गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी

गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी भावना और भावुकता, दयालुता और मनुश्यता की बात यदि एक तरफ कर दी जाये तब भी गाय का दूध, घी इत्यादि सर्वगुणसम्पन्न है। विषैला प्रभाव नष्ट करने में गोघृत की तुलना में अन्य किसी पशु का घी उतना उपयोगी नहीं होता। दूध घी से सैकड़ों रोग-विकार दूर होते हैं, यहाँ कुछ रोगों के नाम के साथ उपचार की संक्षिप्त विधि बतायी जा रही है। इस अमृत की शक्ति को पहचान कर पाठक लंबी आयु तक स्वस्थ और युवा बने रह सकते हैं-
अजीर्णः– जब गरिष्ठ भोजन अनपचा रह जाता है, तब शरीर की आग ठंडी पड़ जाती है, अम्लता बढ़ती जाती है, पेट पत्थर-जैसा ठोस होने लगता है, इसके प्रभाव से गुर्दे भी कमजोर पड़ने लगते हैं। इस स्थिति में दूध में सोंठ और गुड़ औटाइये ताकि पेट की सड़ांध मल-मूत्रा के रास्ते बाहर निकल जाय।
250 ग्राम दुध में 100 ग्राम पानी मिलाइये, 25 ग्राम शक्कर या गुड़ डालिये, 10-12 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाइये, जब पानी जल जाय तो हल्का गर्म रह जाने पर घूँट-घूँट पानी शुरू कर दीजिये। अनपचा भोजन सोंठ की गर्मी से पचने लगेगा और मल-मूत्रा गल-पिघल कर निकलने लगेगा, प्यास लगे तो पानी भी हलका गर्म ही पियें, पेट साफ होते ही जलन, खट्टी डकार अफारा और बेचैनी के विकार भी शान्त हो जायँगे। अजीर्ण से छुटकारा पाने के बाद भी एक दिन दूध ही पीजिये ताकि आँतें और पेट की दीवारें तक निर्मल हो जायँ। कमजोरी से न घबरायें, क्योंकि दुध प्राणों का आधार है; यदि गर्भ से निकला बालक दूध पर जी सकता है तो हम दुर्बल नहीं होंगे, मूँग की पतली दाल से चपाती खाकर आप तीसरे दिन से हलके भोजन की शुरूआत कर सकते हैं, दोपहर को दूध में पका हुआ पतला दलिया एवं शाम को दूध में शहद मिलाकर पीजिये, रात को खिचड़ी खाइये चैथे दिन से सामान्य भोजन शुरू कर दें।
अतिसारः– आयुर्वेद के ग्रन्थों में अतिसार पर काबू पाने के लिये दूध के फेन (झाग) को परमौषधि बताया गया है। मलाई और रबड़ी खाने वालों को मालूम होना चाहिये कि 25 ग्राम दुग्ध फेन, 1/2 किलो मलाई के बराबर पौष्टिक है। झाग मुँह में पहुँचते ही टॉनिक बन जाता है, जबकि रबड़ी-खोया पचाने में कई घंटे लग जाते हैं, दूध दुहने के बाद बर्तन में जितना भी झाग हो, उसे एक बड़े कटोरे में कलछी से निकाल लें, इस झाग को चम्मच से स्वाद लेते हुए चूसना शुरू कर दें, वैसे तो झाग में चूसने वाला ठोस तत्त्व होता ही नहीं, किंतु इस विधि से पेट का संकुचन होता है, गोदुग्ध के झाग से पेट की आग भड़क उठेगी और भोजन के कच्चे रस पचने लगेंगे, दूध का झाग शरीर की पेशियों को भी फुला देता है और पाचन-क्रिया तीव्र हो जाती है, बदन को गठीला और पुष्ट करने में दुग्ध-फेन अत्युत्तम औशधि है।
