास्त्र में, तथा मंत्र-तंत्र के प्राचीन ग्रन्थों में बिखरी हुई हैं। आज आवश्यकता है, इन्हें पहचान कर संकलित करने की और जठिल रोगों की चिकित्सा में इनका प्रयोग करने की। वैदिक तथा पौराणिक काल में अनेक ऐसे विषाणु जनित रोगों की पहचान की गई थी। इन्हीं विषाणु जनित रोगों में से कुछ वह रोग भी हैं जिन्हें आज का चिकित्सा विज्ञान मानसिक रोग मानता है। परंतु स्याने या ओझा तथा आयुर्वेद भी इन रोगों की पहचान भूतरोग (virus) से होने वाले रोगों के रूप में न केवल करता है, अपितु इनकी सफल चिकित्सा भी सुझाता है, यह बात अलग है कि आज उन रोगों की चिकित्सा करने वाले घीरे-धीरे लुप्त हो गये हैं। इनके लुप्त होने का एक कारण यह भी है कि इस चिकित्सा पद्धति को जानने वालों को जादू-टोना कर दूसरों को हानि पहुचाने वाला तांत्रिक माना जाता था, बेशक इनमें से कुछ स्याने इस प्रकार की दुष्प्रवृति वाले रहे होंगे। आज से 50-100 वर्ष पूर्व तक भी इन पद्धतियों को जानने वाले अनेक विद्वान उपलब्ध थे। जिन्हें आम लोग अपनी भाषा में स्याना या ओझा कहते थे। यह स्याने मंत्रो के साथ-साथ औषधियों का समुचित ज्ञान भी रखते थे। आज भी इन में से थोड़ी बहुत विद्या जानने वाले इन का सफल प्रयोग ऐसे ही विषाणु जनित रोगों पर किया करते हैं। जैसे- पीलिया रोग का झाड़ा करने वाले स्याने, गलगण्ड तथा फाईलेरिया की मंत्र चिकित्सा करने वाले ओझा और फलू की चिकित्सा करने वाले मांत्रिक।

अनेक मानसिक रोग हैं, जिन्हें आयुर्वेद शास्त्र भूत-चिकित्सा के नाम से पहचानता है, इनमें भी अधिकांश मानसिक रोगों की शिकार महिलायें ही होती हैं, यह वह मातायें बहने होती हैं, जो मासिक के दिनों में सफाई का विशेष ध्यान नहीं रखती हैं। इस प्रकार के भूतों (विषाणुओं) के अनेक नाम भी आयुर्वेद शास्त्र में वर्णित हैं। इसी प्रकार नवजात शिशुओं को होने वाले कुछ विषाणु जनित रोगों का वर्णन भी इन शास्त्रों में वर्णित हैं। जिनके बचाव तथा उपचार का वर्णन भी सविस्तार मिलता है।

भूत-चिकित्सा हेतु चिकित्सा पद्धतियां?- विषाणु जनित रोगों की चिकित्सा करने वाले विशेषज्ञ जानते थे की किस प्रकार के विषाणु से होने वाले रोग की क्या पहचान है, तथा उस जठिल रोग की चिकित्सा में किस प्रकार की वनौषधि तथा किस प्रकार के मंत्रोपचार और किस तिथि, वार, नक्षत्र, योग व करण से बनने वाले विशेष योग (मुहूर्त) में आरम्भ करनी है, अथवा किस योग मुहूर्त में इनमें से किस प्रकार के रोग की औषधि तैयार की जानी चाहिये। इस प्रकार भूत-चिकित्सा में आयुर्वेद तथा मंत्रशास्त्र के साथ-साथ ज्योतिषीय योगदान भी बराबर का था। वैसे तो इन रोगों के अनेक ज्योतिषीय योग शास्त्रों में वर्णित हैं परंतु अधिकांश विषाणु जनित रोगों के प्रमुख कारक ग्रह शनि-राहु का विशेष योग होता है। इन कष्टसाध्य रोगों का विचार कुण्डली में लग्न, षष्ठ, अष्टम दोनों से, अष्टमात् अष्टम से अर्थात् तृतीय भाव, षष्ठात् षष्ठ अर्थात् एकादश व व्यय स्थान से किया जाता है। इसी प्रकार इन रोगों का उपाय-दवाई निर्माण तथा भक्षण का मुर्हूत चिंतामणि के मतानुसार इस प्रकार है –

भेषऽयं सल्लघुमृदुयरे मूलभे द्वयंगलाने।।
शुक्रेन्द्विज्यें विदि च दिवसे चापि तेषां रवेश्च
शुद्धेरिःफधुनमृतिगृहे सतिथौ नो जनर्भे।।

