गंगाजल से स्नान का महत्व

गंगाजल से स्नान का महत्व दातुन करने के बाद स्नान- ध्यान का विधान है। किंतु स्नान के अंगभूत दो कार्य और हैं-
1. तैलाभ्यंग या तैल-मर्दन।
2. व्यायाम। तैलाभ्यङ्ग त्वागिन्द्रिय को स्निग्ध बनाता है, शरीर में स्फूर्ति लाता है और शरीर पर पानी का बुरा असर नहीं होने देता। स्पर्श ने चाधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम्। त्वचश्च परमोऽभ्यङ्गस्तस्मात्तं शीलयेन्नरः।। (चरक)
अर्थात्-‘शरीर को स्वस्थ रखने के लिये अधिक वायु की आवश्यकता है। वायु का ग्रहण त्वचा के आश्रित है, त्वचा के लिये अभ्यङ्ग (तेलमालिश) परमोपकारी है, इसलिये मालिश करनी चाहिये।’
आयुर्वेदिक ग्रन्थों में तेलमालिश के बहुत गुण बताये गये हैं, जिनमें मुख्य ये हैं- बुढ़ापा, थकावट एवं वायुविकार का नाश करने के लिये तैलमालिश सिर, कान तथा पैरों में विशेष रूप में करनी चाहिये। इससे शरीर मजबूत, सुन्दर चमड़े वाला होता है। वायु-विकार शान्त होते हैं। नित्य तैल- मालिश कराने वाला व्यक्ति क्लेश और श्रम को सहने योग्य हो जाता है। इससे मनुश्य कोमल स्पर्श और पुष्ट अंगवाला तथा प्रियदर्शन होता है। उसको बुढ़ापे के लक्षण कम होते हैं। सिर में प्रतिदिन तेल लगाने से शिरःशूल नहीं होता, बाल न तो झड़ते हैं और न गिरते ही हैं। शिरोऽस्थियों का बल बढ़ता है। बाल मजबूत जड़ वाले, लम्बे और काले होते हैं। सिर पर तेल लगाने से इन्द्रियाँ प्रसन्न (स्वच्छ) होती हैं और मुख का सौन्दर्य बढ़ जाता है। तेल लगा कर सोने से सुख की नींद आती है। इसी प्रकार कान को तेल से तर रखने से चरक के मतानुसार वातजन्य कान के रोग, मन्यास्तम्भ, हनुग्रह, ऊँचे सुनना और बहरापन नहीं होता है।
पैरों में तेल मालिश करने से पैरों की कठिनता, सूखापन, रूक्षता, थकावट और सुस्ती (त्वचा में स्पर्श ज्ञान न होना) इत्यादि-ये सब शीघ्र शान्त हो जाते हैं। पैरों में सुकुमारता, बल और स्थिरता उत्पन्न होती है। दृष्टि स्वच्छ होती है और वायु शान्त होती है। किंतु तेल मालिश कुछ अवस्थाओं में वर्जित भी है। नये ज्वर में, अजीर्ण होने पर, विरेचन-वमन और निरूहण किये हुए मनुश्य को मालिश नहीं करनी चाहिये। इससे विविध हानियाँ होती हैं। शास्त्रों में सोमवार और शनिवार को तेल-मर्दन उत्तम और अन्य दिनों में निषिद्ध किया गया है; परंतु उन दिनों में तेल लगाने के लिये शास्त्रों ने इस उपाय से दोश-परिमार्जन बताया है- रवौ पुष्पं गुरो दूर्वा भौमवारे च मृत्तिका। गोमयं शुक्रवारे च तैलाभ्यङ्गे न दोशभाक्।।
अर्थात्-‘रविवार को पुश्प, गुरूवार को दूर्वा, मंगलवार को मिट्टी और शुक्रवार को गोबर मिलाकर तेलमर्दन करने से दोश नहीं होता।’ ब्रह्मचारियों को तेल लगाना वर्जित है। ज्योतिषसार के अनुसार गृहस्थ को षष्टी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा को भी तेल नहीं लगाना चाहिये; किंतु सरसों का तेल, सुगन्ध युक्त तेल, फूलों से वासित तेल और अन्य द्रव्यों से युक्त तेल दोशयुक्त नहीं माने जाते, अतः इन्हें सब दिन लगा सकते हैं।
शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी। वेहव्यायामसंख्याता मात्रया तां समाचरेत्।।

‘शरीर की जो चेष्टा देह को स्थिर करने एवं उसका बल बढ़ाने वाली हो उसे व्यायाम कहते हैं। उसे प्रतिदिन उचित मात्रा में करना चाहिये।’ (चरक) व्यायाम से कुछ ये लाभ हैं-शरीर की पुष्टि, कान्ति, शरीर के दीप्ताग्नि, आलस्य-हीनता (स्फूर्ति), स्थिरता, हल्कापन, शुद्धि, थकावट-सुस्ती, प्यास, गर्मी एवं ठंड आदि सहने की शक्ति और श्रेष्ठ आरोग्य प्राप्त होता है।
मोटापा को कम करने वाला कोई उपाय इस के समान दूसरा नहीं है। शत्रु का भय नहीं होता, बुढ़ापा सहसा आक्रमण नहीं करता। व्यायाम मर्दित और उद्वर्तित शरीर वाले के पास व्याधियाँ नहीं फटकने पातीं। व्यायाम से वय, रूप और गुण हीन मनुश्य भी देखने में सुन्दर लगता है। व्यायाम से विरूद्ध, कच्चा जला हुआ भोजन भी भली भाँति पच जाता है। व्यायाम एक नैत्यिक अनुष्ठेय कत्र्तव्य है।
नित्य स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान् लोगों को व्यायाम सर्वदा हितकर है। शीत एवं वसन्तकाल में तो वह विशेष लाभप्रद होता ही है, किंतु कामी मनुश्य को सभी ऋतुओं में प्रत्येक दिन अपने बल की आधी शक्ति से व्यायाम करना चाहिये। परन्तु अधिक मात्रा में व्यायाम घातक होता है। उससे क्षय, अधिक प्यास, अरूचि, वमन, रक्त-पित्त, चक्कर, सुस्ती, खाँसी, शोष, ज्वर और श्वास-कष्ट-जैसे रोग होते हैं। कुछ व्यक्तियों के लिये व्यायाम हितकर नहीं होता। रक्त-पित्त के रोगी, कृश, शोष, श्वास-कष्ट, खाँसी और उरः क्षत से पीडि़त, तुरंत भेजन किया हुआ, स्त्री-प्रसंग से क्षीण तथा चक्कर से पीडि़त मनुश्य व्यायाम न करे।
टहलना देह को अधिक पीडि़त करने वाला नहीं होता; वह आयु, बल, मेषा (धारण शक्ति) और अग्नि को बढ़ाने वाला एवं इन्द्रियों को जागृत (चैतन्य) करने वाला होता है। (अधिक रास्ता चलना इसके विपरीत होता है, वह बुढ़ापा एवं दुर्बलता करने वाला होता है।) आयुर्वेद में टहलने को ‘चङ्क्रमण’ कहते हैं। इसे आधुनिक चिकित्सक भी अत्यावश्यक बताते हैं। अतः वृद्धादि को अवश्य टहलना (घूमना) चाहिये।

मनुश्य के शरीर में 9 छिद्र होते हैं। वे रात में शयन करने से अपवित्र हो जाते हैं। अतः प्रातः स्नान अवश्य करे। तीर्थ में स्नान करना हो तो शौच वाला कपड़ा बदल देना चाहिये। स्नानादि के बाद ही तीर्थ-स्नान करना चाहिये; क्योंकि वह प्रशस्त तथा पुण्यजनक भी होता है। यदि गंगा में स्नान करे तो निम्नाकिंत मन्त्र से गंगाजी की प्रार्थना करे-
विष्णुपादाब्जसम्भूते गङ्गे त्रिपथगामिनि।
धर्मद्रवीति विख्याते पापं मे हर जाह्नवि।।
गङ्ग गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।
मुन्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।।
पुराण
‘स्नान’ शब्द का अर्थ ही शुचिता है। स्नान से शरीर और मन पवित्र होते हैं। हमारे शरीर में जो पसीना होता है, उसका जलीय अंश तो भाप बनकर उड़ जाता है और पार्थिव अंश मैल बनकर जम जाता है। यदि नित्य स्नान करके उसे धोया न जाये तो शरीर में मैल की एक तह जम जायगी, जिससे रोमकूप के छिद्र बंद हो जायेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि भीतर का मल तथा दुशित वायु बाहर नहीं पायेगी, जिससे शरीर में दुर्गन्ध और अनेक रोगों की उत्पत्ति हो जायेगी।
स्नान ऐसी विधि से करना चाहिये, जिससे मैल अच्छी तरह छूट जाये। इसके लिये 2-4 चार लोटा जल्दी से पानी डाल लेना पर्याप्त नहीं, किंतु पर्याप्त जल लेकर शरीर को खूब रगड़ कर पानी से धोना चाहिये। यह कार्य अधिक जल वाले तालाब तथा बावड़ी में और सबसे अच्छा बहते हुए जल वाली नदियों में होता है; क्योंकि नदी में हमारे शरीर से निकलता हुआ मैल बहता जाता है और उसकी जगह नया स्वच्छ जल आता जाता है। इसीलिये धर्म शास्त्रों में गृह की अपेक्षा तालाब, तालाब की अपेक्षा नदी और नदी की अपेक्षा गंगादि पवित्र जल वाली नदियों में स्नान को उत्तम माना है।
शास्त्रों में गंगादि नदियों की पवित्रता का जो वर्णन है वह अंधविश्वास मात्र नहीं है। युग में भी गंगा के जल की पवित्रता को अपने अनेकों वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा परीक्षित भौतिक वैज्ञानिकों ने भी मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है। वैज्ञानिकों ने अति स्वच्छ गंगोत्री के जल का तथा अनेकों नदी-नाले, गंद मल-मूत्र के नाले। अति अस्वच्छ वाराणसी, कलकत्ते के गंगा जल का भी परीक्षण करके बताया है कि गंगा जल में रोग के कीटाणुओं को डालने पर वे दूसरे जलों की तरह वृद्धि को प्राप्त नहीं होते, प्रत्युत बहुत शीघ्र मर जाते हैं।
वर्षों रखा रहने पर भी गंगा जल में कीड़े नहीं पड़ते। इसीलिये श्रद्धापूर्वक उसे लाकर घर में रखते हैं और पूजा आदि कार्यो में तथा मृत्यु काल में मरते हुए प्राणी के मुख में डालते हैं। गंगा जल में कीड़े न पड़ने का गुण केवल गंगाजलत्व के कारण ही नहीं है, किंतु गंगाजी के पवित्र क्षेत्र का भी प्रभाव उसमें कारण होता है क्योंकि गंगाजी से निकली नहरों के विशुद्ध जल में तो कीड़े पड़ जाते हैं, परंतु गंगा क्षेत्र में बहती गंगाजी के अशुद्ध जल में कभी नहीं पड़ते!
दूसरी नदियों के जल की भाँति गंगा जल वर्षा-ऋतु में दुशित नहीं होता। प्रवाह में से निकाला हुआ गंगा जल बासी, ठंडा, गरम या अस्र्पशीय आदि से छू जाने पर भी दुशित नहीं होता। गंगाजी में रात्रि में भी स्नान करने से दोश नहीं होता। घर में लाकर गंगा जल से स्नान करने पर भी अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। यह महात्म्य सर्वत्र शास्त्रों में निर्दिष्ट है। सर्व प्रथम सिर में जल डालना चाहिये; इससे सिर आदि की गर्मी पैरों से जाती है। इसके विपरीत पैरों में प्रथम जल डालने से पैर आदि अंगो की गर्मी मस्तिष्क (सिर) में पहुँच कर हानि पहुँचाती है। यही कारण है कि गंगा आदि जलाशयों पर पहुँचकर प्रथम सिर में जल धारण करके प्रणाम करने का शास्त्रों में विधान किया है। ऐसा करने से भौतिक विज्ञानानुसार उक्त लाभ तो होता ही है, किंतु असधिदैविक विज्ञानानुसार वरूण देवता तथा गंगा आदि देवियों का आदर भी हो जाता है। नदियों में जिधर से प्रवाह आ रहा हो उधर मुख करके स्नान करके स्नान करना चाहिये तथा बावड़ी, तालाब आदि में सूर्य की ओर मुख करके स्नान करना चाहिये। स्नान करते समय जल का स्पर्श पाते ही वाणी प्रफुल्लित हो जाती है, उसका सदुपयोग भगवान नाम का कीर्तन, स्तोत्रपाठ आदि द्वारा करना चाहिये। मनोविज्ञानानुसार गंगादि पवित्र तीर्थों के साथ मानसिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिये और आधिदैव विज्ञानानुसार साधारण जल को भी पवित्र जल बनाने के लिये निम्न श्लोक बोलना चाहिये-
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू।।
बीमारी में भोजन करने के बाद, अजीर्ण में 10 बजे से 3 बजे तक रात्रि में स्नान करने से शारीरिक हानि होती है। बहुत वस्त्रों को पहने हुए स्नान करने से शरीर मर्दन में बाधा होती है। अलंकार-आभूषण धारण करके स्नान करने से आभूषणों की क्षति होती है। नग्न होकर नहाना निर्लज्जता का द्योतक तो होता ही है, जल देवता का निरादर भी होता है। इन सब कारणों से शास्त्रों में उक्त प्रकार से स्नान करने का निषेध किया है।
नातुरो न भुक्त्वा नाजीर्णे न बहुवाससा न नग्नो नाश्नन् नालङ्कृतो न सस्त्रजो न निशायाम्।।
लघुहारीत

