गंगाजल से स्नान का महत्व

गंगाजल से स्नान का महत्व दातुन करने के बाद स्नान- ध्यान का विधान है। किंतु स्नान के अंगभूत दो कार्य और हैं-
1. तैलाभ्यंग या तैल-मर्दन।
2. व्यायाम। तैलाभ्यङ्ग त्वागिन्द्रिय को स्निग्ध बनाता है, शरीर में स्फूर्ति लाता है और शरीर पर पानी का बुरा असर नहीं होने देता। स्पर्श ने चाधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम्। त्वचश्च परमोऽभ्यङ्गस्तस्मात्तं शीलयेन्नरः।। (चरक)
अर्थात्-‘शरीर को स्वस्थ रखने के लिये अधिक वायु की आवश्यकता है। वायु का ग्रहण त्वचा के आश्रित है, त्वचा के लिये अभ्यङ्ग (तेलमालिश) परमोपकारी है, इसलिये मालिश करनी चाहिये।’
आयुर्वेदिक ग्रन्थों में तेलमालिश के बहुत गुण बताये गये हैं, जिनमें मुख्य ये हैं- बुढ़ापा, थकावट एवं वायुविकार का नाश करने के लिये तैलमालिश सिर, कान तथा पैरों में विशेष रूप में करनी चाहिये। इससे शरीर मजबूत, सुन्दर चमड़े वाला होता है। वायु-विकार शान्त होते हैं। नित्य तैल- मालिश कराने वाला व्यक्ति क्लेश और श्रम को सहने योग्य हो जाता है। इससे मनुश्य कोमल स्पर्श और पुष्ट अंगवाला तथा प्रियदर्शन होता है। उसको बुढ़ापे के लक्षण कम होते हैं। सिर में प्रतिदिन तेल लगाने से शिरःशूल नहीं होता, बाल न तो झड़ते हैं और न गिरते ही हैं। शिरोऽस्थियों का बल बढ़ता है। बाल मजबूत जड़ वाले, लम्बे और काले होते हैं। सिर पर तेल लगाने से इन्द्रियाँ प्रसन्न (स्वच्छ) होती हैं और मुख का सौन्दर्य बढ़ जाता है। तेल लगा कर सोने से सुख की नींद आती है। इसी प्रकार कान को तेल से तर रखने से चरक के मतानुसार वातजन्य कान के रोग, मन्यास्तम्भ, हनुग्रह, ऊँचे सुनना और बहरापन नहीं होता है।
पैरों में तेल मालिश करने से पैरों की कठिनता, सूखापन, रूक्षता, थकावट और सुस्ती (त्वचा में स्पर्श ज्ञान न होना) इत्यादि-ये सब शीघ्र शान्त हो जाते हैं। पैरों में सुकुमारता, बल और स्थिरता उत्पन्न होती है। दृष्टि स्वच्छ होती है और वायु शान्त होती है। किंतु तेल मालिश कुछ अवस्थाओं में वर्जित भी है। नये ज्वर में, अजीर्ण होने पर, विरेचन-वमन और निरूहण किये हुए मनुश्य को मालिश नहीं करनी चाहिये। इससे विविध हानियाँ होती हैं। शास्त्रों में सोमवार और शनिवार को तेल-मर्दन उत्तम और अन्य दिनों में निषिद्ध किया गया है; परंतु उन दिनों में तेल लगाने के लिये शास्त्रों ने इस उपाय से दोश-परिमार्जन बताया है- रवौ पुष्पं गुरो दूर्वा भौमवारे च मृत्तिका। गोमयं शुक्रवारे च तैलाभ्यङ्गे न दोशभाक्।।
अर्थात्-‘रविवार को पुश्प, गुरूवार को दूर्वा, मंगलवार को मिट्टी और शुक्रवार को गोबर मिलाकर तेलमर्दन करने से दोश नहीं होता।’ ब्रह्मचारियों को तेल लगाना वर्जित है। ज्योतिषसार के अनुसार गृहस्थ को षष्टी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा को भी तेल नहीं लगाना चाहिये; किंतु सरसों का तेल, सुगन्ध युक्त तेल, फूलों से वासित तेल और अन्य द्रव्यों से युक्त तेल दोशयुक्त नहीं माने जाते, अतः इन्हें सब दिन लगा सकते हैं।
शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी। वेहव्यायामसंख्याता मात्रया तां समाचरेत्।।

‘शरीर की जो चेष्टा देह को स्थिर करने एवं उसका बल बढ़ाने वाली हो उसे व्यायाम कहते हैं। उसे प्रतिदिन उचित मात्रा में करना चाहिये।’ (चरक) व्यायाम से कुछ ये लाभ हैं-शरीर की पुष्टि, कान्ति, शरीर के दीप्ताग्नि, आलस्य-हीनता (स्फूर्ति), स्थिरता, हल्कापन, शुद्धि, थकावट-सुस्ती, प्यास, गर्मी एवं ठंड आदि सहने की शक्ति और श्रेष्ठ आरोग्य प्राप्त होता है।
मोटापा को कम करने वाला कोई उपाय इस के समान दूसरा नहीं है। शत्रु का भय नहीं होता, बुढ़ापा सहसा आक्रमण नहीं करता। व्यायाम मर्दित और उद्वर्तित शरीर वाले के पास व्याधियाँ नहीं फटकने पातीं। व्यायाम से वय, रूप और गुण हीन मनुश्य भी देखने में सुन्दर लगता है। व्यायाम से विरूद्ध, कच्चा जला हुआ भोजन भी भली भाँति पच जाता है। व्यायाम एक नैत्यिक अनुष्ठेय कत्र्तव्य है।
नित्य स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान् लोगों को व्यायाम सर्वदा हितकर है। शीत एवं वसन्तकाल में तो वह विशेष लाभप्रद होता ही है, किंतु कामी मनुश्य को सभी ऋतुओं में प्रत्येक दिन अपने बल की आधी शक्ति से व्यायाम करना चाहिये। परन्तु अधिक मात्रा में व्यायाम घातक होता है। उससे क्षय, अधिक प्यास, अरूचि, वमन, रक्त-पित्त, चक्कर, सुस्ती, खाँसी, शोष, ज्वर और श्वास-कष्ट-जैसे रोग होते हैं। कुछ व्यक्तियों के लिये व्यायाम हितकर नहीं होता। रक्त-पित्त के रोगी, कृश, शोष, श्वास-कष्ट, खाँसी और उरः क्षत से पीडि़त, तुरंत भेजन किया हुआ, स्त्री-प्रसंग से क्षीण तथा चक्कर से पीडि़त मनुश्य व्यायाम न करे।
टहलना देह को अधिक पीडि़त करने वाला नहीं होता; वह आयु, बल, मेषा (धारण शक्ति) और अग्नि को बढ़ाने वाला एवं इन्द्रियों को जागृत (चैतन्य) करने वाला होता है। (अधिक रास्ता चलना इसके विपरीत होता है, वह बुढ़ापा एवं दुर्बलता करने वाला होता है।) आयुर्वेद में टहलने को ‘चङ्क्रमण’ कहते हैं। इसे आधुनिक चिकित्सक भी अत्यावश्यक बताते हैं। अतः वृद्धादि को अवश्य टहलना (घूमना) चाहिये।

मनुश्य के शरीर में 9 छिद्र होते हैं। वे रात में शयन करने से अपवित्र हो जाते हैं। अतः प्रातः स्नान अवश्य करे। तीर्थ में स्नान करना हो तो शौच वाला कपड़ा बदल देना चाहिये। स्नानादि के बाद ही तीर्थ-स्नान करना चाहिये; क्योंकि वह प्रशस्त तथा पुण्यजनक भी होता है। यदि गंगा में स्नान करे तो निम्नाकिंत मन्त्र से गंगाजी की प्रार्थना करे-
विष्णुपादाब्जसम्भूते गङ्गे त्रिपथगामिनि।
धर्मद्रवीति विख्याते पापं मे हर जाह्नवि।।
गङ्ग गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।
मुन्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।।
पुराण
‘स्नान’ शब्द का अर्थ ही शुचिता है। स्नान से शरीर और मन पवित्र होते हैं। हमारे शरीर में जो पसीना होता है, उसका जलीय अंश तो भाप बनकर उड़ जाता है और पार्थिव अंश मैल बनकर जम जाता है। यदि नित्य स्नान करके उसे धोया न जाये तो शरीर में मैल की एक तह जम जायगी, जिससे रोमकूप के छिद्र बंद हो जायेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि भीतर का मल तथा दुशित वायु बाहर नहीं पायेगी, जिससे शरीर में दुर्गन्ध और अनेक रोगों की उत्पत्ति हो जायेगी।
स्नान ऐसी विधि से करना चाहिये, जिससे मैल अच्छी तरह छूट जाये। इसके लिये 2-4 चार लोटा जल्दी से पानी डाल लेना पर्याप्त नहीं, किंतु पर्याप्त जल लेकर शरीर को खूब रगड़ कर पानी से धोना चाहिये। यह कार्य अधिक जल वाले तालाब तथा बावड़ी में और सबसे अच्छा बहते हुए जल वाली नदियों में होता है; क्योंकि नदी में हमारे शरीर से निकलता हुआ मैल बहता जाता है और उसकी जगह नया स्वच्छ जल आता जाता है। इसीलिये धर्म शास्त्रों में गृह की अपेक्षा तालाब, तालाब की अपेक्षा नदी और नदी की अपेक्षा गंगादि पवित्र जल वाली नदियों में स्नान को उत्तम माना है।
शास्त्रों में गंगादि नदियों की पवित्रता का जो वर्णन है वह अंधविश्वास मात्र नहीं है। युग में भी गंगा के जल की पवित्रता को अपने अनेकों वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा परीक्षित भौतिक वैज्ञानिकों ने भी मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है। वैज्ञानिकों ने अति स्वच्छ गंगोत्री के जल का तथा अनेकों नदी-नाले, गंद मल-मूत्र के नाले। अति अस्वच्छ वाराणसी, कलकत्ते के गंगा जल का भी परीक्षण करके बताया है कि गंगा जल में रोग के कीटाणुओं को डालने पर वे दूसरे जलों की तरह वृद्धि को प्राप्त नहीं होते, प्रत्युत बहुत शीघ्र मर जाते हैं।
वर्षों रखा रहने पर भी गंगा जल में कीड़े नहीं पड़ते। इसीलिये श्रद्धापूर्वक उसे लाकर घर में रखते हैं और पूजा आदि कार्यो में तथा मृत्यु काल में मरते हुए प्राणी के मुख में डालते हैं। गंगा जल में कीड़े न पड़ने का गुण केवल गंगाजलत्व के कारण ही नहीं है, किंतु गंगाजी के पवित्र क्षेत्र का भी प्रभाव उसमें कारण होता है क्योंकि गंगाजी से निकली नहरों के विशुद्ध जल में तो कीड़े पड़ जाते हैं, परंतु गंगा क्षेत्र में बहती गंगाजी के अशुद्ध जल में कभी नहीं पड़ते!
दूसरी नदियों के जल की भाँति गंगा जल वर्षा-ऋतु में दुशित नहीं होता। प्रवाह में से निकाला हुआ गंगा जल बासी, ठंडा, गरम या अस्र्पशीय आदि से छू जाने पर भी दुशित नहीं होता। गंगाजी में रात्रि में भी स्नान करने से दोश नहीं होता। घर में लाकर गंगा जल से स्नान करने पर भी अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। यह महात्म्य सर्वत्र शास्त्रों में निर्दिष्ट है। सर्व प्रथम सिर में जल डालना चाहिये; इससे सिर आदि की गर्मी पैरों से जाती है। इसके विपरीत पैरों में प्रथम जल डालने से पैर आदि अंगो की गर्मी मस्तिष्क (सिर) में पहुँच कर हानि पहुँचाती है। यही कारण है कि गंगा आदि जलाशयों पर पहुँचकर प्रथम सिर में जल धारण करके प्रणाम करने का शास्त्रों में विधान किया है। ऐसा करने से भौतिक विज्ञानानुसार उक्त लाभ तो होता ही है, किंतु असधिदैविक विज्ञानानुसार वरूण देवता तथा गंगा आदि देवियों का आदर भी हो जाता है। नदियों में जिधर से प्रवाह आ रहा हो उधर मुख करके स्नान करके स्नान करना चाहिये तथा बावड़ी, तालाब आदि में सूर्य की ओर मुख करके स्नान करना चाहिये। स्नान करते समय जल का स्पर्श पाते ही वाणी प्रफुल्लित हो जाती है, उसका सदुपयोग भगवान नाम का कीर्तन, स्तोत्रपाठ आदि द्वारा करना चाहिये। मनोविज्ञानानुसार गंगादि पवित्र तीर्थों के साथ मानसिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिये और आधिदैव विज्ञानानुसार साधारण जल को भी पवित्र जल बनाने के लिये निम्न श्लोक बोलना चाहिये-
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू।।
बीमारी में भोजन करने के बाद, अजीर्ण में 10 बजे से 3 बजे तक रात्रि में स्नान करने से शारीरिक हानि होती है। बहुत वस्त्रों को पहने हुए स्नान करने से शरीर मर्दन में बाधा होती है। अलंकार-आभूषण धारण करके स्नान करने से आभूषणों की क्षति होती है। नग्न होकर नहाना निर्लज्जता का द्योतक तो होता ही है, जल देवता का निरादर भी होता है। इन सब कारणों से शास्त्रों में उक्त प्रकार से स्नान करने का निषेध किया है।
नातुरो न भुक्त्वा नाजीर्णे न बहुवाससा न नग्नो नाश्नन् नालङ्कृतो न सस्त्रजो न निशायाम्।।
लघुहारीत