लघु संज्ञक- हस्त, अश्विनी, पुष्य, मृदु-मृगशीर्ष रेवती, चित्रा, अनुराधा, चरसंक्षक, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और मूल नक्षत्र में तथा द्विस्वभाव लग्न में शुक्र, सोम, गुरू, बुध, और रविवार के दिन में लग्न से सातवें, आठवें व बारहवें भाव शुद्ध हों, जन्म नक्षत्र न हो तथा शुभ तिथि में औषधि (दवाई) का सेवन अथवा निमार्ण करना श्रेष्ठ है। मेरे विचार से आज के समय में सभी विषाणु जनित तथा अन्य रोगों के उपाय में मंत्र सिद्ध कवच (ताबीज) तथा ग्रहों के रत्नादि का धारण करना भी कारगर उपाय हैं।

किस प्रकार की जाती थी इन रोगों की चिकित्सा?-

1. विशेष मंत्रों को जिस साधक ने सिद्ध किया हो ऐसे साधक को अधिकार प्राप्त होता है कि वे उस मंत्र का प्रयोग जन कल्याण के लिये कर सकता है, वह सिद्ध किसी मोरपंखे, झाडू या चक्कू से रोगी पर मंत्र का झाड़ा करता है जिससे विषाणु जनित रोग शीघ्र शांत होते हैं।

2. कम-से-कम 12 वर्ष तक गायत्री साधना करने वाले साधक गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित जल (मंजे हुये शुद्ध बर्तन में शुद्ध कूपजल या गंगाजल डालकर 11 बार गायत्री मंत्र बोलते हुये उसमें दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुली फिराकर रोगी तथा रोगी के कमरे में सर्वत्र छिड़क दें। थोड़ा-थोड़ा, प्रातः संध्या दोनों समय उस व्यक्ति को पिला दें और उसके बिछौनों पर छिड़क दें। उसके कान में गायत्री मंत्र सुनायें। गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित गंगाजल नहाते समय उसके मस्तक पर थोड़ा सा डाल दें।

3. श्रीमद्भागवत गीता का यह श्लोक उसको बार-बार सुनायें और कई कागजों पर लिखकर दीवाल पर टांग दें:-

स्थाने हृषीकेश तब प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो प्रेवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंधा।। (11।36)

इसके द्वारा (उपर्युक्त रीति से) अभिमंत्रित जल भी रोगी को पिलाना चाहिये। किसी मांत्रिक से सिद्ध यंत्र मंगलवार के दिन भोजपत्र पर लाल चंदन से लिखकर (पुरूष हो तो दाहिने हाथ में, स्त्री हो तो बायें हाथ में) चांदी या तांबे के ताबीज में डालकर, धूप देकर बांध दें, और प्रतिदिन गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित जल उस पर छिड़कते और उसे पिलाते रहें।

4. ऐसे और भी बहुत से मंत्र-यंत्र हैं, जो प्रेत-पीड़ा निवारण के सफल साधन हैं। परन्तु इनके जानकार बहुत कम मिलते हैं, ओर आज कल तो अधिकांश स्थानों पर ठगी भी चलती है। और भी अनेक यंत्र-मंत्र तथा शास्त्रीय उपाय-उपचार हैं, जिनका वर्णन इस छोटे से लेख में करना संभव नहीं है, अतः मंत्र-तंत्र-यंत्र के प्रयोग किसी विश्वास वाले साधक से ही लेने चाहियें जो इस विद्या पर अधिकार रखता हो। जो पाठक श्रद्धा रखते हों वे इस गायत्री सेवक डा. आर. बी. धवन से भी (झाड़ा) मंत्रोपचार के लिये सम्पर्क कर सकते हैं। आयुर्वेद में भूतबाधा की चिकित्सा का उल्लेख विशेष धूपों तथा अर्ध्यों के रूप में भी है, जिनसे यह पीड़ा शीघ्र मिट जाती है। उनका उपयोग भी हानिकर नहीं है, परन्तु उसमें भी जानकार विद्वान की जरूरत तो है ही। ऐसे कई देवस्थान भी हैं, जहाँ जाने से बाधायें दूर होती हैं। महामृत्युंजय मंत्र का जप, श्रीहनुमान चालीसा तथा बजरंग बाण के पाठ से भी भूतबाधा दूर होती हैं।

लेखक Dr.R.B.Dhawan

सुश्रुतसंहिता

शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के पितामह और सुश्रुतसंहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व काशी में हुआ था। सुश्रुत का जन्म विश्वामित्र के वंश में हुआ था। इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की थी।

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

सुश्रुतसंहिता को भारतीय चिकित्सा पद्धति में विशेष स्थान प्राप्त है। इसमें शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है। शल्य क्रिया के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए खोजे गए थे। इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयां, चिमटियां आदि हैं। सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की। आठवीं शताब्दी में सुश्रुतसंहिता का अरबी अनुवाद किताब-इ-सुश्रुत के रूप में हुआ। सुश्रुत ने कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता हासिल कर ली थी।