आँखों में जलन-भावप्रकाश निघण्टु में गाय का दूध आँखों के लिये उत्तम अंजन माना गया है, यदि आप भैंस का दूध पीते हैं तो गाय का दूध पीना शुरू कर दें, यदि गाय का दूध पीते हैं तो वह एकदम ताजा-ताजा हो। गाय ब्यायी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि शुरू का दूध जलन पैदा करता है, दूध की मलाई लेकर अँगुली से रात को सोते समय पलकों पर लगा लें, सुबह तक जलन शान्त हो जायगी, नहाने के पहले गोदुग्ध का मक्खन लगा दें, आधे घंटे में जलन जाती रहेगी, यदि मलाई की चिकनाहट को मन न मानता हो तो 4 चम्मच दूध, 1 कटोरी पानी में मिलाकर उससे खुली आँखों में छींटे मारें और स्वच्छ कपड़े से आँखें पोछकर सो जायँ। सुबह तक सारी जलन निकल चुकी होगी, जिन्हें चिकनाई से प्यार हो तो उन्हें दूध की मलाई पलकों पर लेपकर गर्मी की सूजन निकाल देनी चाहिये।
आग से जलनाः- घाव कैसा भी हो, गाय के घी से उत्तम न कोई पेनिसिलिन आदि दवा है न मरहम, कुदरत ने गोघृत को इतनी विषनाशक शक्ति से भर रखा है कि इससे बढि़या क्रीम, मरहम या एंटीसेप्टिक दवा हो ही नहीं सकती, गोघृत में पट्ठी तर करके जली हुई त्वचा पर रखकर भगवान को याद करें, जिसने आप को गोघृत के रूप में अमृत-जैसी पौष्टिक दवा दे रखी है। दूध में घी डाल कर पियें, ताकि सप्ताह भर में घाव की जगह नयी त्वचा उग जाय। गाय का दूध शरीर को त्वचा भी देता है और मांस की कमी भी शीघ्र पूरी करता है।
आधासीसीः- आधे सिर का दर्द तभी होता है, जब उस हिस्से में रक्त के संचार में रूकावट पड़ गयी हो, उस रूकावट का कारण भोजन के वे कच्चे रस होते हैं, जो कफ, लेस आदि के रूप में जमा हो जाते हैं और जुकाम-नजला भी बन जाते हैं, अगर नासिका से दुशित जल न निकले तो माथे के किसी भी हिस्से में जोरों का दर्द उठने लगता है, माथा इतने भयंकर रूप में फटने लगता है जैसे टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ जायगा। 250 ग्राम दूध में 250 ग्राम पानी डालिये, 2 पीपली, 5 लौंग और दालचीनी के 4 छोटे टुकड़े पीसकर दूध में औटाइये।
जब केवल दूध ही बचे तो 2 चम्मच शहद मिलाकर पियें और कंबल ओढ़कर सो जायँ। घूँट इस तरह पियें जैसे गर्म वस्तु चूस रहे हों, जितना अधिक पसीना आयेगा उतनी जल्दी आराम मिलेगा, दिन में 3-4 बार ऐसा दूध पीने से माथे की श्लेष्मा जल बनकर नथनों से बह जायगी या पसीने और मल-मूत्रा के रास्ते निकल जायगी।