नीम का महत्व

नीम का महत्व इसे संस्कृत में निम्ब, नेतर नियमन, अरिष्ट, सर्वतोभद्रक, पतिसार, रविप्रिय आदि, हिन्दी में नीम, बंगला में नीमगाछ, गुजराती में लिमडी, मराठी में कडुनिम्ब, तमिल में बेबू, तेलुगु में वेषु, अंगे्रजी में इंडियन लिलाक, लैटिन में मेलिया अझाडीरेक ;डमसपं कहते हैं। यह वनस्पति जगत के मेलिएसी ;डमसपंबमंमद्ध कुल का सदस्य है।
नीम का वृक्ष संपूर्ण भारत में सर्वत्र उपलब्ध एवं जाना-माना वृक्ष है। अपनी स्वच्छ वायु एवं गुणों के कारण प्राचीन काल से इसका सम्मान होता आया है। आयुर्वेदानुसार नीम को शीतल, कलका, कड़वा, ग्राही, व्रणशोधक, कृमि वमन, व्रण, कफ, शोध, पित्त, विष, वात, कुष्ठ, श्रम, हृदय की जलन, खाँसी, तृषा, ज्वर, अरूचि, प्रमेह तथा रूधिर विकार को नष्ट करने वाला बताया गया है।
नीम के पत्ते– नेत्रों को हितकारी, चखने में कड़वे, पित्त, कृमि अरूचि, विष विकार और कृष्ट को नष्ट करते हैं। नीम के कोमल पत्ते वातकारक, संकोचक, रक्त-पित्त, नेत्र रोग व कुष्ट रोग को दूर करते हैं।
नीम के फूल– पित्तनाशक, कड़वे तथा कृमि और कफ को नष्ट करने वाले हैं।
कच्ची निबोरी– रस में कड़वी, स्निग्ध हल्की, गरम कोढ़, बवासीर, कृमि और प्रमेह को दूर करने वाली है।
नीम के डंठल- श्वास, खाँसी, बवासीर, कृमि और प्रमेह को नष्ट करते हैं।
निम्बोली की मगज- कृमि और कुष्ठ को दूर करता है।
नीम का तेल- नीम के बीजों का तेल कड़वा होता है, यह कृमि रोग तथा कुष्ठ को दूर करता है।
नीम का पंचांग– खुजली, वृण, कृष्ठ, पित्त तथा रुधिर विकार में लाभदायक और गुणकारी हाता है।
आयुर्वेदिक चमत्कार-
(1) दाद दूर करने में– दाद में नीम के पत्तों को दही में पीसकर लेप करने से दाद अच्छा होता है।
(2) फोड़े पर– घाव में बहने वाले फोड़े पर नीम की छाल की भस्म लगाने से लाभ होता है।
(3) दमा हेतु– दमा में नीम के बीज का तेल 30-40 बूँद तक पान में डालकर खाने से दमा में लाभ होता है।
(4) बवासीर में– बवासीर में नीम की निबोरी और एलीवे को मिलाकर 6 माशा खायें, कुछ ही दिनों में बवासीर के मस्से सूख जायेंगे।
(5) जोड़ों के दर्द में– जोड़ों के दर्द में नीम के अन्तरछाल को पानी भर चन्दन की भाँति घिस कर दर्द वाले स्थान पर गाढ़ा लेप करें, सूखने पर उतार दें, ऐसा 4-5 बार करें, दर्द से लाभ होगा।
(6) पेट में कीड़े पड़ने पर– पेट में कृमी होने पर सब्जी के साथ नीम पत्तियाँ का छोंक लगाकर खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं अथवा नीम की कोपल नित्य चबाकर सेवन करने से शरीर में रक्त के दोश दूर होते हैं।
(7) दाँतो के स्वास्थ्य हेतु– नित्य नीम का दातुन करना लाभदायक है।
(8) लकवे में– पक्षाघात वाले अंगों पर नीम के बीज का तेल मलने से लाभ होता है।
(9) बिच्छू काटने पर– बर्र और बिच्छू के काटने पर जिस स्थान पर बर्र या बिच्छू ने काटा हो, वहाँ नीम की पत्तियों को मसल कर मलने से लाभ होता है।
(10) संतति नियंत्रण में– संतति निरोध के लिए सहवास से पूर्व नीम के तेल में रूई का फोहा भिगोकर योनि में कुछ देर रखने से सहवास के समय योनि में प्रवेश करने वाले शुक्राणु मर जाते हैं, जिससे गर्भ ठहर नहीं पाता। फोहा भिगोने हेतु 2 बूँद तेल पर्याप्त है तथा इस प्रयोग को 4-6 दिन के लिए गर्भाधान काल में ही करें। नित्य करें।
(11) अश्मरी हेतु– नीम की पत्तियों की राख जल के साथ दो माशे की मात्रा में नियमित लेते रहने से पथरी होने पर वह धीरे-धीरे टूट-टूट कर पथरी पूरी की पूरी निकल जाती है तथा मरीज को लाभ मिल जाता है।
(12) संसर्ग पीड़ा हेतु– नीम के पत्तों को गर्म करके स्त्री यदि नाभि के नीचे बाँधे तो पुरूष संसर्ग के समय होने वाला दर्द या मासिक धर्म के समय होने वाला दर्द में फायदा होता है।
(13) रक्त शोधन में– नित्य नीम की पत्ती पीसकर पीना हितकर है।
नीम का ज्योतिष में महत्व-
नीम का ज्योतिष शास्त्र में एक महत्व विशेष कहा गया है। तद्नुसार घर में नीम की पत्ती, सर्प की केचुली, मोरपंख की चंद्रिका, शुद्ध घी, बिनौले, बकरी के बाल तथा शिवजी पर चढ़े हुए पुष्पों की धूनी देने से बालारिष्ट का नाश होता है।
नीम का तांत्रिक महत्व-
(1) जो व्यक्ति मेष राशि के सूर्य में एक मसूर तथा दो नीम की पत्तीयों को खाता है उसे एक वर्ष तक सर्प का भय नहीं रहता है।
(2) किसी भी व्यक्ति के दाढ़ में दर्द होने पर निम्न यंत्र को एक कोरे कागज पर पेन्सिल से बनायें तथा अमुक के स्थान पर व्यक्ति का नाम लिखकर नीम के झाड़ में लोहे के कील से ठोंक दें। ऐसा करने से दाढ़ दर्द में लाभ होता है।
(3) स्वाति नक्षत्र में निकाले गयें नीम के बांदे का प्राचीन काल मे अदृष्य होने के लिए उपयोग किया जाता है।
नीम का वास्तु में महत्व-
घर के वायव्य कोण में नीम के वृक्ष का होना अति शुभ है। इसी प्रकार जो व्यक्ति सात नीम के वृक्षों का रोपण करता है उसे मृत्योपरांत शिवलोक की प्राप्ति होती है अथवा जो व्यक्ति 3 नीम के वृक्षों का रोपन करता है वह सैकड़ों वर्षों तक सूर्य लोक में सुखों का भोग करता है। शास्त्रों में कहा गया है- निम्बत्रयं समारोप्य नयो धर्मविचक्षणाः। सूर्यलोकं समासाद्य वसेदब्दायुतत्रयम्।।

