केले के गुण

केले के गुण केला एक बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक व गुणकारी फल है। केले की गिनती हमारे देश के उत्तम फलों में होती है और इसको मांगलिक कार्यो में भी विशेष स्थान दिया गया है। विदेशों में भी इसके गुणों के कारण इसे स्वर्ग का सेव और आदम की अंजीर नाम प्रदान किये गये हैं। आमतौर पर लोगों की यह धारणा होती है कि जब केले खूब पक जाते हैं या पिलपिले हो जाते हैं, तब उनमें कीटाणु पैदा हो जाते हैं, किन्तु यह गलतफहमी है। जब तक केले का छिलका उसके गूदे पर पूरी तरह चिपका होता है, तब तक वह कीटाणुरहित रहता है। इसलिए खूब पके हुए केले भी पूरी तरह खाने योग्य एवं हानिरहित हैं। कुछ लोगों की धारणा यह भी है कि केले पचने में भारी होते हैं। दरअसल कच्चे या अधपके केलों को खाने से ऐसा होता है, क्यों कि वह असानी से हमारे पेट में सरलता से पचने वाली शर्करा में परिवर्तित नहीं होते हैं, फिर भी केले खाने के बाद यदि भारीपन महसूस हो तो एक या दो इलायची ऊपर से खाने से तुरन्त पेट में हल्कापन आ जाता है। केले के छिलके का हरा रंग लुप्त होते ही वह खाने के योग्य हो जाते हैं, तथा उनके छिलके काले होने के पश्चात् तक खाने योग्य रहते हैं, बशर्ते उनका छिलका गूदे से चिपका हो। केले के पौधे हरे, 10 से 12 फीट ऊँचे तथा काष्ठहीन होते हैं। इनके पत्ते काफी बड़े होते हैं। इसके पौधे में शाखाएँ नहीं होती तथा स्तम्भ पर्तदार होता है। केले के गूदे में 1.5 प्रतिशत प्रोटीन, लगभग 3 प्रतिशत विटामिन्स, 20 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स और बाकी ज्यादातर जल तत्व होता है। इसलिए पके हुए केलों को खाने से अजीर्ण नहीं होता। भारतीय ग्रन्थों में भी केला और दूध साथ-साथ खाने को पूर्ण भोजन कहा गया है। यह तथ्य इसलिए भी स्पष्ट हो जाता है कि हमारे भोजन के जो घटक केले में नहीं होते, वे दूध से प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार दूध केले खा लेने के पश्चात् किसी भी व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती है। यह योग एक सन्तुलित आहार का कार्य करता है। छोटे बच्चों को नित्य कम से कम एक केला खिलाने से उनमें उत्तम विकास देखा जा सकता है। केले के भक्षण से शरीर में बल की वृद्धि होती है, केले में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, ताँबा, सीसा, आयोडीन, सोडीयम मैग्नीज आदि अनेक शरीरोपयोगी खनिज तत्व होते हैं। इस प्रकार हर दृष्टि ये यह उत्तम फल है।
पके केले के गुण- स्वादिष्ट, शीतल, वीर्यवर्धक, शरीर के लिए पुष्टिकारक, माँस को बढ़ाने वाला, भूख-प्यास को दूर करने वाला तथा नेत्र रोग और प्र्रमेह नाशक है।
कच्चे केले के गुण- शीतल, ग्राही एस्ट्रीजेन्ट्स–यानी जो अपनी क्रिया द्वारा शरीर के दोश, मल व धातु को सोख ले पाचन में भारी, रक्त, पित्त, वायु कफ विकार तथा क्षय को दूर करने वाला होता है।
केले का औशधीय महत्व
1 वजन बढ़ाने के लिए– एक पाव दूध के साथ नित्य दो केलों का सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और शरीर का वजन बढ़ता है।
2 आँत सम्बन्धी रोगों में– कई लोगों की आँतों में गड़बड़ी होने के कारण उन्हें दस्त पेचिश की शिकायतें बनी रहती हैं। ऐसे लोगों को दो केले उनके (केलों के) वजन से आधे वजन के दही के साथ सेवन करना लाभकारी है।
3 मुँह के छालों के लिए– कुछ लोगों को आये दिन मुँह में छाले हो जाते हैं। ऐसे लोगों को चाहिए कि वे गाय के दूध से निर्मित दही के साथ केला खायें। यह प्रयोग सात से दस दिन तक करना पड़ता है।
4 पेट के कीड़े मारने तथा खून शुद्ध करने के लिए– इसके लिए केलों की जड़ के अर्क का सेवन लाभदायक है। इस अर्क को बनाने के लिए लगभग एक किलो जल में 50 ग्राम केले की जड़ डालकर इतना गर्म करें कि जल की मात्रा आधी हो जाए। इसके बाद मिश्रण छान लें। यही छानन अर्क है। इसी अनुपात में ताजा अर्क बनाए। अर्क की दो तोला मात्रा एक बार में लें।

चमत्कारी वनौशधियाँ

चमत्कारी वनौशधियाँ भारतीय ज्योतिष शास्त्रों में सूर्य को जगदात्मा कहा गया है। यह सही भी है, क्योकि सृष्टि में बगैर सूर्य के विनाश सुनिश्चित है। वास्तव में सूर्य के प्रकाश में एक विशेष शक्ति निहित होती है। इसी जीवनी शक्ति के द्वारा पौधे अपने भोजन की प्राप्ति करते हैं तथा विभिन्न प्राणी भी इस पर आश्रित है। सृष्टि में जीवनचक्र को जहां सूर्य नियंत्रित करता है, वहीं दूसरी और वायुमंडल के विभिन्न गैसीय चक्र भी इसी के अधीन हैं। सूर्य की रश्मियों में सात प्रमुख रंगों (बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नांरगी और लाल) का एक संतुलित सम्मिश्रण होता हैं, इसलिए सृष्टि का निर्माण करने वाले पांचों तत्त्व अर्थात् जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी को सूर्य अपने ही रंग में समेटे हुए है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। सूर्य रश्मियों में विचित्र कीटाणुनाशक क्षमता भी है। इसीलिए जिस घर में सूर्य के प्रकाश का प्रवेश रहता है, उस घर के सभी प्राणी स्वस्थ रहते हैं। इसके विपरीत ऐसे कमरों में रहने वाले, जहां सूर्य का समूचित प्रकाश नहीं पहुंचता, अस्वस्थ तो रहते ही हैं, साथ ही उनकी बुद्धि-बल का भी पूर्ण विकास नहीं होता और न्यूनता दृष्टिगोचर होती है। हम यह भी देखते हैं, कि छाया में पड़ने वाले पौधे अच्छी फसल नहीं दे पाते और सूर्य के प्रकाश के अभाव में कोई भी पौधा पनप नही सकता। इसी प्रकार जिस जलाशय मे धूप नहीं पहुंचती उसमें कीड़े पैदा हो जाते हैं। इसके विपरीत सूर्य का प्रकाश का प्राप्त करने वाले जलाशयों का जल स्वच्छ तथा कीटाणुमुक्त तो होता ही है, इसके साथ ही साथ वह शक्ति का संचार करने वाला भी होता है। सूर्य के प्रकाश से समस्त सृष्टि लाभान्वित होती है। जड़ -चेतन सभी पर इसका समरूप प्रभाव पड़ता है। एक भारतीय महात्मा ‘स्वामी ज्ञानानन्द’ ने तो सूर्य-रश्मियों से तमाम पदार्थो को उत्पन्न कर संसार को चमत्कृत कर दिया था। सूर्य के इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण भारतीय ऋषि- मुनियों और वेदाचार्यो ने सूर्य को देवता कहा है। सूर्य-चमत्कार, संध्योपासना, सूर्य जल अर्पण आदि क्रियाओं के सम्पन्न करने के पीछे भी यही रहस्य हैं। हमारे पूर्वजों को सौर रश्यिमों की सहायता से अनेक औशधियों के निर्माण की जानकारी थी।
वनौषधियों के प्रयोग

