चमत्कारी पौधा अशोक

चमत्कारी पौधा अशोक शोक वृक्ष के नाम से हम सभी परिचित हैं। यह वही वृक्ष है जिसकी छाया तले लंका में माता सीताजी को रखा गया था। यह एक सुंदर सुखद, छाया प्रधान वृक्ष है। इसके पत्ते 8 से 10 इंच लम्बे तथा 2 से 3 इंच चैडे होते हैं। प्रारम्भ में इन पत्तों का रंग ताम्रवर्ण का होता है- इसीलिए इसे ‘‘ताम्र पल्लव’’ भी कहा जाता है। इसके पुश्प गुच्छों में लगते हैं। तथा पुश्प काल में पहले ये नारंगी तदुपरांत लाल रंग के हो जाते हैं। इसलिए अशोक का एक नाम ‘‘हेम्पुश्प’’ भी है। अशोक के पुश्प वसंत ऋतु में खिलते हैं। पुश्पित होने पर ये मन को आनंदित करने वाले होते हैं।

औशधीय  चमत्कार- अपनी सघन सुखदायिनी छाया के द्वारा इस वृक्ष ने जिस प्रकार माँ सीता के दुख को कम किया था। ठीक उसी प्रकार इस वृक्ष के अनेक औशधीय प्रयोग भी हैं। जो कि स्त्रियों में होने वाली व्याधियों को हरने में सक्षम है। वास्तव में इसकी छाल में ‘‘टेनिन’’ तथा ‘‘कैटेचिन’’ नामक रसायन पर्याप्त मात्रा में होते हैं। ये रसायन ही औशधीय  महत्व के हैं। इसलिए औशधी के रूप में इसकी छाल का ही अधिक उपयोग किया जाता है। अशोक से निर्मित अशोकारिष्ट नामक एक आयुर्वेदिक औशधी के गुणों से हम सभी भली-भाँति परिचित हैं।
अश्मरी (पथरी) रोग में- अशोक के बीजों के 2 ग्राम चूर्ण को जल के साथ नित्य कुछ समय तक सेवन करने से अश्मरी रोग का शमन होता है।
गर्भपात रोकने के लिए- प्रायः अनेक महिलाओं को गर्भाशय की निबर्लता के कारण गर्भपात होता है अथवा कभी-कभी महिलाओं को अधिक रक्तस्राव होने लगता है। शास्त्रों में इसके लिए ‘‘अशोक-घृत’’ लेने की सलाह दी गयी है अथवा ऐसे मामले में अशोक की छाल का चूर्ण थोड़ी-सी मात्रा में गाय के दूध के साथ लेने से लाभ हाता है। इस के लिए एक मात्रा 2 से 4 ग्राम की होती है और इसे लगभग एक सप्ताह लेना होता है।
मासिक धर्म की गड़बड़ी- जिन महिलाओं को मासिक धर्म अधिक होता हो अथवा अनियमित होता हो उनके लिए भी अशोक की छाल का व्यवहार करना हितकर है। इसके लिए रोगी महिला को लगभग 2 तोला मात्रा अशोक की छाल लेकर उसे दूध में उबालें जब दूध पर्याप्त गाढ़ा हो जाए तब छाल को अलग कर उस दूध में भरपूर अथवा आवश्यक मात्रा में खांड मिलाकर सेवन करना चाहिए। लिए जाने वाले दूध की मात्रा 250 मिली लीटर हो। इसका सेवन 3 दिन तक करना चाहिए।

रक्त प्रदर में रक्त प्रदर और अधिक मासिक स्राव की स्थिति में अशोक की छाल और सफेद जीरे का आसव भी बहुत लाभकारी है। इसे बनाने के लिए छाल और सफेद जीरे की 2-2 तोला मात्रा लेकर उन्हें आधा सेर जल में उबालते हैं। जब लगभग चैथाई पानी रह जाय तब उतार कर इसे छान लें और इसमें खांड मिलाकर सुबह-सुबह सेवन करें इससे रक्त प्रदर और अधिक मासिक स्राव के विकार दूर होते हैं। यह आसव एक बार में लगभग 2 तोला सेवन किया जा सकता है तथा दिन में 3 या 4 बार सेवन करें।

श्वेत प्रदर में– श्वेत प्रदर से पीडित महिलाओं को अशोक की छाल का दुग्ध कषाय लेना चाहिए। इस कषाय को बनाने के लिए लगभग 250 मि0 ली0 दूध और 100 ग्राम अशोक छाल मिला कर इस मिश्रण को इतना गरम करें कि सम्पूर्ण जलीय अंश उड़ जाए, इसके पश्चात् प्राप्त दूध की लगभग 2 या 3 तोला मात्रा दिन में दो बार लें। यह प्रयोग मासिक स्राव के चैथे दिन के पश्चात् से प्रारंभ करें। इस प्रकार यह महिलाओं के लिए एक अमोघ औशधी है।
अशोक के तांत्रिक चमत्कार- तंत्रशास्त्रों में अशोक के अनेक प्रयोग वर्णित हैं-
1. जिस घर में उत्तर की ओर अशोक का वृक्ष लगा हो उस घर में बिनबुलाए शोक नहीं आते।
2. सोमवार के दिन शुभ मुहूर्त में अशोक के पत्तों को घर में रखने से घर में शांति व श्री वृद्धि होती है।
3. अशोक वृक्ष का बाँदा चित्रा नक्षत्र में लाकर रखने से ऐश्वर्य वृद्धि होती है।
4. उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में निकाला गया अशोक का बाँदा अदृश्यीकरण हेतु प्रयुक्त होता है।
5. अशोक के वृक्ष के नीचे स्नान करने वाले व्यक्ति की ग्रहजनित बाधाएँ दूर होती हैं।
6. मंदबुद्धी/स्मृति लोप वाले जातक या जिनकी पत्रिका में बुध नीच का बैठा हो उनके लिये अशोक वृक्ष के नीचे स्नान करना कष्ट निवारक होता है।
7. इस वृक्ष को घर के उत्तर दिशा में रोपित करने से वास्तुदोश का निवारण होता है।
8. अशोक का वृक्ष घर में होने से घर में लगे अन्य अशुभ वृक्षों का दोश शांत हो जाता है।