यज्ञ चिकित्सा से भी रोग नष्ट होते हैं

यज्ञ चिकित्सा से भी रोग नष्ट होते हैं सूक्ष्म में जो शक्ति है वह स्थूल में नहीं। सोने का एक रत्ती टुकड़ा किसी आदमी को खिला दो कोई लाभ न होगा। उसी को सूक्ष्म करके वर्क बनाकर खिलाओं पुष्टि देगा। पर जब उसे आग में फूँक कर भस्म बना लो तो केवल एक एक रत्ती खिलाने ही चेहरे पर लाली, शरीर में बल, मन में उत्साह उत्पन्न होकर वृद्ध भी युवा बन जायगा। वैद्यलोग जानते हैं कि एक माशे दवा की वैसे बहुत कम शक्ति होती है, उसी दवा को यदि एक सप्ताह तक घोटकर सूक्षम किया जाये तो उसकी शक्ति कई गुणा बढ़ जाती है। होमियोपैथी मे इसी नियम के आधार पर औशधियों की पोटैंसी तैयार की जाती है। जिसका प्रभाव करना अभीष्ट होता है तो खिलाने के स्थान मे औशधि सुँघाते हैं।
सुँघाने की अपेक्षा भी जली हुई औशधि का प्रभाव कितना बढ़ जाता है उसे उदारहण से समझिये। एक मिर्च सूँघने से कुछ न होगा। कूटने से पास बैठे लोगों को खाँसी आवेगी। पर यदि उसको आग में जलावें तो दूर-दूर तक के मनुश्य खांखने लगेंगे। कारण यह कि अब उसके परमाणु बहुत सूक्ष्म हो गये, अतः उनकी शक्ति बढ़ गयी। अब विचार कीजिये कि रोग के कीडे़ एक कतार में रक्खे जावें तो 25000 कीटाणु एक इच्ं स्थान घेरेगें। यदि उनको तौला जावे तो एक खस खस के दाने पर बीस अरब कीटाणु चढ़ जायँगे। इतनी सूक्ष्म वस्तु पर स्थूल कण वाली ओषधियों की बड़ी मात्राओं की पहुँच ही दुस्तर है, कीटाणुओं को समाप्त कर उन पर विजय पाना तो दूर की बात है। इसी नियम को समझने के कारण लोग तपेदिक की चिकित्सा में असफल रहते है, और उसे असाध्य समझते हैं। पर औशधियों का वह अत्यन्त सूक्ष्म भाग जो यज्ञ अग्नि द्वारा छिन्न भिन्न हुआ है कीटाणुओं को सुगमता से नष्ट कर रोग दूर कर सकता है।
पदार्थ विज्ञान से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि कोई वस्तु नष्ट नहीं होती किन्तु रूप बदल जाता है। जो ओषधि मुँह से खायी जाती है, वह रस रक्त बनने के पश्चात् क्षयरोगी के फेफड़ों तक पहुँचेगी। पर अग्नि में जलायी हुई औशधि श्वास द्वारा सीधी फेफड़ो पर पहुँच कर तत्काल प्रभाव करेगी और बहुत सूक्ष्म होने के कारण स्थायी प्रभाव करेगी। गूगूल को ही लीजिये। आयुर्वेद में इसे अन्य गुणों के साथ रसायन, बलकारक, टूटे को जोड़ने वाला और कृमिनाशक बतलाया गया है।
अन्वेषण से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जितने प्राकृतिक पदार्थ हैं उनके सूक्ष्म परमाणु हर समय गतिशील रहते है, यद्यपि प्रत्यक्ष में वे दृष्टिगोचर नहीं होते। हमारे इस मनुश्य शरीर, घर की दीवार, मेज, कुर्सी इत्यादि का प्रत्येक परमाणु गति कर रहा है। यजुर्वेद के 40 वें अध्याय के पहले मन्त्र में संसार को जगत्यां जगत् कहकर इसी नियम को बताया है। और यह गति भी ऊटपटांग नहीं किन्तु नियम पूर्वक है। प्रत्येक परमाणु गति एक सी नहीं होती। किन्हीं की गति समान होती है। और किन्हीं की एक दूसरे के प्रतिकूल। प्रकृति का नियम है कि दो समान वस्तुयें एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है और विरुद्ध वस्तएं एक दूसरे को भगाती हैं। आपने देखा होगा कि एक श्रेणी में एक साथ पढ़ने वाले कई विद्याथियों में से किन्हीं दोमें विशेष मित्रता हो जाती है। शेष में वैसी नहीं होती। रेल में सैकड़ो यात्री साथ-साथ यात्रा करते हैं पर उनमें से किन्हीं दो में ऐसी घनिष्ठता हो जाती है। जो जीवन भर निभाते हैं किन्हीं पति पत्नियों में ऐसा गहरा प्रेम होता है कि वे एक दूसरे पर प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते हैं। यह सब कुछ भी इसी नियम के आधार पर है जिस मनुश्य के शरीर के परमाणु जैसी गति करते हैं। उसे वैसी गति वाले रोग या स्वास्थ्य के परमाणुओं को उसकी ओर खिंचाव हो जाता है। और जो उसके विपरीत होते हैं वे दूर भागते हैं।
किसी भी रोग के कीटाणु जब मनुश्य के शरीर में प्रवेश करते हैं तो हमारे शरीर की रोगनिवारक शक्ति जिसे हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि सदा से जानते थे और प्राणयाम तथा ब्रह्मचर्य द्वारा नित्य बढ़ाया करते थे पर अब इस सम्बन्ध में वर्तमान विज्ञान में भी कुछ समय से खोज होने लगी है जिसे डाक्टरी में रोग निवारक शक्ति कहते है। रोग को दूर भगाने के लिये एक प्रकार का उफान खाया हुआ रस तथा रक्त के श्वेतकणों की सेना, जिसे डाक्टरी में चींहवबलजवेपे कहते है। भेजता है यदि ये लड़ाई में सफल हो जाते हैं तो रोग के कीटाणु वहीं समाप्त हो जाते हैं और हमें ज्ञात भी नहीं होता कि हम पर किसी रोग का आक्रमण हुआ था। हाँ, इनके निर्बल सिद्ध होने पर रोग हमारे शरीर पर अधिकार जमा लेता है। यह रोगनिवारक शक्ति कुछ तो जन्म काल से साथ आती है और कुछ मनुश्य को उत्तम भोजन, शुद्ध सुगन्धित वायु के मिलने से उत्पन्न होती है। अतः हवन यज्ञ से जहाँ रोगनिवारक शक्ति बढ़ेगी वहाँ वह उफान रस भी अधिक उत्पन्न होगा क्यूंकी गर्मी से उफान शीध्र आता ही है। इस प्रकार रोग के कृमि हवन करनेवाले पर आक्रमण करने पर भी रोग उत्पन्न करने में उसफल रहेंगे और रोग की अवस्था में हवन करने से शीध्र नष्ट हो जायँगे।
जिस प्रकार हमारे शरीर के ऊपर खाल का खोल चढ़ा है उसी प्रकार शरीर के भीतर की ओर एक मुलायम खाल का अस्तर भी लगा है। जो गले से लेकर आँतों के निचले भाग तक विशेष रूप से तर रहता है। जिस मनुश्य की यह खाल या अस्तर बिल्कुल ठीक है और उस पर कोई क्षत या खरोंच नहीं है वह स्वस्थ मनुश्य है और उस पर किसी भी संक्रामक रोग का आक्रमण नहीं हो सकता। इस वैज्ञानिक नियम को समझने वाले बुद्धिमान अनुभवी चिकित्सक सर्वदा रेचक दवा का निषेध करते हैं, क्योंकि इससे आँतों के अस्तर में खरोच उत्पन्न होती है। जब रोग-कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं तो इन्हीं खरोंच द्वारा रक्त में इस प्रकार फैल जाते हैं जिस प्रकार प्रवेश करायी हुई ओषधि। अब यदि किसी असुविधा से हमारी इस खाल या अस्तर में कोई खराश हो गयी है तो बाहर की खरोंच की चिकित्सा तो अन्य उपायों से भी सुगम है पर भीतर का प्रबन्ध कठिन है। हाँ जो ऐसी अवस्था में हवन करते हैं उनके भीतर जब घी, कपूर और गूगल इत्यादि के सूक्ष्म परमाणु पहुँचेंगे तो उस खरोंच को किस शीध्रता से भर देंगे इसको समझना कुछ कठिन नहीं है जब कि इन्हीं वस्तुओं से बाहर की खरोंच को भरने का अनुभव प्रत्येक मनुश्य करके देख सकता है।
युक्तियों के पश्चात् अब हम इस विषय में कुछ प्रमाण और अनुभव पेश करते है-
1. वेद भगवान् का प्रमाण- मूँचामि त्वा हविमा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत्र राजयक्ष्मात्।
ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्।।
हे व्याधिग्रस्त, मनुश्य तुझ को सुख के साथ चिरकालतक जीने के लिये गुप्त राजयक्ष्मा रोग से और सम्पूर्ण प्रकट राज्यक्ष्मा रोग से आहुति द्वारा छुड़ाता हूँ। जो इस समय में इस प्राणी को पीड़ाने या पुराने रोग ने ग्रहण किया है। उससे वायु तथा अग्नि देवता इसको अवश्य छुडावें।
इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि वेद भगवान् हर प्रकार के तपेदिक की चिकित्सा चाहे रोग अभी प्रकट हुआ हो या गुप्त हो, वायु और अग्निद्वारा बतलाते हैं और आहुति द्वारा रोग से छूटने का का आदेश करते हैं।
इससे अगला मन्त्र इस प्रकार है – यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव।
तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्षमेनं शतशारदाय।।
यदि रोग के कारण न्यून आयु वाला हो, अथवा संसार के सुखों से दूर हो गया हो, चाहे मृत्यु के निकट पहुँच चुका हो – ऐसे रोगी को भी महारोग के पाश से छुड़ाता हूँ। इस रोगी को सौ शरद् ऋतुओं तक जीने के लिये प्रबल किया है। इससे यह विदित होता है कि खराब से खराब अवस्था को रोगी जिसे चिकित्सक लोग असाध्य कह देते हैं हवन यज्ञ से अच्छा हो सकता है।
2. आयुर्वेद के प्रामणिक ग्रन्थ चरक का प्रमाण- यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुरा जितः।
तां वेदविहितामिष्टिमारोग्या र्थी प्रयोजयेत्।।
जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था आरोग्य चाहने वाले मनुश्य को उसी वेदविहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये।
3. होमियोपैथिक से पृष्टि-
होमियोपैथिक चिकित्सा के आविष्कार कर्ता हैनीमान साहब अधिक निर्बल रोगियों को खिलाने के स्थान में केवल औशधि सुँघाने का परामर्श देते हैं और उसके लिये वह अपनी प्रसिद्ध पुस्तक की की धारा 190 में लिखते है जो औशधि के प्रभाव को शीध्र ग्रहण करता है। सबसे अधिक प्रभाव ओषधि का सूँघने और श्वास लेने से होता है। यदि हैनीमन साहब के समय जर्मनी में यज्ञ का प्रवाह हेाता तो अवश्य ही वे इसे चिकित्सा का प्रधान अंग बनाते ।
4. ऐलोपैथिकमत से पुष्टि-
एलोपैथिक डाक्टरी में तपेदिक के रोगी ज्ञतमवेवजम और म्नबंसलचजने वपस को इत्यादि का प्दींसंजपवद बनाकर सुँघाने हैं और इसका प्रभाव तत्काल होता है। वैसे वही ज्ञतमवेवजम खिलाया भी जाता हैं पर वह इतना शीध्र प्रभाव नहीं करता। ऐसा क्यों होता है। इसीलिये कि सूँधी हुई दवा के सूक्ष्म परमाणु सीधे फेफडे़ में पहुँचकर अपना प्रभाव करते हैं। पर उनमें वह शक्ति नहीं कि स्थायी प्रभाव रख सकें, जैसा कि अग्नि से छिन्न-भिन्न हुई ओषधि के परमाणु रख सकते है।
वैद्यक के अनुसार-
मैंने अपने कई वर्षों की चिकित्सा के अनुभव से निश्चय किया है, जो महारोग ओषधिभक्षण करने से दूर नहीं होते वे वेदोक्त यज्ञों द्वारा दूर हो जाते हैं।
विद्वानो के अनुभव
फ्रांस के विज्ञानवेत्ता प्रो. टिलवर्ट कहते हैं कि जलती हुई खाँड के धुएँ में वायु शुद्ध करने की वड़ी शक्ति है। इससे हैजा, तपेदिक, चेचक इत्यादि का विष शीध्र नष्ट हो जाता है।
डाक्टर टाटलिट साहब ने मुनक्का, किशमिश इत्यादि सूखे फलों को जला कर देखा है और मालूम किया है कि इनके धुँए से टाइफायड ज्वर के कीटाणु केवल आधे धण्टे में और दूसरे रोगों के कीटाणु धण्टे, दो घण्टें में समाप्त हो जाते हैं।
मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर डाक्टर कर्नल किंग त्ण्डण् ने कालि के विद्यार्थियों को बताया कि घी, चावल में केसर मिलाकर जलाने से रोग के कीटाणुओं का नाश होता है।
फ्रांस के डाक्टर हेफकिन, जिन्होंने चेचेक की टीका ईजाद किया, कहते हैं कि घी जलाने से रोगकृति मर जाते हैं।
केमिकल प्रारपटीज की राय-
जयफल, जावित्री, बड़ी इलायची, सूखा चन्दन इत्यादि अग्नि में जलाने से मुफीद हिस्से ज्यों के त्यों रहते हैं या सूक्ष्म हो जाते हैं। पहले पहल इनसे सुगन्धित तेल गैस बनकर निकलते हैं। हवन गैस मेंयह चीजें अपने असली रूप में मिलती हैं। अग्नि इन चीजों को गैस बना देती है। उड़ाने वाले तेलों के परमाणु 1, 0000 से 1, 10000000 सेंटीमीटर व्यासवाले देखे गये हैं। अतः हवन में इन चीजों के गुण बहुत बढ़ जाते हैं और ये आसानी से कीटाणुओं का नाश करते हैं।

 

 