मिर्गी के लिए– जायफल आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला फल है। इक्कीस ‘जायफल’ लाकर उनमें से सात जायफल ‘नीले रंग की बोतल में’ तथा सात जायफल हरे रंग की बोतल में सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक धूप में रखें। इस चैदह जायफल को शेष (बिना धूप में रखे), सात जायफल के साथ पिरोपकर एक माला बनाकर मिर्गी के रोग को पहनाने से उसे मिर्गी के दौरे आने बंद हो जाते हैं।
चेहरे की फुन्सियों को हटाने के लिएः– लगभग सौ मि0 ली0 ‘अंरडी के तेल’ को ‘लाल रंग की काँच की बोतल’ में सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखा रहने दें। लाल रंग की बोतल उपलब्ध न हो तो एक सफेद बोतल के चारों ओर लाल पारदर्शक पन्नी लपेट कर ऐसा किया जा सकता हैं। इस अरंडी के तेल में कपड़े से छना गया महीन ‘बेसन’ मिलाकर इससे बने उबटन को नियमित कुछ देर तक चेहरे पर लगाकर, तदुपरान्त चेहरा धोने से चेहरे पर विकसित होने वाली फुन्सियां दूर हो जाती हैं और चेहरा साफ हो जाता है। आवश्यकता हो, तो रात्रि पर्यन्त इस मिश्रण को चेहरे पर लगाये रहना चाहिए और सुबह-सुबह उसे धो लेना चाहिए। इस सम्बन्ध में अपने चिकित्सक से परामर्श ले लें।
लकवा दूर करने के लिएः– इसके लिए 100 मि0 ली0 ‘सरसो का शुद्ध तेल’ लें, इस तेल में एक तोला ‘काली मिर्च’ का कपड़े की सहायता से छना चूर्ण मिलावें। इसी प्रकार दस ग्राम ‘भांग’ का चूर्ण भी इसमें मिलाकर इस मिश्रण को 10 मिनट तक उबालें। ठंडा होने पर इस तेल को छानकर एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर उसके चारों ओर एक लाल पन्नी लपेट कर सूर्योदय तक सूर्य के प्रकाश में रखें। इस तेल की मालिश लकवे वाले भाग में करने से सम्बन्धित भाग में रक्त का प्रवाह आरम्भ हो जाता है।
कांच निकलना रोकने के लिए– कुछ लोगों को मलत्याग के समय थोड़ी या अधिक आंत्र बाहर निकल आती है, इसे कांच निकलना कहते हैं। इसके लिए थोड़ी सी ‘फिटकारी’ एक नीली बोतल’ में भरकर उसे सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखें। इस बोतल को रख लें। नियमित शौच के समय इस फिटकारी की थोड़ी सी मात्रा जल में घोलकर उस जल से गुदा प्रक्षालन करने से कांच निकलना बंद हो जाता है।
श्वेत कुष्ठ निवारणः– सफेद दाग अथवा फूलबहरी दूर करने के लिए ‘बावची का तेल’ एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर उस बोतल के चारों ओर एक लाल पन्नी लपेट कर इस बोतल को दस दिन तक नियमित सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखें। रात्रि में इसे घर के अंदर रखें। इस तेल को फूलबहरी पर लगाने से वह ठीक हो जाती है। अधिक प्रसारित दागों पर यह उपचार काफी समय लेता है।
जोड़ो का दर्दः– लगभग दो सौ मि0 ली0 उपयोग किया हुआ घी लें इसमें एक तोला ‘शुद्ध कपूर’ एक तोला ‘तारपीन का तेल’ तथा एक तोला ‘गिरनार का तेल मिलाकर इस मिश्रण को ‘लाल पन्नी युक्त बोतल’ में भरकर सूर्योदय से सूर्यास्त तक दस दिन तक धूप में रखें। रात्रि में इसे चांदनी में न रखें। दस दिन बाद इस मिश्रण में दस मिलीमीटर ‘मिथाइल सेलीसिलेट’ मिला दें (प्राचीन काल में इसके स्थान पर ‘बाम का पौधा’ मिलाया जाता था)।
इस तेल की समय-समय पर घुटनों तथा जोड़ों पर मालिश करने से दर्द का शमन होता हैं।
त्वचा रोग – ‘नीम के तेल’ की वांछित मात्रा ‘हरी बोतल’ में भरकर दस दिन तक उसे सूर्योदय तक धूप में रखें। त्वचा रोगों में विशेष रूप से फोड़े-फुंसी तथा खुजली, एक्जीमा आदि में यह तेल प्रभावशाली है, इसे सम्बन्धित स्थान पर लगाया जाता हैं।
इन्द्रिय दौर्बल्य हेतु – इसके लिए शुद्व ‘तिल का तेल’, एक स्वच्छ ‘सफेद बोतल’ में भरकर उस बोतल के चारों ओर लाल पन्नी लपेट कर दस दिनों तक उसे सुबह से लेकर शाम तक धूप में रखें। इस तेल को इन्द्रिय पर नियमित लगाने से उसकी दुर्बलता समाप्त होती हैं।
टॉन्सिल्स के लिएः– बड़ी कटेली को समूचा ही उखाड़ लावें, घर लाकर इसे पानी से भली प्रकार से धोकर एक बड़े बर्तन में रखकर उसमें इतना पानी डालें, कि पौधा आधा डूब जाय। अब इसें उबालें, जब पानी आधा या इससे कुछ कम रह जाय, तो इसे उतार कर छान लें इस छानन को एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर लगभग दो घंटे धूप दिखायें। इस छानन से गरारे करने पर बढ़े हुए टान्सिल्स तुरंत बैठ जाते हैं। अनेक आयुर्वेदिक औशधियां हैं जो हम अपने दैनिक खाद्य पदार्थो के साथ में प्रयोग करते हैं जिनका मानव अपने जीवन में सन्तुलित उपयोग कर अपने स्वास्थ्य को अच्छा बनाये रख सकता हैं, वे क्रमशः इस प्रकार हैं-

  1. धनिया
  2.  मिर्च
  3. सौंफ।

धनिया– धनिया से तो सभी लोग परिचित हैं, नित्य अपनी दाल सब्जी में हम इसे मसाले के रूप में प्रयोग करते हैं, जिससे खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट बन पाता है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औशधि है, जिसमें मानव स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त गुण, धर्म पाये जाते हैं। धनिया मुख्यतः भारत तथा विशेषकर रूस, मोरक्को आदि में प्रमुखता से पैदा होती है। यह एक छोटा सा पौधा होता हैं, जिसमें बीज युक्त छोटे-छोटे फल लगते हैं। बाद में सूख जाने पर उन्हें मसाले के रूप में उपयोग में लाते हैं।
प्रमुख तत्वः– धनिया में मुख्यतः बोलाटाईट तेल तथा प्रमुख तत्व लिनालोन पाया जाता है, जिसके कारण इसमें सुगन्ध बनी रहती हैं। इसके अतिरिक्त इसमें पाईनीन तथा थाईमोल, फिक्सआयल एवं प्रोटीन पाया जाता हैं।
उपयोगः– यह पाचन संस्थान के लिए अत्यन्त उपयोगी है। इसके सेवन से भोजन का अत्यधिक दबाव आन्तरिक अंगो पर नहीं पड़ पाता है, जिससे पाचन क्रिया सुगमता पूर्वक सम्पन्न होती है। यह पेट की दर्द में अत्यन्त लाभकारी औशधि है, जिससे पेट में अपच, गैस आदि की सम्भावना नहीं रहती है। इसका सीमित उपयोग खाद्य पदार्थो में करना उपयुक्त रहता हैं।
मिर्च– मिर्च से प्रायः सभी परिचित है। यह देश के प्रत्येक भाग में पाई जाती है, विशेषतः लाल होने पर इसे मसालों में प्रयोग में लाया जाता हैं। वनस्पति विज्ञान में इसका नाम ‘कैपसीकम’ मिनीमम है। यह जापान, अफ्रीका, एवं भारत में प्रचूर मात्रा में पाई जाती हैं।
प्रमुख तत्व – इसमें मुख्यतः केपसीयासन, विटामिन सी तथा कैराटिन नामक तत्व पाया जाता है, जिसके कारण रंग लाल होता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन बी भी पाया जाता है।
उपयोग– यह भी खाद्य पदार्थो में मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता हैं, जिससे भोजन में स्वाद के गुण आते हैं। यह विशेषतर जोड़ों के दर्द में, सूजन तथा पेट में पाचन क्रिया में पाचक के रूप में सहायक होता हैं। यदि इसे उचित मात्रा में नित्य प्रयोग किया जाए, तो व्यक्ति में पाचन संस्थान एवं शरीर में जोड़ों आदि की तकलीफ एवं दर्द नही होता है।
सौंफ -सौंफ प्रायः भारत तथा अन्य देशों में भी पाई जाती है। विदेशों में यह यूरोप, जापान तथा जापान तथा जर्मनी में पाई जाती है। वनस्पति शास्त्र में इसका नाम ‘फोरनिकुलमबलगेर’ हैं, इसका पौधा दो या तीन फीट लम्बा होता हैं इसमें जो फल लगता हैं सूखने पर उसे प्रयोग में लाते हैं।
प्रमुख तत्व – सौंफ में एनथोल तथा फैनकोन नामक तत्व पाया जाता है, जिसके कारण इसमें सुगन्ध एवं मीठा स्वाद होता हैं। इसके अतिरिक्त इसमें फिक्स तेल तथा प्रोटीन भी पाया जाता है।
गुण– यह श्वसन संस्थान के लिए अत्यन्त उपयोगी औशधि है, विशेषकर खाँसी में यह अच्छा कार्य करता है। इसके अतिरिक्त पाचन संस्थान में अपचन की स्थिति में पाचक के रूप में अच्छा कार्य करता हैं। इसके साथ ही लोग इसका उपयोग घर में माउथ वाश आदि के रूप प्रयोग करते है, जिससे व्यक्ति सुन्दर एवं स्वस्थ बना रहता है।

साधारण पौधा आक

साधारण पौधा आक आक अथवा मदार पूरे भारत में सरलता से उपलब्ध होने वाला एक महत्वपूर्ण पौधा है। यह दो प्रकार का होता है। एक वह जिसके फूल बैंगनी रंग लिये हुए होते हैं और दूसरा वह, जिसके फूल सफेद होते हैं। इसके फल देखने में कच्चे आम के समान होते हैं। ये ज्येष्ट माह में पक जाते हैं। इनके अंदर काले रंग के दाने तथा रूई जैसी निकलती हैं। यह झाड़ी नुमा होता है। इसकी पत्तियाँ मोटी तथा शिराओं वाली होती हैं। पत्तियों और हरे तने व शाखाओं को देखने पर ऐसा लगता है, मानो उन पर पाउडर छिड़का हुआ हो। पत्ती अथवा डण्डी को तोड़ने पर इसमें से दूध जैसा पदार्थ निकलता है।
आक के विभिन्न भाषाओं में नाम:-
श्वेत आक को संस्कृत में श्वेतार्क, मन्दार, सदापुश्प, बालार्क, प्रतापस आदि कहते हैं, जबकि बैंगनी फूल वाले आक को रक्तार्क, के नाम से पुकारते हैं। दोनों ही प्रकार के आक को हिन्दी में आक, अकवन या मदार (सफेद या लाल) व सफेद या लाल अकौआ भी कहते हैं। वनस्पति जगत के एसक्लेपीडेसी ; बेसमचपकंबमंमद्ध कुल का यह सदस्य है।