कमल का औशधीय महत्व

कमल का औशधीय  महत्व कमल को हिन्दी मराठी एवम् गुजराती में इसी नाम से जाना जाता है। इस के अतिरिक्त इसे कन्नड़ में बिलिया ताबरे, तेलगू में कलावा, तमिल में अम्बल या सामरे, मलयालम में अरबिन्द, पंजाबी में कांवल, सिन्धी में पबन, संस्कृत में पुण्डरीक, पद्म, रक्त-पद्म, शत-पत्र, अग्रेजी में लोटस तथा लेटिन में नेलम्बियम, स्पेसियोसम कहते हैं। नीलकमल का वनस्पति भाषा में नाम नेलम्बियम न्यूसीफेरा है। यह वनस्पति जगत निम्फीऐसी कुल में आता है।
संक्षिप्त विवरण- कमल के नाम से हम सभी भली भाँति परिचित हैं। यह एक बड़ा जलज क्षुप है जो कि बहुधा गम्भीर और निर्मल नीर वाले स्वच्छ सरोवरों तथा तालों में उत्त्पन्न होते हैं। इनके पत्ते बड़े-बड़े और गोल तथा चिकने (जिन पर जल का बिन्दु न ठहरे) होते हैं। कमल के पुश्प के नीचे डन्डी होती है उसको मृणाल अर्थात् कमल नाल कहते हैं। कमल पुश्प में उपस्थित ‘‘पीले जीरे’’ को कमल केशर तथा कमल पुश्प की रज को मकरंद तथा कमल के पुश्प के पश्चात् जो फल लगते हैं उन्हें पद्म कोश कहते हैं। पद्म कोश में निकलने वाले बीजों को कमल गट्टा तथा कमल की जड़ को मसीड़ा कहते हैं।

आयुर्वेद का मत आयुर्वेद के मतानुसार कमल शीतल, वर्ण को उत्तम करने वाला, मधुर और कफ-पित्त, तृषा, दाह, रूधिर विकार, फोड़ा, विष तथा विसर्प नाशक है। यह हृदय को शांति एवं चित्त को आनंदित करने वाला है। इस के अलावा कमल केशर शीतल, वृष्य, कसैली, ग्राही, कफ, पित्त तथा दाह, तृषा, रक्त विकार, बवासीर, विष, सृजन, इत्यादि का शमन करने वाली होती है। मृणाल शीतल, वृष्य भारी, पाक में मधुर, दुग्धवर्द्धक, वातकफकारक, ग्राही, रूक्ष, पित्त, दाह तथा रक्त विकार को दूर करने वाली है। कमलगट्टा स्वादु, कड़वा, और उत्तम गर्भस्थापक होता है। यह रक्त पित्त का शमन करता है और वात को बढ़ाता है। भवप्रकाश के अनुसार यह कफ एवं वात को हरनेवाला है।
कमलनाल, अविदाही, रक्त और पित्त को शुद्ध करने वाली मधुर, रूक्ष, तथा पित्त और दाह शामक है। यह मूत्र कृच्छ नाशक तथा उत्तम रक्त वर्द्धक एवं वमनहर है।
कमलपत्र शीतल, कड़वे, कसैले तथा दाह, तृषा, मूत्र कच्छ और रक्त-पित्त नाशक होते हैं।

कमल के भेद-
कमल में पुश्प, वर्ष और आकार भेद से अनेक जातियाँ होती हैं। इन सब में ‘‘सूर्य विकासी’’ व ‘‘चन्द्र विकासी’’ प्रमुख हैं। इनमें से सूर्य विकासी बड़े तथा चन्द्र विकासी छोटे होते हैं। इन दोनों ही प्रकार में श्वेत, रक्त तथा नील ये 3- 3 भेद हैं।

कमल के औशधीय  प्रयोग-
1. नवीन श्वेत प्रदर में- नील कमल की केसर सेंधव नमक, जीरा तथा मुलैठी को समभाग लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 5 ग्राम की मात्रा में दही अथवा शहद के साथ सेवन करने से श्वेत प्रदर का नाश होता है।
2. रक्तार्श में- 5 ग्राम कमल केशर प्रतिदिन सुबह मक्खन के साथ लेने से शीघ्र ही रक्तार्श नष्ट होता है।