चमत्कारी वनौशधियाँ

चमत्कारी वनौशधियाँ भारतीय ज्योतिष शास्त्रों में सूर्य को जगदात्मा कहा गया है। यह सही भी है, क्योकि सृष्टि में बगैर सूर्य के विनाश सुनिश्चित है। वास्तव में सूर्य के प्रकाश में एक विशेष शक्ति निहित होती है। इसी जीवनी शक्ति के द्वारा पौधे अपने भोजन की प्राप्ति करते हैं तथा विभिन्न प्राणी भी इस पर आश्रित है। सृष्टि में जीवनचक्र को जहां सूर्य नियंत्रित करता है, वहीं दूसरी और वायुमंडल के विभिन्न गैसीय चक्र भी इसी के अधीन हैं। सूर्य की रश्मियों में सात प्रमुख रंगों (बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नांरगी और लाल) का एक संतुलित सम्मिश्रण होता हैं, इसलिए सृष्टि का निर्माण करने वाले पांचों तत्त्व अर्थात् जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी को सूर्य अपने ही रंग में समेटे हुए है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। सूर्य रश्मियों में विचित्र कीटाणुनाशक क्षमता भी है। इसीलिए जिस घर में सूर्य के प्रकाश का प्रवेश रहता है, उस घर के सभी प्राणी स्वस्थ रहते हैं। इसके विपरीत ऐसे कमरों में रहने वाले, जहां सूर्य का समूचित प्रकाश नहीं पहुंचता, अस्वस्थ तो रहते ही हैं, साथ ही उनकी बुद्धि-बल का भी पूर्ण विकास नहीं होता और न्यूनता दृष्टिगोचर होती है। हम यह भी देखते हैं, कि छाया में पड़ने वाले पौधे अच्छी फसल नहीं दे पाते और सूर्य के प्रकाश के अभाव में कोई भी पौधा पनप नही सकता। इसी प्रकार जिस जलाशय मे धूप नहीं पहुंचती उसमें कीड़े पैदा हो जाते हैं। इसके विपरीत सूर्य का प्रकाश का प्राप्त करने वाले जलाशयों का जल स्वच्छ तथा कीटाणुमुक्त तो होता ही है, इसके साथ ही साथ वह शक्ति का संचार करने वाला भी होता है। सूर्य के प्रकाश से समस्त सृष्टि लाभान्वित होती है। जड़ -चेतन सभी पर इसका समरूप प्रभाव पड़ता है। एक भारतीय महात्मा ‘स्वामी ज्ञानानन्द’ ने तो सूर्य-रश्मियों से तमाम पदार्थो को उत्पन्न कर संसार को चमत्कृत कर दिया था। सूर्य के इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण भारतीय ऋषि- मुनियों और वेदाचार्यो ने सूर्य को देवता कहा है। सूर्य-चमत्कार, संध्योपासना, सूर्य जल अर्पण आदि क्रियाओं के सम्पन्न करने के पीछे भी यही रहस्य हैं। हमारे पूर्वजों को सौर रश्यिमों की सहायता से अनेक औशधियों के निर्माण की जानकारी थी।
वनौषधियों के प्रयोग