औशधिक चमत्कार

  1. वात रोगों में–श्वेत आक की जड़ को तिल के तेल में डालकर खूब उबाल लें। फिर इस तेल से रोगग्रस्त अंग की मालिश करें। नियमित रूप से इस तेल की मालिश करने से वातव्याधी के कारण हाथ, पैर, कमर में होने वाले दर्द से छुटकारा मिलता है।
    2. गठिया, और मोच में— आक के पत्तों पर मीठे तेल को चुपड़कर उसे हल्का सा सेंक कर गठिया ग्रस्त अंग पर बाँधने से लाभ होता है। घी में चुपड़कर यही प्रयोग करने से मोच के दर्द से मुक्ति मिलती है।
    3. शरीर में यदि छोटे-छोटे सफेद दाग हों तो— श्वेत आक के दूध में सेंधा नमक घिसकर छोटे-छोटे सफेद दागों पर लगाने से वे ठीक हो जाते हैं।
    4. एक्जिमा में– आक के दूध में समान मात्रा में तिल का तेल मिलाकर इस मिश्रण को एक्जिमा पर मलने से सात-आठ दिन में एक्जिमा से मुक्ति मिल जाती है।
    5. कुत्ता या बिच्छु के काटने पर— यदि किसी को कुत्ता या बिच्छु काट ले तो दंश-स्थान (जिस जगह काटा हो) पर आक का दूध लगाने से इनके विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
    6. बवासीर में— बवासीर में आक के दूध में अफीम घोलकर, मस्सों पर लगाने से उनका दर्द दूर होता है।
    7. अण्डकोश बढ़ने पर–सफेद आक की जड़ घिसकर लेप करने से अण्डकोश सामान्य अवस्था में आ जाते हैं।
    8. हाथी पाँव में— आक के जड़ की छाल तथा अडूसे की छाल को पीसकर लेप करने से हाथीपाँव रोग दूर होता है।
    9. अन्दरूनी चोट में— आक के पत्तों को सरसों के तेल में उबालकर मालिश करने से गिरने या किसी ठोस वस्तु के आघात से लगी चोट में लाभ होता है।
    10. सूजन में– आक के पत्तों में अरण्डी का तेल लगाकर गरम करके बाँधने से सूजन तथा दर्द कम हो जाता है।

महा औशधि पीपल

महा औशधि पीपल पीपल वृक्ष की उपस्थिति व उपयोग की जानकारी वैदिक काल से ही मिलती है, अनेक प्राचीन ग्रन्थों में इसके उदाहरण मिलते है, पीपल का वृक्ष सम्पूर्ण जलीय प्रदेश तथा साधारण भूमि में आसानी से मिल जाता है तथा मरूभूमि में भी यह स्वयं को जीवित रखता है। आयुर्वेद के ग्रन्थों व संहिताओं में औशधि के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। चिकित्सा की दृष्टि से रोग निवारण के लिए पीपल के अनेक औशधीय  प्रयोग मिलते हैं, जिनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत है-

  1. सर्पदंश पर विषनाशक प्रयोग
    जब किसी को सर्पदश हो गया हो, शीघ्र ही डंठल की तरफ से पीपल के ताजे पत्ते को रोगी के कान में थोड़ा सा ड़ालें इसे कसकर पकड़े रहें, क्योकि विष के प्रभाव से रोगी को वेदना होती है तथा डंठल का खिंचाव अन्दर की ओर होता है, यदि डंठल अधिक अन्दर चला जाता है, तो कान का पर्दा छिद्रयुक्त हो सकता है, अतरू पत्ते को पकडे़ रहना चाहिए। तथा जब पत्ता कुछ विवर्ण (नीला या पीला) हो जाए व डंठल कुछ फूल जाए तब पत्ते को बदल देना चाहिए अर्थात् नवीन पत्ता लगाना चाहिए। इस क्रिया से विष का आचूषण होता है तथा जब विष का पूरा आचूषण हो जाता है, तब डंठल का अन्दर की ओर खिंचाव तथा रोगी को वेदना होनी बन्द हो जाती है। तब उल्टी (वमन) करानी चाहिए ताकि आमाशय में कोई विषाक्त द्रव एकत्रित हो, तो निकल जाए। इसके पश्चात् दुग्धपान कराना चाहिए।
  2. पीपल के द्वारा चिकित्सा के अनेक योग आयुर्वेदीय योग मिलते हैं जैसे– संग्रहणीय कषाय (चरक), पंचवल्कल कषाय आदि।
    3. आमजप्रवाहिका (एमेबिक डीसेन्ट्री) में पीपल की गोंद का शुष्क चुर्ण 2-3 ग्राम प्रतिदिन लेने से जीर्ण प्रवाहिका ठीक हो जाती है। साथ ही पथ्यापथ्य का पालन आवश्यक है।
    4. मधुमेह रोग में दो पत्ते पीपल के, चार पत्ते तुलसी के, चार पत्ते नीम के, चार पत्ते बिल्प पत्र के तथा आठ पत्र नींबू के एवं पाँच काली मिर्च को मुख में चबा-चबाकर रस चूसना चाहिए, शेष बचे हुए तंतुओं को फेंक देना चाहिए। औषध का सेवन करने के साथ-साथ रोगी को यथा-शक्ति पैदल भ्रमण भी करते रहना चाहिए, इससे कुछ ही दिनों में रक्त शर्करा की मात्रा न्यून हो जाती है।
    5. आयुर्वेद की अनेक भस्मों के निर्माण में भी पीपल के अंगों का प्रयोग किया जाता हैं– जैसे नाग भस्म, वंग भस्म, यशद भस्म, अभ्रक भस्म आदि।

नोट- यह सभी औधिय प्रयोग आप अपने चिकित्सक से परामर्श करके ही करें।

पीपल के मांत्रिक प्रयोग
1. विषम ज्वर
जिस रोगी को ठण्ड लगकर बुखार आता हो या तीन दिन के अन्तर से ज्वर आता हो, उस रोगी को स्नान कराके, शुद्ध जल में तिल व थोड़ा दूध मिलाकर पूर्वाभिमुख खडे़ होकर पीपल वृक्ष पर उस तिलोदक को सात बार मंत्र बोलते हुए धारा बद्ध चढ़ा देने से ज्वर आना बन्द हो जाता है। यह प्रयोग सात दिन तक या ज्वर शांत होने तक किया जाता है। मंत्र इस प्रकार से है- विषमज्वर गच्छत्वं तस्मै तिलोदकं नमरू
2. पुराना ज्वर
 नमः शिवाय’ को ग्यारह बार उच्चारण करते हुए जल अर्पित करें तथा रोगी के रोग निवृत्ति हेतु प्रार्थना करें। इससे पुराना ज्वर, जो अनेक औशधियों के सेवन से भी ठीक न होता हो तब इस मंत्रोपचार से लाभ होता है।\शनिवार के दिन प्रातरूकाल स्नानादि करके रोगी स्वयं या रोगी की ओर से कोई अन्य व्यक्ति रोगी का नाम लेकर एक ताम्र के पात्र में शुद्ध जल व थोड़ा चिरायता, दुग्ध, कुछ शर्करा व कुशा डालकर उत्तर की ओर मुख कर के भगवान शंकर को स्मरण करते हुए शिव पंचाक्षरी मंत्र ‘

एनीमिया कारण और निवारण

एनीमिया कारण और निवारण शरीर में खून का नहीं होना या कम मात्रा में होनाएनीमिया कहलाता है। वास्तव में यह खून की कमी न हो कर लाल रक्त कणों ; भ्ंमउवहसवइपदद्ध की कमी होती है। लाल रक्त कणों का मुख्य कार्य ऑक्सीजन को शरीर में स्थित विभिन्न कोशिकाओं तक पहुँचाना है, जिससे प्रत्येक कोशिका को आक्सीजन मिल सके। इसकी कमी से शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीजन कम मिल पाती है, जिससे वे कोशिकाएं ठीक ढ़ंग से काम नहीं कर पातीं।
एनीमिया होने के मुख्यतरू दो कारण है-
1. रक्त स्त्राव- अधिक रक्त का बहना।
2. लाल रक्त कणों का नष्ट होना।

एनीमिया के लक्षण;

  1. निर्बलता
    2. बैठे-बैठे ही साँस फूलना।
    3. चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा होना।
    4. सुनाई कम पड़ना, कानों में सीटी बजना।
    5. सिर दर्द।
    6. नजर का कम होना।
    7. नींद का कम होना।
    8. पैरों में सूजन होना।
    9. हाथ और पैर की उंगलियों में चींटी सी चलना या झनझनाहट होना।
    10. बच्चों की शारीरिक वृद्धि या वजन बढ़ना रूक जाना।