  1. दाह शमन हेतु- कमन और केले के पत्तों को बिछा कर उसपर शयन करने से शरीर की दाह शांत होती है। पुनः यदि शरीर पर इसी के साथ-साथ चंदन के पानी का भी छिड़काव किया जाय तो और भी जल्दी आराम होता है।
  2. वमन नाश हेतु- कमल गट्टे को भूनकर उसकी गिरी को सेवन करने से वमन का नाश हाता है। किंतु इस प्रयोग में गिरी के मध्य का हरे रंग का अंकुर निकाल देना चाहिए।
  3. कूचों को कठोर करने के लिए- कूचों को कठोर करने के लिए कमल गट्टा, हल्दी तथा असगंध समान मात्रा में लेकर और दूध में पीसकर उसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिला कर 10 ग्राम मात्रा में दूध के साथ सेवन की जाय तो शीघ्र लाभ दिखाई देता है।
  4. समागम शक्ति बढ़ाने के लिए- कमल की जड़ को तिल के तेल में औटाकर रख लें इस तेल की सिर में मालिश करने से सिर तथा नेत्रों में तरावट आती है। तथा समागम की शक्ति बढ़ती है।
    7. स्वप्न दोश के लिए- कमल के पत्तों को बिछौने के नीचे बिछाकर उसपर शयन करने से स्वप्न दोश में कमी आती है।
    8. सिर की शीतलता के लिए- एक लीटर तेल में कमल के पंचांग को ड़ालकर औटावें जब वह जल जावे तो छानकर रख लें, इस तेल को सिर में लगाने से सिर में तनाव तथा पीड़ा दूर होती है।
    9. रक्त प्रदर में- कमल केशर, मुलतानी मिट्टी और मिश्री के चूर्ण को फाँककर ऊपर से जल पीने से रक्त प्रदर मिटता है।
    10. कांच निकलने में- कमल के पत्तों को पीसकर खांड के साथ सेवन करने से कांच का निकलना बंद हो जाता है।
    11. गर्भाशय से रक्तस्राव होने पर- गर्भिणी के गर्भाशय से रक्तस्राव होने पर कमल पुष्पों का फाण्ट देने से रक्तस्राव शीघ्र ही बंद होता है। यह गर्भिणी के लिए निर्दोश उपाय है।
    12. स्त्रीयों की दुर्बलता के लिए- कमल गट्टे के चूर्ण को मिश्री मिले हुए दूध के साथ एक माह तक सेवन करने से स्त्रीयों के शरीर की दुर्बलता दूर होती है।
    कमल का ज्योतिषीय महत्व
    1. जिस की जन्मपत्रिका में लग्न स्वामी की स्थिति निर्बल हो उस जातक को कार्तिक मास में नित्यप्रति विष्णु व लक्ष्मी जी की प्रतिमा पर कमल के फूल अर्पित करने चाहिएं। ऐसा करने से लग्नेश का दोश दूर हो जाता है।
    2. जो व्यक्ति रविवार के दिन इलायची, साठी चावल, खस, मधु, अमलतास, कमल, कुंकुम, मेनसिल तथा देवदार को जल में ड़ाल कर उस जल से स्नान करता है उस की सुर्य पीड़ा शांत होती है। 7 रविवार यह प्रयोग करना चाहिए।
    कमल का तांत्रिक महत्व
    1. शास्त्रानुसार लक्ष्मी जी की पूजा में कमल के पुष्पों को अर्पित करना बहुत शुभ होता है।
  5. कमल गट्टे तथा हल्दी की गाँठ दोनों पांच-पांच पीस लेकर अपनी तिजोरी में रखने से उसमें धन-धान्य की बरकत बनी रहती है।
    कमल का वास्तु में महत्व
    घर के ईशान क्षेत्र में एक छोटा सा तलाब बना कर उसमें नीलकमल या रक्त कमल का रोपण करने से उस घर में लक्ष्मी जी का सदा वास रहता है।

औषधी (वनस्पति) तंत्र

औषधी (वनस्पति) तंत्र आज मानव भौतिक विज्ञान के शिखर पर पहुँच कर भी प्रकृति के सम्मुख बौना ही है। वह प्रकृति के रहस्यों का उदघाटन करने के बावजूद, भी सृष्टि के अंशमात्र से भी परिचित नहीं हो पाया है।
पृथ्वी पर कितने ही प्रकार के पेड़- पौधे, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु तथा वनस्पतियाँ हैं, किन्तु उनका पूर्ण विवरण आज तक तैयार नहीं किया जा सका। प्रत्येक जीव-जन्तु और वनस्पति के अपने कुछ गुण-दोश हैं।

तंत्र के प्रारम्भिक- युग में, जिज्ञासु-साधकों के द्वारा किये गये अनुसन्धान के फलस्वरूप हमें वनस्पति शास्त्र और पदार्थ-विज्ञान तथा इनके मिश्रित रूप आयुर्वेद-शास्त्र सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। वह विपुल साहित्य और वे ग्रन्थ-प्रकृति की रहस्यमता पर पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। महर्षियों के अपनी दीर्घकालीन-शोध और अनुभवों के आधार पर विभिन्न वानस्पतिक-पदार्थो के जो बहु-उपयोगी प्रयोग-परिणाम घोषित किये हैं, उसमें से दो-एक का आंशिक-विवरण (तन्त्र-सन्दर्भ में) यहाँ प्रस्तुत है।
ये प्रयोग विभिन्न प्रकार की समस्याओं के निराकरण हेतु निश्चित किये गये हैं। एक समय इनका देश-व्यापी प्रचार था। काल के प्रभाव से ये लुप्तप्रायः हो गये और आज इनके ज्ञाता साधक गिने-चुने ही रह गये हैं। उनमें भी जो वास्तविक ममज्र्ञ और समर्थ हैं, वे एकान्त सेवी, निस्पृहः और विशुद्ध साधक हैं, पर जो अल्पज्ञ, प्रशंसा-लोलुप, अर्थकामी और विवेक-शून्य हैं, वे डंके की चोट पर अपना प्रचार करते हुए, आडम्बर के जाल में आस्थावान लोगों को फँसाकर लूटने का कार्य कर रहे हैं।
उनके इस आचरण का भेद खुलने पर जन-सामान्य में इन विषयों के प्रति अनास्था ही उत्पन्न होती है, फलस्वरूप नैतिकता, अध्यात्म और संस्कृति का ह्रास होकर अनैतिकता, अराजकता, विभ्रम और पतन का वातावरण निर्मित होता है। मैं मंत्र- तंत्र पर अनुसंन्धानरत बुद्धिमान साधकों से आशा करता हूँ कि वह इन को पहचानें और इन की पोल खोंलें।
लगभग सभी नगण्य प्रतीत होने वाली वनस्पतियों की आश्चर्यजनक उपयोग- विधियों का उल्लेख करते हुए, महर्षियों ने इस सत्य को प्रतिपादित किया है कि सृष्टि का एक कण भी व्यर्थ नहीं है, सबकी ही कुछ न कुछ उपयोगिता है। आवश्यकता है केवल उन्हें परखने और प्रयुक्त करने की। सृष्टि में जहां एक ओर आम, अमरूद, केला, कटहल, नींबू और नारियल जैसे फल हैं। गेहूँ, जौ, चना, धान आदि जैसे अनाज हैं। वहीं घास-पात कही जाने वाली जड़ी-बूटियों में भी अद्भुत गुण समाहित हैं।