साधारण पौधा आक

साधारण पौधा आक आक अथवा मदार पूरे भारत में सरलता से उपलब्ध होने वाला एक महत्वपूर्ण पौधा है। यह दो प्रकार का होता है। एक वह जिसके फूल बैंगनी रंग लिये हुए होते हैं और दूसरा वह, जिसके फूल सफेद होते हैं। इसके फल देखने में कच्चे आम के समान होते हैं। ये ज्येष्ट माह में पक जाते हैं। इनके अंदर काले रंग के दाने तथा रूई जैसी निकलती हैं। यह झाड़ी नुमा होता है। इसकी पत्तियाँ मोटी तथा शिराओं वाली होती हैं। पत्तियों और हरे तने व शाखाओं को देखने पर ऐसा लगता है, मानो उन पर पाउडर छिड़का हुआ हो। पत्ती अथवा डण्डी को तोड़ने पर इसमें से दूध जैसा पदार्थ निकलता है।
आक के विभिन्न भाषाओं में नाम:-
श्वेत आक को संस्कृत में श्वेतार्क, मन्दार, सदापुश्प, बालार्क, प्रतापस आदि कहते हैं, जबकि बैंगनी फूल वाले आक को रक्तार्क, के नाम से पुकारते हैं। दोनों ही प्रकार के आक को हिन्दी में आक, अकवन या मदार (सफेद या लाल) व सफेद या लाल अकौआ भी कहते हैं। वनस्पति जगत के एसक्लेपीडेसी ; बेसमचपकंबमंमद्ध कुल का यह सदस्य है।

औशधिक चमत्कार

  1. वात रोगों में–श्वेत आक की जड़ को तिल के तेल में डालकर खूब उबाल लें। फिर इस तेल से रोगग्रस्त अंग की मालिश करें। नियमित रूप से इस तेल की मालिश करने से वातव्याधी के कारण हाथ, पैर, कमर में होने वाले दर्द से छुटकारा मिलता है।
    2. गठिया, और मोच में— आक के पत्तों पर मीठे तेल को चुपड़कर उसे हल्का सा सेंक कर गठिया ग्रस्त अंग पर बाँधने से लाभ होता है। घी में चुपड़कर यही प्रयोग करने से मोच के दर्द से मुक्ति मिलती है।
    3. शरीर में यदि छोटे-छोटे सफेद दाग हों तो— श्वेत आक के दूध में सेंधा नमक घिसकर छोटे-छोटे सफेद दागों पर लगाने से वे ठीक हो जाते हैं।
    4. एक्जिमा में– आक के दूध में समान मात्रा में तिल का तेल मिलाकर इस मिश्रण को एक्जिमा पर मलने से सात-आठ दिन में एक्जिमा से मुक्ति मिल जाती है।
    5. कुत्ता या बिच्छु के काटने पर— यदि किसी को कुत्ता या बिच्छु काट ले तो दंश-स्थान (जिस जगह काटा हो) पर आक का दूध लगाने से इनके विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
    6. बवासीर में— बवासीर में आक के दूध में अफीम घोलकर, मस्सों पर लगाने से उनका दर्द दूर होता है।
    7. अण्डकोश बढ़ने पर–सफेद आक की जड़ घिसकर लेप करने से अण्डकोश सामान्य अवस्था में आ जाते हैं।
    8. हाथी पाँव में— आक के जड़ की छाल तथा अडूसे की छाल को पीसकर लेप करने से हाथीपाँव रोग दूर होता है।
    9. अन्दरूनी चोट में— आक के पत्तों को सरसों के तेल में उबालकर मालिश करने से गिरने या किसी ठोस वस्तु के आघात से लगी चोट में लाभ होता है।
    10. सूजन में– आक के पत्तों में अरण्डी का तेल लगाकर गरम करके बाँधने से सूजन तथा दर्द कम हो जाता है।

महा औशधि पीपल

महा औशधि पीपल पीपल वृक्ष की उपस्थिति व उपयोग की जानकारी वैदिक काल से ही मिलती है, अनेक प्राचीन ग्रन्थों में इसके उदाहरण मिलते है, पीपल का वृक्ष सम्पूर्ण जलीय प्रदेश तथा साधारण भूमि में आसानी से मिल जाता है तथा मरूभूमि में भी यह स्वयं को जीवित रखता है। आयुर्वेद के ग्रन्थों व संहिताओं में औशधि के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। चिकित्सा की दृष्टि से रोग निवारण के लिए पीपल के अनेक औशधीय  प्रयोग मिलते हैं, जिनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत है-

  1. सर्पदंश पर विषनाशक प्रयोग
    जब किसी को सर्पदश हो गया हो, शीघ्र ही डंठल की तरफ से पीपल के ताजे पत्ते को रोगी के कान में थोड़ा सा ड़ालें इसे कसकर पकड़े रहें, क्योकि विष के प्रभाव से रोगी को वेदना होती है तथा डंठल का खिंचाव अन्दर की ओर होता है, यदि डंठल अधिक अन्दर चला जाता है, तो कान का पर्दा छिद्रयुक्त हो सकता है, अतरू पत्ते को पकडे़ रहना चाहिए। तथा जब पत्ता कुछ विवर्ण (नीला या पीला) हो जाए व डंठल कुछ फूल जाए तब पत्ते को बदल देना चाहिए अर्थात् नवीन पत्ता लगाना चाहिए। इस क्रिया से विष का आचूषण होता है तथा जब विष का पूरा आचूषण हो जाता है, तब डंठल का अन्दर की ओर खिंचाव तथा रोगी को वेदना होनी बन्द हो जाती है। तब उल्टी (वमन) करानी चाहिए ताकि आमाशय में कोई विषाक्त द्रव एकत्रित हो, तो निकल जाए। इसके पश्चात् दुग्धपान कराना चाहिए।
  2. पीपल के द्वारा चिकित्सा के अनेक योग आयुर्वेदीय योग मिलते हैं जैसे– संग्रहणीय कषाय (चरक), पंचवल्कल कषाय आदि।
    3. आमजप्रवाहिका (एमेबिक डीसेन्ट्री) में पीपल की गोंद का शुष्क चुर्ण 2-3 ग्राम प्रतिदिन लेने से जीर्ण प्रवाहिका ठीक हो जाती है। साथ ही पथ्यापथ्य का पालन आवश्यक है।
    4. मधुमेह रोग में दो पत्ते पीपल के, चार पत्ते तुलसी के, चार पत्ते नीम के, चार पत्ते बिल्प पत्र के तथा आठ पत्र नींबू के एवं पाँच काली मिर्च को मुख में चबा-चबाकर रस चूसना चाहिए, शेष बचे हुए तंतुओं को फेंक देना चाहिए। औषध का सेवन करने के साथ-साथ रोगी को यथा-शक्ति पैदल भ्रमण भी करते रहना चाहिए, इससे कुछ ही दिनों में रक्त शर्करा की मात्रा न्यून हो जाती है।
    5. आयुर्वेद की अनेक भस्मों के निर्माण में भी पीपल के अंगों का प्रयोग किया जाता हैं– जैसे नाग भस्म, वंग भस्म, यशद भस्म, अभ्रक भस्म आदि।

नोट- यह सभी औधिय प्रयोग आप अपने चिकित्सक से परामर्श करके ही करें।

पीपल के मांत्रिक प्रयोग
1. विषम ज्वर
जिस रोगी को ठण्ड लगकर बुखार आता हो या तीन दिन के अन्तर से ज्वर आता हो, उस रोगी को स्नान कराके, शुद्ध जल में तिल व थोड़ा दूध मिलाकर पूर्वाभिमुख खडे़ होकर पीपल वृक्ष पर उस तिलोदक को सात बार मंत्र बोलते हुए धारा बद्ध चढ़ा देने से ज्वर आना बन्द हो जाता है। यह प्रयोग सात दिन तक या ज्वर शांत होने तक किया जाता है। मंत्र इस प्रकार से है- विषमज्वर गच्छत्वं तस्मै तिलोदकं नमरू
2. पुराना ज्वर
 नमः शिवाय’ को ग्यारह बार उच्चारण करते हुए जल अर्पित करें तथा रोगी के रोग निवृत्ति हेतु प्रार्थना करें। इससे पुराना ज्वर, जो अनेक औशधियों के सेवन से भी ठीक न होता हो तब इस मंत्रोपचार से लाभ होता है।\शनिवार के दिन प्रातरूकाल स्नानादि करके रोगी स्वयं या रोगी की ओर से कोई अन्य व्यक्ति रोगी का नाम लेकर एक ताम्र के पात्र में शुद्ध जल व थोड़ा चिरायता, दुग्ध, कुछ शर्करा व कुशा डालकर उत्तर की ओर मुख कर के भगवान शंकर को स्मरण करते हुए शिव पंचाक्षरी मंत्र ‘

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार साधना के क्षेत्र में मुद्राओं का विशिष्ठ महत्व सर्वविदित है। तंत्र के क्षेत्र में भी मुद्राओं का सुनियोजित और विस्तृत विवरण मिलता है। मुद्रा के अनेक अर्थ हैं, किन्तु साधारणतया साधनात्मक कार्यो में प्रयुक्त होने वाली मुद्राओं को, जो उंगलियों के माध्यम से देवता के प्रीत्यर्थ प्रकट की जाती हैं मुद्राएं कहा जाता है। इनका प्रयोग शक्ति साधक अनिवार्यतः करते हैं, लेकिन अन्य साधकों के लिए भी मुद्रा प्रदर्शन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि साधना क्रम में यह एक आवश्यक क्रिया मानी गई है। कुलावर्ण तंत्र में लिखा है- ‘‘मुद्राः कुर्वन्ति देवानां मनासि द्रावयन्यि च।’’
‘‘मुद्राओ को प्रदर्शित करने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा मुद्रा प्रदर्शित करने वाले भक्त पर द्रवित होकर कृपा करते हैं।’’ कुछ तंत्र शास्त्रों में स्पष्ट है, कि मुद्रा प्रदर्शित करने पर व्यक्ति को देवताओं की समीप्यता प्राप्त होती है; मुद्राओं के प्रदर्शित करने पर देवता पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रहते हैं तथा इन के प्रदर्शन से साधारण पूजा भी उत्तम हो जाती है, बिना मुद्राओं के सम्पत्र की हुई साधनाए, जप, देवाचार्वन, योग आदि निष्फल हो जाते हैं। मुद्राओं का केवल एक पक्ष नहीं -‘‘क्या मुद्रा द्वारा रोगों का उपचार भी सम्भव है?’’