नीम का महत्व

नीम का महत्व इसे संस्कृत में निम्ब, नेतर नियमन, अरिष्ट, सर्वतोभद्रक, पतिसार, रविप्रिय आदि, हिन्दी में नीम, बंगला में नीमगाछ, गुजराती में लिमडी, मराठी में कडुनिम्ब, तमिल में बेबू, तेलुगु में वेषु, अंगे्रजी में इंडियन लिलाक, लैटिन में मेलिया अझाडीरेक ;डमसपं कहते हैं। यह वनस्पति जगत के मेलिएसी ;डमसपंबमंमद्ध कुल का सदस्य है।
नीम का वृक्ष संपूर्ण भारत में सर्वत्र उपलब्ध एवं जाना-माना वृक्ष है। अपनी स्वच्छ वायु एवं गुणों के कारण प्राचीन काल से इसका सम्मान होता आया है। आयुर्वेदानुसार नीम को शीतल, कलका, कड़वा, ग्राही, व्रणशोधक, कृमि वमन, व्रण, कफ, शोध, पित्त, विष, वात, कुष्ठ, श्रम, हृदय की जलन, खाँसी, तृषा, ज्वर, अरूचि, प्रमेह तथा रूधिर विकार को नष्ट करने वाला बताया गया है।
नीम के पत्ते– नेत्रों को हितकारी, चखने में कड़वे, पित्त, कृमि अरूचि, विष विकार और कृष्ट को नष्ट करते हैं। नीम के कोमल पत्ते वातकारक, संकोचक, रक्त-पित्त, नेत्र रोग व कुष्ट रोग को दूर करते हैं।
नीम के फूल– पित्तनाशक, कड़वे तथा कृमि और कफ को नष्ट करने वाले हैं।
कच्ची निबोरी– रस में कड़वी, स्निग्ध हल्की, गरम कोढ़, बवासीर, कृमि और प्रमेह को दूर करने वाली है।
नीम के डंठल- श्वास, खाँसी, बवासीर, कृमि और प्रमेह को नष्ट करते हैं।
निम्बोली की मगज- कृमि और कुष्ठ को दूर करता है।
नीम का तेल- नीम के बीजों का तेल कड़वा होता है, यह कृमि रोग तथा कुष्ठ को दूर करता है।
नीम का पंचांग– खुजली, वृण, कृष्ठ, पित्त तथा रुधिर विकार में लाभदायक और गुणकारी हाता है।
आयुर्वेदिक चमत्कार-
(1) दाद दूर करने में– दाद में नीम के पत्तों को दही में पीसकर लेप करने से दाद अच्छा होता है।
(2) फोड़े पर– घाव में बहने वाले फोड़े पर नीम की छाल की भस्म लगाने से लाभ होता है।
(3) दमा हेतु– दमा में नीम के बीज का तेल 30-40 बूँद तक पान में डालकर खाने से दमा में लाभ होता है।
(4) बवासीर में– बवासीर में नीम की निबोरी और एलीवे को मिलाकर 6 माशा खायें, कुछ ही दिनों में बवासीर के मस्से सूख जायेंगे।
(5) जोड़ों के दर्द में– जोड़ों के दर्द में नीम के अन्तरछाल को पानी भर चन्दन की भाँति घिस कर दर्द वाले स्थान पर गाढ़ा लेप करें, सूखने पर उतार दें, ऐसा 4-5 बार करें, दर्द से लाभ होगा।
(6) पेट में कीड़े पड़ने पर– पेट में कृमी होने पर सब्जी के साथ नीम पत्तियाँ का छोंक लगाकर खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं अथवा नीम की कोपल नित्य चबाकर सेवन करने से शरीर में रक्त के दोश दूर होते हैं।
(7) दाँतो के स्वास्थ्य हेतु– नित्य नीम का दातुन करना लाभदायक है।
(8) लकवे में– पक्षाघात वाले अंगों पर नीम के बीज का तेल मलने से लाभ होता है।
(9) बिच्छू काटने पर– बर्र और बिच्छू के काटने पर जिस स्थान पर बर्र या बिच्छू ने काटा हो, वहाँ नीम की पत्तियों को मसल कर मलने से लाभ होता है।
(10) संतति नियंत्रण में– संतति निरोध के लिए सहवास से पूर्व नीम के तेल में रूई का फोहा भिगोकर योनि में कुछ देर रखने से सहवास के समय योनि में प्रवेश करने वाले शुक्राणु मर जाते हैं, जिससे गर्भ ठहर नहीं पाता। फोहा भिगोने हेतु 2 बूँद तेल पर्याप्त है तथा इस प्रयोग को 4-6 दिन के लिए गर्भाधान काल में ही करें। नित्य करें।
(11) अश्मरी हेतु– नीम की पत्तियों की राख जल के साथ दो माशे की मात्रा में नियमित लेते रहने से पथरी होने पर वह धीरे-धीरे टूट-टूट कर पथरी पूरी की पूरी निकल जाती है तथा मरीज को लाभ मिल जाता है।
(12) संसर्ग पीड़ा हेतु– नीम के पत्तों को गर्म करके स्त्री यदि नाभि के नीचे बाँधे तो पुरूष संसर्ग के समय होने वाला दर्द या मासिक धर्म के समय होने वाला दर्द में फायदा होता है।
(13) रक्त शोधन में– नित्य नीम की पत्ती पीसकर पीना हितकर है।
नीम का ज्योतिष में महत्व-
नीम का ज्योतिष शास्त्र में एक महत्व विशेष कहा गया है। तद्नुसार घर में नीम की पत्ती, सर्प की केचुली, मोरपंख की चंद्रिका, शुद्ध घी, बिनौले, बकरी के बाल तथा शिवजी पर चढ़े हुए पुष्पों की धूनी देने से बालारिष्ट का नाश होता है।
नीम का तांत्रिक महत्व-
(1) जो व्यक्ति मेष राशि के सूर्य में एक मसूर तथा दो नीम की पत्तीयों को खाता है उसे एक वर्ष तक सर्प का भय नहीं रहता है।
(2) किसी भी व्यक्ति के दाढ़ में दर्द होने पर निम्न यंत्र को एक कोरे कागज पर पेन्सिल से बनायें तथा अमुक के स्थान पर व्यक्ति का नाम लिखकर नीम के झाड़ में लोहे के कील से ठोंक दें। ऐसा करने से दाढ़ दर्द में लाभ होता है।
(3) स्वाति नक्षत्र में निकाले गयें नीम के बांदे का प्राचीन काल मे अदृष्य होने के लिए उपयोग किया जाता है।
नीम का वास्तु में महत्व-
घर के वायव्य कोण में नीम के वृक्ष का होना अति शुभ है। इसी प्रकार जो व्यक्ति सात नीम के वृक्षों का रोपण करता है उसे मृत्योपरांत शिवलोक की प्राप्ति होती है अथवा जो व्यक्ति 3 नीम के वृक्षों का रोपन करता है वह सैकड़ों वर्षों तक सूर्य लोक में सुखों का भोग करता है। शास्त्रों में कहा गया है- निम्बत्रयं समारोप्य नयो धर्मविचक्षणाः। सूर्यलोकं समासाद्य वसेदब्दायुतत्रयम्।।