एनीमिया के इन लक्षणों में से कोई एक या सारे लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं। लक्षणों का प्रकट होना इस बात पर निर्भर करते हैं, कि कितने समय में हीमोग्लोबिन कम हुआ। जैसे किसी के रक्त में लाल रक्त कणों की मात्रा एक सप्ताह में 12 ग्राम से 8 ग्राम हुई, तो लक्षण अधिक होंगें। यदि किसी व्यक्ति में लाल रक्त कणों की संख्या एक वर्ष में कम हुई, तो ऐसे व्यक्ति में लक्षण कम होंगे, क्योकि लाल रक्त कणों की संख्या एक साल में 12 ग्राम से 8 ग्राम हुई। एनीमिया किन कारणों से होता हैं? एनीमिया होने के विभिन्न कारणं हो सकते है, परन्तु प्रायरू लौह तत्व की कमी से होने वाला एनीमिया प्रमुख है, दूसरे प्रकार के एनीमिया दुर्लभ होते हैं। यहाँ लौह तत्व की कमी से उत्पन्न होने वाले एनीमिया के विषय में ही बताया जा रहा है। दिन भर के भोजन में लौह तत्व की केवल 1 मिलीग्राम की मात्रा आवश्यक होती है। गर्भावस्था में व स्तनपान कराने वाली महिलाओं में इसकी आवश्यकता अधिक होती है।
लौह तत्व की कमी से उत्पन्न एनीमिया के तीन मुख्य कारण हैं –
1. रक्त स्त्राव
2. भोजन में लौह तत्व की कमी
3. भोजन से प्राप्त लौह तत्व का पाचन न होना।
इनमें भी पहला कारण ही मुख्य है। जब भी रक्त स्त्राव से उत्पन्न लौह तत्व की कमी भोजन में उपलब्ध लौह तत्व की मात्रा से ज्यादा होती है, तो एनीमिया हो जाता है। यदि आयु बढ़ने पर बच्चे को दूसरा आहार देने में देरी हो जाती है और वह लम्बे समय तक केवल दूध पर ही निर्भर रहता है, तो बालक को लौह तत्व की कमी अवश्य हो जायेगी। ऐसा आहार, जिसमें लौह तत्व की मात्रा अधिक हो, बच्चे को देते ही यह कमी तुरन्त दूर हो जाती है। जब शरीर में तेजी से विकास होता है और लौह की आवश्यकता बढ़ जाती है, जो भोजन से उपलब्ध नहीं हो पाती, क्योंकि इस उम्र में युवाओं का रूझान संतुलित आहार की अपेक्षा ‘फास्ट फूड’ पर ज्यादा होता है।
रजस्वला स्त्री के शरीर को भी लौह तत्व की अधिक आवश्यकता होती है, उसे 2 मिलीग्राम लौह प्रतिदिन के भोजन के द्वारा प्राप्त होना चाहिए। यद्यपि गर्भावस्था में रजस्त्राव से होने वाली लौह तत्व की कमी तो रूक जाती है, परन्तु शिशु और माँ के शरीर की आवश्यकता बढ़ जाती है। गर्भावस्था के समय के साथ ही साथ लौह तत्व की आवश्यकता में भी वृद्धि होती जाती है। गर्भावस्था के दूसरे तीसरे माह के पश्चात् माँ के शरीर को लौह तत्व की आवश्यकता अधिक होती है और यह आवश्यकता इतनी अधिक बढ़ जाती है, कि दैनिक भोजन में भी उसकी पूर्ति नहीं हो पाती। इसीलिए चिकित्सक गर्भावस्था में लौह व कैल्शियम लेने की सलाह देते हैं। ज्यादातर यह पाया गया है, कि महिलायें इस विषय की गम्भीरता पर ध्यान न दे कर दवायें नियमित रूप से नहीं लेतीं, जिसका दुष्प्रभाव बच्चे व मां दोनों पर पड़ता है। बवासीर, पेट का अल्सर, आदि से भी जो रक्त स्त्राव होता है, उससे भी एनीमिया हो जाता है।
उपचार-
लौह तत्व की कमी को दूर करने के लिए भोजन में पाये जाने वाले लौह तत्व की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिये, इसी लिए लौह तत्व वाला भोजन निरन्तर लेने की सलाह दी जाती है। जब शरीर में लाल रक्त कणों की संख्या बहुत कम होती है, तब इस कमी को पूरा करने के लिए आयरन टेबलेट या कैपसूल के द्वारा शरीर को लौह तत्व की आपूर्ति की जाती है। लौह तत्व की पर्याप्त मात्रा लेने से से लाल रक्त कणों की संख्या बढ़ने लगती है।

नोट- कब, क्या और कितनी अधिक मात्रा माँ लौह तत्व लेना है, यह हमेशा अपने अनुभवी चिकित्सक से परामर्श करने के उपरान्त ही लें।

लौह तत्व से युक्त भोजन लेते रहना चाहिए, जिससे कि शरीर के लौह भण्डार फिर से भर जायें। लौह तत्व की अधिक मात्रा वाले आहार शाकाहारी भोजन में अनाज, हरी पत्तियों की सब्जियां जैसे पालक आदि, तेल बाले बीज जैसे तिल, सरसों, मूंगफली, सोयाबीन, सूखे मेवे व गुड़ आदि में लौह तत्व की मात्रा पर्याप्त होती है। यदि सामान्य भोजन को भी लोहे के बर्तन में पकाया जाय, तो उसमें लौह तत्व की मात्रा बढ़ जाती है। कुछ आहार शरीर द्वारा लौह तत्व की पाचन क्षमता को भी प्रभावित करते हैं। नीबू लौह तत्व की पाचन क्षमता में वृद्धि करता है, जबकि चाय में पाया जाने वाला टैनिन, सब्जियों में पाया जाने वाला ऑक्सालेट आदि तत्व इस पाचन क्षमता में बाधा डालते हैं। एनीमिया होने पर चिकित्सकीय दृष्टि से शरीर को लौह तत्व की अधिक मात्रा या कवेम की आवश्यकता होती है। चिकित्सक ऊपर बताये गए लक्षणों को देख कर तथा जिह्ना, हथेली, नाखून, अन्दर से पलकों में पीलापन देख कर एनीमिया को पहचानते हैं तथा लैबोरेटरी जांच की सहायता से एनीमिया की मात्रा तथा इसके प्रकार की जांच करते हैं। हृदय के कुछ रोगों का कारण एनीमिया ही होता है।
आयुर्वेदिक उपचार-
अदरक जहाँ एक खांसी या कफ में लाभदायक औशधि है, वहीं अयुवेदीय ग्रर्थो मे इसे रक्त की कमी को समाप्त करने के लिए एक श्रेष्ठ औशधि कहा गया हैं। इस औशधि का प्रयोग धैर्यपूर्वक करने पर ही सफलता प्राप्त होती है। चार-पाँच ग्राम अदरक तथा शहद मिलाकर रोज प्रातरू पीयें। महीने भर तक नियमित प्रयोग से खून बनने की प्रक्रिया में तेजी आयेगी तथा चेहरे का सौन्दर्य भी निखर उठेगा। एक तथ्य यह भी ध्यान रखने योग्य है, कि रक्तदान करने वाले व्यक्ति का पहले ‘हीमाग्लोबिन टेस्ट’ किया जाता है और हीमाग्लोबिन के कम होने पर रक्त लिया ही नहीं जाता। रक्तदान के समय एक व्यक्ति से करीब 300 मिलीलिटर रक्त ही लिया जाता है। लौह तत्व युक्त संतुलित भोजन करने पर कुछ ही दिनों में इसकी पूर्ति हो जाती है। एक स्वथ्य व्यक्ति को भी समय-समय पर अपने शरीर में हीमोग्लोबिन की जांच कराते रहना चाहिए। वर्ष में एक बार या कभी भी संदेहात्मक स्थिति आने पर अपने चिकित्सक से तत्काल सलाह ले

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार साधना के क्षेत्र में मुद्राओं का विशिष्ठ महत्व सर्वविदित है। तंत्र के क्षेत्र में भी मुद्राओं का सुनियोजित और विस्तृत विवरण मिलता है। मुद्रा के अनेक अर्थ हैं, किन्तु साधारणतया साधनात्मक कार्यो में प्रयुक्त होने वाली मुद्राओं को, जो उंगलियों के माध्यम से देवता के प्रीत्यर्थ प्रकट की जाती हैं मुद्राएं कहा जाता है। इनका प्रयोग शक्ति साधक अनिवार्यतः करते हैं, लेकिन अन्य साधकों के लिए भी मुद्रा प्रदर्शन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि साधना क्रम में यह एक आवश्यक क्रिया मानी गई है। कुलावर्ण तंत्र में लिखा है- ‘‘मुद्राः कुर्वन्ति देवानां मनासि द्रावयन्यि च।’’
‘‘मुद्राओ को प्रदर्शित करने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा मुद्रा प्रदर्शित करने वाले भक्त पर द्रवित होकर कृपा करते हैं।’’ कुछ तंत्र शास्त्रों में स्पष्ट है, कि मुद्रा प्रदर्शित करने पर व्यक्ति को देवताओं की समीप्यता प्राप्त होती है; मुद्राओं के प्रदर्शित करने पर देवता पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रहते हैं तथा इन के प्रदर्शन से साधारण पूजा भी उत्तम हो जाती है, बिना मुद्राओं के सम्पत्र की हुई साधनाए, जप, देवाचार्वन, योग आदि निष्फल हो जाते हैं। मुद्राओं का केवल एक पक्ष नहीं -‘‘क्या मुद्रा द्वारा रोगों का उपचार भी सम्भव है?’’

निर्विषोऽपि भेवेत् क्षिप्रं यो जन्तुर्विषमूर्छितः। चत्वारिंशित् समाख्याता मुद्रा श्रेष्ठा महाधिकाः।।