निर्विषोऽपि भेवेत् क्षिप्रं यो जन्तुर्विषमूर्छितः। चत्वारिंशित् समाख्याता मुद्रा श्रेष्ठा महाधिकाः।।

‘‘मुद्रा प्रदर्शन से विष द्वारा मूच्र्छित व्यक्ति भी स्वस्थ्य लाभ प्राप्त करता है। व्याधि और मुत्यु तक का निवारण मुद्राओं द्वारा संभव है। मोक्ष, जो मनुश्य जीवन का सर्वोच्च सोपान है, वह भी मुद्रा प्रदर्शन से प्राप्त किया जा सकता है।’’ मुद्राओं के महत्व को जानकर यदि व्यक्ति चाहे, तो अनेक रोगों पर नियंत्रण कर सकता है। वर्तमान समय में तो इतने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोग है, जिनसे बचना मनुश्य के लिए कठिन हो गया है, न चाहते हुए भी अनेक प्रकार की औशधिओं का सेवन करना पड़ता है और जिसके कारण कभी-कभी अनेक प्रकार के साईड़ इफेक्ट हो जाते हैं, जैसे चेहरे पर अनेक प्रकार के दाने, फुंसियां निकल आती हैं, जिसकी वजह से सौन्दर्य क्षीण हो जाता है। इसके लिए ‘कुम्भ मुद्रा ’ का प्रयोग करें, तो चेहरा रोग रहित, कान्तियुक्त और चमकदार बनने लगेगा। कुम्भ मुद्रा में साधक अपने दाहिने हाथ से हल्की खुली सी मुट्ठी  बनावें, इसी प्रकार दूसरे हाथ से भी करें, दोनों हाथ के अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करते रहें बायें हाथ को दाहिने हाथ के ऊपर रखें। इसे कुम्भ मुद्रा कहते है। इसके नित्य प्रदर्शन से साधक का चेहरा आकर्षक बनता है तथा दाने व मुहासे साफ हो जाते है।
स्वर शोधक-
साधक यदि ‘प्राण मुद्रा’ सम्पन्न करें, तो स्वर से सम्बन्धित रोगों को नियंत्रित कर सकते है। प्राण मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक अपने अंगूठे से अनामिका और कनिष्ठका के पोरों को स्पर्श करें, बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखें, तो प्राण मुद्रा के प्रदर्शित करने से साधक के स्वर संस्थान पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उसका स्वर शुद्ध होता है। जिनका स्वर घरघराता हो या आवाज स्पष्ट न हो, उसे प्राण मुद्रा करने से बहुत लाभ होता है।
मुख शोधन-
व्यान मुद्रा’ प्रदर्शित करने से साधक के मुख से सम्बधित रोगों का शमन होता है। साधक बैठ कर अपने हाथ के अंगूठे से मध्यमा और अनामिका को स्पर्श करें, इससे व्यान मुद्रा प्रदर्शित होती है। इस मुद्रा के प्रदर्शन से साधक के मुख सम्बन्धी रोगों पर प्रभाव पड़ता है; जैसे यदि उसके मुंह से दुर्गन्ध आती है या उसके मुंह का स्वाद अक्सर बिगड़ा रहता है अथवा मुख में छाले निकलने लगते हो, तो इस मुद्रा को नित्य करने से बहुत लाभ मिलता है। गले के रोग- सर्दी या गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला अंग गला ही होता है। यह शीघ्र ही वातावरण से प्रभावित हो कर संक्रमित हो जाता है, जिसकी वजह से गला बैठना, गले में सूजन, दर्द या टॉन्सिल्स की शिकायत होने लगती है। यदि ऐसा व्यक्ति ‘उदान मुद्रा’ सम्पन्न करता है, तो उसे गले से सम्बन्धित रोग नहीं होते। इस मुद्रा को करते समय अपने हाथ के अंगूठे से तर्जनी अंगुली को स्पर्श करें और पूर्ण रूप से स्थिर होकर बैठें व मन ‘सौं’ बीज पर एकाग्र करें।
हृदय सम्बन्धी रोग-
‘आवाहनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से हृदय रोगों पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। आवाहनी मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक दोनों हाथों को मिलाकर अंजुली बना लें व अंगूठों से अनामिका के मूल को स्पर्श करें। ऐसा साधक नित्य स्थिर मन से जिस आसन में वह सुविधा अनुभव करे चाहे पद्यासन हो या सुखासन हो, बैठ कर करे। यह मुद्रा सम्पन्न करने से साधक हृदय के रोगों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। यदि साधक घबराहट का अनुभव कर रहा हो, तो वह थोड़ी देर इस मुद्रा को न करे, तो उसे लाभ अवश्य होगा।
पेट के रोग-
‘सम्मुखीकरण मुद्रा’ सम्पन्न करने से साधक पेट से सम्बधित रोगों पर विजय प्राप्त कर लेता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए साधक स्थिर बैठ जाये व अपने दोनों हाथों से मुट्ठी  बनाये, अंगूठे को मुट्ठी के अन्दर रखे तथा दोनों हाथों की मुट्ठी को परस्पर कनिष्ठिका उंगली से मिला ले। इसे सम्पन्न करने पर पेट में यदि कीड़े भी हों या पित्त अधिक बनता हो, तो व्यक्ति को राहत मिलती है। यह मुद्रा पेट से सम्बधित रोगों में अत्यन्त सहायक होती है, जिसे नित्य करने से व्यक्ति इन रोगों को नियंत्रित कर सकता है।
चर्मरोग-
खुजली होने या किसी वस्तु से खाने -पीने से एलर्जी हो जाने से पर चमड़ी से सम्बन्धित रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति असहजता अनुभव करता है। इस रोग के लिए ‘चक्र मुद्रा’ करने से नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। दोनों हाथों की उंगलियों को फैला लें व बायें हाथ की कनिष्का अंगुली से दाहिने हाथ की कनिष्किा को स्पर्श करें तथा बायें हाथ के अंगूठे से दाहिने हाथ के अंगूठे को परस्पर स्पर्श करें। इस प्रकार से चक्र मुद्रा प्रदर्शित होती है।
उच्च रक्तचाप-
उच्च रक्तचाप में ‘ज्ञान मुद्रा’ सहायक होती है। इस मुद्रा को करने से व्यक्ति को अपने रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। ज्ञान मुद्रा को करने के लिए अंगूठे और तर्जनी को परस्पर स्पर्श करें। यह मुद्रा शान्तचित होकर सम्पन्न करनी चाहिए और नियमित रूप से करनी चाहिए तभी राहत का अनुभव होता है।

कमर के रोग-
‘सन्निरोधिनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से कमर के रोगों पर नियंत्रण होता है। इस मुद्रा के लिए व्यक्ति अपने दोनों हाथों से मुत्ठियाँ बना कर उन्हे आमने-सामने कर जोड़ दें तथा थोडी देर तक कमर सीधी कर सुखासन पर बैठ कर यह मुद्रा सम्पन्न करें। इससे साधक को अपने कमर से सम्बधित रोगों में लाभ मिलता है। इस से कमर का तनाव भी समाप्त हो जाता है, कमर से सम्बधित अन्य रोगों में भी लाभ मिलता है।
गुर्दे के रोग-
यदि कोई गुर्दे के रोग से पीडि़त है या गुर्दे से सम्बधित किसी रोग से ग्रस्त है, तो वह यदि ‘गदा मुद्रा’ का नियमित अभ्यास करता है, तो उसे सम्बधित रोग पर नियंत्रण प्राप्त होता है। इस मुद्रा को प्रदर्शित करने के लिए दोनों हाथों की उंगलियों को एक दूसरे में फंसा दें। इससे गदा मुद्रा प्रदर्शित होगी। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से व्यक्ति को यदि गुर्दे में सूजन है तो उसे अच्छे परिणाम की प्राप्ति होती है।
हाथ और पांव से सम्बधित रोग-
यदि सायंकाल खड़े होकर ‘सम्पुटी मुद्रा’ को सम्पन्न किया जाए, तो साधक को हाथ और पांव से सम्बन्धित रोगों में आराम मिलता है। यदि पावों में अक्सर दर्द रहता हो तथा घुटने मोड़ने में अत्यधिक कष्ट हो, तो यह मुद्रा आराम दिलाने में सहायक होती है। वजन उठाने पर दर्द का अनुभव हो, तो इस मुद्रा को करने से लाभ होता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए बायें हाथ को आकाश की ओर रखें तथा उस पर दाहिने हाथ से सम्पुट करें। यह मुद्रा साधक 5 मिनट तक नित्य करें।
वात रोग
‘शंख मुद्रा’ इस मुद्रा को नित्य करने से व्यक्ति यदि वात रोग से पीडि़त है, तो उसे इस रोग में आराम मिलता है। इस मुद्रा को साधक प्रातः काल स्थिर भाव से बैठ कर सन्ध्यादि से पूर्व प्रदर्शित करे। इस मुद्रा के लिए बायें हाथ के अंगूठे को दाहिने हाथ से मुट्ठी बनाकर पकडे़ं तथा मुट्ठी को दाहिने हाथ की अंगुलियों से स्पर्श करायें, तो शंख मुद्रा प्रकट होगी। यह मुद्रा यदि नियमित रूप से 5-7 मिनट तक सम्पन्नकी जाय, तो वात रोगों में आश्चर्य जनक लाभ होता है।

यंत्रा और मंत्रा

यंत्रा और मंत्रा प्रजनन के देवता काम ने कादिविद्या मूलमंत्रा की उपासना की थी। जिसके बल से कामदेव का सामर्थय इतना बढ़ गया की वह बड़े-बड़े मुनियों के चित्त को भी आच्छत् करने लगा। ब्लें रति का बीज मंत्रा है। ब् और ल् उसके नेत्रा हैं और ए शक्ति रूप है। वपुषा पद से व्, लेह्येत पद से ले और महतां मुनिनां पद के अनुस्वार से लेकर उक्त बीज मंत्रा का उद्धरण किया जाता है। माया बीज और कामबीज के योग से ‘‘हृी क्लीं ब्लें’’ इस साध्य सिद्धमंत्रा का उद्धार है। इस मंत्रा से हृदयचक्र और महानाद के ऊपर शक्ति का न्यास किया जाता है। अर्थात् यंत्राकृति तैयार की जाती है। जिस का फल सौभाग्य प्राप्ति है।

इसी प्रकार महामृत्युजय यंत्रा और मंत्रा का विचार करें तो देखते हैं- इसके बीज हृौं जूं सः’ शिव-शक्तिमय हैं। हृौं शिवबीज, जूं जीवनबीज, सः शक्तिबीज है। शिवबीज हृौं से जीवनशिक्ति जूं का आप्यायन होता है तथा शक्तिबीज सः से जीवनशक्ति (जीवनक्रम) की वृद्धि होती है। जूं (जीवनशक्ति) के शिवशक्त्याश्रय होने से जीवन वृद्धि का नाम मृत्यु्जयसिद्धि है।

अभिष्ट की प्राप्ति के लिये मंत्रा और तंत्रा का या इनकी शक्तियों और प्रतिक्रियाओं का जो प्रयोग प्रतिकात्मक अथवा चित्रात्मक रूप से किया जाता है, उस स्वरूप को ‘यंत्रा’ कहा जाता है।

यंत्रा एवं उसकी साधना करके लौकिक कामनाओं की पूर्ति की जाती है। अथवा कहा जा सकता है कि अपनी कामना पूर्ति के लिये यंत्रा साधना क्रियात्मक विधान है। इसके द्वारा साधक साध्य से मिलकर अपनी समस्त इच्छाओं की पूर्ति करता है। इन यंत्रों के द्वारा न केवल हमारी सांसारिक इच्छायें पूर्ण होती हैं, बल्कि लौकिक सिद्धियाँ भी मिलती हैं जिनसे दुःखों की निवृति और अंत में मुक्ति भी संभव है।

प्रस्तुत ‘‘यंत्रा विशेषांक’’ में अनेक प्रकार के यंत्रा सम्बंधी लेख भिन्न-भिन्न लेखकों के द्वारा दिये गये हैं। वस्तुतः प्रत्येक साधक (लेखक) के अपने-अपने अनुभव के आधार पर ही यंत्रा सम्बंधी लेख प्रकाशित किये गये हैं। इस के साथ मेरी अपनी राय यही है कि आप किसी भी सिद्ध साधक के द्वारा प्राण प्रतिष्ठित यंत्रा ही लें क्योकि यंत्रा स्वयं में जड होते हैं; इनकी जब तक प्राण प्रतिष्ठा नहीं करवाई जाती तब तक यह चैत्नय अवस्था में नही आते और ना ही अपना पूर्ण शुभ प्रभाव ही प्रकट करते हैं। अथवा प्राण प्रतिष्ठा का विधान स्वयं समझकर स्वयं ही प्राण प्रतिष्ठा कर सकते हैं। यह भी ध्यान रहे की कभी-कभी यंत्रा पूजा की सम्पूर्ण विधि-विधान के बाद भी सिद्ध नहीं होते ऐसा उस पूजा की प्रक्रिया की सही जानकारी के आभाव के कारण होता है।