अद्भुत गुणों से युक्त्त– अपामार्ग पौधे का विवरण प्रस्तुत है। अपामार्ग, लटजीरा, अंझाझार, ओंगा, चिरचिटा- यह सब एक ही पौधे के नाम है। यह समग्र भारतवर्ष तथा एशिया के उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में पाया जाता है। वर्षा का प्रथम पानी पड़ते ही आपामार्ग के पौधे अंकुरित होते हैं।

 

Pencil Therapy Intro पेंसिल थेरेपी क्या है?

पेंसिल थेरेपी क्या है ? What is pencil therapy??

पेंसिल थेरेपी pencil therapy शारीरिक दर्द और मानसिक तनाव के निवारण की एक सरल पद्धति है। इस थेरेपी से अकुप्रेसर, अकुपंचर, सु-जोक, रेफ़्लेक्सोलोजी, इत्यादि के लाभ मिलते हैं लेकिन इसे सीखना और करना अत्यंत आसान है। जिनके शरीर में दर्द या तनाव हो उन्हें यह थेरेपी pencil therapy करते समय अपनी उंगली पर दर्द का अनुभव होगा। थेरेपी करने से उन्हें दर्द और तनाव से राहत मिलेगी।

पेंसिल थेरेपी करने के क्या लाभ है ?

पेंसिल थेरेपी pencil therapy करने से दर्द से पीड़ित व्यक्ति को दर्द में राहत मिलती है और मानसिक तनाव ग्रस्त को तनाव से मुक्ति मिलती है। जिस व्यक्ति के शरीर में दर्द न हो उसे हलकापन या स्फूर्ति का एहसास होता है / नई ऊर्जा का संचार हुआ है ऐसा मालूम होता है। कई प्रकार की बीमारियों में पेंसिल थेरेपी pencil therapy से लाभ लिया जा सकता है। यदि कोई डाक्टरी दवा शुरू हो तो उसे बिना अपने डाक्टर के सलाह के बंद नहीं करना चाहिए।

पेंसिल थेरेपी करते समय कितना दर्द होता है?

पेंसिल थेरेपी pencil therapy करते समय दर्द से पीड़ित व्यक्ति को उंगली में असहनीय दर्द का अनुभव होता है। जिसके शरीर में अधिक दर्द हो उन्हें उंगली पर भी अधिक दर्द होगा और जिनके शरीर में दर्द कम हो उन्हें उंगली पर दर्द कम होगा। स्वस्थ व्यक्ति को सहनीय या साधारण दर्द होता है।

पेंसिल थेरेपी सीखने के लिए क्या जानकारी होना आवश्यक है?

यह थेरेपी बहुत ही आसान है। इसे कोई भी सीख और कर सकता है। इसे सीखने और करने के लिए पढ़ा लिखा होना आवश्यक नहीं है।

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पेंसिल थेरेपी कैसे की जाती है?

बेलनाकार पेंसिल को हाथ और पैर की उँगलियों पर अंगूठे से थोड़े से दबाव के साथ घुमाया जाता है। पेंसिल को उँगलियों के चार साइड और चार कोनों पर घुमाया जाता है। नाखूनों पर पेंसिल नहीं घुमाते हैं। नाखून को छोड़कर बाकी सारी उंगली पर पेंसिल घुमाई जाती है।

पेंसिल थेरेपी कब की जा सकती है?

पेंसिल थेरेपी भोजन के एक घंटा पहले या दो ढाई घंटे बाद की जा सकती है। स्नान के एक घंटे पहले या एक घंटे बाद भी की जा सकती है। पेंसिल थेरेपी कैसी

उँगलियों पर की जा सकती है?

पेंसिल थेरेपी pencil therapy करने से पहले यह देख लेना चाहिए कि जिन उँगलियों पर पेंसिल घुमाना है वे उँगलियाँ स्वस्थ है। उँगलियाँ कटी फटी न हो; उनपर कोई घाव या फोड़ा फुंसी या चोट न लगी हो; जिन उँगलियों में पहले से ही दर्द हो उनपर पेंसिल थेरेपी नहीं करनी चाहिए।

क्या महिलाओं को भी पेंसिल थेरेपी की जा सकती है?

गर्भवती महिलाओं को पेंसिल थेरेपी का उपचार नहीं देना चाहिए।
यदि कोई महिला मासिक धर्म में हो तो उन्हें पूरी पेंसिल थेरेपी नहीं देना चाहिए। यदि उन्हें कोई दर्द हो तो उस दर्द का उपचार किया जा सकता है। जैसे कि यदि सर दर्द हो या और कोई दर्द हो तो उस दर्द के निवारण के लिए जितना उपचार देना आवश्यक हो उतना उपचार देना चाहिए।

पेंसिल थेरेपी की क्या विशेषताएँ हैं?