‘‘मुद्रा प्रदर्शन से विष द्वारा मूच्र्छित व्यक्ति भी स्वस्थ्य लाभ प्राप्त करता है। व्याधि और मुत्यु तक का निवारण मुद्राओं द्वारा संभव है। मोक्ष, जो मनुश्य जीवन का सर्वोच्च सोपान है, वह भी मुद्रा प्रदर्शन से प्राप्त किया जा सकता है।’’ मुद्राओं के महत्व को जानकर यदि व्यक्ति चाहे, तो अनेक रोगों पर नियंत्रण कर सकता है। वर्तमान समय में तो इतने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोग है, जिनसे बचना मनुश्य के लिए कठिन हो गया है, न चाहते हुए भी अनेक प्रकार की औशधिओं का सेवन करना पड़ता है और जिसके कारण कभी-कभी अनेक प्रकार के साईड़ इफेक्ट हो जाते हैं, जैसे चेहरे पर अनेक प्रकार के दाने, फुंसियां निकल आती हैं, जिसकी वजह से सौन्दर्य क्षीण हो जाता है। इसके लिए ‘कुम्भ मुद्रा ’ का प्रयोग करें, तो चेहरा रोग रहित, कान्तियुक्त और चमकदार बनने लगेगा। कुम्भ मुद्रा में साधक अपने दाहिने हाथ से हल्की खुली सी मुट्ठी  बनावें, इसी प्रकार दूसरे हाथ से भी करें, दोनों हाथ के अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करते रहें बायें हाथ को दाहिने हाथ के ऊपर रखें। इसे कुम्भ मुद्रा कहते है। इसके नित्य प्रदर्शन से साधक का चेहरा आकर्षक बनता है तथा दाने व मुहासे साफ हो जाते है।
स्वर शोधक-
साधक यदि ‘प्राण मुद्रा’ सम्पन्न करें, तो स्वर से सम्बन्धित रोगों को नियंत्रित कर सकते है। प्राण मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक अपने अंगूठे से अनामिका और कनिष्ठका के पोरों को स्पर्श करें, बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखें, तो प्राण मुद्रा के प्रदर्शित करने से साधक के स्वर संस्थान पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उसका स्वर शुद्ध होता है। जिनका स्वर घरघराता हो या आवाज स्पष्ट न हो, उसे प्राण मुद्रा करने से बहुत लाभ होता है।
मुख शोधन-
व्यान मुद्रा’ प्रदर्शित करने से साधक के मुख से सम्बधित रोगों का शमन होता है। साधक बैठ कर अपने हाथ के अंगूठे से मध्यमा और अनामिका को स्पर्श करें, इससे व्यान मुद्रा प्रदर्शित होती है। इस मुद्रा के प्रदर्शन से साधक के मुख सम्बन्धी रोगों पर प्रभाव पड़ता है; जैसे यदि उसके मुंह से दुर्गन्ध आती है या उसके मुंह का स्वाद अक्सर बिगड़ा रहता है अथवा मुख में छाले निकलने लगते हो, तो इस मुद्रा को नित्य करने से बहुत लाभ मिलता है। गले के रोग- सर्दी या गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला अंग गला ही होता है। यह शीघ्र ही वातावरण से प्रभावित हो कर संक्रमित हो जाता है, जिसकी वजह से गला बैठना, गले में सूजन, दर्द या टॉन्सिल्स की शिकायत होने लगती है। यदि ऐसा व्यक्ति ‘उदान मुद्रा’ सम्पन्न करता है, तो उसे गले से सम्बन्धित रोग नहीं होते। इस मुद्रा को करते समय अपने हाथ के अंगूठे से तर्जनी अंगुली को स्पर्श करें और पूर्ण रूप से स्थिर होकर बैठें व मन ‘सौं’ बीज पर एकाग्र करें।
हृदय सम्बन्धी रोग-
‘आवाहनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से हृदय रोगों पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। आवाहनी मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक दोनों हाथों को मिलाकर अंजुली बना लें व अंगूठों से अनामिका के मूल को स्पर्श करें। ऐसा साधक नित्य स्थिर मन से जिस आसन में वह सुविधा अनुभव करे चाहे पद्यासन हो या सुखासन हो, बैठ कर करे। यह मुद्रा सम्पन्न करने से साधक हृदय के रोगों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। यदि साधक घबराहट का अनुभव कर रहा हो, तो वह थोड़ी देर इस मुद्रा को न करे, तो उसे लाभ अवश्य होगा।
पेट के रोग-
‘सम्मुखीकरण मुद्रा’ सम्पन्न करने से साधक पेट से सम्बधित रोगों पर विजय प्राप्त कर लेता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए साधक स्थिर बैठ जाये व अपने दोनों हाथों से मुट्ठी  बनाये, अंगूठे को मुट्ठी के अन्दर रखे तथा दोनों हाथों की मुट्ठी को परस्पर कनिष्ठिका उंगली से मिला ले। इसे सम्पन्न करने पर पेट में यदि कीड़े भी हों या पित्त अधिक बनता हो, तो व्यक्ति को राहत मिलती है। यह मुद्रा पेट से सम्बधित रोगों में अत्यन्त सहायक होती है, जिसे नित्य करने से व्यक्ति इन रोगों को नियंत्रित कर सकता है।
चर्मरोग-
खुजली होने या किसी वस्तु से खाने -पीने से एलर्जी हो जाने से पर चमड़ी से सम्बन्धित रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति असहजता अनुभव करता है। इस रोग के लिए ‘चक्र मुद्रा’ करने से नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। दोनों हाथों की उंगलियों को फैला लें व बायें हाथ की कनिष्का अंगुली से दाहिने हाथ की कनिष्किा को स्पर्श करें तथा बायें हाथ के अंगूठे से दाहिने हाथ के अंगूठे को परस्पर स्पर्श करें। इस प्रकार से चक्र मुद्रा प्रदर्शित होती है।
उच्च रक्तचाप-
उच्च रक्तचाप में ‘ज्ञान मुद्रा’ सहायक होती है। इस मुद्रा को करने से व्यक्ति को अपने रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। ज्ञान मुद्रा को करने के लिए अंगूठे और तर्जनी को परस्पर स्पर्श करें। यह मुद्रा शान्तचित होकर सम्पन्न करनी चाहिए और नियमित रूप से करनी चाहिए तभी राहत का अनुभव होता है।

कमर के रोग-
‘सन्निरोधिनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से कमर के रोगों पर नियंत्रण होता है। इस मुद्रा के लिए व्यक्ति अपने दोनों हाथों से मुत्ठियाँ बना कर उन्हे आमने-सामने कर जोड़ दें तथा थोडी देर तक कमर सीधी कर सुखासन पर बैठ कर यह मुद्रा सम्पन्न करें। इससे साधक को अपने कमर से सम्बधित रोगों में लाभ मिलता है। इस से कमर का तनाव भी समाप्त हो जाता है, कमर से सम्बधित अन्य रोगों में भी लाभ मिलता है।
गुर्दे के रोग-
यदि कोई गुर्दे के रोग से पीडि़त है या गुर्दे से सम्बधित किसी रोग से ग्रस्त है, तो वह यदि ‘गदा मुद्रा’ का नियमित अभ्यास करता है, तो उसे सम्बधित रोग पर नियंत्रण प्राप्त होता है। इस मुद्रा को प्रदर्शित करने के लिए दोनों हाथों की उंगलियों को एक दूसरे में फंसा दें। इससे गदा मुद्रा प्रदर्शित होगी। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से व्यक्ति को यदि गुर्दे में सूजन है तो उसे अच्छे परिणाम की प्राप्ति होती है।
हाथ और पांव से सम्बधित रोग-
यदि सायंकाल खड़े होकर ‘सम्पुटी मुद्रा’ को सम्पन्न किया जाए, तो साधक को हाथ और पांव से सम्बन्धित रोगों में आराम मिलता है। यदि पावों में अक्सर दर्द रहता हो तथा घुटने मोड़ने में अत्यधिक कष्ट हो, तो यह मुद्रा आराम दिलाने में सहायक होती है। वजन उठाने पर दर्द का अनुभव हो, तो इस मुद्रा को करने से लाभ होता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए बायें हाथ को आकाश की ओर रखें तथा उस पर दाहिने हाथ से सम्पुट करें। यह मुद्रा साधक 5 मिनट तक नित्य करें।
वात रोग
‘शंख मुद्रा’ इस मुद्रा को नित्य करने से व्यक्ति यदि वात रोग से पीडि़त है, तो उसे इस रोग में आराम मिलता है। इस मुद्रा को साधक प्रातः काल स्थिर भाव से बैठ कर सन्ध्यादि से पूर्व प्रदर्शित करे। इस मुद्रा के लिए बायें हाथ के अंगूठे को दाहिने हाथ से मुट्ठी बनाकर पकडे़ं तथा मुट्ठी को दाहिने हाथ की अंगुलियों से स्पर्श करायें, तो शंख मुद्रा प्रकट होगी। यह मुद्रा यदि नियमित रूप से 5-7 मिनट तक सम्पन्नकी जाय, तो वात रोगों में आश्चर्य जनक लाभ होता है।

कालसर्प योग

कालसर्प योग कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है। पं. जवाहर लाल जी की कुण्डली में देश भर में हजारों की संख्या में हमारे पाठक वर्ग की ओर से निरंतर पत्र प्राप्त हो रहे थे की कालसर्प योग पर ‘आप का भविष्य‘ का एक विशेषांक प्रकाशित किया जाये। अब जब ईष्ट की प्रेरणा और प्रभु की इच्छा हुई तब यह कालसर्प योग विशेषांक’ पाठकों से समक्ष प्रस्तुत है।

पाठको कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है। पं. जवाहर लाल जी की कुण्डली में भी इसी प्रकार से अनेक राजयोग तथा एक कालसर्प योग बना है। इन दोनो का ही फल उनके जीवन में घटित भी हुआ है। वह लम्बे समय तक जेल में भी रहे थे। उन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति भी नहीं मिली थी। क्योकि उनके पिता ने सारी सम्पत्ति देश को दान दी थी। इस प्रकार वह अपनी पैतृक संपत्ति से वंचित हुये। परंतु कुण्डली में एक से अधिक राजयोगों का निर्माण होने के कारण उन्हें ‘‘शासक’’ का पद भी प्राप्त हुआ।

मैने अपने जीवन में अनेक ऐसे उच्चकोटी के संतों की कुण्डली में भी कालसर्प योग देखा है। परंतु उन सभी संतों का जीवन राष्ट्र के लिये आज भी समर्पित है। यह बिलकुल सत्य है कि वह सभी व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नही कर पाये परंतु जब वह समाज और देश के लिये समर्पित हुये तब उच्चकोटी का सम्मान आज भी उन्हें मिल रहा है। वह सभी किसी न किसी रूप से ट्रस्ट बनाकर संचित धन का राष्ट्र के लिये प्रयोग कर रहे हैं। अतः यह स्पष्ट है कि यह कालसर्प नामक योग व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नहीं करने देता। परंतु देश के लिये या समाज के लिये संकल्पित होने पर यह योग बहुविख्यात करता है।

मैं पाठकों को यह भी बताना चाहता हूँ कि प्रत्येक वह ‘‘कालसर्प योग’’ कालसर्प योग नहीं होता जिस कुण्डली में राहु या केतु के साथ कोई अन्य ग्रह भी विराजमान हों। क्योंकि यदि वह अन्य ग्रह यदि राहु या केतु से डिग्रीयों में इनसे एक डिग्री भी बाहर है तब इस योग का वह प्रभाव मेरे अनुभव में कालसर्प योग जैसा कभी नहीं देखा गया। अतः पहले कुण्डली में इस प्रकार की ग्रहदशा होने पर राहु या केतु के साथ वाले ग्रहों को डिग्रीयों का अवश्य जांच लें।

 