तृषा रोग के कारण व निवारण

तृषा रोग के कारण व निवारण शारीरिक श्रम करने पर तृषा अर्थात् प्यास की इच्छा होती है। तृषा होने पर सभी छोटे-बड़े के लिए जल पीना आवश्यक हो जाता है। जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। स्वास्थ्य के संतुलन को बनाये रखने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञ दिन में 15 से 20 गिलास पानी पीने का परामर्श देते हैं। जल भोजन की पाचन क्रिया को सरल बनाता है ओर मूत्र एवं पसीने के द्वारा शरीर के दुशित तत्त्वों को शरीर से निष्कासित करता है।
शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में तृषा की अधिक विकृति देखी जाती है। बार-बार शीतल जल पीने पर भी तृषा शांत नही होती। किसी भी स्त्री-पुरूष के साथ ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने का अर्थ होता है तृषा रोग। तृषा रोग में रोगी को बहुत प्यास लगती है। जल्दी-जल्दी जल पीने के बाद भी तृषा शान्त नही होती, तृषा के कारण रोगी बेचैन हो जाता है। तृषा के कारण रोगी का कण्ठ शुष्क होता है।
तृषा उत्पत्ति के कारण-
भोजन में कुछ उष्ण खाद्य पदार्थ होते हैं। पाचन क्रिया के समय शरीर में अधिक उष्णता पैदा होती है और उस गर्मी को शांत करने के लिए शरीर को पानी की आवश्यकता होती है। विभिन्न कारणों से तृषा की उत्पत्ति होती है। अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक प्यास लगती है। शुष्क व रूक्ष खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है।
चिकित्सा विशेषज्ञ शोक, चिंता और भय की परिस्थिति में अधिक प्यास लगने की बात करते हैं। गर्मियों में अधिक पसीने आने से शरीर में जल की कमी हो जाती है इसलिए अधिक प्यास लगती है। छोटे बच्चे जब दौडने का खेल खेलते हैं तब उन्हें अधिक प्यास लगती है।
अधिक उपवास किये जाने पर तृषा अधिक उत्पन्न होती है। अघिक उष्ण मिर्च-मसालों व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है। कुछ चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अग्नाशय की विकृति होने पर मधुमेह रोग की उत्पत्ति होती है तो रोगी को अधिक प्यास लगती है। बार बार पानी पीने से भी तृषा शान्त नहीं होती है।
भोजन में पित्त कारक खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करने से अधिक तृषा व जलन उत्पन्न होती है। अधिक उष्ण वातावरण में रहने और धूप में चलने फिरने से अधिक प्यास लगती है। मादक द्रव्यों व धूम्रपान करने वालों को अधिक प्यास लगती है।
तृषा के विभिन्न लक्षण-
जल पीने के बाद दो तीन घण्टों के लिए जल की इच्छा अर्थात तृषा शांत हो जाती है। लेकिन 30-40 मिनट बाद ही जल पीने की इच्छा होने लगे तो उसे तृषा रोग कहा जाता है। तृषा रोगी को 30-40 मिनट बाद जल पीने की इच्छा होती है तथा जल न मिले तो बेचैनी होने लगती है। उसका मुंह और कण्ठ सूखने लगता है, होंठ भी शुष्क होने लगते हैं।
रोगी को जल पीने के बाद भी बेचैनी बनी रहती है। जल पीने के कुछ देर बाद ही कण्ठ, होंठ, जीभ पर शुष्कता के लक्षण स्पष्ट होने लगते हैं। जल की इच्छा रोगी को बेचैन सी करने लगती है। ऐसे में रोगी को हृदय की निर्बलता भी अनुभव होने लगती है ग्रीष्म ऋतु में छोटे-बड़े सभी तृषा से अधिक पीडि़त दिखाई देते हैं। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता के कारण अधिक पसीने आने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में शरीर को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। जल की पूर्ति के लिए अधिक प्यास लगती हैं। लेकिन तृषा रोगी को शीत ऋतु में भी 30-40 मिनट के अंतराल पर बार-बार प्यास लगती है।
तृषा रोग के भेदः
आयुर्वेदाचार्यों ने तृषा के भेदों के अनुसार अलग-अलग लक्षणों का वर्णन किया है। वात, पित्त, कफ दोषों के अनुसार तृषा को वातज, पित्तज, कफज, क्षतज, आमन और भक्तज आदि भेदों में विभक्त किया है।
तृषा रोग की गुणकारी चिकित्सा-
तृषा की उत्पत्ति को जान लेने के बाद उसकी चिकित्सा सरल हो जाती है। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता की अधिकता होने के कारण सभी छोटे-बड़े को तृषा अधिक पीडि़त करती है। शीतल जल के सेवन से प्यास शांत होती हैं। शीतल जल से हाथ-पांव और चेहरे को साफ करने से तृषा का प्रकोप कम होता है। शीतल जल में नीबू का रस और थोड़ी शक्कर मिलाकर, शिकंजी बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तृषा का निवारण होता है।
वातज तृषा की चिकित्साः
जब यह ज्ञात हो कि रोगी वातक तृषा से पीडि़त है तो उसको वात-पित्त शामक औशधियों का सेवन कराकर वातक तृषा का निवारण किया जाता हैं।
दो-दो तोले गिलोय का रस दो-दो घण्टे के अन्तराल से वातज तृषा से पीडि़त रोगी को पिलाने से तुरंत रोग का निवारण होता हैं। दिन में दो तीन बार पिला सकते हैं।
कुश, कास, शर, दर्भ और ईख, इन पंच तृणों की जड़ को उबाल कर कपडे से छान कर पिलाने से तृषा का अन्त होता हैं।
गुड़ और दही मिलाकर रोगी को सेवन कराने से वातज तृषा नष्ट होती हैं।
घी को हल्का सा गर्म करके रोगी को 10-10 ग्राम मात्रा में पिलाने से वातज तृषा के कारण तालु में उत्पन्न शुष्कता नष्ट होती हैं। तृषा की अधिकता से मुच्छित रोगी को घी नही पिलाना चाहिए।
मांस रस के सेवन से भी वातक तृषा नष्ट होती है।
तृषा नाशक कुछ गुणकारी औशधियां-
बिजौरे नीबू के फूलों को, केशर का चूर्ण, अनार का रस, मधु ओर सेंधा नमक, सबको अच्छी तरह मिलाकर सेवन करने से तृषा की निवृत्ति होती हैं।
लाल शालि (चावलों) का भात पकाकर, शीतल होने पर मधु मिलाकर खाने से जीर्ण तृषा का भी निवारण होता हैं।
रक्त पित्त रोग के कारण तृषा की उत्पत्ति होने पर चंद्रकला रस (आयुर्वेदिक औशधि) का सेवन करने से बहुत लाभ होता हैं।
सितोपलादि चूर्ण दिन में दो-तीन वार अनार के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा नष्ट होती है।
ताम्र भस्म और बंग भस्म 1-1 रत्ती मात्रा में चंदन के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा का निवारण होता है।
जल में मधु मिलाकर कुछ देर जल को मुँह में रोके रखने से तृषा की विकृति नष्ट होती है।
शीतल जल में धनियां, जीरा और सौफ भिगोकर, उनको छानकर, उस जल में मिश्री मिला कर पीने से तृषा नष्ट होती है।
गुलाब, चंदन, नीबू और अनार के रस का शरबत बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तीव्र तृषा रोग नष्ट होता है।
आहार विहारः
भोजन में रूक्ष, गरिष्ठ व उष्ण मिर्च मसालों के खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिक उत्पत्ति होती है। ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। चाय- कॉफी से भी अधिक प्यास लगती है। ग्रीष्म ऋतु में बर्फ का अधिक सेवन करने से भी अधिक प्यास लगती है। सीधे जल में बर्फ डाल कर नही पीना चाहिए। बर्फ के साथ रखकर जल को शीतल करके पीने से तृषा का निवारण होता है।
नीबू के रस से बनी शिकंजी तृषा को जल्दी शांत करती है। नदी व तालाब में स्नान करने से तृषा की विकृति नष्ट होती है। संतरा, मौसमी, जौ के सत्तू, इमली से बने पेय पदार्थ, धनियां, जीरा, मिश्री, अनानास, नारियल का जल, गन्ने का रस, आँवले व आम का मुरब्बा, शीतल दूध, तक्र (मट्ठा) आदि तृषा को नष्ट करते हैं।
सूर्य की प्रचण्ड धूप में अधिक घूमने-फिरने ओर अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक तृषा की उत्पत्ति होती हैं। गुरू, उष्ण, घी, तेल में बने पकवान, अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थ, चटपटे, तीक्ष्ण पदार्थ, सोंठ, पीपल, लाल मिर्च, चाय- कॉफी आदि खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिकता होती हैं। इन खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए।

नेत्र रोग का समूल नाश करने वाली ‘चाक्षुषोपनिषद् विद्या’
नेत्र रोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली चाक्षुषी विद्या की व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्र रोग की निवृत्ति के लिए इसका जप होता है। यह विनयोग है।
नेत्रोपनिषद मंत्रः
ऊँ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ऊँ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ऊँ नमः करूणाकरायामृताय। ऊँ नमः सूर्याय। ऊँ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा´छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।
ऊँ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायँ। मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊँ ( कृपया ) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें। ऊँ ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ऊँ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ऊँ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ऊँ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ ( सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले ) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। ( अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले ) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्णस्वरूप भगवान् सुर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं-उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।
जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा ( भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले ) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय ( सुवर्ण के समान कान्तिमान् ) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्तिज्ञथान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं ( प्राणियों ) के समक्ष उदित हो रहे हैं।
ऊँ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।
ऊँ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिए उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिए, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिए तथा तमोमय बन्धन में बधे हुए हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुश्प्करेक्शन को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।
नेत्र रोग से पीडि़त श्रद्धालु साधक को चाहिए कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी के रस) से अनार की शाखा की कलम के द्वारा काँसे के पात्र में निम्नलिखित विधि से यन्त्र को लिखें।
फिर उसी यन्त्र पर ताँबे की कटोरी में चर्तुमुख ( चारो ओर चार बत्तीयो का ) घी का दीपक जलाकर रख दें। तदानन्तर गन्ध-पुष्पादि से यन्त्र का पूजन करें। फिर पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ‘ऊँ ह्नीं हंसः’ इस बीज मंत्र की छः मालाएँ जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालाएँ जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अघ्र्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।
ऐसा करते रहने से इस उपनिषद् का नेत्ररोगनाशक अदभुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखने में आता है।

 

गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी

गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी भावना और भावुकता, दयालुता और मनुश्यता की बात यदि एक तरफ कर दी जाये तब भी गाय का दूध, घी इत्यादि सर्वगुणसम्पन्न है। विषैला प्रभाव नष्ट करने में गोघृत की तुलना में अन्य किसी पशु का घी उतना उपयोगी नहीं होता। दूध घी से सैकड़ों रोग-विकार दूर होते हैं, यहाँ कुछ रोगों के नाम के साथ उपचार की संक्षिप्त विधि बतायी जा रही है। इस अमृत की शक्ति को पहचान कर पाठक लंबी आयु तक स्वस्थ और युवा बने रह सकते हैं-
अजीर्णः– जब गरिष्ठ भोजन अनपचा रह जाता है, तब शरीर की आग ठंडी पड़ जाती है, अम्लता बढ़ती जाती है, पेट पत्थर-जैसा ठोस होने लगता है, इसके प्रभाव से गुर्दे भी कमजोर पड़ने लगते हैं। इस स्थिति में दूध में सोंठ और गुड़ औटाइये ताकि पेट की सड़ांध मल-मूत्रा के रास्ते बाहर निकल जाय।
250 ग्राम दुध में 100 ग्राम पानी मिलाइये, 25 ग्राम शक्कर या गुड़ डालिये, 10-12 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाइये, जब पानी जल जाय तो हल्का गर्म रह जाने पर घूँट-घूँट पानी शुरू कर दीजिये। अनपचा भोजन सोंठ की गर्मी से पचने लगेगा और मल-मूत्रा गल-पिघल कर निकलने लगेगा, प्यास लगे तो पानी भी हलका गर्म ही पियें, पेट साफ होते ही जलन, खट्टी डकार अफारा और बेचैनी के विकार भी शान्त हो जायँगे। अजीर्ण से छुटकारा पाने के बाद भी एक दिन दूध ही पीजिये ताकि आँतें और पेट की दीवारें तक निर्मल हो जायँ। कमजोरी से न घबरायें, क्योंकि दुध प्राणों का आधार है; यदि गर्भ से निकला बालक दूध पर जी सकता है तो हम दुर्बल नहीं होंगे, मूँग की पतली दाल से चपाती खाकर आप तीसरे दिन से हलके भोजन की शुरूआत कर सकते हैं, दोपहर को दूध में पका हुआ पतला दलिया एवं शाम को दूध में शहद मिलाकर पीजिये, रात को खिचड़ी खाइये चैथे दिन से सामान्य भोजन शुरू कर दें।
अतिसारः– आयुर्वेद के ग्रन्थों में अतिसार पर काबू पाने के लिये दूध के फेन (झाग) को परमौषधि बताया गया है। मलाई और रबड़ी खाने वालों को मालूम होना चाहिये कि 25 ग्राम दुग्ध फेन, 1/2 किलो मलाई के बराबर पौष्टिक है। झाग मुँह में पहुँचते ही टॉनिक बन जाता है, जबकि रबड़ी-खोया पचाने में कई घंटे लग जाते हैं, दूध दुहने के बाद बर्तन में जितना भी झाग हो, उसे एक बड़े कटोरे में कलछी से निकाल लें, इस झाग को चम्मच से स्वाद लेते हुए चूसना शुरू कर दें, वैसे तो झाग में चूसने वाला ठोस तत्त्व होता ही नहीं, किंतु इस विधि से पेट का संकुचन होता है, गोदुग्ध के झाग से पेट की आग भड़क उठेगी और भोजन के कच्चे रस पचने लगेंगे, दूध का झाग शरीर की पेशियों को भी फुला देता है और पाचन-क्रिया तीव्र हो जाती है, बदन को गठीला और पुष्ट करने में दुग्ध-फेन अत्युत्तम औशधि है।
आँखों में जलन-भावप्रकाश निघण्टु में गाय का दूध आँखों के लिये उत्तम अंजन माना गया है, यदि आप भैंस का दूध पीते हैं तो गाय का दूध पीना शुरू कर दें, यदि गाय का दूध पीते हैं तो वह एकदम ताजा-ताजा हो। गाय ब्यायी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि शुरू का दूध जलन पैदा करता है, दूध की मलाई लेकर अँगुली से रात को सोते समय पलकों पर लगा लें, सुबह तक जलन शान्त हो जायगी, नहाने के पहले गोदुग्ध का मक्खन लगा दें, आधे घंटे में जलन जाती रहेगी, यदि मलाई की चिकनाहट को मन न मानता हो तो 4 चम्मच दूध, 1 कटोरी पानी में मिलाकर उससे खुली आँखों में छींटे मारें और स्वच्छ कपड़े से आँखें पोछकर सो जायँ। सुबह तक सारी जलन निकल चुकी होगी, जिन्हें चिकनाई से प्यार हो तो उन्हें दूध की मलाई पलकों पर लेपकर गर्मी की सूजन निकाल देनी चाहिये।
आग से जलनाः- घाव कैसा भी हो, गाय के घी से उत्तम न कोई पेनिसिलिन आदि दवा है न मरहम, कुदरत ने गोघृत को इतनी विषनाशक शक्ति से भर रखा है कि इससे बढि़या क्रीम, मरहम या एंटीसेप्टिक दवा हो ही नहीं सकती, गोघृत में पट्ठी तर करके जली हुई त्वचा पर रखकर भगवान को याद करें, जिसने आप को गोघृत के रूप में अमृत-जैसी पौष्टिक दवा दे रखी है। दूध में घी डाल कर पियें, ताकि सप्ताह भर में घाव की जगह नयी त्वचा उग जाय। गाय का दूध शरीर को त्वचा भी देता है और मांस की कमी भी शीघ्र पूरी करता है।
आधासीसीः- आधे सिर का दर्द तभी होता है, जब उस हिस्से में रक्त के संचार में रूकावट पड़ गयी हो, उस रूकावट का कारण भोजन के वे कच्चे रस होते हैं, जो कफ, लेस आदि के रूप में जमा हो जाते हैं और जुकाम-नजला भी बन जाते हैं, अगर नासिका से दुशित जल न निकले तो माथे के किसी भी हिस्से में जोरों का दर्द उठने लगता है, माथा इतने भयंकर रूप में फटने लगता है जैसे टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ जायगा। 250 ग्राम दूध में 250 ग्राम पानी डालिये, 2 पीपली, 5 लौंग और दालचीनी के 4 छोटे टुकड़े पीसकर दूध में औटाइये।
जब केवल दूध ही बचे तो 2 चम्मच शहद मिलाकर पियें और कंबल ओढ़कर सो जायँ। घूँट इस तरह पियें जैसे गर्म वस्तु चूस रहे हों, जितना अधिक पसीना आयेगा उतनी जल्दी आराम मिलेगा, दिन में 3-4 बार ऐसा दूध पीने से माथे की श्लेष्मा जल बनकर नथनों से बह जायगी या पसीने और मल-मूत्रा के रास्ते निकल जायगी।

चमत्कारी वनौशधियाँ

चमत्कारी वनौशधियाँ भारतीय ज्योतिष शास्त्रों में सूर्य को जगदात्मा कहा गया है। यह सही भी है, क्योकि सृष्टि में बगैर सूर्य के विनाश सुनिश्चित है। वास्तव में सूर्य के प्रकाश में एक विशेष शक्ति निहित होती है। इसी जीवनी शक्ति के द्वारा पौधे अपने भोजन की प्राप्ति करते हैं तथा विभिन्न प्राणी भी इस पर आश्रित है। सृष्टि में जीवनचक्र को जहां सूर्य नियंत्रित करता है, वहीं दूसरी और वायुमंडल के विभिन्न गैसीय चक्र भी इसी के अधीन हैं। सूर्य की रश्मियों में सात प्रमुख रंगों (बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नांरगी और लाल) का एक संतुलित सम्मिश्रण होता हैं, इसलिए सृष्टि का निर्माण करने वाले पांचों तत्त्व अर्थात् जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी को सूर्य अपने ही रंग में समेटे हुए है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। सूर्य रश्मियों में विचित्र कीटाणुनाशक क्षमता भी है। इसीलिए जिस घर में सूर्य के प्रकाश का प्रवेश रहता है, उस घर के सभी प्राणी स्वस्थ रहते हैं। इसके विपरीत ऐसे कमरों में रहने वाले, जहां सूर्य का समूचित प्रकाश नहीं पहुंचता, अस्वस्थ तो रहते ही हैं, साथ ही उनकी बुद्धि-बल का भी पूर्ण विकास नहीं होता और न्यूनता दृष्टिगोचर होती है। हम यह भी देखते हैं, कि छाया में पड़ने वाले पौधे अच्छी फसल नहीं दे पाते और सूर्य के प्रकाश के अभाव में कोई भी पौधा पनप नही सकता। इसी प्रकार जिस जलाशय मे धूप नहीं पहुंचती उसमें कीड़े पैदा हो जाते हैं। इसके विपरीत सूर्य का प्रकाश का प्राप्त करने वाले जलाशयों का जल स्वच्छ तथा कीटाणुमुक्त तो होता ही है, इसके साथ ही साथ वह शक्ति का संचार करने वाला भी होता है। सूर्य के प्रकाश से समस्त सृष्टि लाभान्वित होती है। जड़ -चेतन सभी पर इसका समरूप प्रभाव पड़ता है। एक भारतीय महात्मा ‘स्वामी ज्ञानानन्द’ ने तो सूर्य-रश्मियों से तमाम पदार्थो को उत्पन्न कर संसार को चमत्कृत कर दिया था। सूर्य के इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण भारतीय ऋषि- मुनियों और वेदाचार्यो ने सूर्य को देवता कहा है। सूर्य-चमत्कार, संध्योपासना, सूर्य जल अर्पण आदि क्रियाओं के सम्पन्न करने के पीछे भी यही रहस्य हैं। हमारे पूर्वजों को सौर रश्यिमों की सहायता से अनेक औशधियों के निर्माण की जानकारी थी।
वनौषधियों के प्रयोग