मिर्गी के लिए– जायफल आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला फल है। इक्कीस ‘जायफल’ लाकर उनमें से सात जायफल ‘नीले रंग की बोतल में’ तथा सात जायफल हरे रंग की बोतल में सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक धूप में रखें। इस चैदह जायफल को शेष (बिना धूप में रखे), सात जायफल के साथ पिरोपकर एक माला बनाकर मिर्गी के रोग को पहनाने से उसे मिर्गी के दौरे आने बंद हो जाते हैं।
चेहरे की फुन्सियों को हटाने के लिएः– लगभग सौ मि0 ली0 ‘अंरडी के तेल’ को ‘लाल रंग की काँच की बोतल’ में सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखा रहने दें। लाल रंग की बोतल उपलब्ध न हो तो एक सफेद बोतल के चारों ओर लाल पारदर्शक पन्नी लपेट कर ऐसा किया जा सकता हैं। इस अरंडी के तेल में कपड़े से छना गया महीन ‘बेसन’ मिलाकर इससे बने उबटन को नियमित कुछ देर तक चेहरे पर लगाकर, तदुपरान्त चेहरा धोने से चेहरे पर विकसित होने वाली फुन्सियां दूर हो जाती हैं और चेहरा साफ हो जाता है। आवश्यकता हो, तो रात्रि पर्यन्त इस मिश्रण को चेहरे पर लगाये रहना चाहिए और सुबह-सुबह उसे धो लेना चाहिए। इस सम्बन्ध में अपने चिकित्सक से परामर्श ले लें।
लकवा दूर करने के लिएः– इसके लिए 100 मि0 ली0 ‘सरसो का शुद्ध तेल’ लें, इस तेल में एक तोला ‘काली मिर्च’ का कपड़े की सहायता से छना चूर्ण मिलावें। इसी प्रकार दस ग्राम ‘भांग’ का चूर्ण भी इसमें मिलाकर इस मिश्रण को 10 मिनट तक उबालें। ठंडा होने पर इस तेल को छानकर एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर उसके चारों ओर एक लाल पन्नी लपेट कर सूर्योदय तक सूर्य के प्रकाश में रखें। इस तेल की मालिश लकवे वाले भाग में करने से सम्बन्धित भाग में रक्त का प्रवाह आरम्भ हो जाता है।
कांच निकलना रोकने के लिए– कुछ लोगों को मलत्याग के समय थोड़ी या अधिक आंत्र बाहर निकल आती है, इसे कांच निकलना कहते हैं। इसके लिए थोड़ी सी ‘फिटकारी’ एक नीली बोतल’ में भरकर उसे सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखें। इस बोतल को रख लें। नियमित शौच के समय इस फिटकारी की थोड़ी सी मात्रा जल में घोलकर उस जल से गुदा प्रक्षालन करने से कांच निकलना बंद हो जाता है।
श्वेत कुष्ठ निवारणः– सफेद दाग अथवा फूलबहरी दूर करने के लिए ‘बावची का तेल’ एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर उस बोतल के चारों ओर एक लाल पन्नी लपेट कर इस बोतल को दस दिन तक नियमित सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखें। रात्रि में इसे घर के अंदर रखें। इस तेल को फूलबहरी पर लगाने से वह ठीक हो जाती है। अधिक प्रसारित दागों पर यह उपचार काफी समय लेता है।
जोड़ो का दर्दः– लगभग दो सौ मि0 ली0 उपयोग किया हुआ घी लें इसमें एक तोला ‘शुद्ध कपूर’ एक तोला ‘तारपीन का तेल’ तथा एक तोला ‘गिरनार का तेल मिलाकर इस मिश्रण को ‘लाल पन्नी युक्त बोतल’ में भरकर सूर्योदय से सूर्यास्त तक दस दिन तक धूप में रखें। रात्रि में इसे चांदनी में न रखें। दस दिन बाद इस मिश्रण में दस मिलीमीटर ‘मिथाइल सेलीसिलेट’ मिला दें (प्राचीन काल में इसके स्थान पर ‘बाम का पौधा’ मिलाया जाता था)।
इस तेल की समय-समय पर घुटनों तथा जोड़ों पर मालिश करने से दर्द का शमन होता हैं।
त्वचा रोग – ‘नीम के तेल’ की वांछित मात्रा ‘हरी बोतल’ में भरकर दस दिन तक उसे सूर्योदय तक धूप में रखें। त्वचा रोगों में विशेष रूप से फोड़े-फुंसी तथा खुजली, एक्जीमा आदि में यह तेल प्रभावशाली है, इसे सम्बन्धित स्थान पर लगाया जाता हैं।
इन्द्रिय दौर्बल्य हेतु – इसके लिए शुद्व ‘तिल का तेल’, एक स्वच्छ ‘सफेद बोतल’ में भरकर उस बोतल के चारों ओर लाल पन्नी लपेट कर दस दिनों तक उसे सुबह से लेकर शाम तक धूप में रखें। इस तेल को इन्द्रिय पर नियमित लगाने से उसकी दुर्बलता समाप्त होती हैं।
टॉन्सिल्स के लिएः– बड़ी कटेली को समूचा ही उखाड़ लावें, घर लाकर इसे पानी से भली प्रकार से धोकर एक बड़े बर्तन में रखकर उसमें इतना पानी डालें, कि पौधा आधा डूब जाय। अब इसें उबालें, जब पानी आधा या इससे कुछ कम रह जाय, तो इसे उतार कर छान लें इस छानन को एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर लगभग दो घंटे धूप दिखायें। इस छानन से गरारे करने पर बढ़े हुए टान्सिल्स तुरंत बैठ जाते हैं। अनेक आयुर्वेदिक औशधियां हैं जो हम अपने दैनिक खाद्य पदार्थो के साथ में प्रयोग करते हैं जिनका मानव अपने जीवन में सन्तुलित उपयोग कर अपने स्वास्थ्य को अच्छा बनाये रख सकता हैं, वे क्रमशः इस प्रकार हैं-