यंत्रा और मंत्रा

यंत्रा और मंत्रा प्रजनन के देवता काम ने कादिविद्या मूलमंत्रा की उपासना की थी। जिसके बल से कामदेव का सामर्थय इतना बढ़ गया की वह बड़े-बड़े मुनियों के चित्त को भी आच्छत् करने लगा। ब्लें रति का बीज मंत्रा है। ब् और ल् उसके नेत्रा हैं और ए शक्ति रूप है। वपुषा पद से व्, लेह्येत पद से ले और महतां मुनिनां पद के अनुस्वार से लेकर उक्त बीज मंत्रा का उद्धरण किया जाता है। माया बीज और कामबीज के योग से ‘‘हृी क्लीं ब्लें’’ इस साध्य सिद्धमंत्रा का उद्धार है। इस मंत्रा से हृदयचक्र और महानाद के ऊपर शक्ति का न्यास किया जाता है। अर्थात् यंत्राकृति तैयार की जाती है। जिस का फल सौभाग्य प्राप्ति है।

इसी प्रकार महामृत्युजय यंत्रा और मंत्रा का विचार करें तो देखते हैं- इसके बीज हृौं जूं सः’ शिव-शक्तिमय हैं। हृौं शिवबीज, जूं जीवनबीज, सः शक्तिबीज है। शिवबीज हृौं से जीवनशिक्ति जूं का आप्यायन होता है तथा शक्तिबीज सः से जीवनशक्ति (जीवनक्रम) की वृद्धि होती है। जूं (जीवनशक्ति) के शिवशक्त्याश्रय होने से जीवन वृद्धि का नाम मृत्यु्जयसिद्धि है।

अभिष्ट की प्राप्ति के लिये मंत्रा और तंत्रा का या इनकी शक्तियों और प्रतिक्रियाओं का जो प्रयोग प्रतिकात्मक अथवा चित्रात्मक रूप से किया जाता है, उस स्वरूप को ‘यंत्रा’ कहा जाता है।

यंत्रा एवं उसकी साधना करके लौकिक कामनाओं की पूर्ति की जाती है। अथवा कहा जा सकता है कि अपनी कामना पूर्ति के लिये यंत्रा साधना क्रियात्मक विधान है। इसके द्वारा साधक साध्य से मिलकर अपनी समस्त इच्छाओं की पूर्ति करता है। इन यंत्रों के द्वारा न केवल हमारी सांसारिक इच्छायें पूर्ण होती हैं, बल्कि लौकिक सिद्धियाँ भी मिलती हैं जिनसे दुःखों की निवृति और अंत में मुक्ति भी संभव है।

प्रस्तुत ‘‘यंत्रा विशेषांक’’ में अनेक प्रकार के यंत्रा सम्बंधी लेख भिन्न-भिन्न लेखकों के द्वारा दिये गये हैं। वस्तुतः प्रत्येक साधक (लेखक) के अपने-अपने अनुभव के आधार पर ही यंत्रा सम्बंधी लेख प्रकाशित किये गये हैं। इस के साथ मेरी अपनी राय यही है कि आप किसी भी सिद्ध साधक के द्वारा प्राण प्रतिष्ठित यंत्रा ही लें क्योकि यंत्रा स्वयं में जड होते हैं; इनकी जब तक प्राण प्रतिष्ठा नहीं करवाई जाती तब तक यह चैत्नय अवस्था में नही आते और ना ही अपना पूर्ण शुभ प्रभाव ही प्रकट करते हैं। अथवा प्राण प्रतिष्ठा का विधान स्वयं समझकर स्वयं ही प्राण प्रतिष्ठा कर सकते हैं। यह भी ध्यान रहे की कभी-कभी यंत्रा पूजा की सम्पूर्ण विधि-विधान के बाद भी सिद्ध नहीं होते ऐसा उस पूजा की प्रक्रिया की सही जानकारी के आभाव के कारण होता है।

ग्रहों का रोगों से सम्बध

ग्रहों का रोगों से सम्बध रोग की कभी-कभी पहचान नहीं हो पाती और गलत उपचार के कारण रोगी की मृत्यु हो जाती है, मगर यदि डॅाक्टर, वैद्य या चिकित्सक इस कार्य के लिए ज्योतिष का सहारा लें, तो वह सहजता से उस रोग को पहचान सकते हैं, जिसकी वजह से रोगी कष्ट में है और इस दृष्टि से ज्योतिष और रोग का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। यह लेख आप सभी के लिए इतना ही आवश्यक है, जितना कि एक ज्योतिषी के लिए। वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी ग्रह द्वारा प्रदत्त रोग उस पर शनि, मंगल या राहू के प्रभाव के कारण प्रस्फुटित होते हैं। इनमें शनि अग्रणीय है। कुण्डली जब शनि का सम्बन्ध कुण्डली के रोग भाव अर्थात् छठे भाव से हो या इसका सम्बन्ध आठवें या बारहवें भाव से हो तो यह अपने से सम्बन्धित रोग देता है। इस पर इसके शुत्र ग्रहों का प्रभाव रोगों के आरोह अवरोह एवं उनकी विविधता देता है, तब इसके द्वारा प्रदत्त रोग शनैः शनैः बढ़ते या घटते हैं। शनि के द्वारा रोग उसके कारकत्व में आने वाले अंगों में होते हैं।

ये अंग हैं त्वचा, हड्डियां, घुटने, पैर, पित्ताशय, दांत, टांगें, अड्रेनलिन ग्रन्थि, हड्डियो को जोड़ने वाली मांसपेशियों के तन्तु। शनि प्रधान रोगों में वात विकार जोड़ों का गठिया, बाय का दर्द, जहरीले पदार्थ का सेवन, शरीर में जहरीले पदार्थो के बनने की प्रक्रिया, जैव रसायनों या अजैव रसायनों की कमी या बढ़ोत्तरी से पैदा होने वाले रोग प्रधानतया आते हैं। दूसरे ग्रहों के प्रभाव के साथ शनि का योगदान निम्न रोगों में भी होता है- बालों के रोग, तिल्ली या प्लीहा सम्बधित रोग, दायें पैर के पंजे का रोग, रिकेटस, जिह्ना सम्बन्धी रोग, आंखों से सम्बन्धित रोग जैसे मोतियाबिन्द, नाक के रोग, अण्डकोशों का बढ़ना, कुष्ठ, राज यक्ष्मा, लकवा होना, पागलपन आदि। शनि की दुश्मनी सूर्य से है। सूर्य का प्रभाव शनि पर पड़ने पर रोगों की शुरूआत होती है। शनि जनित रोग, पीड़ा या शनि जनित दुःखों की शुरूआत अन्तिम 60 बर्षो के अन्तराल में प्रभाव जातक पर होता है। लग्न गत शनि जातक को आलसी, गन्धीला, कामुक तो बनाता ही है, साथ ही उसे नाक सम्बन्धित दोश, रोग भी देता है।
शनि का प्रभाव गुरु पर होने से आकृति विवर्ण होने लगती है, कफ की प्रधानता हो जाती है, दृष्टि मन्द होने लगती है, सफेद मोतिया बढ़ने लगता है, सन्तोष कम होता है। यदि लग्न गत शनि की दृष्टि चन्द्रमा पर पड़ जाय, तो जातक पराधीन जीवन व्यतीत करता है। पराधीन जातकों का शनि नीच का, दुर्बल, शुत्र क्षेत्री हुआ करता है। वैसे लग्न गत शनि वाले व्यक्तियों को अपने पारिवारिक सदस्यों के अधीन वृद्धावस्था व्यतीत करनी पड़ती है। परन्तु यदि लग्न गत शनि धनु, मीन या बुध की राशियों का ही (यानी चतुर्थेश या दशमेश की राशि का हो), तो राजरोग कारक होता है, परन्तु रोग को देने से वंछित नहीं होता है, हां उपयुक्त इलाज के साधन भी जातक को उपलब्ध कराता है, लेकिन रोग के समाप्त होने या न होने की शर्त नहीं है। मिथुन का लग्न गत शनि फोडे़ं, फुन्सी, दाद, कैन्सर का कारक होता है। ऐसे जातकों की कुण्डली में बुध पर या शनि पर सूर्य, मंगल या राहू का प्रभाव हुआ करता है लग्न गत कर्क का शनि भी उपरोक्त फलों का जनक होता है। ऐसा शनि कई स्त्रियों से यौन सम्बन्ध करा लेता है। इस योग में यदि शुक्र-राहू का सम्बन्ध हो ओैर शुक्र शनि की राशि में हो या राहू शनि की राशि में हो तो ऐसे जातकों को अप्सरा, यक्षिणी, जिन्नी आदि की सिद्धि आसान होती है, परन्तु इसके कारण उसका पतन भी होता है।