  • यह थेरेपी बहुत ही आसान और तुरंत आराम देने वाली है।
  • इसे कभी भी, कहीं भी किया जा सकता है।
  • इस थेरेपी को करने के लिए एक छोटे से बेलनाकार पेंसिल के टुकड़े की आवश्यकता होती है, जो कहीं भी, किसी को भी सहजता से उपलब्ध हो सकता है।
  • इसका कोई नेगेटिव साइड इफैक्ट भी नहीं है।
  • यह पद्धति पूर्णतया पारदर्शी है।
  • यदि शरीर में दर्द या तनाव हो तो ही उँगलियों पर दर्द होता है, अन्यथा नहीं।

आयुर्वेद का त्रिदोष सिद्धान्त – Aayurveda Tridosh Principle

Tridosh Vaat Pitt Kaph

Tridosh Vaat Pitt Kaph

त्रिदोष का अर्थ है वात, पित्त और कफ। इन्हीं तीन तत्त्वों पर सारी आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिष्ठित है। उन दिनों रोग भी आज की भाँति नित्य नये पैदा नहीं होते थे; प्रत्युत वे सीमित थे। सामान्यतः समग्र मानवजाति सुखी पायी जाती थी। रोग का मूल कारण मिथ्या आहार और विहार माना जाता था। सर्वसाधारण मानव विवेक पूर्वक इससे बचता था, जिससे उस पर रोग का आक्रमण बहुत कम होता था। समग्र वैद्यक विज्ञान चिकित्सा शास्त्र इसी त्रिदोष- सिद्धान्त पर चलता रहा। भारत का यह सुविचारित त्रिदोष-सिद्धान्त सर्वप्रथम यहाँ से ईरान पहुँचा, ईरान से अरब और वहाँ से मिस्र देश गया। सम्राट् सिकन्दर भी लौटते समय अपने साथ यहाँ के वैद्यों को लेता गया। इस प्रकार सुदूर अतीत में सारी चिकित्सा-व्यवस्था त्रिदोष-सिद्धान्त पर ही चलती रही।

समय बदला और यहाँ मुस्लिम शासकों का साम्राज्य चला, जिसके फलस्वरूप यहाँ की असंख्य बहुमूल्य पुस्तकों की शिक्षा को परिवर्तित किया गया, जिनमें आयुर्वेद के भी अनेक ग्रन्थ-रत्न थे। फिर भी उस काल में चिकित्सा- व्यवस्था त्रिदोष-सिद्धान्त को छोड़ कर परिवर्तित की गई। वात, पित्त और कफ के साथ रक्त को भी जोड़ कर इसके मौलिक तत्त्व सफरा, बलगम और खून ही माने जाते रहे। अर्थात त्रिदोष-सिद्धान्तानुसारी चिकित्सा-व्यवस्था ठीक से नहीं चल पायी। उन दिनों वायु का प्रकोप होने पर अजवाइन पीस-छौंक कर पिला दी जाती थी। कफ का प्रकोप होने पर थोड़े से दूध में हल्दी मिलाकर कर पिलायी जाती और पित्त का प्रकोप होने पर धान्यपंचक का काढ़ा पिलाया जाता या मिश्री खिलायी जाती थी। लोग मलेरिया में सुदर्शन चूर्ण की फंकी लगवाते और पित्त का शमन करवाते थे।

चिरायता और हरड़ का क्वाथ दिया जाता था। सनाय की फंकी फँकवायी जाती थी। आँखों के लिये त्रिफला का उपयोग किया जाता था। सोंठ तो नित्य की घरेलू दवा ही बन गयी थी। पिपरामूल का भी प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार घरेलू उपचारों से ही वात, पित्त, कफ को संतुलित और समान्य स्थिति में बनाये रखा जाता था। भाव यह है कि इन त्रिदोषों का वैषम्य ही समस्त रोगों की जड़ है। तत्कालीन वैद्यों को ही नहीं, अनेक घरों के अनुभवी बड़े-बूढ़ों और वृद्धाओं को इन मौलिक तत्त्वों के-त्रिदोष का अच्छा ज्ञान रहता था। सन् 1920 तक यही स्थिति बनी रही। उस सन् में जब प्लेग का राष्ट्रव्यापी आक्रमण हुआ, तब भी त्रिदोषवाद का ही बोलबाला था। किंतु जैसे-जैसे तथाकथित नवीन विज्ञान बढ़ने लगा, इस त्रिदोष-सिद्धान्त की हँसी भी उसी अनुपात में उड़ाई जाने लगी।