  1. धनिया
  2.  मिर्च
  3. सौंफ।

धनिया– धनिया से तो सभी लोग परिचित हैं, नित्य अपनी दाल सब्जी में हम इसे मसाले के रूप में प्रयोग करते हैं, जिससे खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट बन पाता है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औशधि है, जिसमें मानव स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त गुण, धर्म पाये जाते हैं। धनिया मुख्यतः भारत तथा विशेषकर रूस, मोरक्को आदि में प्रमुखता से पैदा होती है। यह एक छोटा सा पौधा होता हैं, जिसमें बीज युक्त छोटे-छोटे फल लगते हैं। बाद में सूख जाने पर उन्हें मसाले के रूप में उपयोग में लाते हैं।
प्रमुख तत्वः– धनिया में मुख्यतः बोलाटाईट तेल तथा प्रमुख तत्व लिनालोन पाया जाता है, जिसके कारण इसमें सुगन्ध बनी रहती हैं। इसके अतिरिक्त इसमें पाईनीन तथा थाईमोल, फिक्सआयल एवं प्रोटीन पाया जाता हैं।
उपयोगः– यह पाचन संस्थान के लिए अत्यन्त उपयोगी है। इसके सेवन से भोजन का अत्यधिक दबाव आन्तरिक अंगो पर नहीं पड़ पाता है, जिससे पाचन क्रिया सुगमता पूर्वक सम्पन्न होती है। यह पेट की दर्द में अत्यन्त लाभकारी औशधि है, जिससे पेट में अपच, गैस आदि की सम्भावना नहीं रहती है। इसका सीमित उपयोग खाद्य पदार्थो में करना उपयुक्त रहता हैं।
मिर्च– मिर्च से प्रायः सभी परिचित है। यह देश के प्रत्येक भाग में पाई जाती है, विशेषतः लाल होने पर इसे मसालों में प्रयोग में लाया जाता हैं। वनस्पति विज्ञान में इसका नाम ‘कैपसीकम’ मिनीमम है। यह जापान, अफ्रीका, एवं भारत में प्रचूर मात्रा में पाई जाती हैं।
प्रमुख तत्व – इसमें मुख्यतः केपसीयासन, विटामिन सी तथा कैराटिन नामक तत्व पाया जाता है, जिसके कारण रंग लाल होता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन बी भी पाया जाता है।
उपयोग– यह भी खाद्य पदार्थो में मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता हैं, जिससे भोजन में स्वाद के गुण आते हैं। यह विशेषतर जोड़ों के दर्द में, सूजन तथा पेट में पाचन क्रिया में पाचक के रूप में सहायक होता हैं। यदि इसे उचित मात्रा में नित्य प्रयोग किया जाए, तो व्यक्ति में पाचन संस्थान एवं शरीर में जोड़ों आदि की तकलीफ एवं दर्द नही होता है।
सौंफ -सौंफ प्रायः भारत तथा अन्य देशों में भी पाई जाती है। विदेशों में यह यूरोप, जापान तथा जापान तथा जर्मनी में पाई जाती है। वनस्पति शास्त्र में इसका नाम ‘फोरनिकुलमबलगेर’ हैं, इसका पौधा दो या तीन फीट लम्बा होता हैं इसमें जो फल लगता हैं सूखने पर उसे प्रयोग में लाते हैं।
प्रमुख तत्व – सौंफ में एनथोल तथा फैनकोन नामक तत्व पाया जाता है, जिसके कारण इसमें सुगन्ध एवं मीठा स्वाद होता हैं। इसके अतिरिक्त इसमें फिक्स तेल तथा प्रोटीन भी पाया जाता है।
गुण– यह श्वसन संस्थान के लिए अत्यन्त उपयोगी औशधि है, विशेषकर खाँसी में यह अच्छा कार्य करता है। इसके अतिरिक्त पाचन संस्थान में अपचन की स्थिति में पाचक के रूप में अच्छा कार्य करता हैं। इसके साथ ही लोग इसका उपयोग घर में माउथ वाश आदि के रूप प्रयोग करते है, जिससे व्यक्ति सुन्दर एवं स्वस्थ बना रहता है।

महा औशधि पीपल

महा औशधि पीपल पीपल वृक्ष की उपस्थिति व उपयोग की जानकारी वैदिक काल से ही मिलती है, अनेक प्राचीन ग्रन्थों में इसके उदाहरण मिलते है, पीपल का वृक्ष सम्पूर्ण जलीय प्रदेश तथा साधारण भूमि में आसानी से मिल जाता है तथा मरूभूमि में भी यह स्वयं को जीवित रखता है। आयुर्वेद के ग्रन्थों व संहिताओं में औशधि के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। चिकित्सा की दृष्टि से रोग निवारण के लिए पीपल के अनेक औशधीय  प्रयोग मिलते हैं, जिनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत है-