मिर्गी के लिए– जायफल आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला फल है। इक्कीस ‘जायफल’ लाकर उनमें से सात जायफल ‘नीले रंग की बोतल में’ तथा सात जायफल हरे रंग की बोतल में सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक धूप में रखें। इस चैदह जायफल को शेष (बिना धूप में रखे), सात जायफल के साथ पिरोपकर एक माला बनाकर मिर्गी के रोग को पहनाने से उसे मिर्गी के दौरे आने बंद हो जाते हैं।
चेहरे की फुन्सियों को हटाने के लिएः– लगभग सौ मि0 ली0 ‘अंरडी के तेल’ को ‘लाल रंग की काँच की बोतल’ में सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखा रहने दें। लाल रंग की बोतल उपलब्ध न हो तो एक सफेद बोतल के चारों ओर लाल पारदर्शक पन्नी लपेट कर ऐसा किया जा सकता हैं। इस अरंडी के तेल में कपड़े से छना गया महीन ‘बेसन’ मिलाकर इससे बने उबटन को नियमित कुछ देर तक चेहरे पर लगाकर, तदुपरान्त चेहरा धोने से चेहरे पर विकसित होने वाली फुन्सियां दूर हो जाती हैं और चेहरा साफ हो जाता है। आवश्यकता हो, तो रात्रि पर्यन्त इस मिश्रण को चेहरे पर लगाये रहना चाहिए और सुबह-सुबह उसे धो लेना चाहिए। इस सम्बन्ध में अपने चिकित्सक से परामर्श ले लें।
लकवा दूर करने के लिएः– इसके लिए 100 मि0 ली0 ‘सरसो का शुद्ध तेल’ लें, इस तेल में एक तोला ‘काली मिर्च’ का कपड़े की सहायता से छना चूर्ण मिलावें। इसी प्रकार दस ग्राम ‘भांग’ का चूर्ण भी इसमें मिलाकर इस मिश्रण को 10 मिनट तक उबालें। ठंडा होने पर इस तेल को छानकर एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर उसके चारों ओर एक लाल पन्नी लपेट कर सूर्योदय तक सूर्य के प्रकाश में रखें। इस तेल की मालिश लकवे वाले भाग में करने से सम्बन्धित भाग में रक्त का प्रवाह आरम्भ हो जाता है।
कांच निकलना रोकने के लिए– कुछ लोगों को मलत्याग के समय थोड़ी या अधिक आंत्र बाहर निकल आती है, इसे कांच निकलना कहते हैं। इसके लिए थोड़ी सी ‘फिटकारी’ एक नीली बोतल’ में भरकर उसे सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखें। इस बोतल को रख लें। नियमित शौच के समय इस फिटकारी की थोड़ी सी मात्रा जल में घोलकर उस जल से गुदा प्रक्षालन करने से कांच निकलना बंद हो जाता है।
श्वेत कुष्ठ निवारणः– सफेद दाग अथवा फूलबहरी दूर करने के लिए ‘बावची का तेल’ एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर उस बोतल के चारों ओर एक लाल पन्नी लपेट कर इस बोतल को दस दिन तक नियमित सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखें। रात्रि में इसे घर के अंदर रखें। इस तेल को फूलबहरी पर लगाने से वह ठीक हो जाती है। अधिक प्रसारित दागों पर यह उपचार काफी समय लेता है।
जोड़ो का दर्दः– लगभग दो सौ मि0 ली0 उपयोग किया हुआ घी लें इसमें एक तोला ‘शुद्ध कपूर’ एक तोला ‘तारपीन का तेल’ तथा एक तोला ‘गिरनार का तेल मिलाकर इस मिश्रण को ‘लाल पन्नी युक्त बोतल’ में भरकर सूर्योदय से सूर्यास्त तक दस दिन तक धूप में रखें। रात्रि में इसे चांदनी में न रखें। दस दिन बाद इस मिश्रण में दस मिलीमीटर ‘मिथाइल सेलीसिलेट’ मिला दें (प्राचीन काल में इसके स्थान पर ‘बाम का पौधा’ मिलाया जाता था)।
इस तेल की समय-समय पर घुटनों तथा जोड़ों पर मालिश करने से दर्द का शमन होता हैं।
त्वचा रोग – ‘नीम के तेल’ की वांछित मात्रा ‘हरी बोतल’ में भरकर दस दिन तक उसे सूर्योदय तक धूप में रखें। त्वचा रोगों में विशेष रूप से फोड़े-फुंसी तथा खुजली, एक्जीमा आदि में यह तेल प्रभावशाली है, इसे सम्बन्धित स्थान पर लगाया जाता हैं।
इन्द्रिय दौर्बल्य हेतु – इसके लिए शुद्व ‘तिल का तेल’, एक स्वच्छ ‘सफेद बोतल’ में भरकर उस बोतल के चारों ओर लाल पन्नी लपेट कर दस दिनों तक उसे सुबह से लेकर शाम तक धूप में रखें। इस तेल को इन्द्रिय पर नियमित लगाने से उसकी दुर्बलता समाप्त होती हैं।
टॉन्सिल्स के लिएः– बड़ी कटेली को समूचा ही उखाड़ लावें, घर लाकर इसे पानी से भली प्रकार से धोकर एक बड़े बर्तन में रखकर उसमें इतना पानी डालें, कि पौधा आधा डूब जाय। अब इसें उबालें, जब पानी आधा या इससे कुछ कम रह जाय, तो इसे उतार कर छान लें इस छानन को एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर लगभग दो घंटे धूप दिखायें। इस छानन से गरारे करने पर बढ़े हुए टान्सिल्स तुरंत बैठ जाते हैं। अनेक आयुर्वेदिक औशधियां हैं जो हम अपने दैनिक खाद्य पदार्थो के साथ में प्रयोग करते हैं जिनका मानव अपने जीवन में सन्तुलित उपयोग कर अपने स्वास्थ्य को अच्छा बनाये रख सकता हैं, वे क्रमशः इस प्रकार हैं-

  1. धनिया
  2.  मिर्च
  3. सौंफ।

धनिया– धनिया से तो सभी लोग परिचित हैं, नित्य अपनी दाल सब्जी में हम इसे मसाले के रूप में प्रयोग करते हैं, जिससे खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट बन पाता है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औशधि है, जिसमें मानव स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त गुण, धर्म पाये जाते हैं। धनिया मुख्यतः भारत तथा विशेषकर रूस, मोरक्को आदि में प्रमुखता से पैदा होती है। यह एक छोटा सा पौधा होता हैं, जिसमें बीज युक्त छोटे-छोटे फल लगते हैं। बाद में सूख जाने पर उन्हें मसाले के रूप में उपयोग में लाते हैं।
प्रमुख तत्वः– धनिया में मुख्यतः बोलाटाईट तेल तथा प्रमुख तत्व लिनालोन पाया जाता है, जिसके कारण इसमें सुगन्ध बनी रहती हैं। इसके अतिरिक्त इसमें पाईनीन तथा थाईमोल, फिक्सआयल एवं प्रोटीन पाया जाता हैं।
उपयोगः– यह पाचन संस्थान के लिए अत्यन्त उपयोगी है। इसके सेवन से भोजन का अत्यधिक दबाव आन्तरिक अंगो पर नहीं पड़ पाता है, जिससे पाचन क्रिया सुगमता पूर्वक सम्पन्न होती है। यह पेट की दर्द में अत्यन्त लाभकारी औशधि है, जिससे पेट में अपच, गैस आदि की सम्भावना नहीं रहती है। इसका सीमित उपयोग खाद्य पदार्थो में करना उपयुक्त रहता हैं।
मिर्च– मिर्च से प्रायः सभी परिचित है। यह देश के प्रत्येक भाग में पाई जाती है, विशेषतः लाल होने पर इसे मसालों में प्रयोग में लाया जाता हैं। वनस्पति विज्ञान में इसका नाम ‘कैपसीकम’ मिनीमम है। यह जापान, अफ्रीका, एवं भारत में प्रचूर मात्रा में पाई जाती हैं।
प्रमुख तत्व – इसमें मुख्यतः केपसीयासन, विटामिन सी तथा कैराटिन नामक तत्व पाया जाता है, जिसके कारण रंग लाल होता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन बी भी पाया जाता है।
उपयोग– यह भी खाद्य पदार्थो में मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता हैं, जिससे भोजन में स्वाद के गुण आते हैं। यह विशेषतर जोड़ों के दर्द में, सूजन तथा पेट में पाचन क्रिया में पाचक के रूप में सहायक होता हैं। यदि इसे उचित मात्रा में नित्य प्रयोग किया जाए, तो व्यक्ति में पाचन संस्थान एवं शरीर में जोड़ों आदि की तकलीफ एवं दर्द नही होता है।
सौंफ -सौंफ प्रायः भारत तथा अन्य देशों में भी पाई जाती है। विदेशों में यह यूरोप, जापान तथा जापान तथा जर्मनी में पाई जाती है। वनस्पति शास्त्र में इसका नाम ‘फोरनिकुलमबलगेर’ हैं, इसका पौधा दो या तीन फीट लम्बा होता हैं इसमें जो फल लगता हैं सूखने पर उसे प्रयोग में लाते हैं।
प्रमुख तत्व – सौंफ में एनथोल तथा फैनकोन नामक तत्व पाया जाता है, जिसके कारण इसमें सुगन्ध एवं मीठा स्वाद होता हैं। इसके अतिरिक्त इसमें फिक्स तेल तथा प्रोटीन भी पाया जाता है।
गुण– यह श्वसन संस्थान के लिए अत्यन्त उपयोगी औशधि है, विशेषकर खाँसी में यह अच्छा कार्य करता है। इसके अतिरिक्त पाचन संस्थान में अपचन की स्थिति में पाचक के रूप में अच्छा कार्य करता हैं। इसके साथ ही लोग इसका उपयोग घर में माउथ वाश आदि के रूप प्रयोग करते है, जिससे व्यक्ति सुन्दर एवं स्वस्थ बना रहता है।

साधारण पौधा आक

साधारण पौधा आक आक अथवा मदार पूरे भारत में सरलता से उपलब्ध होने वाला एक महत्वपूर्ण पौधा है। यह दो प्रकार का होता है। एक वह जिसके फूल बैंगनी रंग लिये हुए होते हैं और दूसरा वह, जिसके फूल सफेद होते हैं। इसके फल देखने में कच्चे आम के समान होते हैं। ये ज्येष्ट माह में पक जाते हैं। इनके अंदर काले रंग के दाने तथा रूई जैसी निकलती हैं। यह झाड़ी नुमा होता है। इसकी पत्तियाँ मोटी तथा शिराओं वाली होती हैं। पत्तियों और हरे तने व शाखाओं को देखने पर ऐसा लगता है, मानो उन पर पाउडर छिड़का हुआ हो। पत्ती अथवा डण्डी को तोड़ने पर इसमें से दूध जैसा पदार्थ निकलता है।
आक के विभिन्न भाषाओं में नाम:-
श्वेत आक को संस्कृत में श्वेतार्क, मन्दार, सदापुश्प, बालार्क, प्रतापस आदि कहते हैं, जबकि बैंगनी फूल वाले आक को रक्तार्क, के नाम से पुकारते हैं। दोनों ही प्रकार के आक को हिन्दी में आक, अकवन या मदार (सफेद या लाल) व सफेद या लाल अकौआ भी कहते हैं। वनस्पति जगत के एसक्लेपीडेसी ; बेसमचपकंबमंमद्ध कुल का यह सदस्य है।