त्रिदोष का परिहास करते हुए कहा जाने लगा कि वायु तो ‘गैस’ है। पित्त को बाईल और कफ को आँव स्थान पर ‘बैक्टिरिया’ वाद प्रारम्भ हो गया और चिकित्सा भी जादू की छड़ी बन गयी। सन् 1935 के पश्चात् तो उत्तरोत्तर इस नवीन विज्ञान का प्रभाव अधिकाधिक बढ़ने लगा। लोग ‘लंघन’ या उपवास को, जिसे प्रभावकारी रसायन या मात्रा माना जाता था, भूल गये और ‘कर्षण’ चिकित्सा के स्थान पर ‘तर्पण’ चिकित्सा की नींव सुदृढ़ हो गयी। कहा जाने लगा कि शरीर में शक्ति रहने पर ही तो रोग को मिटाया जा सकता है? खाने को न दिया जायेगा तो बेचारा रोगी बे मौत ही मर जायेगा। इस तरह के और ऐसे ही अन्य कुतर्क भी प्रस्तुत कर ‘कर्षण’ के स्थान पर ‘तर्पण’- चिकित्सा चलाते हुए इस नवीन विज्ञान द्वारा ‘त्रिदोषवाद’ को खड्डे में ढकेल दिया गया। अब तो औषधियाँ विदेश से बनकर आने लगी हैं। ‘यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं हितम्’-‘रोगी जिस देश का हो, औषध भी उसी देश की उसके लिये हितकारी होती है’-यह सूत्र भी भुला दिया गया। अंधाधुंध जंगल काटे जाने लगे और यहाँ तक की अनेक रोग-निवारक ओषधियाँ और वनस्पतियाँ मिट्टी में मिला दी गयीं। फिर भी ध्यान देने की बात है कि जैसे मानव की छाया उससे अलग नहीं की जा सकती, वैसे ही ‘त्रिदोषवाद’ भी मानव से कभी दूर नहीं किया जा सकता। ताने-बाने की भाँति वह मानवीय जीवन से पूर्णरूप से जुड़ा हुआ है। जिस प्रकार पंचतत्त्वों के बीच पृथ्वीतत्त्व को हम भली-भाँति पहचानते हैं। इसी प्रकार वात-पित और कफ का संतुलन भी शरीर में आवश्यक है। जब इन का संतुलन रहता है तभी शरीर की यह मशीनरी स्वाभाविक रूप में चलती है, किंतु जब ये तीनों विषमावस्था में आ जाते हैं, तब इस शरीर रूपी मशीन के चलने में अवरोध आ जाता है। मुख्यतः इस शरीर-मशीन को चलाने वाला तत्त्व है अग्नि या पित्त। यह अग्नि दो प्रकार की है-एक धातु-अग्नि और दूसरी जठराग्नि, जो पेट के भीतर रहती है। यही जठराग्नि मानव द्वारा खाये हुए पदार्थों का पक्व रस बनाकर शरीर को गतिशील बनाती है। यह अग्नि जलाकर राख न कर डाले, इसके लिये उसके शमनार्थ कफ (जल) तत्त्व है और पित्त प्रवाही है। उष्ण द्रवरूप और पीले वर्ण का। यह मानव में सत्त्वगुण का उदय करता है। आप नितान्त श्वेत दूध पी लीजिये, परंतु उसमें पित्त के मिल जाने पर दस्त पीले ही होंगे। मानव जब मिथ्या आहार और विहार करने लगता है, तब इन तीनों में न्यूनाधिकता आने से उनकी साम्यावस्था नष्ट हो जाती है, जो उनका ‘प्रकोप’ कहलाता है। ‘प्रकोप’ का स्पष्ट रूप एक उदाहरण से समझाया जा सकता है। मान लीजिये, एक तपेली में एक सेर दूध हो और उसे आग पर गरम करने के लिये रख दें, उसमें उफान आयेगा, दूध अपना स्थान त्याग देगा। इस क्रिया से दूध कुछ बढ़ता नहीं फिर भी उसने अपना स्थान छोड़ दिया। यही प्रकोप है, जिसका मूलस्थान पेडू है। वह वायु यदि वहाँ से ऊपर चढ़ जाय तो उसे ‘वायु का प्रकोप’ कहा जायगा। पहले लोग प्रातःकाल खाली पेट दातून करके दाँत साफ करते और फिर दातून को चीरकर उससे जीभ रगड़कर सारा दूषित कफ बाहर निकाल डालते थे। नित्य प्रातः खाली पेट हरड़ का चूर्ण फाँक कर गरम-गरम पित्त को दस्त के मार्ग से निकाल डालते थे। इसी तरह बस्ति (एनिमा) लेकर दूषित वायु को निकाल डालते थे। इन दैनिक क्रियाओं से प्रातःकाल ही शरीर की चिन्ताएँ दूर हो जाती थीं। त्रिदोषवाद के अनुसार जगत की चिकित्सा-व्यवस्था चलती रही, तब तक मानव सुखी और दीर्घजीवी होते थे और अन्ततः उनका मोक्ष मार्ग भी निरापद् हो जाता था, किंतु जब से ‘तन्तुवाद’ आया और उन्हें मारने की ओषधियाँ खोजी जाने लगीं, तभी से अनिवार्यतः उसके दुष्प्रभाव और उपद्रव भी असीम रूप में बढ़ने लगे हैं।

वायु का प्रकोप और शमन-

प्राकृतिक वेगों की रोकथाम, अधिक मात्रा में भोजन और जागरण, अधिक श्रम, जोर देकर बोलना, लगातार गाड़ी-घोड़ा और रेल-जहाज पर यात्रा, कड़वे, तीखे और रूखे पदार्थों का निरन्तर सेवन, चिन्ता, अधिक स्त्रीसंग, भय, अधिक उपवास, शोक आदि के कारण वायु सदैव अपना स्थान उष्ण, स्थिर, त्याग देता है। उसे पुनः अपने स्थान पर लाने के लिये उष्ण, स्थिर, वृष्य, बल्य, लवणयुक्त, स्वादु और अम्ल पदार्थों का सेवन, तैलमर्दन, धूप-ग्रहण, गरम जल से स्नान, अभ्यंग, बस्ति, आसव सेवन, देहमर्दन, स्नेहन, स्वेदनिष्कासन, नस्य, विश्राम, सेंक आदि क्रियाएँ करनी चाहिये। उससे विकृत वायु का शमन होकर वह अपने नियत स्थान पर लौट आता है। आयुर्वेद में 80 प्रकार के वायु रोग (वात रोग) हैं, आजकल जिसे ‘सर्वाइकल’ के नाम से जाना जाता है वह एक प्रकार का वात रोग है।

पित्त का प्रकोप और शमन-

तीखे, खट्टे, विशेष लवणयुक्त, उष्ण, विदाही और तीक्ष्ण पदार्थ तथा मद्य का सेवन, सूखे शाक का खाना, क्रोध, ताप, अग्नि, भय, श्रम, विषम भोजन आदि से स्थान पर लाने के लिये कड़वे, मीठे, कसैले, शीतल पदार्थों का भोजन, पवन, छाया, जल, चाँदनी (तहखाना), फुहारा, कमल आदि शीतकर वस्तुओं का सेवन, घी-दूध का सेवन, विरेचन, सूखी आदि (सोंठ) के लेप आदि से पित्त पुनः अपने स्थान पर आ जाता और उसका शमन हो जाता है। आज भी पित्त के शमन के लिये अनेक प्रकार के लेप किये जाते हैं। साठी चावल, बथुआ (शाक), मूँग और दूध पित्त के प्रमुख रूप से शामक माने जाते हैं।