  1. सर्पदंश पर विषनाशक प्रयोग
    जब किसी को सर्पदश हो गया हो, शीघ्र ही डंठल की तरफ से पीपल के ताजे पत्ते को रोगी के कान में थोड़ा सा ड़ालें इसे कसकर पकड़े रहें, क्योकि विष के प्रभाव से रोगी को वेदना होती है तथा डंठल का खिंचाव अन्दर की ओर होता है, यदि डंठल अधिक अन्दर चला जाता है, तो कान का पर्दा छिद्रयुक्त हो सकता है, अतरू पत्ते को पकडे़ रहना चाहिए। तथा जब पत्ता कुछ विवर्ण (नीला या पीला) हो जाए व डंठल कुछ फूल जाए तब पत्ते को बदल देना चाहिए अर्थात् नवीन पत्ता लगाना चाहिए। इस क्रिया से विष का आचूषण होता है तथा जब विष का पूरा आचूषण हो जाता है, तब डंठल का अन्दर की ओर खिंचाव तथा रोगी को वेदना होनी बन्द हो जाती है। तब उल्टी (वमन) करानी चाहिए ताकि आमाशय में कोई विषाक्त द्रव एकत्रित हो, तो निकल जाए। इसके पश्चात् दुग्धपान कराना चाहिए।
  2. पीपल के द्वारा चिकित्सा के अनेक योग आयुर्वेदीय योग मिलते हैं जैसे– संग्रहणीय कषाय (चरक), पंचवल्कल कषाय आदि।
    3. आमजप्रवाहिका (एमेबिक डीसेन्ट्री) में पीपल की गोंद का शुष्क चुर्ण 2-3 ग्राम प्रतिदिन लेने से जीर्ण प्रवाहिका ठीक हो जाती है। साथ ही पथ्यापथ्य का पालन आवश्यक है।
    4. मधुमेह रोग में दो पत्ते पीपल के, चार पत्ते तुलसी के, चार पत्ते नीम के, चार पत्ते बिल्प पत्र के तथा आठ पत्र नींबू के एवं पाँच काली मिर्च को मुख में चबा-चबाकर रस चूसना चाहिए, शेष बचे हुए तंतुओं को फेंक देना चाहिए। औषध का सेवन करने के साथ-साथ रोगी को यथा-शक्ति पैदल भ्रमण भी करते रहना चाहिए, इससे कुछ ही दिनों में रक्त शर्करा की मात्रा न्यून हो जाती है।
    5. आयुर्वेद की अनेक भस्मों के निर्माण में भी पीपल के अंगों का प्रयोग किया जाता हैं– जैसे नाग भस्म, वंग भस्म, यशद भस्म, अभ्रक भस्म आदि।

नोट- यह सभी औधिय प्रयोग आप अपने चिकित्सक से परामर्श करके ही करें।

पीपल के मांत्रिक प्रयोग
1. विषम ज्वर
जिस रोगी को ठण्ड लगकर बुखार आता हो या तीन दिन के अन्तर से ज्वर आता हो, उस रोगी को स्नान कराके, शुद्ध जल में तिल व थोड़ा दूध मिलाकर पूर्वाभिमुख खडे़ होकर पीपल वृक्ष पर उस तिलोदक को सात बार मंत्र बोलते हुए धारा बद्ध चढ़ा देने से ज्वर आना बन्द हो जाता है। यह प्रयोग सात दिन तक या ज्वर शांत होने तक किया जाता है। मंत्र इस प्रकार से है- विषमज्वर गच्छत्वं तस्मै तिलोदकं नमरू
2. पुराना ज्वर
 नमः शिवाय’ को ग्यारह बार उच्चारण करते हुए जल अर्पित करें तथा रोगी के रोग निवृत्ति हेतु प्रार्थना करें। इससे पुराना ज्वर, जो अनेक औशधियों के सेवन से भी ठीक न होता हो तब इस मंत्रोपचार से लाभ होता है।\शनिवार के दिन प्रातरूकाल स्नानादि करके रोगी स्वयं या रोगी की ओर से कोई अन्य व्यक्ति रोगी का नाम लेकर एक ताम्र के पात्र में शुद्ध जल व थोड़ा चिरायता, दुग्ध, कुछ शर्करा व कुशा डालकर उत्तर की ओर मुख कर के भगवान शंकर को स्मरण करते हुए शिव पंचाक्षरी मंत्र ‘

चमत्कारी पौधा अशोक

चमत्कारी पौधा अशोक शोक वृक्ष के नाम से हम सभी परिचित हैं। यह वही वृक्ष है जिसकी छाया तले लंका में माता सीताजी को रखा गया था। यह एक सुंदर सुखद, छाया प्रधान वृक्ष है। इसके पत्ते 8 से 10 इंच लम्बे तथा 2 से 3 इंच चैडे होते हैं। प्रारम्भ में इन पत्तों का रंग ताम्रवर्ण का होता है- इसीलिए इसे ‘‘ताम्र पल्लव’’ भी कहा जाता है। इसके पुश्प गुच्छों में लगते हैं। तथा पुश्प काल में पहले ये नारंगी तदुपरांत लाल रंग के हो जाते हैं। इसलिए अशोक का एक नाम ‘‘हेम्पुश्प’’ भी है। अशोक के पुश्प वसंत ऋतु में खिलते हैं। पुश्पित होने पर ये मन को आनंदित करने वाले होते हैं।