उपचारार्थ मंत्र चिकित्सा

उपचारार्थ मंत्र चिकित्सा
बवासीर दूर करने का मंत्र

ओउम् काका कर्ता किरोरी करता ओउम् करता से हो ययरसना दश हूंस प्रगटे खूनी बादी बवासीर न होय मंत्र जान के न बतावे द्वादस ब्रह्म हत्या का पाप होय लाख जप करे तो उसके बस में न होय शबद सांचा पिण्ड काचा हनुमान का मन्त्र साँचा फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा।

यह मन्त्र ग्रहण काल में जितना जप हो जाय उतना ही जप करने से सिद्ध हो जाता है। सिद्ध हो जाने पर यह मंत्र 21 बार पढ़कर पानी को मन्त्र से अभिमन्त्रित करके आबदस्त लेने से बवासीर दूर होती है।

दाढ़ में दर्द हो या कीड़ा पड़ गया हो तो निम्न मंत्र से झाड़ने से दर्द कष्ट, पीड़ा दूर हो जाती है-

ओउम् नमो आदेश गुरु को-वन में जाई अंजनी जिन जाया हनुमन्त। कीड़ा मकड़ा मसकड़ा यह तीनों भस्मन्त। गुरु कि शक्ति मेरी भक्ति फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा।

यह मन्त्र भी ग्रहण के समय जितना जपा जा सके उतना ही जप करने से सिद्ध होता है। और इसको भी सिद्ध हाने पर 21 बार पढ़कर नीम की डाली से झाड़ने से दाढ़़ का दर्द, पीड़ा आदि दूर होती है।

कखवाईः-काँख

बगल में होने वाले फोड़े को कखबाई कहते हैं। इसको दूर करने का मंत्र निम्न प्रकार से हैंः-

ओउम् नमो कखवाई भरी तलाई जहाँ बैठा हनुमन्त आई पके न फूटे चले न पीड़ा रक्षा करै हनुमन्त
वीर दुहाई गोरखनाथ की शब्द साँच पिण्ड कांचा। फुरो मन्त्र ईश्वर वाचा सत्यनाम आदेश गुरु को।

मन्त्र को सिद्ध करने के लिए ग्रहण के समय में या पर्वकालों में 100 माला जपकर सिद्ध करने के बाद 21 बार झाड़ने से और मोर पंख या नीम की डाली से जिस स्थान पर झाड़ा दे उस स्थान कि मिट्टी बाँधने से तीन दिन में कखवाई की गांठ बैठ जाती है।

कण्ठबेल दूर करने का मन्त्रः-

ओउम् नमो कण्ठबेल तू द्रुमद्रु मली सिर पर जकड़ी बज्र की ताली गोरखनाथ जागता आया बढ़ती बेल को तुरन्त घटाया। जो कुछ बची ताहि मुरझाया। घट गई बेल बढ़त नहीं बैठी तहाँ उठत नहीं। पके फूटे पीड़ा करे तो गुरु गोरखनाथ की दुहाई। ओउम् नमो आदेश गुरु को मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फुरी मन्त्र ईश्वरी वाचा।

ग्रहण काल अथवा पर्वकाल में 100 माला जपकर इस मन्त्र को सिद्ध करने के बाद कण्ठबेल के रोगी को सात दिन तक झाड़कर जमीन पर चाकू से 21 लकीरें खीचें तो रोग दूर हो। कण्ठबेल गले पर गरदन का एक दुसाध्य चर्मरोग होता है। झाड़ने से दूर हो जाता है।

बिच्छू का विष झाड़ने का मन्त्र

बिच्छू काटने के बाद उसका जहर जहाँ तक चढ़ा हो वहाँ से पकड़कर झाड़ें। जैसे-जैसे जहर उतरता जाए वहीं पर पकड़ता रहे और झाड़ते हुए उतारता जाए। डंक की जगह तक आने पर झाड़ना बंद कर दें और डंक से ऊपर ‘‘जहर मोहरा’’ पानी में घिसकर लगाएं। जहर मोहरा बाजार में मिल जाता है।
शिलाजीत बेचने वालों के पास भी मिल जाता है। मन्त्र को पहले बताए गये तरीके से सिद्ध किया जाना चाहिए ग्रहण के समय या पर्वकाल में 100 माला जप करके सिद्ध कर लेना चाहिए।
पहला मन्त्रः

ओउम् नमो आदेश गुरु को। लो बिच्छू कांकर वालों उतर बिच्छू न कर टालो उतरो तो उतारुं चढ़े तो मारुं गरुड़ मोर पंख हकालूं। शब्द सांचा पिण्ड काचा फुरो मंत्र ईश्वरी वाचा।

दूसरा मंत्रः-(काला बिच्छू उतारने का)

ओउम् काला बिच्छू कांकरवालो हरी पूंछ भैराला। सोना का नाडू रुपे का पतनाला आठ गाँठ नौ कोर नीचे बिच्छू ऊपर मोर कौन मोरा कौन मोरा रेतो भकभकाकर बिच्छू रहे तो वह वीर नीड निकोर के कौन वैद मानुष पर गया खाते जाते लागी वार। उतर रे बिच्छु ताहे भैरो बाबा की आन।

पागल कुतो का विष झाड़ने का मंत्र

ओउम् कामरुप देश कामाक्षी देवी जहां बसे मछन्दर जोगी। मछन्दर जोगी का झामरा कुतो सोने की डाढ रुपे का कुंडा। बन्दर नाचे रीछ बजाये चीता बैठा औषध बांटे कूकर का विष भागे। शब्द सांचा पिण्ड काचा फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा
100 माला जपकर मन्त्र को सिद्ध कर लें। फिर समय पड़ने पर काटे हुए स्थान को झाड़े।
जमीन पर चाकू की नोक से 21 लकीरें खीचें। इस प्रकार सात दिन तक झाड़ने से पागल कुतो का विष दूर हो जाता है। आजकल पागल कुतो के काटे के लिये शर्तिया इलाज इंजेक्शन हैं और इन्हें अवश्य लगवाना चाहिए। पागल कुत्ते की पहचान है कि अगर कुत्ता पागल होगा तो काटने के बाद 2-3 दिन में ही मर जायेगा रिस्क नहीं लेना चाहिये इंजेक्शन द्वारा इलाज पूरा कराना चाहिये। मन्त्र में शक्ति जरुर होती यदि ऐसा कोई मन्त्रवेत्ता हो जिसने मन्त्र सिद्ध किया हो और इस प्रकार के प्रयोग सफलता पूर्वक कर चुका हो तभी उस पर निर्भर करें।

पीलिया झाड़ने का मंत्र

पीलिया रोग में शरीर पीला पड़ जाता है, आंखें पीली हो जाती हैं, सारा कुछ पीला ही दिखाई देता है। यह पिताशय में पित्त की अधिकता हो जाने पर होता है। आजकल तो चिकित्सा विज्ञान में इस रोग के लिए बहुत औशधियां उपलब्ध हैं। परन्तु पहले जमाने में गांवों में इन रोगों की चिकित्सा मन्त्रों के ही द्वारा होती थी।
100 माला जप कर इस मन्त्र को सिद्ध करके रोगी के सिर पर कांसे की कटोरी में तिल का तेल भर कर रखें और डाभ यानी कुशा से उस तेल को चलाते हुए निम्न मंत्र को सात बार पढ़े। तीन दिन तक ऐसा करते रहने पर तेल पीला पड़ जायेगा और पीलिया रोग दूर हो जायेगा।

ओउम् नमो वीर बैताल असराल नार कहे तू देव खादी तू बादी पीलिया कूं भिदाती कारै झारै पीलिया रहे न एक निशान जो कहीं रह जाए तो हनुमन्त वीर की आन। मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा।

एक्युप्रेशर-सिद्धान्त और पद्धति

एक्युप्रेशर-सिद्धान्त और पद्धति हमारा शरीर संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है।यह शरीर श्रेष्ठ स्वंयचालित, कोमल, नाजुक, सुक्ष्म पर अत्यंत शक्तिशाली यंत्रों से सुसज्जित है। हृदय और फेफड़े कभी न रुकनेवाले पंप हैं, आँखें आश्चर्यजनक कैमरा और प्रोजेक्टर हैं, कान अद्भुत ध्वनि व्यवस्था है, पेट आश्चर्यजनक रासायनिक लॅबोरेटरी  है, नाडि़याँ (छमतअमे) मीलों तक फैली सूक्ष्म संचार-व्यवस्था हैं, अनंत क्षमतावाला यह मस्तिष्क अद्भुत कॅम्प्यूटर है। और सबसे बड़ी विशेषता इसमें यह है कि इन सभी यंत्रो के बीच सहयोग के कारण हमारा यह मानव शरीर सौ से भी अधिक वर्षों तक सुचारु रुप से कार्यरत रह सकता है।

हम सौ वर्षों से भी अधिक समय तक सरलता पूर्वक जी सकते हैं। हर किसी अच्छे यंत्र में ऐसी रचना होती है जब भी कोई बड़ा खतरा पैदा होता है, वह अपने आप बंद हो जाता है और दोबारा तभी चालू होता है जब आप उसका बटन दबाते हैं-जैसे रेफ्रिजरेटर और गरम पानी का गीज़र। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसी ही कोई रचना-व्यवस्था हमारे मानव शरीर रुपी यंत्र मे भी हो। यह सच है कि हमारे शरीर की रचना बहुत ही जटिल है, परंतु उसकी देखभाल करना बहुत ही आसान है। प्रकृति ने स्वंय हमारे शरीर में ऐसी व्यवस्था की है, जिसके द्वारा अपने आप सभी यंत्रों की देखभाल सुचारु रुप से होती रहती है। भारत में सैकड़ों वर्ष पूर्व से एक्युप्रेशर थैरेपी प्रचलित थी।

दुर्भाग्य से हम उसे अच्छी तरह संभाल नहीं सके और ‘एक्यूपंक्चर के रुप में वह श्रीलंका जा पहुँची। श्रीलंका से बौद्ध भिक्षु इस चिकित्सा पद्धति को चीन और जापान ले गए। वहाँ इसका व्यापक प्रचार हुआ। आज चीन संपूर्ण विश्व को एक्युपंक्चर पद्धति सिखा रहा है। सोलहवीं शताब्दी में रेड इंडियन्स एक्यूप्रेशर पद्धति द्वारा पैर के तलवे के बिन्दुओं का दबाकर रोग मिटाते थे। एक्युप्रेशर शब्द ‘एक्युपंक्चर’ शब्द से सम्बन्ध है। ‘एक्यु’ आर्थात सूई और ‘पंक्चर’ अर्थात छेद करना। ‘एक्युपंक्चर’ का अर्थ है सूई द्वारा शरीर के किसी भी बिंदु पर छेदकर रोग नष्ट करने या शरीर के किसी अंग को निरोग बनाने की कला। ‘एक्युप्रेशर’ का अर्थ है उँगली, अंगूठे अथवा किसी कुंद साधन से दबाव देकर शरीर को निरोग रखने की पद्धति।

हमारा शरीर पंच महाभूतों अर्थात पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश जैसे पाँच मूल तत्वों से बना है। विद्युत उसका संचालन करती है। एक्युपंक्चर पद्धति में इस विद्युत के दो प्रकार माने गए हैं-पहला पॉज़िटिव  (ची) तथा दूसरा निगेटिव (चेन)। यह विद्युत प्राण-जीवन-बैटरी से उत्पन्न होती है। पंच महाभूतों या पंच तत्वों पर हमारे शरीर की विद्युत का नियंत्रण है। पश्चिमी देशों में भी अब इस विद्युत को जीव-विद्युत (बायो-इलेक्ट्रिसिटी-ठपव. म्समबजतपबपजल) अथवा जीवन-शक्ति (बायो- एनर्जी-ठपव.म्दमतहल) के रुप में स्वीकृति मिली है। यह प्राणशक्ति जीवन-बैटरी हमारे शरीर में गर्भाधारण के समय से ही स्थापित हो जाती है। यह जीवन-बैटरी अपरिवर्तनीय है और इससे चेतनारुपी विद्युत-प्रवाह उत्पन्न होता है।