औशधिक चमत्कार

  1. वात रोगों में–श्वेत आक की जड़ को तिल के तेल में डालकर खूब उबाल लें। फिर इस तेल से रोगग्रस्त अंग की मालिश करें। नियमित रूप से इस तेल की मालिश करने से वातव्याधी के कारण हाथ, पैर, कमर में होने वाले दर्द से छुटकारा मिलता है।
    2. गठिया, और मोच में— आक के पत्तों पर मीठे तेल को चुपड़कर उसे हल्का सा सेंक कर गठिया ग्रस्त अंग पर बाँधने से लाभ होता है। घी में चुपड़कर यही प्रयोग करने से मोच के दर्द से मुक्ति मिलती है।
    3. शरीर में यदि छोटे-छोटे सफेद दाग हों तो— श्वेत आक के दूध में सेंधा नमक घिसकर छोटे-छोटे सफेद दागों पर लगाने से वे ठीक हो जाते हैं।
    4. एक्जिमा में– आक के दूध में समान मात्रा में तिल का तेल मिलाकर इस मिश्रण को एक्जिमा पर मलने से सात-आठ दिन में एक्जिमा से मुक्ति मिल जाती है।
    5. कुत्ता या बिच्छु के काटने पर— यदि किसी को कुत्ता या बिच्छु काट ले तो दंश-स्थान (जिस जगह काटा हो) पर आक का दूध लगाने से इनके विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
    6. बवासीर में— बवासीर में आक के दूध में अफीम घोलकर, मस्सों पर लगाने से उनका दर्द दूर होता है।
    7. अण्डकोश बढ़ने पर–सफेद आक की जड़ घिसकर लेप करने से अण्डकोश सामान्य अवस्था में आ जाते हैं।
    8. हाथी पाँव में— आक के जड़ की छाल तथा अडूसे की छाल को पीसकर लेप करने से हाथीपाँव रोग दूर होता है।
    9. अन्दरूनी चोट में— आक के पत्तों को सरसों के तेल में उबालकर मालिश करने से गिरने या किसी ठोस वस्तु के आघात से लगी चोट में लाभ होता है।
    10. सूजन में– आक के पत्तों में अरण्डी का तेल लगाकर गरम करके बाँधने से सूजन तथा दर्द कम हो जाता है।

महा औशधि पीपल

महा औशधि पीपल पीपल वृक्ष की उपस्थिति व उपयोग की जानकारी वैदिक काल से ही मिलती है, अनेक प्राचीन ग्रन्थों में इसके उदाहरण मिलते है, पीपल का वृक्ष सम्पूर्ण जलीय प्रदेश तथा साधारण भूमि में आसानी से मिल जाता है तथा मरूभूमि में भी यह स्वयं को जीवित रखता है। आयुर्वेद के ग्रन्थों व संहिताओं में औशधि के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। चिकित्सा की दृष्टि से रोग निवारण के लिए पीपल के अनेक औशधीय  प्रयोग मिलते हैं, जिनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत है-

  1. सर्पदंश पर विषनाशक प्रयोग
    जब किसी को सर्पदश हो गया हो, शीघ्र ही डंठल की तरफ से पीपल के ताजे पत्ते को रोगी के कान में थोड़ा सा ड़ालें इसे कसकर पकड़े रहें, क्योकि विष के प्रभाव से रोगी को वेदना होती है तथा डंठल का खिंचाव अन्दर की ओर होता है, यदि डंठल अधिक अन्दर चला जाता है, तो कान का पर्दा छिद्रयुक्त हो सकता है, अतरू पत्ते को पकडे़ रहना चाहिए। तथा जब पत्ता कुछ विवर्ण (नीला या पीला) हो जाए व डंठल कुछ फूल जाए तब पत्ते को बदल देना चाहिए अर्थात् नवीन पत्ता लगाना चाहिए। इस क्रिया से विष का आचूषण होता है तथा जब विष का पूरा आचूषण हो जाता है, तब डंठल का अन्दर की ओर खिंचाव तथा रोगी को वेदना होनी बन्द हो जाती है। तब उल्टी (वमन) करानी चाहिए ताकि आमाशय में कोई विषाक्त द्रव एकत्रित हो, तो निकल जाए। इसके पश्चात् दुग्धपान कराना चाहिए।
  2. पीपल के द्वारा चिकित्सा के अनेक योग आयुर्वेदीय योग मिलते हैं जैसे– संग्रहणीय कषाय (चरक), पंचवल्कल कषाय आदि।
    3. आमजप्रवाहिका (एमेबिक डीसेन्ट्री) में पीपल की गोंद का शुष्क चुर्ण 2-3 ग्राम प्रतिदिन लेने से जीर्ण प्रवाहिका ठीक हो जाती है। साथ ही पथ्यापथ्य का पालन आवश्यक है।
    4. मधुमेह रोग में दो पत्ते पीपल के, चार पत्ते तुलसी के, चार पत्ते नीम के, चार पत्ते बिल्प पत्र के तथा आठ पत्र नींबू के एवं पाँच काली मिर्च को मुख में चबा-चबाकर रस चूसना चाहिए, शेष बचे हुए तंतुओं को फेंक देना चाहिए। औषध का सेवन करने के साथ-साथ रोगी को यथा-शक्ति पैदल भ्रमण भी करते रहना चाहिए, इससे कुछ ही दिनों में रक्त शर्करा की मात्रा न्यून हो जाती है।
    5. आयुर्वेद की अनेक भस्मों के निर्माण में भी पीपल के अंगों का प्रयोग किया जाता हैं– जैसे नाग भस्म, वंग भस्म, यशद भस्म, अभ्रक भस्म आदि।

नोट- यह सभी औधिय प्रयोग आप अपने चिकित्सक से परामर्श करके ही करें।

पीपल के मांत्रिक प्रयोग
1. विषम ज्वर
जिस रोगी को ठण्ड लगकर बुखार आता हो या तीन दिन के अन्तर से ज्वर आता हो, उस रोगी को स्नान कराके, शुद्ध जल में तिल व थोड़ा दूध मिलाकर पूर्वाभिमुख खडे़ होकर पीपल वृक्ष पर उस तिलोदक को सात बार मंत्र बोलते हुए धारा बद्ध चढ़ा देने से ज्वर आना बन्द हो जाता है। यह प्रयोग सात दिन तक या ज्वर शांत होने तक किया जाता है। मंत्र इस प्रकार से है- विषमज्वर गच्छत्वं तस्मै तिलोदकं नमरू
2. पुराना ज्वर
 नमः शिवाय’ को ग्यारह बार उच्चारण करते हुए जल अर्पित करें तथा रोगी के रोग निवृत्ति हेतु प्रार्थना करें। इससे पुराना ज्वर, जो अनेक औशधियों के सेवन से भी ठीक न होता हो तब इस मंत्रोपचार से लाभ होता है।\शनिवार के दिन प्रातरूकाल स्नानादि करके रोगी स्वयं या रोगी की ओर से कोई अन्य व्यक्ति रोगी का नाम लेकर एक ताम्र के पात्र में शुद्ध जल व थोड़ा चिरायता, दुग्ध, कुछ शर्करा व कुशा डालकर उत्तर की ओर मुख कर के भगवान शंकर को स्मरण करते हुए शिव पंचाक्षरी मंत्र ‘

एनीमिया कारण और निवारण

एनीमिया कारण और निवारण शरीर में खून का नहीं होना या कम मात्रा में होनाएनीमिया कहलाता है। वास्तव में यह खून की कमी न हो कर लाल रक्त कणों ; भ्ंमउवहसवइपदद्ध की कमी होती है। लाल रक्त कणों का मुख्य कार्य ऑक्सीजन को शरीर में स्थित विभिन्न कोशिकाओं तक पहुँचाना है, जिससे प्रत्येक कोशिका को आक्सीजन मिल सके। इसकी कमी से शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीजन कम मिल पाती है, जिससे वे कोशिकाएं ठीक ढ़ंग से काम नहीं कर पातीं।
एनीमिया होने के मुख्यतरू दो कारण है-
1. रक्त स्त्राव- अधिक रक्त का बहना।
2. लाल रक्त कणों का नष्ट होना।

एनीमिया के लक्षण;

  1. निर्बलता
    2. बैठे-बैठे ही साँस फूलना।
    3. चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा होना।
    4. सुनाई कम पड़ना, कानों में सीटी बजना।
    5. सिर दर्द।
    6. नजर का कम होना।
    7. नींद का कम होना।
    8. पैरों में सूजन होना।
    9. हाथ और पैर की उंगलियों में चींटी सी चलना या झनझनाहट होना।
    10. बच्चों की शारीरिक वृद्धि या वजन बढ़ना रूक जाना।