औशधीय  चमत्कार- अपनी सघन सुखदायिनी छाया के द्वारा इस वृक्ष ने जिस प्रकार माँ सीता के दुख को कम किया था। ठीक उसी प्रकार इस वृक्ष के अनेक औशधीय प्रयोग भी हैं। जो कि स्त्रियों में होने वाली व्याधियों को हरने में सक्षम है। वास्तव में इसकी छाल में ‘‘टेनिन’’ तथा ‘‘कैटेचिन’’ नामक रसायन पर्याप्त मात्रा में होते हैं। ये रसायन ही औशधीय  महत्व के हैं। इसलिए औशधी के रूप में इसकी छाल का ही अधिक उपयोग किया जाता है। अशोक से निर्मित अशोकारिष्ट नामक एक आयुर्वेदिक औशधी के गुणों से हम सभी भली-भाँति परिचित हैं।
अश्मरी (पथरी) रोग में- अशोक के बीजों के 2 ग्राम चूर्ण को जल के साथ नित्य कुछ समय तक सेवन करने से अश्मरी रोग का शमन होता है।
गर्भपात रोकने के लिए- प्रायः अनेक महिलाओं को गर्भाशय की निबर्लता के कारण गर्भपात होता है अथवा कभी-कभी महिलाओं को अधिक रक्तस्राव होने लगता है। शास्त्रों में इसके लिए ‘‘अशोक-घृत’’ लेने की सलाह दी गयी है अथवा ऐसे मामले में अशोक की छाल का चूर्ण थोड़ी-सी मात्रा में गाय के दूध के साथ लेने से लाभ हाता है। इस के लिए एक मात्रा 2 से 4 ग्राम की होती है और इसे लगभग एक सप्ताह लेना होता है।
मासिक धर्म की गड़बड़ी- जिन महिलाओं को मासिक धर्म अधिक होता हो अथवा अनियमित होता हो उनके लिए भी अशोक की छाल का व्यवहार करना हितकर है। इसके लिए रोगी महिला को लगभग 2 तोला मात्रा अशोक की छाल लेकर उसे दूध में उबालें जब दूध पर्याप्त गाढ़ा हो जाए तब छाल को अलग कर उस दूध में भरपूर अथवा आवश्यक मात्रा में खांड मिलाकर सेवन करना चाहिए। लिए जाने वाले दूध की मात्रा 250 मिली लीटर हो। इसका सेवन 3 दिन तक करना चाहिए।

रक्त प्रदर में रक्त प्रदर और अधिक मासिक स्राव की स्थिति में अशोक की छाल और सफेद जीरे का आसव भी बहुत लाभकारी है। इसे बनाने के लिए छाल और सफेद जीरे की 2-2 तोला मात्रा लेकर उन्हें आधा सेर जल में उबालते हैं। जब लगभग चैथाई पानी रह जाय तब उतार कर इसे छान लें और इसमें खांड मिलाकर सुबह-सुबह सेवन करें इससे रक्त प्रदर और अधिक मासिक स्राव के विकार दूर होते हैं। यह आसव एक बार में लगभग 2 तोला सेवन किया जा सकता है तथा दिन में 3 या 4 बार सेवन करें।

श्वेत प्रदर में– श्वेत प्रदर से पीडित महिलाओं को अशोक की छाल का दुग्ध कषाय लेना चाहिए। इस कषाय को बनाने के लिए लगभग 250 मि0 ली0 दूध और 100 ग्राम अशोक छाल मिला कर इस मिश्रण को इतना गरम करें कि सम्पूर्ण जलीय अंश उड़ जाए, इसके पश्चात् प्राप्त दूध की लगभग 2 या 3 तोला मात्रा दिन में दो बार लें। यह प्रयोग मासिक स्राव के चैथे दिन के पश्चात् से प्रारंभ करें। इस प्रकार यह महिलाओं के लिए एक अमोघ औशधी है।
अशोक के तांत्रिक चमत्कार- तंत्रशास्त्रों में अशोक के अनेक प्रयोग वर्णित हैं-
1. जिस घर में उत्तर की ओर अशोक का वृक्ष लगा हो उस घर में बिनबुलाए शोक नहीं आते।
2. सोमवार के दिन शुभ मुहूर्त में अशोक के पत्तों को घर में रखने से घर में शांति व श्री वृद्धि होती है।
3. अशोक वृक्ष का बाँदा चित्रा नक्षत्र में लाकर रखने से ऐश्वर्य वृद्धि होती है।
4. उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में निकाला गया अशोक का बाँदा अदृश्यीकरण हेतु प्रयुक्त होता है।
5. अशोक के वृक्ष के नीचे स्नान करने वाले व्यक्ति की ग्रहजनित बाधाएँ दूर होती हैं।
6. मंदबुद्धी/स्मृति लोप वाले जातक या जिनकी पत्रिका में बुध नीच का बैठा हो उनके लिये अशोक वृक्ष के नीचे स्नान करना कष्ट निवारक होता है।
7. इस वृक्ष को घर के उत्तर दिशा में रोपित करने से वास्तुदोश का निवारण होता है।
8. अशोक का वृक्ष घर में होने से घर में लगे अन्य अशुभ वृक्षों का दोश शांत हो जाता है।