इस बैटरी से चकाचैंध करने वाला सफेद प्रकाश उत्पन्न होता है। इसे कुछ यौगिक क्रियाओं द्वारा कपाल के मध्य भाग में बंद आँखों द्वारा देखा जा सकता है। इस प्रकाश के दर्शन अनेक लोगों ने और स्वंय इस लेखक ने भी किए हैं। इस बैटरी से उत्पन्न विद्युत-प्रवाह हमारे शरीर में प्रवाहित होता है। इसे हम चेतना कहते हैं। इस विद्युत-प्रवाह की भिन्न-भिन्न रेखाएँ ‘मेरीडिअन्स’ कहलाती हैं। ये दाहिने हाथ की उँगलियों और अंगूठे के सिरे से आरम्भ होकर शरीर के सभी भागों में होकर दाहिने पैर के अंगूठे और उँगलियों के सिरों तक जाती हैं। उसी तरह बाएँ हाथ की उँगलियों और अंगूठे के सिरों से उत्पन्न प्रवाह शरीर के बाएँ हिस्से में घूमकर बाएँ पैर के अंगूठे तथा उँगलियों के सिरों से उत्पन्न प्रवाह शरीर के बाएँ हिस्से में घूमकर बाँए पैर के अंगूठे तथा उँगलियों के सिरों तक जाता है। जब तक चेतना का यह विद्युत-प्रवाह शरीर में ठीक ढंग से घूमता रहता है, शरीर तंदुरुस्त रहता है। अत्यधिक श्रम, छीज आदि कारणों से जब यह विद्युत-प्रवाह शरीर के किसी भी अवयव तक ठीक से नहीं पहुँच पाता, तब वह अवयव सुचारु रुप से काम नहीं करता, इसलिए उस हिस्से में दर्द या रोग होता है। अतः इस प्रवाह को यदि उस अवयव तक पहुँचाया जाए, तो वहाँ होनेवाला दर्द-पीड़ा अथवा रोग (यदि हुआ हो, तो) दूर हो जाता है। इस प्रकार एक्यूप्रेशर एक ऐसी प्राकृतिक चिकित्सा पद्यति है, जो हमारे शरीर की भीतरी रचना द्वारा वाँछित भाग में आवश्यकतानुसार विद्युत-प्रवाह पहुँचाकर हमें रोगों से दूर रखती है। संचालन व्यवस्था एक्युपंक्चर, शीआत्सु या पॉइंटेड प्रेशर थैरेपी के अनुसार हमारे शरीर में विद्यमान विद्युत-प्रवाह की शिराओं पर पूरे शरीर में लगभग 100 बिंदु हैं। इन बिंदुओं पर दबाव डालकर या पंक्चरिंग कर रोग को मिटाया जा सकता है।

सामान्य लोगों के लिए एक्युप्रेशर पद्धति को समझना तथा इस पद्धति द्वारा उपचार करना अत्यंत सरल है। अतः कोई भी व्यक्ति, भले ही वह दस वर्ष का बालक ही क्यों न हो, इस पद्धति का अध्ययन व अभ्यास कर सकता है। हमारे शरीर में विद्युत-प्रवाह का स्विच-बोर्ड हाथ के दोनों पंजों तथा पैर के  दोनों तलवों में स्थित है। भिन्न-भिन्न स्विच कहाँ हैं, इस का अध्यन किया जा सकता है। अधिकतर अवयव और अंतःस्रावी ग्रंथियाँ शरीर के दाएँ व बाएँ भाग में स्थित हैं। अतः उनके स्पर्श-बिन्दु भी दाएँ व बाएँ पंजों एंव पैरों के दोनों तलवों में हैं। हृदय और तिल्ली (प्लीहा) शरीर के बाईं ओर है, इसलिए उनसे संबंधित बिंदु हाथ के बाएँ पंजे या बाएँ पैर के तलवे में हैं। लिवर, पित्ताशय (ळंसस इसंककमत) और आंत्रपुच्छ (।चचमदकपग) शरीर के दांई ओर हैं, अतः उनके बिंदु दाएँ हाथ के पंजे या दाएँ पैर के तलवे में हैं। सूर्य केन्द्र को छोड़कर अन्य सभी अवयवों की प्रकृति से हम परिचित हैं। ये दोनों केन्द्र विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं, अतः यहाँ इनकी विस्तृत जानकारी दी जाती है। सूर्य केन्द्र इसको ‘नाभिचक्र’ भी कहते हैं।

यह छाती के नीचे स्थित सभी अवयवों का संचालन करता है। इस नाभिचक्र का उल्लेख केवल भारतीय आयुर्वेद में ही मिलता है, अन्य किसी थैरेपी में नहीं। अतः इससे यह सिद्ध होता है कि इस थैरेपी की उत्पत्ति भारत में ही हुई थी। डायाफ्राम (पेट के परदे) के नीचे स्थित कोई भी अवयव यदि ठीक से काम न करे तो इस बिन्दु पर दबाव देना होता है।
नाभिचक्र परखने की पद्धति है:- सुबह खाली पेट सीधे लेट कर यदि नाभि पर उँगली या अंगूठे से दबाया जाए, तो वहाँ हृदय की धड़कन महसूस होगी। ऐसी धड़कन महसूस करने पर समझ लें कि यह चक्र सही हालत में है। यदि नाभिचक्र ठीक ढंग से काम कर रहा हो, तो नाभि से दाएँ स्तनाग्र और बाएँ स्तनाग्र के बीच का अंतर समान होता है। किंतु यदि यह नाभिचक्र ऊपर या नीचे की ओर सरका हुआ हो, तो उपर्युक्त अंतर नापने से मालूम होता है कि यह चक्र ऊपर चढ़ा हुआ है या नीचे उतरा हुआ है। अत्यधिक बोझ उठाने, पाचनशक्ति मंद पड़ने या गैस के दबाव से नाभिचक्र ऊपर या नीचे सरक जाता है। ऐसी हालत में धड़कन नाभि में नहीं, उसके आसपास मालूम होगी। अत्यधिक वजन उठाने अथवा अत्यधिक गैस उत्पन्न होने पर नाभिचक्र ऊपर या नीचे सरकता है। नाभिचक्र के ऊपर की ओर सरकने पर कब्जियत होती है और नीचे सरकने पर वायु के दबाव के कारण दस्तें लगती हैं। जब दवाओं से भी यह तकलीफ दूर नहीं हो तो एक्यूप्रेशर पद्धति की सहायता अवश्य लेनी चाहिए।
पाचन-क्रिया अक्सर खराब हो जाती है! यदि यह शिकायत दीर्घ काल तक चलती है तो, और कभी-कभी ऑपरेशन भी कराना पड़ता है। इसमें दवाओं से भी लाभ नहीं होता। ऐसी स्थिति में यह संभावना अधिक रहती है कि नाभिचक्र ऊपर की ओर सरका हुआ हो। इसलिए कोई भी उपचार शुरु करने से पहले इस बात की जाँच कर लें कि नाभिचक्र ठीक अपनी जगह पर है या नहीं? नाभिचक्र घड़ी के मुख्य स्प्रिंग जैसा होता है। यदि उसे अपने स्थान पर न लाया जाए, तो किसी भी उपचार से अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सकता। निम्नलिखित पद्धतियों में से किसी भी एक पद्धति द्वारा नाभिचक्र को केंद्र-अपने मूल स्थान-में लाया जा सकता है। ये सभी प्रयोग प्रातः खाली पेट या भोजन के 3, 4 घंटे बाद किए जा सकते हैं।

  1. अंगूठे से नाभि के इर्द-गिर्द दबाव देकर नाभिचक्र को केन्द्र की ओर ठेलना।
  2. नाभि पर वज़न रखकर नाभिचक्र को केन्द्र की ओर सरकाना।
  3. सीधे लेट जाइए। दोनों हाथ शरीर से सटाकर रखिए। किसी से अपने दोनों घुटनों पर दबाव देने के लिए कहिए। जो अंगूठा निचली सतह पर हो, उस पैर के घुटने पर भी अधिक दबाव दीजिए। यदि आवश्वकता हो, तो दूसरा व्यक्ति एक हाथ में दोनों पैरों के अंगूठे पकडे़ रखें और जो अंगूठा नीचे हो उसे ऊपर खींचने का प्रयास करें। इस पर भी यदि दोनों अंगूठे एक लाइन में न आ पाएँ, तो यही क्रिया दोबारा कीजिए।
  4. सीधे लेट जाइए। दोनों हाथ शरीर से सटाकर रखिए। सिर के नीचे तकिया न रखें, सिर को जमीन पर टिकाइए। दोनों पैर ऊपर उठाइए और उन्हें जमीन से 10 अंश के कोण पर रखिए। फिर सिर को बिना जमीन से उठाए दोनों पैरों को सीधे रखते हुए धीमे-धीमे जमीन पर लाइए। इस प्रकार पाँच-छह बार कीजिए। इसके बाद इसकी जाँच कीजिए कि नाभि में धड़कन महसूस होती है या नहीं?
  5. जमीन पर सीधे लेट जाइए। साँस बाहर छोडि़ए। अब पुनः साँस लेने के र्पूव पेट को फुलाइए और इस स्थिति में यथासंभव अधिक समय तक रखिए। नाभिचक्र के अपने स्थान पर आने तक यह क्रिया बार-बार दोहराते रहिए।
  6. बाएँ हाथ की कोहनी के जोड़ में हाथ की हथेली जमाइए और झटके से अंगूठे द्वारा बाएँ कन्धे का स्पर्श कीजिए। जब तक ये अंगूठा बाएँ कंधे का स्पर्श न करे, तब तक यह प्रयत्न जारी रखिए। इसी प्रकार यह क्रिया दाएँ हाथ से कीजिए और साथ वाली आकृति से परीक्षण कीजिए।

जब भी कब्जियत अथवा दस्त की तकलीफ हो, तो सर्वप्रथम इस बात की जाँच कीजिए कि नाभिचक्र सही हालत में है या नहीं। ठीक हालत में न होने पर उसे ठीक कीजिए। एक रोगी को हाएटस हर्निया (भ्मपजने भ्मतदपं) था। डॉक्टर ने उसे ऑपरेशन करवाने की सलाह दी थी। उसका नाभिचक्र ठीक कर दिया गया। केवल दो दिन में ही उसकी तकलीफ दूर हो गई। एक स्त्री-रोग विशेषज्ञ महिला डॉक्टर को कई वर्षों से पेडू में दर्द होता था। उनका नाभिचक्र सही हालत में ला देने के पश्चात् वे एकदम ठीक हो गई। एक किशोरी के पेट में ऐसा दर्द था कि वह जो भी खाती-पीती, तुरन्त ही उल्टी होकर बाहर निकल जाता। वह बंबई के एक मशहूर अस्पताल में 21 दिनों तक रही, फिर भी रोग कोई भी निदान नहीं हो सका।