एनीमिया के इन लक्षणों में से कोई एक या सारे लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं। लक्षणों का प्रकट होना इस बात पर निर्भर करते हैं, कि कितने समय में हीमोग्लोबिन कम हुआ। जैसे किसी के रक्त में लाल रक्त कणों की मात्रा एक सप्ताह में 12 ग्राम से 8 ग्राम हुई, तो लक्षण अधिक होंगें। यदि किसी व्यक्ति में लाल रक्त कणों की संख्या एक वर्ष में कम हुई, तो ऐसे व्यक्ति में लक्षण कम होंगे, क्योकि लाल रक्त कणों की संख्या एक साल में 12 ग्राम से 8 ग्राम हुई। एनीमिया किन कारणों से होता हैं? एनीमिया होने के विभिन्न कारणं हो सकते है, परन्तु प्रायरू लौह तत्व की कमी से होने वाला एनीमिया प्रमुख है, दूसरे प्रकार के एनीमिया दुर्लभ होते हैं। यहाँ लौह तत्व की कमी से उत्पन्न होने वाले एनीमिया के विषय में ही बताया जा रहा है। दिन भर के भोजन में लौह तत्व की केवल 1 मिलीग्राम की मात्रा आवश्यक होती है। गर्भावस्था में व स्तनपान कराने वाली महिलाओं में इसकी आवश्यकता अधिक होती है।
लौह तत्व की कमी से उत्पन्न एनीमिया के तीन मुख्य कारण हैं –
1. रक्त स्त्राव
2. भोजन में लौह तत्व की कमी
3. भोजन से प्राप्त लौह तत्व का पाचन न होना।
इनमें भी पहला कारण ही मुख्य है। जब भी रक्त स्त्राव से उत्पन्न लौह तत्व की कमी भोजन में उपलब्ध लौह तत्व की मात्रा से ज्यादा होती है, तो एनीमिया हो जाता है। यदि आयु बढ़ने पर बच्चे को दूसरा आहार देने में देरी हो जाती है और वह लम्बे समय तक केवल दूध पर ही निर्भर रहता है, तो बालक को लौह तत्व की कमी अवश्य हो जायेगी। ऐसा आहार, जिसमें लौह तत्व की मात्रा अधिक हो, बच्चे को देते ही यह कमी तुरन्त दूर हो जाती है। जब शरीर में तेजी से विकास होता है और लौह की आवश्यकता बढ़ जाती है, जो भोजन से उपलब्ध नहीं हो पाती, क्योंकि इस उम्र में युवाओं का रूझान संतुलित आहार की अपेक्षा ‘फास्ट फूड’ पर ज्यादा होता है।
रजस्वला स्त्री के शरीर को भी लौह तत्व की अधिक आवश्यकता होती है, उसे 2 मिलीग्राम लौह प्रतिदिन के भोजन के द्वारा प्राप्त होना चाहिए। यद्यपि गर्भावस्था में रजस्त्राव से होने वाली लौह तत्व की कमी तो रूक जाती है, परन्तु शिशु और माँ के शरीर की आवश्यकता बढ़ जाती है। गर्भावस्था के समय के साथ ही साथ लौह तत्व की आवश्यकता में भी वृद्धि होती जाती है। गर्भावस्था के दूसरे तीसरे माह के पश्चात् माँ के शरीर को लौह तत्व की आवश्यकता अधिक होती है और यह आवश्यकता इतनी अधिक बढ़ जाती है, कि दैनिक भोजन में भी उसकी पूर्ति नहीं हो पाती। इसीलिए चिकित्सक गर्भावस्था में लौह व कैल्शियम लेने की सलाह देते हैं। ज्यादातर यह पाया गया है, कि महिलायें इस विषय की गम्भीरता पर ध्यान न दे कर दवायें नियमित रूप से नहीं लेतीं, जिसका दुष्प्रभाव बच्चे व मां दोनों पर पड़ता है। बवासीर, पेट का अल्सर, आदि से भी जो रक्त स्त्राव होता है, उससे भी एनीमिया हो जाता है।
उपचार-
लौह तत्व की कमी को दूर करने के लिए भोजन में पाये जाने वाले लौह तत्व की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिये, इसी लिए लौह तत्व वाला भोजन निरन्तर लेने की सलाह दी जाती है। जब शरीर में लाल रक्त कणों की संख्या बहुत कम होती है, तब इस कमी को पूरा करने के लिए आयरन टेबलेट या कैपसूल के द्वारा शरीर को लौह तत्व की आपूर्ति की जाती है। लौह तत्व की पर्याप्त मात्रा लेने से से लाल रक्त कणों की संख्या बढ़ने लगती है।

नोट- कब, क्या और कितनी अधिक मात्रा माँ लौह तत्व लेना है, यह हमेशा अपने अनुभवी चिकित्सक से परामर्श करने के उपरान्त ही लें।

लौह तत्व से युक्त भोजन लेते रहना चाहिए, जिससे कि शरीर के लौह भण्डार फिर से भर जायें। लौह तत्व की अधिक मात्रा वाले आहार शाकाहारी भोजन में अनाज, हरी पत्तियों की सब्जियां जैसे पालक आदि, तेल बाले बीज जैसे तिल, सरसों, मूंगफली, सोयाबीन, सूखे मेवे व गुड़ आदि में लौह तत्व की मात्रा पर्याप्त होती है। यदि सामान्य भोजन को भी लोहे के बर्तन में पकाया जाय, तो उसमें लौह तत्व की मात्रा बढ़ जाती है। कुछ आहार शरीर द्वारा लौह तत्व की पाचन क्षमता को भी प्रभावित करते हैं। नीबू लौह तत्व की पाचन क्षमता में वृद्धि करता है, जबकि चाय में पाया जाने वाला टैनिन, सब्जियों में पाया जाने वाला ऑक्सालेट आदि तत्व इस पाचन क्षमता में बाधा डालते हैं। एनीमिया होने पर चिकित्सकीय दृष्टि से शरीर को लौह तत्व की अधिक मात्रा या कवेम की आवश्यकता होती है। चिकित्सक ऊपर बताये गए लक्षणों को देख कर तथा जिह्ना, हथेली, नाखून, अन्दर से पलकों में पीलापन देख कर एनीमिया को पहचानते हैं तथा लैबोरेटरी जांच की सहायता से एनीमिया की मात्रा तथा इसके प्रकार की जांच करते हैं। हृदय के कुछ रोगों का कारण एनीमिया ही होता है।
आयुर्वेदिक उपचार-
अदरक जहाँ एक खांसी या कफ में लाभदायक औशधि है, वहीं अयुवेदीय ग्रर्थो मे इसे रक्त की कमी को समाप्त करने के लिए एक श्रेष्ठ औशधि कहा गया हैं। इस औशधि का प्रयोग धैर्यपूर्वक करने पर ही सफलता प्राप्त होती है। चार-पाँच ग्राम अदरक तथा शहद मिलाकर रोज प्रातरू पीयें। महीने भर तक नियमित प्रयोग से खून बनने की प्रक्रिया में तेजी आयेगी तथा चेहरे का सौन्दर्य भी निखर उठेगा। एक तथ्य यह भी ध्यान रखने योग्य है, कि रक्तदान करने वाले व्यक्ति का पहले ‘हीमाग्लोबिन टेस्ट’ किया जाता है और हीमाग्लोबिन के कम होने पर रक्त लिया ही नहीं जाता। रक्तदान के समय एक व्यक्ति से करीब 300 मिलीलिटर रक्त ही लिया जाता है। लौह तत्व युक्त संतुलित भोजन करने पर कुछ ही दिनों में इसकी पूर्ति हो जाती है। एक स्वथ्य व्यक्ति को भी समय-समय पर अपने शरीर में हीमोग्लोबिन की जांच कराते रहना चाहिए। वर्ष में एक बार या कभी भी संदेहात्मक स्थिति आने पर अपने चिकित्सक से तत्काल सलाह ले

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार साधना के क्षेत्र में मुद्राओं का विशिष्ठ महत्व सर्वविदित है। तंत्र के क्षेत्र में भी मुद्राओं का सुनियोजित और विस्तृत विवरण मिलता है। मुद्रा के अनेक अर्थ हैं, किन्तु साधारणतया साधनात्मक कार्यो में प्रयुक्त होने वाली मुद्राओं को, जो उंगलियों के माध्यम से देवता के प्रीत्यर्थ प्रकट की जाती हैं मुद्राएं कहा जाता है। इनका प्रयोग शक्ति साधक अनिवार्यतः करते हैं, लेकिन अन्य साधकों के लिए भी मुद्रा प्रदर्शन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि साधना क्रम में यह एक आवश्यक क्रिया मानी गई है। कुलावर्ण तंत्र में लिखा है- ‘‘मुद्राः कुर्वन्ति देवानां मनासि द्रावयन्यि च।’’
‘‘मुद्राओ को प्रदर्शित करने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा मुद्रा प्रदर्शित करने वाले भक्त पर द्रवित होकर कृपा करते हैं।’’ कुछ तंत्र शास्त्रों में स्पष्ट है, कि मुद्रा प्रदर्शित करने पर व्यक्ति को देवताओं की समीप्यता प्राप्त होती है; मुद्राओं के प्रदर्शित करने पर देवता पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रहते हैं तथा इन के प्रदर्शन से साधारण पूजा भी उत्तम हो जाती है, बिना मुद्राओं के सम्पत्र की हुई साधनाए, जप, देवाचार्वन, योग आदि निष्फल हो जाते हैं। मुद्राओं का केवल एक पक्ष नहीं -‘‘क्या मुद्रा द्वारा रोगों का उपचार भी सम्भव है?’’

निर्विषोऽपि भेवेत् क्षिप्रं यो जन्तुर्विषमूर्छितः। चत्वारिंशित् समाख्याता मुद्रा श्रेष्ठा महाधिकाः।।