कफ का प्रकोप और शमन-

मधुर, ठंडे, भारी, खट्टे, पिच्छिल, स्निग्ध, दूध के बने पदार्थ और ईख का रस सेवन करने, अतितृप्ति, अधिक मीठा खाने, अधिक पानी पीने आदि से कफ की वृद्धि होती है और वह अपना स्थान छोड़कर अन्यत्र चला जाता है। परिणाम स्वरूप छाती भारी हो जाती है, शरीर श्वेत हो जाता है, खुजली होने लगती है, सदैव आलस छाया रहता है। कफ को पुनः अपने निश्चित स्थान पर लाने के लिये रूक्ष भोजन, क्षार का सेवन, कषाय तिक्त, कटु पदार्थ खाना, व्यायाम, उलटी, गमन (चलना), जागरण, नदीं में तैरना, ताप, विरेचन, स्वेद लाना आदि क्रियाएँ करनी चाहिये। प्राचीन काल में दोषों का प्रकोप होने पर उनके शमन पर ही सर्वाधिक ध्यान दिया जाता था, जैसे विकृत कफ को वमन करवाकर निकाल दिया जाता था, दूषित पित्त को विरेचन करवाकर निकलवा देते थे और प्रकूपित वायु को बस्ति द्वारा शुद्ध करवा दिया था। इस चिकित्सा में रोग या दोष को दबा देने की बात ही नहीं की जाती थी, जबकि आज के डाक्टर ऐन्टीबायोटिक से पित्त को दबा देते हैं जिसके विपरीत प्रभाव भी होते हैं।

How to Overcome Paralysis in Ayurveda & Color Therapy

वनौषधियों के प्रयोग:

लकवा दूर करने के लिएः-

इसके लिए 100 मि. ली. ‘सरसो का शुद्ध तेल’ लें, इस तेल में एक तोला ‘काली मिर्च’ का कपड़े की सहायता से छना चूर्ण मिलावें। इसी प्रकार दस ग्राम ‘भांग’ का चूर्ण भी इसमें मिलाकर इस मिश्रण को 10 मिनट तक उबालें। ठंडा होने पर इस तेल को छानकर एक ‘सफेद पारदर्शी बोतल’ में भरकर उसके चारों ओर एक लाल पन्नी लपेट कर सूर्योदय तक सूर्य के प्रकाश में रखें। इस तेल की मालिश लकवे वाले भाग में करने से सम्बन्धित भाग में रक्त का प्रवाह आरम्भ हो जाता है।

To Overcome Paralysis :-

Take 100 ml ‘pure mustard oil’ back in the oil Tola ‘pepper’ powder Milaven filtered through the fabric. Similarly, add ten gram ‘cannabis’ powder into it, then boil the mixture for 10 minutes. On cooling, filter the oil in a “white transparent bottle”, then wrap red foil around the bottle and keep the bottle in sunlight until next sunrise. Massage this oil in the relative paralyzed part of the Body, the blood flow is initiated in that part by this message.

Facial Acne Cure in Ayurveda & Color Therapy

वनौषधियों के प्रयोग:

चेहरे की फुन्सियों को हटाने के लिएः-

लगभग 100(सौ) मि. ली. ‘अरंडी(arandi) के तेल’ को ‘लाल रंग की काँच की बोतल’ में सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखा रहने दें। लाल रंग की बोतल उपलब्ध न हो तो एक सफेद बोतल के चारों ओर लाल पारदर्शक पन्नी लपेट कर ऐसा किया जा सकता हैं। इस अरंडी के तेल में कपड़े से छना गया महीन ‘बेसन’ मिलाकर इससे बने उबटन को नियमित कुछ देर तक चेहरे पर लगाकर, तदुपरान्त चेहरा धोने से चेहरे पर विकसित होने वाली फुन्सियां दूर हो जाती हैं और चेहरा साफ हो जाता है। आवश्यकता हो, तो रात्रि पर्यन्त इस मिश्रण को चेहरे पर लगाये रहना चाहिए और सुबह-सुबह उसे धो लेना चाहिए। इस सम्बन्ध में अपने चिकित्सक से परामर्श ले लें।

 

Remove Facial Acne:-

Take approximately hundred/100 ml ‘Castor(Anrdi) Oil’ into ‘Red Bottle Glass’ in the sun from Sunrise to Sunset taken into account. If there is a bottle of white/transparent color then wrap Red Foil around a transparent Bottle. Now, put cloth poured Nice Wispy ‘Gram flour’ into this Castor Oil. Use this COSMETIC Mixture Regularly on your Face. Just Wash your Face after applying this paste on your Face. This will Cleanse the face and gently remove Facial Acne. If required, apply and leave this Mixture throughout the night and wash it early morning. Please consult your doctor in this regard, if you have sensitive skin.

Epilepsy – stop attacks as per Ayurveda

वनौषधियों के प्रयोग:

मिर्गी के लिए-

जायफल आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला फल है। इक्कीस ‘जायफल’ लाकर उनमें से सात जायफल ‘नीले रंग की बोतल में’ तथा सात जायफल हरे रंग की बोतल में सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक धूप में रखें। इस चैदह जायफल को शेष (बिना धूप में रखे), सात जायफल के साथ पिरो कर एक माला बनाकर मिर्गी के रोग को पहनाने से उसे मिर्गी के दौरे आने बंद हो जाते हैं।

The Epilepsy-

The Nutmeg fruit is readily available. Bring Twenty-one ‘Nutmeg’, Put seven (7) of them in a ‘Blue colored Bottle’ and seven (7) of them in ‘Green colored Bottle’  in the duration from Sunrise to Sunset and then Place both the bottles in the sun/sunlight. These Fourteen (14) nutmeg and remaining seven (7) nutmeg (that were housed without the sun/sunlight), total of 21, shall be used to make a Garland / Necklet and should be worn by the Patient, this should stop him from getting an attack of the disease Epilepsy.