उसकी शिकायत पूर्वत जारी रही। पेट में ऐसी पीड़ा होती थी कि वह पलंग पर तड़पने लगती थी। जाँच करने पर पता चला कि उसका नाभिचक्र अपने स्थान पर सही हालत में नहीं है। उसका नाभिचक्र ठीक कर दिया गया और उसकी उल्टी बंद हो गई। उसे एक सप्ताह तक हरे रस और फल के रस पर रखा गया। उसकी सारी पीड़ा दूर हो गई। एक रोगी को लंबे अरसे से खूनी अर्श की तकलीफ थी। उसे ऑपरेशन करवाने की सलाह दी गई। ऑपरेशन के केवल तीन दिन पूर्व उसने एक्यूप्रेशर-विशेषज्ञ की सलाह ली। उसकी नाभिचक्र ठीक कर दी गई। फलतः इतनी तेजी से सुधार हुआ कि ऑपरेशन कराने की जरुरत ही नहीं रही।“ संभव हो तो ‘स्वास्थ्य-पेय’ या ताँबा, चाँदी और सुवर्ण-सेवित पानी पिएँ। जाली (मइ):बड़ी जाली अंगूठे व पहली उँगली के बीच में तथा छोटी जालियाँ उगँलियों के बीच में स्थिति हैं। यहाँ से ज्ञानतंतु (छमतअमे) रीढ़ के द्वारा हमारे शरीर में फैलते हैं। अतः ज्ञानतंतु (छमतअमे) संबंधी किसी भी गड़बड़ी मे इन जलियों पर एक्यूप्रेशर चिकित्सक द्वारा उपचार होना चाहिए। एक्युप्रेशर थैरेपी के अनुसार हाथ के पजों या पैर के तलवों के बिंदुओं व उनके आसपास दबाव देना पड़ता है। ऐसा करने से बिन्दु से संलग्न अवयव की ओर विद्युत-प्रवाह होने लगता है।

अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ:- ये शरीर के सभी अवयवों का संचालन करती हैं। उनके बिन्दुओं पर ज्यादा दबाव देना आवश्यक है। ऐसा करने से संबद्ध अंतःस्रावी ग्रंथि ठीक से काम करने लगती है। यदि कोई ग्रंथि कम सक्रिय हो, तो दबाव देने पर उसकी सक्रियता बढ़ती है और वह सुचारु रुप से काम करती है और यदि कोई अंतःस्रावी ग्रंथि अपेक्षाकृत अधिक काम करती हो, तो दबाव देने पर उसकी सक्रियता कम होती है-वह नियंत्रित होती है और मात्रानुसार कार्य करने लगती है। इस प्रकार केवल दबाव देकर अंतःस्रावी ग्रंथियों का नियमन हो सकता है। अंगूठे, पहली उँगली, कुंद पेन्सिल या लकड़ी की चूसनी (भ्ंदक डेंहमत) से बिन्दुओं पर दबाव दिया जा सकता है। किसी भी बिन्दु पर 4-5 सेकंड तक दबाव देना चाहिए। फिर 1-2 सेंकड के लिए दबाव हटा लें और पुनः दबाव दें। इसी प्रकार 1-2 मिनट पंपिंग पद्धति से दबाव दें अथवा भारपूर्वक मसाज करें। दबाव की मात्राः-जब हम किसी भी बिन्दु पर दबाव देते हैं, तब वहाँ हमें दबाव या भार का अनुभव होना चाहिए। ज्यादा दबाव जरुरी नहीं है। यदि नरम हाथ हों, तो कम दबाव देने पर भी दबाव का अनुभव होगा। अंतःस्रावी ग्रंथियों के बिन्दुओं को छोड़कर प्रत्येक बिंदु पर तिरछे से भार देने से पर्याप्त दबाव आएगा। यह छाती के नीचे स्थित सभी अवयवों का संचालन करता है।
इस नाभिचक्र का उल्लेख केवल भारतीय आयुर्वेद में ही मिलता है, अन्य किसी थैरेपी में नहीं। अतः इससे यह सिद्ध होता है कि इस एक्यूपे्रशर थैरेपी की उत्पत्ति भारत में ही हुई थी। डायाफ्राम (पेट के परदे) के नीचे स्थित कोई भी अवयव यदि ठीक से काम न करे तो नाभिचक्र की परिक्षा करवानी चाहिए।

नाभिचक्र परखने की पद्धति है:- सुबह खाली पेट सीधे लेट कर यदि नाभि पर उँगली या अंगूठे से दबाया जाए, तो वहाँ हृदय की धड़कन महसूस होगी। ऐसी धड़कन महसूस करने पर समझ लें कि यह चक्र सही हालत में है। यदि नाभिचक्र ठीक ढंग से काम कर रहा हो, तो नाभि से दाएँ स्तनाग्र और बाएँ स्तनाग्र के बीच का अंतर समान होता है। किंतु यदि यह नाभिचक्र ऊपर या नीचे की ओर सरका हुआ हो, तो उपर्युक्त अंतर नापने से मालूम होता है कि यह चक्र ऊपर चढ़ा हुआ है या नीचे उतरा हुआ है। अत्यधिक बोझ उठाने, पाचनशक्ति मंद पड़ने या गैस के दबाव से नाभिचक्र ऊपर या नीचे सरक जाता है। ऐसी हालत में धड़कन नाभि में नहीं, उसके आसपास मालूम होगी। अत्यधिक वजन उठाने अथवा अत्यधिक गैस उत्पन्न होने पर नाभिचक्र ऊपर या नीचे सरकता है। नाभिचक्र के ऊपर की ओर सरकने पर कब्जियत होती है और नीचे सरकने पर वायु के दबाव के कारण दस्तें लगती हैं। जब दवाओं से भी यह तकलीफ दूर नहीं हो तो एक्यूप्रेशर पद्धति की सहायता अवश्य लेनी चाहिए।
नोट- नाभीचक्र की परिक्षा और उपचार किसी अनुभवी वैद्य अथवा एक्यूप्रेशरिस्ट से करवानी चाहिए।

चमत्कारी पौधा अशोक

चमत्कारी पौधा अशोक शोक वृक्ष के नाम से हम सभी परिचित हैं। यह वही वृक्ष है जिसकी छाया तले लंका में माता सीताजी को रखा गया था। यह एक सुंदर सुखद, छाया प्रधान वृक्ष है। इसके पत्ते 8 से 10 इंच लम्बे तथा 2 से 3 इंच चैडे होते हैं। प्रारम्भ में इन पत्तों का रंग ताम्रवर्ण का होता है- इसीलिए इसे ‘‘ताम्र पल्लव’’ भी कहा जाता है। इसके पुश्प गुच्छों में लगते हैं। तथा पुश्प काल में पहले ये नारंगी तदुपरांत लाल रंग के हो जाते हैं। इसलिए अशोक का एक नाम ‘‘हेम्पुश्प’’ भी है। अशोक के पुश्प वसंत ऋतु में खिलते हैं। पुश्पित होने पर ये मन को आनंदित करने वाले होते हैं।

औशधीय  चमत्कार- अपनी सघन सुखदायिनी छाया के द्वारा इस वृक्ष ने जिस प्रकार माँ सीता के दुख को कम किया था। ठीक उसी प्रकार इस वृक्ष के अनेक औशधीय प्रयोग भी हैं। जो कि स्त्रियों में होने वाली व्याधियों को हरने में सक्षम है। वास्तव में इसकी छाल में ‘‘टेनिन’’ तथा ‘‘कैटेचिन’’ नामक रसायन पर्याप्त मात्रा में होते हैं। ये रसायन ही औशधीय  महत्व के हैं। इसलिए औशधी के रूप में इसकी छाल का ही अधिक उपयोग किया जाता है। अशोक से निर्मित अशोकारिष्ट नामक एक आयुर्वेदिक औशधी के गुणों से हम सभी भली-भाँति परिचित हैं।
अश्मरी (पथरी) रोग में- अशोक के बीजों के 2 ग्राम चूर्ण को जल के साथ नित्य कुछ समय तक सेवन करने से अश्मरी रोग का शमन होता है।
गर्भपात रोकने के लिए- प्रायः अनेक महिलाओं को गर्भाशय की निबर्लता के कारण गर्भपात होता है अथवा कभी-कभी महिलाओं को अधिक रक्तस्राव होने लगता है। शास्त्रों में इसके लिए ‘‘अशोक-घृत’’ लेने की सलाह दी गयी है अथवा ऐसे मामले में अशोक की छाल का चूर्ण थोड़ी-सी मात्रा में गाय के दूध के साथ लेने से लाभ हाता है। इस के लिए एक मात्रा 2 से 4 ग्राम की होती है और इसे लगभग एक सप्ताह लेना होता है।
मासिक धर्म की गड़बड़ी- जिन महिलाओं को मासिक धर्म अधिक होता हो अथवा अनियमित होता हो उनके लिए भी अशोक की छाल का व्यवहार करना हितकर है। इसके लिए रोगी महिला को लगभग 2 तोला मात्रा अशोक की छाल लेकर उसे दूध में उबालें जब दूध पर्याप्त गाढ़ा हो जाए तब छाल को अलग कर उस दूध में भरपूर अथवा आवश्यक मात्रा में खांड मिलाकर सेवन करना चाहिए। लिए जाने वाले दूध की मात्रा 250 मिली लीटर हो। इसका सेवन 3 दिन तक करना चाहिए।

रक्त प्रदर में रक्त प्रदर और अधिक मासिक स्राव की स्थिति में अशोक की छाल और सफेद जीरे का आसव भी बहुत लाभकारी है। इसे बनाने के लिए छाल और सफेद जीरे की 2-2 तोला मात्रा लेकर उन्हें आधा सेर जल में उबालते हैं। जब लगभग चैथाई पानी रह जाय तब उतार कर इसे छान लें और इसमें खांड मिलाकर सुबह-सुबह सेवन करें इससे रक्त प्रदर और अधिक मासिक स्राव के विकार दूर होते हैं। यह आसव एक बार में लगभग 2 तोला सेवन किया जा सकता है तथा दिन में 3 या 4 बार सेवन करें।

श्वेत प्रदर में– श्वेत प्रदर से पीडित महिलाओं को अशोक की छाल का दुग्ध कषाय लेना चाहिए। इस कषाय को बनाने के लिए लगभग 250 मि0 ली0 दूध और 100 ग्राम अशोक छाल मिला कर इस मिश्रण को इतना गरम करें कि सम्पूर्ण जलीय अंश उड़ जाए, इसके पश्चात् प्राप्त दूध की लगभग 2 या 3 तोला मात्रा दिन में दो बार लें। यह प्रयोग मासिक स्राव के चैथे दिन के पश्चात् से प्रारंभ करें। इस प्रकार यह महिलाओं के लिए एक अमोघ औशधी है।
अशोक के तांत्रिक चमत्कार- तंत्रशास्त्रों में अशोक के अनेक प्रयोग वर्णित हैं-
1. जिस घर में उत्तर की ओर अशोक का वृक्ष लगा हो उस घर में बिनबुलाए शोक नहीं आते।
2. सोमवार के दिन शुभ मुहूर्त में अशोक के पत्तों को घर में रखने से घर में शांति व श्री वृद्धि होती है।
3. अशोक वृक्ष का बाँदा चित्रा नक्षत्र में लाकर रखने से ऐश्वर्य वृद्धि होती है।
4. उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में निकाला गया अशोक का बाँदा अदृश्यीकरण हेतु प्रयुक्त होता है।
5. अशोक के वृक्ष के नीचे स्नान करने वाले व्यक्ति की ग्रहजनित बाधाएँ दूर होती हैं।
6. मंदबुद्धी/स्मृति लोप वाले जातक या जिनकी पत्रिका में बुध नीच का बैठा हो उनके लिये अशोक वृक्ष के नीचे स्नान करना कष्ट निवारक होता है।
7. इस वृक्ष को घर के उत्तर दिशा में रोपित करने से वास्तुदोश का निवारण होता है।
8. अशोक का वृक्ष घर में होने से घर में लगे अन्य अशुभ वृक्षों का दोश शांत हो जाता है।