‘‘मुद्रा प्रदर्शन से विष द्वारा मूच्र्छित व्यक्ति भी स्वस्थ्य लाभ प्राप्त करता है। व्याधि और मुत्यु तक का निवारण मुद्राओं द्वारा संभव है। मोक्ष, जो मनुश्य जीवन का सर्वोच्च सोपान है, वह भी मुद्रा प्रदर्शन से प्राप्त किया जा सकता है।’’ मुद्राओं के महत्व को जानकर यदि व्यक्ति चाहे, तो अनेक रोगों पर नियंत्रण कर सकता है। वर्तमान समय में तो इतने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोग है, जिनसे बचना मनुश्य के लिए कठिन हो गया है, न चाहते हुए भी अनेक प्रकार की औशधिओं का सेवन करना पड़ता है और जिसके कारण कभी-कभी अनेक प्रकार के साईड़ इफेक्ट हो जाते हैं, जैसे चेहरे पर अनेक प्रकार के दाने, फुंसियां निकल आती हैं, जिसकी वजह से सौन्दर्य क्षीण हो जाता है। इसके लिए ‘कुम्भ मुद्रा ’ का प्रयोग करें, तो चेहरा रोग रहित, कान्तियुक्त और चमकदार बनने लगेगा। कुम्भ मुद्रा में साधक अपने दाहिने हाथ से हल्की खुली सी मुट्ठी  बनावें, इसी प्रकार दूसरे हाथ से भी करें, दोनों हाथ के अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करते रहें बायें हाथ को दाहिने हाथ के ऊपर रखें। इसे कुम्भ मुद्रा कहते है। इसके नित्य प्रदर्शन से साधक का चेहरा आकर्षक बनता है तथा दाने व मुहासे साफ हो जाते है।
स्वर शोधक-
साधक यदि ‘प्राण मुद्रा’ सम्पन्न करें, तो स्वर से सम्बन्धित रोगों को नियंत्रित कर सकते है। प्राण मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक अपने अंगूठे से अनामिका और कनिष्ठका के पोरों को स्पर्श करें, बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखें, तो प्राण मुद्रा के प्रदर्शित करने से साधक के स्वर संस्थान पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उसका स्वर शुद्ध होता है। जिनका स्वर घरघराता हो या आवाज स्पष्ट न हो, उसे प्राण मुद्रा करने से बहुत लाभ होता है।
मुख शोधन-
व्यान मुद्रा’ प्रदर्शित करने से साधक के मुख से सम्बधित रोगों का शमन होता है। साधक बैठ कर अपने हाथ के अंगूठे से मध्यमा और अनामिका को स्पर्श करें, इससे व्यान मुद्रा प्रदर्शित होती है। इस मुद्रा के प्रदर्शन से साधक के मुख सम्बन्धी रोगों पर प्रभाव पड़ता है; जैसे यदि उसके मुंह से दुर्गन्ध आती है या उसके मुंह का स्वाद अक्सर बिगड़ा रहता है अथवा मुख में छाले निकलने लगते हो, तो इस मुद्रा को नित्य करने से बहुत लाभ मिलता है। गले के रोग- सर्दी या गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला अंग गला ही होता है। यह शीघ्र ही वातावरण से प्रभावित हो कर संक्रमित हो जाता है, जिसकी वजह से गला बैठना, गले में सूजन, दर्द या टॉन्सिल्स की शिकायत होने लगती है। यदि ऐसा व्यक्ति ‘उदान मुद्रा’ सम्पन्न करता है, तो उसे गले से सम्बन्धित रोग नहीं होते। इस मुद्रा को करते समय अपने हाथ के अंगूठे से तर्जनी अंगुली को स्पर्श करें और पूर्ण रूप से स्थिर होकर बैठें व मन ‘सौं’ बीज पर एकाग्र करें।
हृदय सम्बन्धी रोग-
‘आवाहनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से हृदय रोगों पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। आवाहनी मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक दोनों हाथों को मिलाकर अंजुली बना लें व अंगूठों से अनामिका के मूल को स्पर्श करें। ऐसा साधक नित्य स्थिर मन से जिस आसन में वह सुविधा अनुभव करे चाहे पद्यासन हो या सुखासन हो, बैठ कर करे। यह मुद्रा सम्पन्न करने से साधक हृदय के रोगों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। यदि साधक घबराहट का अनुभव कर रहा हो, तो वह थोड़ी देर इस मुद्रा को न करे, तो उसे लाभ अवश्य होगा।
पेट के रोग-
‘सम्मुखीकरण मुद्रा’ सम्पन्न करने से साधक पेट से सम्बधित रोगों पर विजय प्राप्त कर लेता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए साधक स्थिर बैठ जाये व अपने दोनों हाथों से मुट्ठी  बनाये, अंगूठे को मुट्ठी के अन्दर रखे तथा दोनों हाथों की मुट्ठी को परस्पर कनिष्ठिका उंगली से मिला ले। इसे सम्पन्न करने पर पेट में यदि कीड़े भी हों या पित्त अधिक बनता हो, तो व्यक्ति को राहत मिलती है। यह मुद्रा पेट से सम्बधित रोगों में अत्यन्त सहायक होती है, जिसे नित्य करने से व्यक्ति इन रोगों को नियंत्रित कर सकता है।
चर्मरोग-
खुजली होने या किसी वस्तु से खाने -पीने से एलर्जी हो जाने से पर चमड़ी से सम्बन्धित रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति असहजता अनुभव करता है। इस रोग के लिए ‘चक्र मुद्रा’ करने से नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। दोनों हाथों की उंगलियों को फैला लें व बायें हाथ की कनिष्का अंगुली से दाहिने हाथ की कनिष्किा को स्पर्श करें तथा बायें हाथ के अंगूठे से दाहिने हाथ के अंगूठे को परस्पर स्पर्श करें। इस प्रकार से चक्र मुद्रा प्रदर्शित होती है।
उच्च रक्तचाप-
उच्च रक्तचाप में ‘ज्ञान मुद्रा’ सहायक होती है। इस मुद्रा को करने से व्यक्ति को अपने रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। ज्ञान मुद्रा को करने के लिए अंगूठे और तर्जनी को परस्पर स्पर्श करें। यह मुद्रा शान्तचित होकर सम्पन्न करनी चाहिए और नियमित रूप से करनी चाहिए तभी राहत का अनुभव होता है।

कमर के रोग-
‘सन्निरोधिनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से कमर के रोगों पर नियंत्रण होता है। इस मुद्रा के लिए व्यक्ति अपने दोनों हाथों से मुत्ठियाँ बना कर उन्हे आमने-सामने कर जोड़ दें तथा थोडी देर तक कमर सीधी कर सुखासन पर बैठ कर यह मुद्रा सम्पन्न करें। इससे साधक को अपने कमर से सम्बधित रोगों में लाभ मिलता है। इस से कमर का तनाव भी समाप्त हो जाता है, कमर से सम्बधित अन्य रोगों में भी लाभ मिलता है।
गुर्दे के रोग-
यदि कोई गुर्दे के रोग से पीडि़त है या गुर्दे से सम्बधित किसी रोग से ग्रस्त है, तो वह यदि ‘गदा मुद्रा’ का नियमित अभ्यास करता है, तो उसे सम्बधित रोग पर नियंत्रण प्राप्त होता है। इस मुद्रा को प्रदर्शित करने के लिए दोनों हाथों की उंगलियों को एक दूसरे में फंसा दें। इससे गदा मुद्रा प्रदर्शित होगी। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से व्यक्ति को यदि गुर्दे में सूजन है तो उसे अच्छे परिणाम की प्राप्ति होती है।
हाथ और पांव से सम्बधित रोग-
यदि सायंकाल खड़े होकर ‘सम्पुटी मुद्रा’ को सम्पन्न किया जाए, तो साधक को हाथ और पांव से सम्बन्धित रोगों में आराम मिलता है। यदि पावों में अक्सर दर्द रहता हो तथा घुटने मोड़ने में अत्यधिक कष्ट हो, तो यह मुद्रा आराम दिलाने में सहायक होती है। वजन उठाने पर दर्द का अनुभव हो, तो इस मुद्रा को करने से लाभ होता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए बायें हाथ को आकाश की ओर रखें तथा उस पर दाहिने हाथ से सम्पुट करें। यह मुद्रा साधक 5 मिनट तक नित्य करें।
वात रोग
‘शंख मुद्रा’ इस मुद्रा को नित्य करने से व्यक्ति यदि वात रोग से पीडि़त है, तो उसे इस रोग में आराम मिलता है। इस मुद्रा को साधक प्रातः काल स्थिर भाव से बैठ कर सन्ध्यादि से पूर्व प्रदर्शित करे। इस मुद्रा के लिए बायें हाथ के अंगूठे को दाहिने हाथ से मुट्ठी बनाकर पकडे़ं तथा मुट्ठी को दाहिने हाथ की अंगुलियों से स्पर्श करायें, तो शंख मुद्रा प्रकट होगी। यह मुद्रा यदि नियमित रूप से 5-7 मिनट तक सम्पन्नकी जाय, तो वात रोगों में आश्चर्य जनक लाभ होता है।

यंत्रा और मंत्रा

यंत्रा और मंत्रा प्रजनन के देवता काम ने कादिविद्या मूलमंत्रा की उपासना की थी। जिसके बल से कामदेव का सामर्थय इतना बढ़ गया की वह बड़े-बड़े मुनियों के चित्त को भी आच्छत् करने लगा। ब्लें रति का बीज मंत्रा है। ब् और ल् उसके नेत्रा हैं और ए शक्ति रूप है। वपुषा पद से व्, लेह्येत पद से ले और महतां मुनिनां पद के अनुस्वार से लेकर उक्त बीज मंत्रा का उद्धरण किया जाता है। माया बीज और कामबीज के योग से ‘‘हृी क्लीं ब्लें’’ इस साध्य सिद्धमंत्रा का उद्धार है। इस मंत्रा से हृदयचक्र और महानाद के ऊपर शक्ति का न्यास किया जाता है। अर्थात् यंत्राकृति तैयार की जाती है। जिस का फल सौभाग्य प्राप्ति है।

इसी प्रकार महामृत्युजय यंत्रा और मंत्रा का विचार करें तो देखते हैं- इसके बीज हृौं जूं सः’ शिव-शक्तिमय हैं। हृौं शिवबीज, जूं जीवनबीज, सः शक्तिबीज है। शिवबीज हृौं से जीवनशिक्ति जूं का आप्यायन होता है तथा शक्तिबीज सः से जीवनशक्ति (जीवनक्रम) की वृद्धि होती है। जूं (जीवनशक्ति) के शिवशक्त्याश्रय होने से जीवन वृद्धि का नाम मृत्यु्जयसिद्धि है।

अभिष्ट की प्राप्ति के लिये मंत्रा और तंत्रा का या इनकी शक्तियों और प्रतिक्रियाओं का जो प्रयोग प्रतिकात्मक अथवा चित्रात्मक रूप से किया जाता है, उस स्वरूप को ‘यंत्रा’ कहा जाता है।

यंत्रा एवं उसकी साधना करके लौकिक कामनाओं की पूर्ति की जाती है। अथवा कहा जा सकता है कि अपनी कामना पूर्ति के लिये यंत्रा साधना क्रियात्मक विधान है। इसके द्वारा साधक साध्य से मिलकर अपनी समस्त इच्छाओं की पूर्ति करता है। इन यंत्रों के द्वारा न केवल हमारी सांसारिक इच्छायें पूर्ण होती हैं, बल्कि लौकिक सिद्धियाँ भी मिलती हैं जिनसे दुःखों की निवृति और अंत में मुक्ति भी संभव है।

प्रस्तुत ‘‘यंत्रा विशेषांक’’ में अनेक प्रकार के यंत्रा सम्बंधी लेख भिन्न-भिन्न लेखकों के द्वारा दिये गये हैं। वस्तुतः प्रत्येक साधक (लेखक) के अपने-अपने अनुभव के आधार पर ही यंत्रा सम्बंधी लेख प्रकाशित किये गये हैं। इस के साथ मेरी अपनी राय यही है कि आप किसी भी सिद्ध साधक के द्वारा प्राण प्रतिष्ठित यंत्रा ही लें क्योकि यंत्रा स्वयं में जड होते हैं; इनकी जब तक प्राण प्रतिष्ठा नहीं करवाई जाती तब तक यह चैत्नय अवस्था में नही आते और ना ही अपना पूर्ण शुभ प्रभाव ही प्रकट करते हैं। अथवा प्राण प्रतिष्ठा का विधान स्वयं समझकर स्वयं ही प्राण प्रतिष्ठा कर सकते हैं। यह भी ध्यान रहे की कभी-कभी यंत्रा पूजा की सम्पूर्ण विधि-विधान के बाद भी सिद्ध नहीं होते ऐसा उस पूजा की प्रक्रिया की सही जानकारी के आभाव के कारण होता है।