एक बार आधी रात के समय सुश्रुत को दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। उन्होंने दीपक हाथ में लिया और दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही उनकी नजर एक व्यक्ति पर पड़ी। उस व्यक्ति की आंखों से अश्रु-धारा बह रही थी और नाक कटी हुई थी। उसकी नाक से तीव्र रक्त-स्राव हो रहा था। व्यक्ति ने आचार्य सुश्रुत से सहायता के लिए विनती की। सुश्रुत ने उसे अन्दर आने के लिए कहा। उन्होंने उसे शांत रहने को कहा और दिलासा दिया कि सब ठीक हो जायेगा। वे अजनबी व्यक्ति को एक साफ और स्वच्छ कमरे में ले गए। कमरे की दीवार पर शल्य क्रिया के लिए आवश्यक उपकरण टंगे थे। उन्होंने अजनबी के चेहरे को औषधीय रस से धोया और उसे एक आसन पर बैठाया। उसको एक गिलास में शोमरस भरकर सेवन करने को कहा और स्वयं शल्य क्रिया की तैयारी में लग गए। उन्होंने एक पत्ते द्वारा जख्मी व्यक्ति की नाक का नाप लिया और दीवार से एक चाकू व चिमटी उतारी। चाकू और चिमटी की मदद से व्यक्ति के गाल से एक मांस का टुकड़ा काटकर उसे उसकी नाक पर प्रत्यारोपित कर दिया। इस क्रिया में व्यक्ति को हुए दर्द का शौमरस ने महसूस नहीं होने दिया। इसके बाद उन्होंने नाक पर टांके लगाकर औषधियों का लेप कर दिया। व्यक्ति को नियमित रूप से औषाधियां लेने का निर्देश देकर सुश्रुत ने उसे घर जाने के लिए कहा।

सुश्रुत नेत्र शल्य चिकित्सा भी करते थे। सुश्रुतसंहिता में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। सुश्रुत को टूटी हुई हड्डी का पता लगाने और उनको जोड़ने में विशेषज्ञता प्राप्त थी। शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्यपान या विशेष औषधियां देते थे। सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे।
उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया। प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे। मानव शरीर की अंदरूनी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया तथा इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया। उन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर संरचना, काया-चिकित्सा, बाल रोग, स्त्री रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी। कई लोग प्लास्टिक सर्जरी को अपेक्षाकृत एक नई विधा के रूप में मानते हैं। प्लास्टिक सर्जरी की उत्पत्ति की जड़ें भारत की सिंधु नदी सभ्यता से 4000 से अधिक साल से जुड़ी हैं। इस सभ्यता से जुड़े श्लोकों को 3000 और 1000 ई.पू. के बीच संस्कृत भाषा में वेदों के रूप में संकलित किया गया है, जो हिन्दू धर्म की सबसे पुरानी पवित्र पुस्तकों में में से हैं। इस युग को भारतीय इतिहास में वैदिक काल के रूप में जाना जाता है, जिस अवधि के दौरान चारों वेदों अर्थात् ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद को संकलित किया गया। चारों वेद श्लोक, छंद, मंत्र के रूप में संस्कृत भाषा में संकलित किए गए हैं और सुश्रुत संहिता को अथर्ववेद का एक हिस्सा माना जाता है।

सुश्रुत संहिता, जो भारतीय चिकित्सा में सर्जरी की प्राचीन परंपरा का वर्णन करता है, उसे भारतीय चिकित्सा साहित्य के सबसे शानदार रत्नों में से एक के रूप में माना जाता है। इस ग्रंथ में महान प्राचीन सर्जन सुश्रुत की शिक्षाओं और अभ्यास का विस्तृत विवरण है, जो आज भी महत्वपूर्ण व प्रासंगिक शल्य चिकित्सा ज्ञान है। प्लास्टिक सर्जरी का मतलब है- शरीर के किसी हिस्से की रचना ठीक करना। प्लास्टिक सर्जरी में प्लास्टिक का उपयोग नहीं होता है। सर्जरी के पहले जुड़ा प्लास्टिक ग्रीक शब्द प्लास्टिको से आया है। ग्रीक में प्लास्टिको का अर्थ होता है बनाना, रोपना या तैयार करना। प्लास्टिक सर्जरी में सर्जन शरीर के किसी हिस्से के उत्तकों को लेकर दूसरे हिस्से में जोड़ता है। भारत में सुश्रुत को पहला सर्जन माना जाता है। आज से करीब 2500 साल पहले युद्ध या प्राकृतिक विपदाओं में जिनकी नाक खराब हो जाती थी, आचार्य सुश्रुत उन्हें ठीक करने का काम करते थे।