औषधी (वनस्पति) तंत्र

औषधी (वनस्पति) तंत्र आज मानव भौतिक विज्ञान के शिखर पर पहुँच कर भी प्रकृति के सम्मुख बौना ही है। वह प्रकृति के रहस्यों का उदघाटन करने के बावजूद, भी सृष्टि के अंशमात्र से भी परिचित नहीं हो पाया है।
पृथ्वी पर कितने ही प्रकार के पेड़- पौधे, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु तथा वनस्पतियाँ हैं, किन्तु उनका पूर्ण विवरण आज तक तैयार नहीं किया जा सका। प्रत्येक जीव-जन्तु और वनस्पति के अपने कुछ गुण-दोश हैं।

तंत्र के प्रारम्भिक- युग में, जिज्ञासु-साधकों के द्वारा किये गये अनुसन्धान के फलस्वरूप हमें वनस्पति शास्त्र और पदार्थ-विज्ञान तथा इनके मिश्रित रूप आयुर्वेद-शास्त्र सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। वह विपुल साहित्य और वे ग्रन्थ-प्रकृति की रहस्यमता पर पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। महर्षियों के अपनी दीर्घकालीन-शोध और अनुभवों के आधार पर विभिन्न वानस्पतिक-पदार्थो के जो बहु-उपयोगी प्रयोग-परिणाम घोषित किये हैं, उसमें से दो-एक का आंशिक-विवरण (तन्त्र-सन्दर्भ में) यहाँ प्रस्तुत है।
ये प्रयोग विभिन्न प्रकार की समस्याओं के निराकरण हेतु निश्चित किये गये हैं। एक समय इनका देश-व्यापी प्रचार था। काल के प्रभाव से ये लुप्तप्रायः हो गये और आज इनके ज्ञाता साधक गिने-चुने ही रह गये हैं। उनमें भी जो वास्तविक ममज्र्ञ और समर्थ हैं, वे एकान्त सेवी, निस्पृहः और विशुद्ध साधक हैं, पर जो अल्पज्ञ, प्रशंसा-लोलुप, अर्थकामी और विवेक-शून्य हैं, वे डंके की चोट पर अपना प्रचार करते हुए, आडम्बर के जाल में आस्थावान लोगों को फँसाकर लूटने का कार्य कर रहे हैं।
उनके इस आचरण का भेद खुलने पर जन-सामान्य में इन विषयों के प्रति अनास्था ही उत्पन्न होती है, फलस्वरूप नैतिकता, अध्यात्म और संस्कृति का ह्रास होकर अनैतिकता, अराजकता, विभ्रम और पतन का वातावरण निर्मित होता है। मैं मंत्र- तंत्र पर अनुसंन्धानरत बुद्धिमान साधकों से आशा करता हूँ कि वह इन को पहचानें और इन की पोल खोंलें।
लगभग सभी नगण्य प्रतीत होने वाली वनस्पतियों की आश्चर्यजनक उपयोग- विधियों का उल्लेख करते हुए, महर्षियों ने इस सत्य को प्रतिपादित किया है कि सृष्टि का एक कण भी व्यर्थ नहीं है, सबकी ही कुछ न कुछ उपयोगिता है। आवश्यकता है केवल उन्हें परखने और प्रयुक्त करने की। सृष्टि में जहां एक ओर आम, अमरूद, केला, कटहल, नींबू और नारियल जैसे फल हैं। गेहूँ, जौ, चना, धान आदि जैसे अनाज हैं। वहीं घास-पात कही जाने वाली जड़ी-बूटियों में भी अद्भुत गुण समाहित हैं।

अद्भुत गुणों से युक्त्त– अपामार्ग पौधे का विवरण प्रस्तुत है। अपामार्ग, लटजीरा, अंझाझार, ओंगा, चिरचिटा- यह सब एक ही पौधे के नाम है। यह समग्र भारतवर्ष तथा एशिया के उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में पाया जाता है। वर्षा का प्रथम पानी पड़ते ही आपामार्ग के पौधे अंकुरित होते हैं।