Wonder Ayurvedic Herbs [Medicines] Series | Part – 0 Introduction

चमत्कारी वनौषधियाँ- Wonder Ayurvedic Herbs –

भारतीय ज्योतिष(Indian Vedic Astrology) शास्त्रों में सूर्य(Sun) को जगदात्मा कहा गया है। यह सही भी है, क्योकि सृष्टि में बगैर सूर्य के विनाश सुनिश्चित है। वास्तव में सूर्य के प्रकाश में एक विशेष शक्ति निहित होती है। इसी जीवनी शक्ति के द्वारा पौधे(plants) अपने भोजन की प्राप्ति करते हैं तथा विभिन्न प्राणी भी इस पर आश्रित है। सृष्टि में जीवनचक्र को जहां सूर्य नियंत्रित करता है, वहीं दूसरी और वायुमंडल के विभिन्न गैसीय चक्र भी इसी के अधीन हैं। सूर्य की रश्मियों(spectrum) में सात प्रमुख रंगों (बैंगनी Violet, जामुनी Indigo, नीला Blue, हरा Green, पीला Yellow, नांरगी Orange और लाल Red) का एक संतुलित सम्मिश्रण होता हैं, इसलिए सृष्टि का निर्माण करने वाले पांचों तत्त्व अर्थात् जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी को सूर्य अपने ही रंग में समेटे हुए है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। सूर्य रश्मियों में विचित्र(wonder) कीटाणुनाशक क्षमता भी है। इसीलिए जिस घर में सूर्य के प्रकाश का प्रवेश रहता है, उस घर के सभी प्राणी स्वस्थ रहते हैं। इसके विपरीत ऐसे कमरों मेें रहने वाले, जहां सूर्य का समूचित प्रकाश नहीं पहुंचता, अस्वस्थ तो रहते ही हैं, साथ ही उनकी बुद्धि-बल का भी पूर्ण विकास नहीं होता और न्यूनता दृष्टिगोचर होती है।

हम यह भी देखते हैं, कि छाया में पड़ने वाले पौधे अच्छी फसल नहीं दे पाते और सूर्य के प्रकाश के अभाव में कोई भी पौधा पनप नही सकता। इसी प्रकार जिस जलाशय मेे धूप नहीं पहुंचती उसमें कीड़े पैदा हो जाते हैं। इसके विपरीत सूर्य का प्रकाश का प्राप्त करने वाले जलाशयों का जल स्वच्छ तथा कीटाणुमुक्त तो होता ही है, इसके साथ ही साथ वह शक्ति का संचार करने वाला भी होता है। सूर्य के प्रकाश से समस्त सृष्टि लाभान्वित(benefited) होती है। जड़ -चेतन सभी पर इसका समरूप प्रभाव पड़ता है। एक भारतीय महात्मा ‘स्वामी ज्ञानानन्द’ ने तो सूर्य-रश्मियों से तमाम पदार्थो को उत्पन्न कर संसार को चमत्कृत कर दिया था। सूर्य के इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण भारतीय ऋषि – मुनियों और वेदाचार्यो ने सूर्य को देवता कहा है। सूर्य-चमत्कार, संध्योपासना, सूर्य जल अर्पण आदि क्रियाओं के सम्पन्न करने के पीछे भी यही रहस्य हैं। हमारे पूर्वजों को सौर रश्यिमों की सहायता से अनेक औषधियों के निर्माण की जानकारी थी।

आयुर्वेद में अभ्रक भस्म के गुण एवं प्रभाव

अभ्रक भस्म के गुण अभ्रक भस्म अनेक रोगों को नष्ट करता है, देह को दृढ करता है एंव वीर्य बढाता है। यह तरूणावस्था प्राप्त कराता और सहवास की शक्ति प्रदान करता है। राजयक्ष्मा, खांसी, उरःक्षत, कफ, दमा, धातुक्षय, विशेषकर मधुमेह, बहुमूत्र, अनेक प्रकार के प्रमेह, सोम रोग, शरीर का दुबलापन, प्रसूत रोग और अति कमजोरी, सूखीं खाँसी, काली खाँसी, पाण्डु ,दाह, नकसीर, जीर्णज्वर, संग्रहणी, शूल, गूल्म, आँव, अरूचि, अग्निमांद्य, अम्लपित्त, रक्तपित्त, पीलिया, खूनी अर्श, हृद्रय रोग, उन्माद, मृगी, मूत्रकच्छ्र, पथरी तथा नेत्र-रोगों में यह भस्म लाभदायक सिद्ध होती है।

The properties of Mica Bhasma (Incinerate) Mica Bhasma destroys many diseases, makes body firm and increases Semen Health & Count. Here are some abhrak (mica) bhasma effects as per Ayurveda. It provides the strength as of Young Age and increases & strengthens the Power for Sex. Tuberculosis , Cough , Urःksht , Cough , Asthma , Dhatuksy , Viseshkr diabetes , diabetes insipidus , diabetes , several types , Mon disease , debility of Srir , introduced disease and extreme weakness , Sukin cough , whooping cough , Pandu , throat, nosebleed , Jiarnjhwar , diarrhea , Sul , Gulm , Aँv , indisposition , indigestion , pyrosis , Rktpitt , jaundice , bloody Ars , Hridray disease , mania , doe , Mutrkchcr , calculus and eye – diseases consume it proves to be beneficial . These