सिंह राशि या कन्या का लग्न गत शनि पुत्र सुख में बाधा कारक होता है। द्वितीय भावस्थ मेष या वृषभ का शनि अल्पायु कारक होता है। चेहरे पर चोट का निशान या दाग देता है मिथुन का दूसरे भाव का शनि, परन्तु इस फल के लिये बुध पर सूर्य, मंगल या गुरू का प्रभाव भी होना चाहिये। दूसरे भाव में कर्क या सिंह राशि का शनि हो, तो जातक अल्पायु होता है, सम्भवतया वह राजदण्ड का भागी भी बने। तुला, वृश्चिक राशि का द्वितीयस्थ शनि जातक को पेट के रोग देता है। मीन का द्वितीय भावस्थ शनि राजदण्ड प्रदायक होता है। क्रूर, पापी ग्रहों का फल तीसरे भाव में अच्छा कहा जाता है। प्रायः ज्योतिष के सार ग्रंथ इस फल के लिये एकमत हैं, परन्तु यह उपयुक्त नहीं है।
तीसरा भाव आठवें से आठवां भाव है।भावाति भावम् सिद्धान्त के अनुसार इस भाव का सम्बन्ध मृत्यु के कारणों से भी है। इस भाव का शनि प्रायः दूसरे मारकों के कारकत्व को लेकर प्रधान मारक बन जाता है। परन्तु तुला, मकर कुम्भ का शनि इस का अपवाद है, यहां शनि अरिष्ठ नाशक बन जाता है, कर्क, सिंह राशि का शनि अल्पायु प्रदान करने के साथ-साथ जातक को अस्वस्थ भी रखता है, ऐसे जातकों की मृत्यु अस्वाभाविक कारणों से और तत्काल होती है। कन्या व तुला का तृतीयस्थ शनि मृत सन्तान पैदा कराता है। यह फल मंगल के द्वादश भावस्थ होने पर अवश्यम्भावी होता है। पंचम भाव में भी राहू या केतु का प्रभाव होना आवश्यक है इस फल के लिये। कन्या या तुला का तृतीयस्थ शनि हो, सूर्य पर राहू या केतू का प्रभाव हो, तो भी जातक को मृत सन्तान होती है। यदि सातवें भाव पर पाप प्रभाव हो और शनि तीसरे भाव में हो, तो जातक की पत्नी का सम्बन्ध उसके देवर या पर पुरूष से होता है। वृश्चिक या धनु या तृतीयस्थ शनि जातक की पत्नी के लिये घातक होता है।
चैथे भाव के शनि का सम्बन्ध अष्टमेश के साथ होने पर माता का सुख कम होता है, जातक वात रोग से भी पीडि़त रहता है। इसकी पुष्टि जातक के बालों की अधिकता और लम्बे नाखून करते हैं। इस भाव में सूर्य या मंगल या राहू का साथ या प्रभाव (शनि पर) होने पर शनि हृदय रोग का भी प्रदायक है। मेष चतुर्थ भावस्थ शनि भी हृदय रोग कारक होता है। चतुर्थ भावस्थ शनि वृद्धि कारक और लम्बी आयु देता है, इस भाव में बृषभ, कर्क और सिंह राशि के शनि का यही फल है। मिथुन का शनि यदि चैथे भाव में हो और दूसरे आयु कारक रोग भी न हों, तो पुत्र के हाथों मृत्यु कराता है या पुत्रहीनता का कारक होता है। कन्या का चैथे भाव में शनि जीवन पर्यन्त रोग भय देता है। तुला या वृश्चिक राशि का चतुर्थ भावस्थ शनि वात रोग देता है। मीन राशि चैथे भाव में हो, शनि भी चैथे भाव में हो, तो पूरे परिवार को नष्ट करता है।
शनि और सूर्य की युति प्रायः शुभ नहीं होती है, परन्तु पांचवें भाव में शनि, सूर्य की युति बहुत से बुरे फलों को नष्ट करने वाली होती है। सामाजिक पहचान एवं शिक्षा के क्षेत्र में पांचवें भावस्थ शनि, सूर्य पर गुरू का साथ या इसकी दृष्टि बहुत शुभ होती है, परन्तु प्रेम के क्षेत्र में असफलता देती है। पांचवें भाव में कर्क या सिंह का शनि अल्पायु और वृश्चिक या मकर का शनि सन्तान हीनता देता है। यही गुण द्वितीय भाव का स्वग्रही शनि भी देता है।
छठे भाव का शनि महिलाओं की कुण्डली में सौत का योग बनाता है। इस भाव का शनि गुह्य रोग, प्रमेह, मुधमेह, लकवा, वात रोग, पोलियो का कारक होता है। द्वादशेश शनि द्वादश में बैठ कर भी यही रोग देता है। अष्टमेश होकर यदि शनि छठे भाव में पडे़, तो विपरीत राजयोग कारक माना जाता है। परन्तु यदि ऐसा शनि वृश्चिक या धनु राशि का हो, तो वात रोग या शूल रोग कारक, नशा कारक, होता है। इस भाव में शनि मेष राशि होने पर जिगर और आंख; वृषभ का होने पर आंख व गुदा रोग, पित्ताशय, हृदय का रोग; मिथुन का होने पर दमा, मस्तिष्क सम्बन्धी, गुदा रोगों का; कर्क राशि का होने पर आमाशय आंख, हृदय रोगों का; कन्या राशि का होने पर शनि मूत्र सम्बन्धी; तुला का होने पर डिप्थीरिया; वृश्चिक का होने पर मस्तिष्क रोगों का कारक बनता है। कन्या राशि का शनि छठे भाव में हो, तो गिरने से चोट और रास्ते या विदेश में मृत्यु देता है। छठे भाव में तुला का शनि गिरने से चैट दे सकता है तथा जीवन, विशेषकर बाल्यावस्था कष्टकर होती है। वृश्चिक का शनि छठे भाव में पड़ कर सर्प, विष से भय देता है। इस भाव में धनु या मकर राशि का शनि राजयक्ष्मा रोग देता है।

मकर राशि का शनि स्त्री संसर्ग से मृत्यु देता है, एड्स एवं यौन रोगों की प्रबल सम्भावना रहती है। छठे भावस्थ कुम्भ या मीन का शनि पुत्र सुख की न्यूनता देता है। सातवें भाव में शनि दाम्पत्य भाव को विषमय ही नहीं बनाता, बल्कि बरबाद कर देता है। जातक की धूर्तता, क्रूरता, निर्दयता और मलिनता पत्नी को दूसरे पुरूष के आगोश में जाने को मजबूर कर देती है। पत्नी का यौन सम्बन्ध देवर या निकट के सम्बन्धी से बन जाता है ऐसे परिप्रेक्ष्य में। सातवें भाव का शनि निचले कटि प्रदेश और जाघों के ऊपर के भाग में रोगों का प्रकोप पैदा करता है। ऐसा शनि या तो सन्तान होने नहीं देता और यदि हो गई, तो वह रोगिणी होती है। सातवें शनि वाले जातक बिन ब्याहे रह जायें, तो काई आश्चर्य नहीं। उसका स्वग्रही शनि भी दाम्पत्य जीवन को सुखमय नहीं बना पाता है। सातवें भाव में मकर, कुम्भ या तुला राशि का शनि हो, तो ऐसे जातक के आकर्षण का केन्द्र स्त्री का गुप्तांग होता है, वह उसका स्पर्श, मर्दन, करना चाहता है या करता है। सप्तम शनि वैश्या गमन या पर स्त्री सम्बन्ध बनाता है। इस भाव में शुक्र या मंगल का सम्बन्ध इसको बल प्रदान करता है। शनि-चन्द्र युति इसी कारण वश गृहस्थों के लिये शुभ नहीं होती।

उदासीनता, वैराग्य, आलस्य, यौन विकृतियां मानसिक या स्थूल स्तर पर परिलक्षित होती हैं। सातवें शनि-चन्द्र युति होने पर। परन्तु संन्यासियों को सातवें चन्द्र-शनि की युति अच्छी मानी गयी है। सातवें भाव में महिलाओं की कुण्डलियों का शनि भी यही फल देता है। सिंह राशि का सातवां शनि सांस के रोग देता है, कफ सम्बन्धी रोग भी होते हैं। दशम भावस्थ कन्या राशि का शनि भी कफ जनित रोग देता है। धनु, मकर का सातवें भाव में शनि फोडे़, फुन्सी, भगन्दर, बवासीर, स्त्री समागम जनित रोग, कैन्सर आदि रोगों का कारक होता है। इनमें से कोई भी रोग मृत्यु का कारण बन सकता है। अपने पाप प्रभाव का मूर्त रूप अष्टम भाव में शनि बन जाता है अकसर। केवल तुला, मकर या कुम्भ राशि का शनि अष्टमस्थ होकर दीर्घायु कारक होता है। पर जातकों को मध्यम स्वास्थ भी देता है।
आठवें भाव का शनि बादी, बवासीर, भगन्दर, गुह्य रोग, कोढ़, नेत्र विकार, पेचिश, हृदय रोग, दाद, खारिश, फोड़े, प्रेमह आदि बीमारियां पैदा करता है। अष्टम भावस्थ शनि राशि क्रम से मृत्यु का कारण बनता है।

भूख, उपवास से बहुत भोजन या भोजन न मिलना, रिश्तेदारों के हाथ, से संग्रहणी से, शत्रु के हाथों से, पीलिया से, राजयक्ष्मा रोग से, प्रमेह से, मानसिक बीमारी, चर्म रोग (खुजली), कांटा या इन्जेक्शन या सर्प दंश से, फोड़े या कैन्सर से, ऊपर से गिरने से या चोट लगने से मृत्यु की सम्भावना होती है। इस सम्भावना को ब्रह्म वाक्य में बदलने के लिये अष्टमेश का निर्बल होना और पाप प्रभाव में होना सम्बन्धित रोगों का कारण होता है।

मेष का अष्टमस्थ शनि सूर्य या राहू या केतु के प्रभाव के कारण पेट से सम्बन्धित विकार, नेत्र रोग, संग्रहणी, विषमय शरीर विकार देता है। जिन जातकों की कुण्डली में मिथुन या कर्क का अष्टम भाव में शनि होता है, उनके लिए राजदण्ड़, फांसी का भय पैदा रहता है। यदि चोरी करना मानसिक वृत्ति हो सकती है, तो यह अष्टम शनि की देन होगी, परन्तु द्वितीय भाव का शनि भी चोरी करने की प्रवृत्ति देता है। मीन राशि का अष्टमस्थ शनि संग्रहणी, सर्प भय, विष भय कारक होता है। नवें, दसवें, ग्यारहवें भाव का शनि अपना पापत्व खो देता है। संन्यासियों की कुण्डली में सप्तम शनि अच्छा माना जाता है। नवें भाव का शनि संन्यासी को मठाधीश बना देता है।
नवम भावस्थ शनि पैरों में विकार देता है। मेष, मीन का नवमस्थ शनि पुरूषत्वहीनता या बांझपन देता है। एकादश भावस्थ पाप प्रभाव वाला शनि मृत सन्तान पैदा कराता है। वृष राशि का एकादश शनि पत्नी को सन्तान के जन्म पर मरणासन्न बना देता है। बारहवें भाव में आकर शनि पापी बन जाता है। ऐसा जातक पूर्णतः संसारी बन जाता है।, धर्म-कर्म में उसकी आस्था नहीं होती है, आधि दैविक आधि-व्याधि को भोगता हुआ जीता है, उनका उपचार नहीं करता है। पसलियों के रोग, जांघ का फोड़ा आदि रोग धनु का शनि द्वादश भाव में देता है, ऐसे जातक दुबले-पतले शरीर वाले होते हैं, आखें छोटी-बड़ी होती है। बारहवां शनि राहू या सूर्य के प्रभाव के कारण अन्धापन या कानापन देता है, मस्तिष्क के विकार भी हो सकते हैं। मिथुन का शनि द्वादश भाव में बैठ कर आत्मघाती प्रवृत्ति जातक को देता है, विषैले जानवरों के काटने, विषैले इन्जेक्शनों, पानी में डूबने के कारण होने वाले कष्ट भी होते हैं। सिंह का द्वादशस्थ शनि पुत्र सुख नहीं देता है। तुला, वृश्चिक का शनि राज भय कारक होता है।

शनि, चन्द्र, सूर्य की युति पर यदि मंगल का प्रभाव हो, तो जातक का विवाह बांझ स्त्री से होता है। आठवें भाव में बुध के साथ आयु कारक माना जाता है और शनि-चन्द्र की युति वैराग्य कारक होती है, परन्तु यही शनि-चन्द्र की युति तीसरे भाव में हो और बुध आठवें पड़ा हो, तो जातक अल्पायु होता है, जातक का परिवार नष्ट हो जाता है, जातक की मां को दीर्घकालिक रोग होते हैं। शनि-मंगल की युति तृतीय या चतुर्थ भाव में हो, या इन भावों से तीसरे, आठवें या दसवें भाव में शनि-मंगल हो, तो जातक की पत्नी की मृत्यु शादी के शीघ्र बाद हो जाती है जातक को अपने भाई के साथ रहना पड़ता है। तीसरे या चैथे या सातवें भाव में शनि-बुध की युति प्रायः निरोग शरीर देती है, परन्तु इस योग में जातक नीच कुल की स्त्री के साथ रहता है। शनि-मंगल की युति सातवें या दसवें में हो, चन्द्रमा जन्म लग्न से तीसरे या चैथे हो और बुध चैथे, आठवें या बारहवें भाव में पडें हों, शनि, चन्द्र, बुध चैथे, आठवें या बारहवें भाव में पड़े हों, शनि, चन्द्र, बुध सातवें या दसवें भाव में हों, तो दस वर्ष की आयु में जातक की मृत्यु होती है। गुरू, शनि, चन्द्र यदि दूसरे या बारहवें भाव में हो, तो आखों की रोशनी नष्ट करते हैं। शनि-बुध की युति पर मंगल का प्रभाव छठे भाव में हो, तो जातक भाइयों से लड़ कर घर-द्वार छोड़ देता है।

 

उपचारार्थ मंत्र चिकित्सा

उपचारार्थ मंत्र चिकित्सा
बवासीर दूर करने का मंत्र

ओउम् काका कर्ता किरोरी करता ओउम् करता से हो ययरसना दश हूंस प्रगटे खूनी बादी बवासीर न होय मंत्र जान के न बतावे द्वादस ब्रह्म हत्या का पाप होय लाख जप करे तो उसके बस में न होय शबद सांचा पिण्ड काचा हनुमान का मन्त्र साँचा फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा।

यह मन्त्र ग्रहण काल में जितना जप हो जाय उतना ही जप करने से सिद्ध हो जाता है। सिद्ध हो जाने पर यह मंत्र 21 बार पढ़कर पानी को मन्त्र से अभिमन्त्रित करके आबदस्त लेने से बवासीर दूर होती है।

दाढ़ में दर्द हो या कीड़ा पड़ गया हो तो निम्न मंत्र से झाड़ने से दर्द कष्ट, पीड़ा दूर हो जाती है-

ओउम् नमो आदेश गुरु को-वन में जाई अंजनी जिन जाया हनुमन्त। कीड़ा मकड़ा मसकड़ा यह तीनों भस्मन्त। गुरु कि शक्ति मेरी भक्ति फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा।

यह मन्त्र भी ग्रहण के समय जितना जपा जा सके उतना ही जप करने से सिद्ध होता है। और इसको भी सिद्ध हाने पर 21 बार पढ़कर नीम की डाली से झाड़ने से दाढ़़ का दर्द, पीड़ा आदि दूर होती है।

कखवाईः-काँख

बगल में होने वाले फोड़े को कखबाई कहते हैं। इसको दूर करने का मंत्र निम्न प्रकार से हैंः-

ओउम् नमो कखवाई भरी तलाई जहाँ बैठा हनुमन्त आई पके न फूटे चले न पीड़ा रक्षा करै हनुमन्त
वीर दुहाई गोरखनाथ की शब्द साँच पिण्ड कांचा। फुरो मन्त्र ईश्वर वाचा सत्यनाम आदेश गुरु को।

मन्त्र को सिद्ध करने के लिए ग्रहण के समय में या पर्वकालों में 100 माला जपकर सिद्ध करने के बाद 21 बार झाड़ने से और मोर पंख या नीम की डाली से जिस स्थान पर झाड़ा दे उस स्थान कि मिट्टी बाँधने से तीन दिन में कखवाई की गांठ बैठ जाती है।

कण्ठबेल दूर करने का मन्त्रः-

ओउम् नमो कण्ठबेल तू द्रुमद्रु मली सिर पर जकड़ी बज्र की ताली गोरखनाथ जागता आया बढ़ती बेल को तुरन्त घटाया। जो कुछ बची ताहि मुरझाया। घट गई बेल बढ़त नहीं बैठी तहाँ उठत नहीं। पके फूटे पीड़ा करे तो गुरु गोरखनाथ की दुहाई। ओउम् नमो आदेश गुरु को मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फुरी मन्त्र ईश्वरी वाचा।

ग्रहण काल अथवा पर्वकाल में 100 माला जपकर इस मन्त्र को सिद्ध करने के बाद कण्ठबेल के रोगी को सात दिन तक झाड़कर जमीन पर चाकू से 21 लकीरें खीचें तो रोग दूर हो। कण्ठबेल गले पर गरदन का एक दुसाध्य चर्मरोग होता है। झाड़ने से दूर हो जाता है।

बिच्छू का विष झाड़ने का मन्त्र

बिच्छू काटने के बाद उसका जहर जहाँ तक चढ़ा हो वहाँ से पकड़कर झाड़ें। जैसे-जैसे जहर उतरता जाए वहीं पर पकड़ता रहे और झाड़ते हुए उतारता जाए। डंक की जगह तक आने पर झाड़ना बंद कर दें और डंक से ऊपर ‘‘जहर मोहरा’’ पानी में घिसकर लगाएं। जहर मोहरा बाजार में मिल जाता है।
शिलाजीत बेचने वालों के पास भी मिल जाता है। मन्त्र को पहले बताए गये तरीके से सिद्ध किया जाना चाहिए ग्रहण के समय या पर्वकाल में 100 माला जप करके सिद्ध कर लेना चाहिए।
पहला मन्त्रः

ओउम् नमो आदेश गुरु को। लो बिच्छू कांकर वालों उतर बिच्छू न कर टालो उतरो तो उतारुं चढ़े तो मारुं गरुड़ मोर पंख हकालूं। शब्द सांचा पिण्ड काचा फुरो मंत्र ईश्वरी वाचा।

दूसरा मंत्रः-(काला बिच्छू उतारने का)

ओउम् काला बिच्छू कांकरवालो हरी पूंछ भैराला। सोना का नाडू रुपे का पतनाला आठ गाँठ नौ कोर नीचे बिच्छू ऊपर मोर कौन मोरा कौन मोरा रेतो भकभकाकर बिच्छू रहे तो वह वीर नीड निकोर के कौन वैद मानुष पर गया खाते जाते लागी वार। उतर रे बिच्छु ताहे भैरो बाबा की आन।

पागल कुतो का विष झाड़ने का मंत्र

ओउम् कामरुप देश कामाक्षी देवी जहां बसे मछन्दर जोगी। मछन्दर जोगी का झामरा कुतो सोने की डाढ रुपे का कुंडा। बन्दर नाचे रीछ बजाये चीता बैठा औषध बांटे कूकर का विष भागे। शब्द सांचा पिण्ड काचा फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा
100 माला जपकर मन्त्र को सिद्ध कर लें। फिर समय पड़ने पर काटे हुए स्थान को झाड़े।
जमीन पर चाकू की नोक से 21 लकीरें खीचें। इस प्रकार सात दिन तक झाड़ने से पागल कुतो का विष दूर हो जाता है। आजकल पागल कुतो के काटे के लिये शर्तिया इलाज इंजेक्शन हैं और इन्हें अवश्य लगवाना चाहिए। पागल कुत्ते की पहचान है कि अगर कुत्ता पागल होगा तो काटने के बाद 2-3 दिन में ही मर जायेगा रिस्क नहीं लेना चाहिये इंजेक्शन द्वारा इलाज पूरा कराना चाहिये। मन्त्र में शक्ति जरुर होती यदि ऐसा कोई मन्त्रवेत्ता हो जिसने मन्त्र सिद्ध किया हो और इस प्रकार के प्रयोग सफलता पूर्वक कर चुका हो तभी उस पर निर्भर करें।

पीलिया झाड़ने का मंत्र

पीलिया रोग में शरीर पीला पड़ जाता है, आंखें पीली हो जाती हैं, सारा कुछ पीला ही दिखाई देता है। यह पिताशय में पित्त की अधिकता हो जाने पर होता है। आजकल तो चिकित्सा विज्ञान में इस रोग के लिए बहुत औशधियां उपलब्ध हैं। परन्तु पहले जमाने में गांवों में इन रोगों की चिकित्सा मन्त्रों के ही द्वारा होती थी।
100 माला जप कर इस मन्त्र को सिद्ध करके रोगी के सिर पर कांसे की कटोरी में तिल का तेल भर कर रखें और डाभ यानी कुशा से उस तेल को चलाते हुए निम्न मंत्र को सात बार पढ़े। तीन दिन तक ऐसा करते रहने पर तेल पीला पड़ जायेगा और पीलिया रोग दूर हो जायेगा।

ओउम् नमो वीर बैताल असराल नार कहे तू देव खादी तू बादी पीलिया कूं भिदाती कारै झारै पीलिया रहे न एक निशान जो कहीं रह जाए तो हनुमन्त वीर की आन। मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा।