एलर्जी

“एलर्जी” एक आम शब्द, जिसका प्रयोग हम कभी किसी ख़ास व्यक्ति से मुझे एलर्जी है, के रूप में करते हैं, ऐसे ही हमारा शरीर भी ख़ास रसायन उद्दीपकों के प्रति अपनी असहज प्रतिक्रया को ‘एलर्जी’ के रूप में दर्शाता है।

बारिश के बाद आयी धूप तो ऐसे रोगियों क़ी स्थिति को और भी दूभर कर देती है, ऐसे लोगों को अक्सर अपने चेहरे पर रूमाल लगाए देखा जा सकता है, क्या करें छींक के मारे बुरा हाल जो हो जाता है।

हालांकि एलर्जी के कारणों को जानना कठिन होता है, परन्तु कुछ आयुर्वेदिक उपचार इसे दूर करने में कारगर हो सकते हैं, आप इन्हें अपनाएं और एलर्जी से निजात पाएं।

• नीम चढी गिलोय के डंठल को छोटे टुकड़ों में काटकर इसका रस हरिद्रा खंड चूर्ण के साथ 1.5 से तीन ग्राम नियमित प्रयोग करें, यह पुरानी से पुरानी एलर्जी में रामबाण औषधि है।

• गुनगुने निम्बू पानी का प्रातःकाल नियमित प्रयोग शरीर सें विटामिन- सी की मात्रा की पूर्ति कर एलर्जी के कारण होने वाले नजला-जुखाम जैसे लक्षणों को दूर करता है।

• अदरख, काली मिर्च, तुलसी के चार पत्ते, लौंग एवं मिश्री को मिलाकर बनायी गयी ‘हर्बल चाय’ एलर्जी से निजात दिलाती है।

• बरसात के मौसम में होनेवाले विषाणु (वायरस) संक्रमण के कारण ‘फ्लू’ जनित लक्षणों को नियमित ताजे चार नीम के पत्तों को चबा कर दूर किया जा सकता है।

• आयुर्वेदिक औषधि सितोपलादि चूर्ण’ एलर्जी के रोगियों में चमत्कारिक प्रभाव दर्शाती है।

• नमक पानी से ‘कुंजल क्रिया’ एवं ‘नेती क्रिया’ कफ दोष को बाहर निकालकर पुराने से पुराने एलर्जी को दूर कने में मददगार होती है।

• पंचकर्म की प्रक्रिया ‘नस्य’ का चिकित्सक के परामर्श से प्रयोग ‘एलर्जी’ से बचाव ही नहीं इसकी सफल चिकित्सा है।

• प्राणायाम में ‘कपालभाती’ का नियमित प्रयोग एलर्जी से मुक्ति का सरल उपाय है।

कुछ सावधानियां जिन्हें अपनाकर आप एलर्जी से खुद को दूर रख सकते हैं : –

• धूल, धुआं एवं फूलों के परागकण आदि के संपर्क से बचाव।

• अत्यधिक ठंडी एवं गर्म चीजों के सेवन से बचना।

• कुछ आधुनिक दवाओं जैसे : एस्पिरीन, निमासूलाइड आदि का सेवन सावधानी से करना।

• खटाई एवं अचार के नियमित सेवन से बचना।

हल्दी से बनी आयुर्वेदिक औषधि :- हरिद्रा खंड के सेवन से शीतपित्त, खुजली, एलर्जी, और चर्म रोग नष्ट होकर देह में सुन्दरता आ जाती है। बाज़ार में यह ओषधि सूखे चूर्ण के रूप में मिलती है। इसे खाने के लिए मीठे दूध का प्रयोग अच्छा होता है, परन्तु शास्त्र विधि में इसको निम्न प्रकार से घर पर बना कर खाया जाये तो अधिक गुणकारी रहता है। बाज़ार में इस विधि से बना कर चूँकि अधिक दिन तक नहीं रखा जा सकता, इसलिए नहीं मिलता है। घर पर बनी इस विधि से बना हरिद्रा खंड अधिक गुणकारी और स्वादिष्ट होता है। कई सालो से चलती आ रही एलर्जी, या स्किन में अचानक उठाने वाले चकत्ते, खुजली इसके दो तीन माह के सेवन से हमेशा के लिए ठीक हो जाती है। इस प्रकार के रोगियों को यह बनवा कर जरुर खाना चाहिए, और अपने मित्रो कोभी बताना चाहिए, यह हानि रहित निरापद बच्चे बूढ़े सभी को खा सकने योग्य है, जो नहीं बना सकते वे या शुगर के मरीज, कुछ कम गुणकारी, चूर्ण रूप में जो की बाज़ार में उपलब्ध हे का सेवन कर सकते हैं।

हरिद्रा खंड निर्माण विधि :-

सामग्री – हरिद्रा -320 ग्राम, गाय का घी – 240 ग्राम, दूध – 5 किलो, शक्कर -2 किलो।
सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, तेजपत्र, छोटी इलायची, दालचीनी, वायविडंग, निशोथ, हरड, बहेड़ा, आंवले, नागकेशर, नागरमोथा, और लोह भस्म, प्रत्येक 40-40 ग्राम (यह सभी आयुर्वेदिक औषधि विक्रेताओ से मिल जाएँगी), आप यदि अधिक नहीं बनाना चाहते तो हर वस्तु अनुपात रूप से कम की जा सकती है। (यदि हल्दी ताजी मिल सके तो 1 किलो 250 ग्राम लेकर छीलकर मिक्सर पीस कर काम में लें)

बनाने की विधि – हल्दी को दूध में मिलाकार खोया या मावा बनाये, इस खोये को घी डालकर धीमी आंच पर भूने, भुनने के बाद इसमें शक्कर मिलाये, सक्कर गलने पर शेष औषधियों का कपड छान बारीक़ चूर्ण मिला देवें। अच्छी तरह से पाक जाने पर चक्की या लड्डू बना लें।

सेवन की मात्रा – 20-25 ग्राम दो बार दूध के साथ।
(बाज़ार में मिलने वाला हरिद्रखंड चूर्ण के रूप में मिलता है, इसमें घी और दूध नहीं होता, शकर कम या नहीं होती अत : खाने की मात्रा भी कम 3 से 5 ग्राम दो बार रहेगी)।

सूर्य किरण चिकित्सा

सूर्य की रोशनी में सात रंग की किरणें होती हैं, ज्योतिषीय मतानुसार सूर्य की किरणों से अपने सातों ग्रहों को अनुकूल कर सकते हैं :-

Dr.R.B.Dhawan

जातक की कुंडली के प्रतिकूल ग्रहों को सूर्य की किरणों से चिकित्सा कर भाग्य को चमकाया जा सकता है, जन्म कुंडली द्वारा जब यह निश्चित हो जाता है कि कुंडली में कौन कौन से ग्रह कमजोर हैं, जिसे आप उस ग्रह के रंग से ठीक कर सकते हैं। तब उस ग्रह के लिए सूर्य की किरणों से उपचार करना सरल हो जाता है। सूर्य की सातों किरणों का प्रभाव अलग-अलग है, अपनी प्रकृति के अनुसार ये विभिन्न रोगों और मानसिक दोषों को दूर करने में सहायक सिद्ध होती हैं। सूर्य की सातों किरणों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। शरीर में तीन प्रकार के प्रमुख दोष होते हैं:- “वात, पित और कफ” जो ग्रह कमजोर होता है, उस रंग की कमी हो जाती है। जिसे आप जातक की कुंडली से जानकर उस का उपचार कर सकते हैं। जैसे अग्नितत्व कमजोर होगा तो लाल रंग से चिकित्सा करना होगा …

१. पीला (Yellow), नारंगी (Orange), लाल (Red),

2. हरा (Green)

3. बैंगनी (Voilet), नीला (Indigo), आसमानी (Blue)

औषधिय जल निर्माण :-

1. सूर्य किरण चिकित्सा के लिए जिस किरण (Violet, Indigo, Blue, Green, Yellow, Orange या Red) का औषधिय जल बनाना हो, उसी रंग की कांच की साफ़ बोतल ले लेनी चाहिए। यदि उस रंग की बोतल न हो तो उस कलर का BOPP ले कर बोतल पर लपेट दें, बोतलों को अच्छी तरह से धोकर साफ़ कर लें। उसके बाद उसमे साफ़ पीने का पानी भर दें। बोतल को ऊपर से तीन अंगुल खाली रखें, और ढक्कन लगाकर अच्छे से बंद कर दें।

2. पानी से भरी इन बोतलों को सूर्योदय के समय से 6 से 8 घंटे तक धूप में रख दें। बोतलें रखते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी बोतल की छाया दूसरी बोतल पर न पड़े। रात्रि को बोतल को घर के अंदर रख दें। इस प्रकार सूर्य किरण औषधि तैयार हो जाती है। यह औषधिय जल को रोगी को दिन में 3-4 बार पिलायें। एक बार तैयार किये गए औषधिय जल को 4 -5 दिन तक पी सकते हैं। औषधिय जल समाप्त होने के पश्चात पुनः बना लें।

औषधि सेवन कैसे करें : –

नारंगी रंग के औषधिय जल को भोजन करने के 15 मिनट बाद और 30 मिनट के अंदर लेना चाहिए। हरे या नीले रंग के औषधिय जल को खाली पेट या भोजन करने से एक घंटा पहले सेवन करना चाहिए। हरे रंग के औषधिय जल को प्रातः काल 200 मि. ली. तक ले सकते हैं। यह औषधिय जल शरीर से Toxins को बाहर निकालता है, एवं इसका कोई विपरीत प्रभाव भी नहीं है।

मात्रा :- एक बार में एक से दो चम्मच औषधिय जल लें, दिन में तीन या चार बार ले सकते हैं।

औषधीय जल सेवन से लाभ :

1. लाल (Red) रंग :- लाल रंग की बोतल का जल अत्यंत गर्म प्रकृति का होता है। अतः जिनकी प्रकृति गर्म हो उन्हें इसे नहीं लेना चाहिए। इसको पीने से खूनी दस्त या उलटी हो सकती है। इस जल का उपयोग केवल मालिश करने के लिए करना चाहिए। यह Blood और Nerves को उत्तेजित करता है। और शरीर में गर्मी बढ़ाता है। गर्मियों में इसका उपयोग नहीं करना चाहिए। यह सभी प्रकार के वात और कफ रोगों के लिए लाभ प्रदान करता है।

2. नारंगी (Orange) रंग :- नारंगी रंग की बोतल में तैयार किया गया जल Blood Circulation को बढ़ाता है, और मांसपेशियों को मजबूत करता है। यह औषधिय जल मानसिक शक्ति और इच्छाशक्ति को बढ़ाने वाला है। अतः यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में सूर्य या चन्द्रमा निर्बल है तो, उसे इस जल का उपयोग करके अत्यंत लाभ प्राप्त हो सकता है। यह औषधिय जल बुद्धि और साहस को भी बढ़ाता है। कफ सम्बंधित रोगों, खांसी, बुखार, निमोनिया, सांस से सम्बंधित रोग, Tuberculosis, पेट में गैस, हृदय रोग, गठिया, Anaemia, Paralysis आदि रोगों में लाभ देता है। यह औषधिय जल माँ के स्तनों में दूध की वृद्धि भी करता है।

3. पीला(Yellow) रंग :- शारीरिक एवं मानसिक स्वस्थता के लिए यह जल बहुत उपयोगी है परन्तु इस जल को थोड़ी मात्रा में लेना चाहिए। यह जल Digestive System को ठीक करता है अतः पेट दर्द, कब्ज आदि समस्यायों के निवारण हेतु इस जल का सेवन लाभकारी है। परन्तु पेचिश होने पर इस जल का प्रयोग वर्जित है। इसके अतिरिक्त हृदय, लीवर और Lungs के रोगों में भी इस जल को पीने से लाभ मिलता है।

4. हरा (Green) रंग :- यह औषधिय जल शारीरिक स्वस्थता और मानसिक प्रसन्नता देने वाला है। Muscles को regenerate करता है। Mind और Nervous system को स्वस्थ रखता है। इस जल को वात रोगों, Typhoid, मलेरिया आदि बुखार, Liver और Kidney में सूजन, त्वचा सम्बंधित रोगों, फोड़ा -फुन्सी, दाद, आँखों के रोग, डायबिटीज, सूखी खांसी, जुकाम, बवासीर, कैंसर, सिरदर्द, ब्लड प्रेशर, आदि में सेवन करना लाभप्रद है।

5. आसमानी (Blue) रंग: – यह जल शीतल औषधिय जल है। यह पित्त सम्बंधित रोगों में लाभप्रद है। प्यास को शांत करता है एवं बहुत अच्छा Antiseptic भी है। सभी प्रकार के बुखारों में सर्वोत्तम लाभकारी है। कफ वाले व्यक्तियों को इसका उपयोग नहीं करना चाहिए। यह बुखार, खांसी, दस्त, पेचिश, दमा, सिरदर्द, Urine सम्बन्धी रोग, पथरी, त्वचा रोग, नासूर, फोड़े -फुन्सी, आदि रोगों में अत्यंत लाभ प्रदान करता है।

6. नीला (Indigo) रंग:- यह औषधिय जल भी शीतल श्रेणी में आता है। इस औषधि को लेने में थोड़ी सी कब्ज की शिकायत हो सकती है, परन्तु यह शीतलता और मानसिक शान्ति प्रदान करता है। शरीर पर इस जल का प्रभाव बहुत जल्दी होता है। यह Intestine, Leucoria, योनिरोग आदि रोगों में विशेष लाभप्रद है। तथा शरीर में गर्मी के सभी रोगों को समाप्त करता है।

7. बैंगनी (Voilet) रंग :- इस औषधिय जल के गुण बहुतायत में नीले रंग के जल से मिलते जुलते हैं। इसके सेवन से Blood में RBC Count बढ़ जाता है। यही खून की कमी को दूर कर Anaemia रोग को ठीक करता है। Tuberculosis जैसे रोग को ठीक करता है। इस जल को पीने से नींद अच्छी आती है।

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ज्योतिष और मासिक धर्म

महिलाओं को मासिक धर्म या पीरियड्स 28 दिन में ही क्यों? :-

Dr.R.B.Dhawan

मासिक धर्म और चन्द्रमा दोनों के 28 दिवसीय चक्र का ज्योतिषीय सम्बन्ध है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 28 नक्षत्र (अभिजित सहित) होते हैं, जब किसी महिला के जन्म समय के नक्षत्र से वर्तमान चन्द्रमा का गोचर 28 नक्षत्रों पर पूर्ण होता है, तो नियमतः मासिक धर्म आरम्भ होता है। वस्तुत: मासिक धर्म महिलाओं के स्वास्थ्य का सूचक तंत्र है। जिसका ज्योतिषीय संबंध चंद्रमा ग्रह से होता है। इस चक्र में अनियमितता की वजह से महिलाओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जहां कुछ महिलाओं को पीरियड देरी से आते हैं तो, वहीं कुछ महिलाओं को मासिक चक्र पूरा होने से पहले ही पीरियड आ जाता है। समय से और नियमित माहवारी आना महिलाओं की सेहत के लिए बहुत अच्‍छा होता है। यदि कोई महिला लगातार अनियमित माहवारी का सामना कर रही है तो, उसको सावधान रहने की जरुरत है। अपने कुंडली के चंद्रमा और मंगल ग्रह पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आइए जानते हैं आखिर क्‍यों कई बार महिलाओं को अनियमित मासिक धर्म जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

एक या दो दिन देरी से पीरियड आना या जल्‍दी आना फिर भी सामान्‍य सी बात है। मासिक धर्म का च‍क्र 28 दिनों का होता है। अगर पीरियड एक हफ्ते देरी से आते हैं या पहले ही आते हैं तो यह महिला के लिए चिंताजनक स्थिति है, और इस अवधि में महिलाओं को असहनीय दर्द भी सहना पड़ता है। यहां हम बता रहे हैं कि जल्‍दी और देरी से मासिक धर्म आने का कारण क्‍या है? क्‍या यह स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्‍याएं पैदा कर सकता है?

1. हार्मोनल असंतुलन :- यदि आपके पीरियड अनियमित हैं तो आपको जांच करने की जरुरत है कि कहीं हार्मोन में तो कुछ गड़बड़ नहीं हैं, क्‍योंकि हार्मोन अंसतुलन होने की वजह इसका असर सीधा मासिक धर्म में पड़ता है। एन्डोमीट्रीओसिस एंडोमीट्रीओसिस एक ऐसी स्थिति होती है, जहां गर्भाशय, योनि की दीवारों और फैलोपियन ट्यूबों के अस्तर में एक ऊतक का विकास होता है। जिसकी वजह से मासिक धर्म में अनियमिताएं होती हैं।

2. पोषक तत्वों की कमी :- पौषण की ओर ध्यान देना भी नि‍यमित मासिक धर्म के लिए आवश्यक है। यदि शरीर में निश्चित पोषक तत्‍वों की कमी होने लगती है तो भी इसका असर मासिक धर्म में दिखाई देता है।

3. तनाव :- कभी कभी स्‍ट्रेस का असर भी महिलाओं के मासिक धर्म पर देखने पर मिलता है। जब कोई महिला तनाव में होती है तो शरीर से कॉर्टिसॉल और एड्रेनालाईन हार्मोन शरीर से निकलते हैं, जिसके वजह से मासिक धर्म इफेक्‍ट होते हैं,
थाईराइड की समस्‍या चाहे हाइपरथायरॉडीज या हाइपोथायरायडिज्म हो, दोनों ही मामलों में मासिक धर्म के चक्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। थाइराइड का स्‍तर ज्‍यादा हो या कम लेकिन ये मासिक धर्म के लिए बिल्‍कुल भी ठीक नहीं है। हार्मोन्‍स की गड़बड़ी या असंतुलन की वजह से होता है। इस सिंड्रोम की वजह से ऑवरीज में अंडों का विकास होने में असफल हो जाता है। जिसकी वजह से मासिक धर्म में समस्‍या होती है। और संतान होने में भी समस्या आती है, जिसे आप दैनिक दिनचर्या में सुधार कर ठीक कर सकते हैं।

उपचार :-

1. कैल्शियम की मात्रा को संतुलित करें क्योंकि इसका सम्बन्ध चंद्रमा से है। माँ से संबंध मधुर रखें, पानी अपने वजन के अनुसार पियें। फ्रीज़ का सामान नहीं लें।

2. अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें। भाई से संबंध मधुर रखें, क्योंकि रक्त का संबंध मंगल से है, मासिक में रक्त डिस्चार्ज होता है।

3. लाल मिर्च व खट्टा नहीं खायें और न ही लाल वस्त्र पहनें।क्योकि इससे क्रोध बड़ेगा।

4. सोना नहीं पहने, चाँदी के आभूषणों का प्रयोग अधिक किया करें।

5. पीले वस्त्र अधिक धारण करें, हल्दी मिश्रित दूध का सेवन किया करें।

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बथुआ

बथुआ के गुण और लाभ :-

Dr.R.B.Dhawan

इन दिनों दिनों बाज़ार में खूब बथुए का साग आ रहा है, बथुआ संस्कृत भाषा में वास्तुक और क्षारपत्र के नाम से जाना जाता है, बथुआ एक ऐसी सब्जी या साग है, जो गुणों की खान होने पर भी बिना किसी विशेष परिश्रम और देखभाल के खेतों में स्वत: ही उग जाता है। एक डेढ़ फुट का यह हराभरा पौधा कितने ही गुणों से भरपूर है। बथुआ के परांठे और रायता तो लोग चटकारे लगाकर खाते हैं, बथुआ का शाक पचने में हल्का, रूचि उत्पन्न करने वाला, शुक्र तथा पुरुषत्व को बढ़ने वाला है। यह तीनों दोषों को शांत करके उनसे उत्पन्न विकारों का शमन करता है। विशेषकर प्लीहा का विकार, रक्तपित, बवासीर तथा कृमियों पर अधिक प्रभावकारी है।

– इसमें क्षार होता है, इसलिए यह पथरी के रोग के लिए बहुत अच्छी औषधि है, इसके लिए इसका 10-15 ग्राम रस सवेरे शाम लिया जा सकता है।

– यह कृमिनाशक मूत्रशोधक और बुद्धिवर्धक है।

-किडनी की समस्या हो जोड़ों में दर्द या सूजन हो ; तो इसके बीजों का काढ़ा लिया जा सकता है, इसका साग भी लिया जा सकता है।

– सूजन है, तो इसके पत्तों का पुल्टिस गर्म करके बाँधा जा सकता है, यह वायुशामक होता है।

– गर्भवती महिलाओं को बथुआ नहीं खाना चाहिए।

– एनीमिया होने पर इसके पत्तों के 25 ग्राम रस में पानी मिलाकर पिलायें।

– अगर लीवर की समस्या है, या शरीर में गांठें हो गई हैं तो, पूरे पौधे को सुखाकर 10 ग्राम पंचांग का काढ़ा पिलायें।

– पेट के कीड़े नष्ट करने हों या रक्त शुद्ध करना हो तो इसके पत्तों के रस के साथ नीम के पत्तों का रस मिलाकर लें, शीतपित्त की परेशानी हो, तब भी इसका रस पीना लाभदायक रहता है।

– सामान्य दुर्बलता बुखार के बाद की अरुचि और कमजोरी में इसका साग खाना हितकारी है।

– धातु दुर्बलता में भी बथुए का साग खाना लाभकारी है।

– बथुआ को साग के तौर पर खाना पसंद न हो तो इसका रायता बनाकर खाएं।

– बथुआ लीवर के विकारों को मिटा कर पाचन शक्ति बढ़ाकर रक्त बढ़ाता है। शरीर की शिथिलता मिटाता है। लिवर के आसपास की जगह सख्त हो, उसके कारण पीलिया हो गया हो तो छह ग्राम बथुआ के बीज सवेरे शाम पानी से देने से लाभ होता है।

– सिर में अगर जुएं हों तो बथुआ को उबालकर इसके पानी से सिर धोएं। जुएं मर जाएंगे और सिर भी साफ हो जाएगा।

– बथुआ को उबाल कर इसके रस में नींबू, नमक और जीरा मिलाकर पीने से पेशाब में जलन और दर्द नहीं होता।

– यह पाचनशक्ति बढ़ाने वाला, भोजन में रुचि बढ़ाने वाला पेट की कब्ज मिटाने वाला और स्वर (गले) को मधुर बनाने वाला है।

– पत्तों के रस में मिश्री मिला कर पिलाने से पेशाब खुल कर आता है।

– इसका साग खाने से बवासीर में लाभ होता है।

– कच्चे बथुआ के एक कप रस में थोड़ा सा नमक मिलाकर प्रतिदिन लेने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।

बालरोग चिकित्सा

बच्चों के रोग :-
Dr.R.B.Dhawan

बच्चों की चिकित्सा बड़ों की चिकित्सा से बहुत अलग होती है, क्योंकि बच्चे अपने रोग या पीड़ा को शब्दों से नहीं बता सकते, चिकित्सक को उसकी पीड़ा संकेतों से ही समझनी होती है। इसके अतिरिक्त माता-पिता को उसकी हर तकलीफ पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। बहुत मामलों में घरेलू नुस्खों से बहुत लाभ होता है, परंतु इसके लिए हर मां पिता को बच्चे के साधारण रोगों की या तकलीफ की जानकारी हो तो चिकित्सक के पास कम से कम जाना पड़ता है।

दस्त लगने पर : – 1. जायफल या सोंठ अथवा दोनों का मिश्रण पानी में घिसकर सुबह-शाम 3 से 6 रत्ती (करीब 400 से 750 मिलीग्राम) देने से हरे दस्त ठीक हो जाते हैं।

2. दो ग्राम खसखस पीसकर 10 ग्राम दही में मिलाकर देने से बच्चों की दस्त की तकलीफ दूर होती है।

पेट की गड़बड़ी या दर्द :-  5 ग्राम सोंफ लेकर थोड़ा कूट लें। एक गिलास उबलते हुए पानी में सोंफ लेकर थोड़ा कूट लें। एक गिलास उबलते हुए पानी में डालें व उतार लें और ढँककर ठण्डा होने के लिए रख दें। ठण्डा होने पर मसलकर छान लें। यह सोंफ का 1 चम्मच पानी 1-2 चम्मच दूध में मिलाकर दिन में 3 बार शिशु को पिलाने से शिशु को पेट फूलना, दस्त, अपच, मरोड़, पेटदर्द होना आदि उदरविकार नहीं होते हैं। दाँत निकलते समय यह सोंफ का पानी शिशु को अवश्य पिलाना चाहिए जिससे शिशु स्वस्थ रहता है।

अपचः- नागरबेल के पान के रस में शहद मिलाकर चाटने से छोटे बच्चों का आफरा, अपच तुरंत ही दूर होता है।

सर्दी-खाँसी :- 1. हल्दी का नस्य देने से तथा एक ग्राम शीतोपलादि चूर्ण पिलाने से अथवा अदरक व तुलसी का 2-2 मि.ली. रस 5 ग्राम शहद के साथ देने से लाभ होता है।

2. एक ग्राम सोंठ को दूध अथवा पानी में घिसकर पिलाने से बच्चों की छाती पर जमा कफ निकल जाता है।

3. नागरबेल के पान में अरंडी का तेल लगाकर हल्का सा गर्म कर छोटे बच्चे की छाती पर रखकर गर्म कपड़े से हल्का सेंक करने से बालक की छाती में भरा कफ निकल जाता है।
वराधः (बच्चों का एक रोग हब्बा-डब्बा)- सर्दी जुखाम और छाती में कफ व खांसी अक्सर रहना।

1. इस के लिए आक के पौधे की रूई का छोटा सा गद्दा बना लिया जायेगा, उस पर बच्चे को सुलाने से यह रोग ठीक हो जाता है।

2. जन्म से 40 दिन तक कुल मिलाकर दो आने भर (1.5 – 1.5 ग्राम) सुबह-शाम शहद चटाने से बालकों को यह रोग नहीं होता।

3. मोरपंख की भस्म 1 ग्राम, काली मिर्च का चूर्ण 1 ग्राम, इनको घोंटकर छः मात्रा बनायें। जरूरत के अनुसार दिन में 1-1 मात्रा तीन-चार बार शहद से चटा दें।

4. बालरोगों में 2 ग्राम हल्दी व 1 ग्राम सेंधा नमक शहद अथवा दूध के साथ चटाने से बालक को उलटी होकर वराध में राहत मिलती है। यह प्रयोग एक वर्ष से अधिक की आयुवाले बालक पर और चिकित्सक की सलाह से ही करें।

न्यमोनिया में :- महालक्ष्मीविलासरस की आधी से एक गोली 10 से 50 मि.ली. दूध अथवा 2 से 10 ग्राम शहद अथवा अदरक के 2 से 10 मि.ली. रस के साथ देने से न्यूमोनिया में लाभ होता है।

फुन्सियाँ होने परः- 1. पीपल की छाल और ईंट पानी में एक साथ घिसकर लेप करने से फुन्सियाँ मिटती हैं।

2. हल्दी, चंदन, मुलहठी व लोध्र का पाऊडर मिलाकर या किसी एक का भी पाऊडर पानी में मिलाकर लगाने से फुन्सी मिटती हैं।

दाँत निकलने परः -1. तुलसी के पत्तों का रस शहद में मिलाकर मसूढ़े पर घिसने से बालक के दाँत बिना तकलीफ के निकल जाते हैं।

2. मुलहठी का चूर्ण मसूढ़ों पर घिसने से भी दाँत जल्दी निकलते हैं।

नेत्र रोग के लिये:- त्रिफला या मुलहठी का 5 ग्राम चूर्ण तीन घंटे से अधिक समय तक 100 मि.ली. पानी में भिगोकर फिर थोड़ा-सा उबालें व ठण्डा होने पर मोटे कपड़े से छानकर आँखों में डालें। इससे समस्त नेत्र रोगों में लाभ होता है। यह प्रतिदिन ताजा बनाकर ही प्रयोग में लें तथा सुबह का जल रात को उपयोग में न लेवें।

हिचकीः धीरे-धीरे प्याज सूँघने से लाभ होता है।

पेट के कीड़े:- 1. पेट में कृमि होने पर शिशु के गले में छिले हुए लहसुन की कलियों का अथवा तुलसी का हार बनाकर पहनाने से आँतों के कीड़ों से शिशु की रक्षा होती है।

2. सुबह खाली पेट एक ग्राम गुड़ खिलाकर उसके पाँच मिनट बाद बच्चे को दो काली मिर्च के चूर्ण में वायविडंग का दो ग्राम चूर्ण मिलाकर खिलाने से पेट के कृमि में लाभ होता है। यह प्रयोग लगातार 15 दिन तक करें तथा एक सप्ताह बंद करके आवश्यकता पड़ने पर पुनः आरंभ करें।

3. पपीते के 11 बीज सुबह खाली पेट सात दिन तक बच्चे को खिलायें। इससे पेट के कृमि मिटते हैं। यह प्रयोग वर्ष में एक ही बार करें।

4. पेट में कृमि होने पर उन्हें नियमित सुबह-शाम दो-दो चम्मच अनार का रस पिलाने से कृमि नष्ट हो जाते हैं।

5. गर्म पानी के साथ करेले के पत्तों का रस देने से कृमि का नाश होता है।

6. नीम के पत्तों का 10 ग्राम रस 10 ग्राम शहद मिलाकर पिलाने से उदरकृमि नष्ट हो जाते हैं।

7. तीन से पाँच साल के बच्चों को आधा ग्राम अजवायन के चूर्ण को समभाग गुड़ में मिलाकर गोली बनाकर दिन में तीन बार खिलाने से लाभ होता है।

8. चंदन, हल्दी, मुलहठी या दारुहल्दी का चूर्ण भुरभराएँ।

9. मुलहठी का चूर्ण या फुलाया हुआ सुहागा मुँह में भुरभुराएँ या उसके गर्म पानी से कुल्ले करवायें। साथ में 1 से 2 ग्राम त्रिफला चूर्ण देने से लाभ होता है।

मुँह से लार निकलना:- कफ की अधिकता एवं पेट में कीड़े होने की वजह से मुँह से लार निकलती है। इसलिए दूध, दही, मीठी चीजें, केले, चीकू, आइसक्रीम, चॉकलेट आदि न खिलायें। अदरक एवं तुलसी का रस पिलायें। कुबेराक्ष चूर्ण या ‘संतकृपा चूर्ण’ खिलायें।

तुतलापनः -1. सूखे आँवले के 1 से 2 ग्राम चूर्ण को गाय के घी के साथ मिलाकर चाटने से थोड़े ही दिनों में तुतलापन दूर हो जाता है।

2. दो रत्ती शंखभस्म दिन में दो बार शहद के साथ चटायें तथा छोटा शंख गले में बाँधें एवं रात्रि को एक बड़े शंख में पानी भरकर सुबह वही पानी पिलायें।

3. बारीक भुनी हुई फिटकरी मुख में रखकर सो जाया करें। एक मास के निरन्तर सेवन से तुतलापन दूर हो जायेगा।

यह प्रयोग साथ में करवायें- अन्तःकुंभक करवाकर, होंठ बंद करके, सिर हिलाते हुए ‘ॐ…’ का गुंजन कंठ में ही करवाने से तुतलेपन में लाभ होता है।

शैयापर मूत्र (Enuresis)- सोने से पूर्व ठण्डे पानी से हाथ पैर धुलायें।

औषधीय प्रयोगः- सोंठ, काली मिर्च, बड़ी पीपर, बडी इलायची, एवं सेंधा नमक प्रत्येक का 1-1 ग्राम का मिश्रण 5 से 10 ग्राम शहद के साथ देने से अथवा काले तिल एवं खसखस समान मात्रा में मिलाकर 1-1 चम्मच चबाकर खिलाने एवं पानी पिलाने से लाभ होता है। साथ में पेट के कृमि की चिकित्सा भी करें।

दमा (श्वास फूलना):- बच्चे के पैर के तलवे के नीचे थोड़ी लहसुन की कलियों को छीलकर थोड़ी देर रखें, एवं ऊपर से ऊन के गर्म मोजे पहना दें। ऐसा करने से दमा धीरे-धीरे मिट जाता है। साथ में 10 से 20 मि.ली. अदरक एवं 5 से 10 मि.ली. तुलसी का रस दें।

सिर में दर्द:- अरनी के फूल सुँघाने से अथवा अरण्डी के तेल को थोड़ा सा गर्म करके नाक में 1-1 बूँद डालने से बच्चों के सिरदर्द में लाभ होता है।

बालकों के शरीर पुष्टि के लिए:- 1. तुलसी के पत्तों का 10 बूँद रस पानी में मिलाकर रोज पिलाने से स्नायु एवं हड्डियाँ मजबूत होती हैं।

2. शुद्ध घी में बना हुआ हलुआ खिलाने से शरीर पुष्ट होता है।

मिट्टी खाने की आदत होने परः- बालक की मिट्टी खाने की आदत को छुड़ाने के लिए पके हुए केलों को शहद के साथ खिलायें।

स्मरणशक्ति बढ़ाने के लिए:-  1. तुलसी के पत्तों का 5 से 20 मि.ली. रस पीने से स्मरणशक्ति बढ़ती है।

2. पढ़ने के बाद भी याद न रहता हो सुबह एवं रात्रि को दो तीन महीने तक 1 से 2 ग्राम ब्राह्मी तथा शंखपुष्पी लेने से लाभ होता है।

3. पांच‌ से 10 ग्राम शहद के साथ 1 से 2 ग्राम भांगरा चूर्ण अथवा एक से दो ग्राम शंखावली के साथ उतना ही आँवला चूर्ण खाने से स्मरणशक्ति बढ़ती है।

4. बदाम की गिरी, चारोली एवं खसखस को बारीक पीसकर, दूध में उबालकर, खीर बनाकर उसमें गाय का घी एवं मिश्री डालकर पीने से दिमाग पुष्ट होता है।

5. दस ग्राम सौंफ को अधकूटी करके 100 ग्राम पानी में खूब उबालें। 25 ग्राम पानी शेष रहने पर उसमें 100 ग्राम दूध, 1 चम्मच शक्कर एवं एक चम्मच घी मिलाकर सुबह-शाम पियें। घी न हो तो एक बादाम पीसकर डालें। इससे दिमाग की शक्ति बढ़ती है।

बच्चे को नींद न आये तब :- 1. बालक को रोना बंद न होता हो तो जायफल पानी में घिसकर उसके ललाट पर लगाने से बालक शांति से सो जायेगा।

2. प्याज के रस की 5 बूँद को शहद में मिलाकर चाटने से बालक प्रगाढ़ नींद लेता है।

स्रोत :- आरोग्य निधि पुस्तक।

अश्वगंधा 

Dr.R.B.Dhawan

अश्वगंधा प्राश (निर्माण विधि) :-

अश्वगंधा का चूर्ण 500 ग्राम, सोंठ का चूर्ण 250 ग्राम, बड़ी पीपल का चूर्ण 125 ग्राम, काली मिर्च का चूर्ण 50 ग्राम। दालचीनी, इलायची, तेजपत्र, और लौंग सभी प्रत्येक पचास-पचास ग्राम बारीक़ पीस लेवें, तदन्तर सबको 6 किलो भैंस के दूध में उबालकर उसमे 3 किलो 500 ग्राम चीनी, और 1 किलो 500 ग्राम शुद्ध घी लेकर उन्हें मिलाकर मिट्टी के बर्तन में मन्दाग्नि पर पकावें। जब उबाल आ जाये तो अश्वगंधा आदि के उपरोक्त समस्त चूर्ण को थोड़े दूध के साथ पकाकर इसमें डाल दें, और उसके बाद अग्नि पर इतना पकावें कि वह करछी से लगने लगें । तदनन्तर उसमें दालचीनी, तेजपत्र, नागकेशर, और इलायची का 20 ग्राम चूर्ण डालकर पकावें । जब उसमें चावल के समान दाने पड़ने लगें और घी अलग होने लगे तब उतारकर पिपलामूल, जीरा, गिलोय, लौंग, तगर, जायफल, खश, सुगंधवाला, सफेद चंदन, बेलगिरी, कमल, धनिया, धाय के फूल, वंशलोचन, आमला, खेर, कर्पूर, पुनर्नवा, वन तुलसी, चिता, और शतावर, प्रत्येक द्रव्य को पांच पांच ग्राम लेकर महीन चूर्ण बनाकर मिलावें और एक बर्तन में फेला देवें। शीतल होने पर प्रमाण अनुसार टुकड़े कर लें। 
शास्त्रोक्त गुण धर्म :-

इसके सेवन से कफ, श्वास, अजीर्ण, वातरक्त, प्लीहा, मेदरोग, दुर्जय आमवात, शोथ, शूल, पाण्डु रोग, और अन्य वात कफ विकार नष्ट होते है। इसका एक मास तक प्रयोग करने से वृद्ध भी जवान बन सकता है। मन्दाग्नि के लिए यह बहुत ही हितकर है।  यह प्राश शक्ति उत्तपन्न करने वाला तथा बालकों के शरीरों को बढ़ाने वाला है। यह सर्व व्याधि नाशक पाक है।

Shukracharya

शंख

शंख का औषधीय  महत्व

Dr.R.B.Dhawan
शंख का अध्यात्मिक महत्व ही नहीं है, भैषज्य रूप में भी बड़ा महत्व है। यह अनेक प्रकार से गुणकारी है तथा मस्तिष्क, पाचन तन्त्र, उदर और रक्त पर भी इसकी उपयुक्त क्रिया देखी गयी है। औषधी शास्त्र में इसके अनेक अद्भुत प्रयोग देखने में आते हैं। इसकी भस्म, वटी आदि का सेवन अनेक रोगों पर कराया जाता है। इस विषय में प्रसंगवश परिचय देना अपेक्षित है।

शंखोदक के लाभ-
शंख में जल भर कर दो-तीन घंटे तक रहने दें। फिर यह जल किसी विशेष रोगों पर लाभकारी होता है। किन्तु शंख जितना उत्तम श्रेणी का होगा, उतना ही प्रभावकारी सिद्ध होगा। सामान्य प्रकार के शंख इस कार्य में अल्प प्रभाव वाले ठहरते हैं।

शंख का जल मन को प्रसन्न करने वाला, मस्तिष्क को शीतल करने वाला होता है। इसकी मात्रा लगभग चार चम्मच होनी चाहिए, दिन में तीन-चार बार चार-चार घंटे के अंतराल पर देना चाहिए। इसके सेवन से अनेक रोग दूर हो सकते है, जैसे मृगी (अपस्मार), अपतंत्रक (हिस्टीरिया), जी घबराना, जी मिचलाना, मानसिक अशांति, थकान आदि। रक्त-संचालन की अनियमित प्रक्रिया पर भी यह अनुकूल रूप से प्रभाव डालती है। शंखोदक का प्रभाव हृदय पर भी हितकर पड़ता है।
शंख-भस्म-
शंख की आयुर्वेदिक विधि से भस्म बनाई जाती है। यह भस्म पाचन तंत्र पर भी विशेष प्रभाव डालती है। अजीर्ण, अग्निमांद्य, संग्रहणी आदि में अधिक हितकर होती है। जिगर, तिल्ली, गुल्म, आमांश, आम्लपित आदि में भी उपयोगी है। इसकी भस्म स्वर्णमाक्षिक की विधि से या अन्य विधियों से बनाई जाती है। वस्तुतः बिजौरे नींबू के रस में तपा-तपा कर शंख को सिद्ध कर लिया जाता है और फिर उसे कुलथी-क्वाथ, छांछ या बकरी के मूत्र में घोंट कर जगपुट में आरने उपलों की आग दे कर फूँक लेते हैं। किंतु भस्म बनाने का कार्य अनुभव-प्राप्त व्यक्ति ही ठीक प्रकार से कर सकता है। नये आदमी को असफलता हो सकती है।

आयुर्वेद की प्रसिद्ध शंखवटी-
इसमें मुख्य द्रव्य तो शंख ही है, जिसे नींबू स्वरस में तपा कर बुझाना होता है। यह वटी अजीर्ण, मंदाग्नि, ग्रहणी, उदर रोग तथा क्षय प्रभृति रोगों को दूर करने में उपयोगी है। पाठको की जनकारी के लिए इसका नुस्खा यहाँ लिखा जाता है- शंख, इमलीक्षार, पंचलवण समग्र, हिंग और त्रिकुट (सोंठ काली मिर्च, पीपल) 4-4 भाग, नींबू का स्वरस 20 भाग, पारा, गन्धक और वत्सनाभ 1-1 भाग।
बनाने कि विधि यह है कि नींबू के स्वरस में इमली खार और पाँचों नमक डाल कर घुलने दें तथा शंख को तपा-तपा कर इमलीक्षार नमक, नींबू के रस वाले घोल में कम से कम सात बार बुझायें। बुझाना अधिक पडता है। कुछ लोग इक्कीस बार तपा-तपा कर भी उचित मानते हैं। पारद-गंधक की कज्जली कर के मिलावें और शेष द्रव्य भी मिला कर एक प्रहर घोटते हुए नींबू के रस में ही एक-एक रत्तिप्रमाण गोलियाँ बना ले तथा आवश्यकता पड़ने पर लक्षणानुसार उचित अनुपान के साथ दवा का व्यवहार करना चाहिए। गंधक आदि द्रव्य को शुद्ध करके प्रयोग में लाने चाहिए।
महाशंख-वटि-
यह भी आयुर्वेद की एक प्रसिद्ध औषधी है। इसका व्यवहार उदरशुल, अर्जीण, मंदाग्नि आदि में अधिक होता है। यह गोलियाँ अन्न को पचाने वाली है। नियम निम्न प्रकार है- शंख, पंच लवन, हींग,इमली क्षार, त्रिकटु, गन्धक, पारद और वत्सनाभ। सभी समान मात्रा में लेने चाहिए। शंख को तपा-तपा कर शुद्ध कर लें। भावना द्रव्य चित्रक मूल क्वाथ, अपामार्ग पत्र स्वरस और नींबू का स्वरस। इन सब की सात-सात भावनाएँ देनी चाहियें। गंधक, पारद और वात्सनाम का प्रयोग भी शोधनोपरांत ही करें। क्योंकि यह द्रव्य भी अशुद्ध अवस्था में प्रयोग में नहीं लाये जाते। यह गोलियाँ दो-दो रत्ती की बना लेनी चाहियें। आवश्यकता होने पर उचित अनुमान से देने पर शीघ्र लाभ करती हैं। शंख का उपयोग इसी प्रकार अन्य अनेक रोगों में होता है। बहुत से आयुर्वेदिक नुस्खों में इसका उपयोग योगवाही रूप से भी होता है। किंतु भस्मादि के लिये भी शंख अच्छी किस्म का लेना चाहिए।

संदर्भ ग्रंथ- आयुर्वेद सार संग्रह

गंगाजल स्नान

गंगाजल से स्नान का महत्व:-

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आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर में 9 छिद्र होते हैं। वे रात में शयन करने से अपवित्र हो जाते हैं। अतः प्रातः स्नान अवश्य करे। तीर्थ में स्नान करना हो तो शौच वाला कपड़ा बदल देना चाहिये। स्नानादि के बाद ही तीर्थ-स्नान करना चाहिये; क्योंकि वह प्रशस्त तथा पुण्यजनक भी होता है। यदि गंगा में स्नान करे तो निम्नाकिंत मन्त्र से गंगाजी की प्रार्थना करे-

विष्णुपादाब्जसम्भूते गङ्गे त्रिपथगामिनि।
धर्मद्रवीति विख्याते पापं मे हर जाह्नवि।।
गङ्ग गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।
मुन्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।। (पुराण)

‘स्नान’ शब्द का अर्थ ही शुचिता है, और गंगाजल स्नान से तो शरीर और मन दोनों पवित्र होते हैं। हमारे शरीर में जो पसीना होता है, उसका जलीय अंश तो भाप बनकर उड़ जाता है, और पार्थिव अंश मैल बनकर जम जाता है। यदि नित्य स्नान करके उसे धोया न जाये तो शरीर में मैल की एक तह जम जायगी, जिससे रोमकूप के छिद्र बंद हो जायेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि भीतर का मल तथा दुषित वायु बाहर नहीं निकल पायेगी, जिससे शरीर में दुर्गन्ध और अनेक रोगों की उत्पत्ति हो जायेगी।

स्नान ऐसी विधि से करना चाहिये, जिससे मैल अच्छी तरह छूट जाये। इसके लिये 2-4 चार लोटा पानी डाल लेना पर्याप्त नहीं, किंतु पर्याप्त जल लेकर शरीर को खूब रगड़ कर पानी से धोना चाहिये। यह कार्य अधिक जल वाले तालाब तथा बावड़ी में और सबसे अच्छा बहते हुए जल वाली नदियों में होता है; क्योंकि नदी में हमारे शरीर से निकलता हुआ मैल बहता जाता है और उसकी जगह नया स्वच्छ जल आता जाता है। इसीलिये धर्म शास्त्रों में घर की अपेक्षा तालाब, तालाब की अपेक्षा नदी और नदी की अपेक्षा गंगादि पवित्र जल वाली नदियों में स्नान को उत्तम माना है।

शास्त्रों में गंगाजल स्नान की पवित्रता का जो वर्णन है वह अंधविश्वास मात्र नहीं है। इस युग में भी गंगा के जल की पवित्रता को अपने अनेकों वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा परीक्षित भौतिक वैज्ञानिकों ने भी मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है। वैज्ञानिकों ने अति स्वच्छ गंगोत्री के जल का तथा अनेकों नदी-नाले, गंद मल-मूत्र के नाले। अति अस्वच्छ वाराणसी, कलकत्ते के गंगा जल का भी परीक्षण करके बताया है कि गंगा जल में रोग के कीटाणुओं को डालने पर वे दूसरे जलों की तरह वृद्धि को प्राप्त नहीं होते, प्रत्युत बहुत शीघ्र मर जाते हैं। वर्षों रखा रहने पर भी गंगा जल में कीड़े नहीं पड़ते। इसीलिये श्रद्धापूर्वक गंगाजल लाकर घर में रखते हैं और पूजा आदि कार्यो में तथा मृत्यु काल में मरते हुए प्राणी के मुख में डालते हैं। गंगा जल में कीड़े न पड़ने का गुण केवल गंगाजलत्व के कारण ही नहीं है, किंतु गंगाजी के पवित्र क्षेत्र का भी प्रभाव उसमें होता है। गंगाजी से निकली नहरों के विशुद्ध जल में तो कीड़े पड़ जाते हैं, परंतु गंगा क्षेत्र में बहती गंगाजी के अशुद्ध जल में कभी नहीं पड़ते!

दूसरी नदियों के जल की भाँति गंगाजल वर्षा-ऋतु में दूषित नहीं होता। प्रवाह में से निकाला हुआ गंगाजल बासी, ठंडा, गरम या अस्र्पशीय आदि से छू जाने पर भी दूषित नहीं होता। गंगाजी में रात्रि में भी स्नान करने से दोष नहीं होता। घर में लाकर गंगाजल स्नान करने पर भी अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। यह महात्म्य सर्वत्र शास्त्रों में निर्दिष्ट है। सर्व प्रथम सिर में जल डालना चाहिये; इससे सिर आदि की गर्मी पैरों से जाती है। इसके विपरीत पैरों में प्रथम गंगाजल डालने से पैर आदि अंगो की गर्मी मस्तिष्क (सिर) में पहुँच कर हानि पहुँचाती है। यही कारण है कि गंगा आदि जलाशयों पर पहुँचकर प्रथम सिर में गंगाजल धारण करके प्रणाम करने का शास्त्रों में विधान किया है। ऐसा करने से भौतिक विज्ञानानुसार उक्त लाभ तो होता ही है, किंतु असधिदैविक विज्ञानानुसार वरूण देवता तथा गंगा आदि देवियों का आदर भी हो जाता है। नदियों में जिधर से प्रवाह आ रहा हो उधर मुख करके स्नान करके स्नान करना चाहिये तथा बावड़ी, तालाब आदि में सूर्य की ओर मुख करके स्नान करना चाहिये। गंगाजल स्नान करते समय जल का स्पर्श पाते ही वाणी प्रफुल्लित हो जाती है, उसका सदुपयोग भगवान नाम का कीर्तन, स्तोत्रपाठ आदि द्वारा करना चाहिये। मनोविज्ञानानुसार गंगादि पवित्र तीर्थों के साथ मानसिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिये और आधिदैव विज्ञानानुसार साधारण जल को भी पवित्र जल बनाने के लिये निम्न श्लोक बोलना चाहिये-

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू।।

बीमारी में भोजन करने के बाद, अजीर्ण में 10 बजे से 3 बजे तक रात्रि में स्नान करने से शारीरिक हानि होती है। बहुत वस्त्रों को पहने हुए स्नान करने से शरीर मर्दन में बाधा होती है। अलंकार-आभूषण धारण करके स्नान करने से आभूषणों की क्षति होती है। नग्न होकर नहाना निर्लज्जता का द्योतक तो होता ही है, जल देवता का निरादर भी होता है। इन सब कारणों से शास्त्रों में उक्त प्रकार से स्नान करने का निषेध किया है।

नातुरो न भुक्त्वा नाजीर्णे न बहुवाससा न नग्नो नाश्नन् नालङ्कृतो न सस्त्रजो न निशायाम्।।

दातुन करने के बाद स्नान- ध्यान का विधान है। किंतु स्नान के अंगभूत दो कार्य और हैं-  1. तैलाभ्यंग या तैल-मर्दन।  2. व्यायाम।

तैलाभ्यङ्ग त्वागिन्द्रिय को स्निग्ध बनाता है, शरीर में स्फूर्ति लाता है और शरीर पर पानी का बुरा असर नहीं होने देता। 

स्पर्श ने चाधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम्। त्वचश्च परमोऽभ्यङ्गस्तस्मात्तं शीलयेन्नरः।। (चरक)

अर्थात्-‘शरीर को स्वस्थ रखने के लिये अधिक वायु की आवश्यकता है। वायु का ग्रहण त्वचा के आधीन है, त्वचा के लिये अभ्यङ्ग (तेलमालिश) परमोपकारी है, इसलिये प्रतिदिन मालिश करनी चाहिये।

आयुर्वेदिक ग्रन्थों में तेलमालिश के बहुत गुण बताये गये हैं, जिनमें मुख्य ये हैं- बुढ़ापा, थकावट एवं वायुविकार का नाश करने के लिये तैलमालिश सिर, कान तथा पैरों में विशेष रूप में करनी चाहिये। इससे शरीर मजबूत होकर सुन्दर बनता है, वायुविकार शान्त होते हैं। नित्य तैलमालिश कराने वाला व्यक्ति क्लेश और श्रम को सहने योग्य हो जाता है। इससे मनुष्य कोमल स्पर्श वाला और पुष्ट अंगवाला तथा प्रियदर्शी होता है। इसमें बुढ़ापे के लक्षण कम होते हैं। सिर में प्रतिदिन तेल लगाने से शिरःशूल नहीं होता, बाल न तो झड़ते हैं और न गिरते ही हैं। शिरोऽस्थियों काो बल मिलता है। बाल मजबूत जड़ वाले, लम्बे और काले हो जाते हैं। सिर पर तेल लगाने से इन्द्रियाँ प्रसन्न (स्वच्छ) होती हैं और मुख का सौन्दर्य बढ़ जाता है। तेल लगा कर सोने से सुख की नींद आती है। इसी प्रकार कान को तेल से तर रखने से चरक के मतानुसार वातजन्य कान के रोग, मन्यास्तम्भ, हनुग्रह, ऊँचे सुनना और बहरापन नहीं होता है।

पैरों में तेल मालिश करने से पैरों की कठिनता, सूखापन, रूक्षता, थकावट और सुस्ती (त्वचा में स्पर्श ज्ञान न होना) इत्यादि-ये सब शीघ्र शान्त हो जाते हैं। पैरों में सुकुमारता, बल और स्थिरता बनी रहती है, नेत्रों की दृष्टि स्वच्छ होती है, और वायु शान्त होती है, किंतु तेलमालिश कुछ अवस्थाओं में वर्जित भी है। नये ज्वर में, अजीर्ण होने पर, विरेचन-वमन और निरूहण किये हुए मनुष्य को मालिश नहीं करनी चाहिये। इससे विविध हानियाँ होती हैं। शास्त्रों में सोमवार और शनिवार को तेल-मर्दन उत्तम और अन्य दिनों में निषिद्ध किया गया है; परंतु उन दिनों में तेल लगाने के लिये शास्त्रों ने इस उपाय से दोष-परिमार्जन बताया है- 

रवौ पुष्पं गुरो दूर्वा भौमवारे च मृत्तिका। गोमयं शुक्रवारे च तैलाभ्यङ्गे न दोशभाक्।।

अर्थात्-‘रविवार को फूल, गुरूवार को दूर्वा, मंगलवार को मिट्टी और शुक्रवार को गोबर मिलाकर तेलमर्दन करने से दोष नहीं होता।’ ब्रह्मचारियों को तेल लगाना वर्जित है। ज्योतिषसार के अनुसार गृहस्थ को षष्टी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा को भी तेल नहीं लगाना चाहिये; किंतु सरसों का तेल, सुगन्ध युक्त तेल, फूलों से वासित तेल और अन्य द्रव्यों से युक्त तेल दोषयुयुक्त नहीं माने जाते, अतः इन्हें सब दिन लगा सकते हैं।

शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी। वेहव्यायामसंख्याता मात्रया तां समाचरेत्।।

‘शरीर की जो चेष्टा देह को स्थिर करने एवं उसका बल बढ़ाने वाली हो उसे व्यायाम कहते हैं। उसे प्रतिदिन उचित मात्रा में करना चाहिये।’ (चरक) व्यायाम से कुछ ये लाभ हैं- शरीर की पुष्टि, कान्ति, शरीर के दीप्ताग्नि, आलस्य-हीनता (स्फूर्ति), स्थिरता, हल्कापन, शुद्धि, थकावट-सुस्ती, प्यास, गर्मी एवं ठंड आदि सहने की शक्ति और श्रेष्ठ आरोग्य प्राप्त होता है।

मोटापा को कम करने वाला कोई उपाय इस के समान दूसरा नहीं है। शत्रु का भय नहीं होता, बुढ़ापा सहसा आक्रमण नहीं करता। व्यायाम मर्दित और उद्वर्तित शरीर वाले के पास व्याधियाँ नहीं फटकने पातीं। व्यायाम से वय, रूप और गुण हीन मनुष्य भी देखने में सुन्दर लगता है। व्यायाम से विरूद्ध, कच्चा जला हुआ भोजन भी भली भाँति पच जाता है। व्यायाम एक नैत्यिक अनुष्ठेय कर्तव्य है।

नित्य स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान् लोगों को व्यायाम सर्वदा हितकर है। शीत एवं वसन्तकाल में तो वह विशेष लाभप्रद होता ही है, किंतु कामी मनुष्य को सभी ऋतुओं में प्रत्येक दिन अपने बल की आधी शक्ति से व्यायाम करना चाहिये। परन्तु अधिक मात्रा में व्यायाम घातक होता है। उससे क्षय, अधिक प्यास, अरूचि, वमन, रक्त-पित्त, चक्कर, सुस्ती, खाँसी, शोष, ज्वर और श्वास-कष्ट-जैसे रोग होते हैं। कुछ व्यक्तियों के लिये व्यायाम हितकर नहीं होता। रक्त-पित्त के रोगी, कृश, शोष, श्वास-कष्ट, खाँसी और उरः क्षत से पीडि़त, तुरंत भेजन किया हुआ, स्त्री-प्रसंग से क्षीण तथा चक्कर से पीडि़त मनुष्य व्यायाम न करे।

टहलना देह को अधिक पीडि़त करने वाला नहीं होता; वह आयु, बल, मेेेधा (धारण शक्ति) और अग्नि को बढ़ाने वाला एवं इन्द्रियों को जागृत (चैतन्य) करने वाला होता है। (अधिक रास्ता चलना इसके विपरीत होता है, वह बुढ़ापा एवं दुर्बलता करने वाला होता है।) आयुर्वेद में टहलने को ‘चङ्क्रमण’ कहते हैं। इसे आधुनिक चिकित्सक भी अत्यावश्यक बताते हैं। अतः वृद्धादि को अवश्य टहलना (घूमना) चाहिये।

नीम

नीम का महत्व:-

Dr.R.B.Dhawan
नीम को संस्कृत में निम्ब, नेतर नियमन, अरिष्ट, सर्वतोभद्रक, पतिसार, रविप्रिय आदि, हिन्दी में नीम, बंगला में नीमगाछ, गुजराती में लिमडी, मराठी में कडुनिम्ब, तमिल में बेबू, तेलुगु में वेषु, अंगे्रजी में इंडियन लिलाक, लैटिन में मेलिया अझाडीरेक ;डमसपं कहते हैं। यह वनस्पति जगत के मेलिएसी कुल का सदस्य है।

नीम का वृक्ष संपूर्ण भारत में सर्वत्र उपलब्ध एवं जाना-माना वृक्ष है। अपनी स्वच्छ वायु एवं गुणों के कारण प्राचीन काल से इसका सम्मान होता आया है। आयुर्वेदानुसार नीम को शीतल, कलका, कड़वा, ग्राही, व्रणशोधक, कृमि वमन, व्रण, कफ, शोध, पित्त, विष, वात, कुष्ठ, श्रम, हृदय की जलन, खाँसी, तृषा, ज्वर, अरूचि, प्रमेह तथा रूधिर विकार को नष्ट करने वाला बताया गया है।

नीम के पत्ते– नेत्रों को हितकारी, चखने में कड़वे, पित्त, कृमि अरूचि, विष विकार और कृष्ट को नष्ट करते हैं। नीम के कोमल पत्ते वातकारक, संकोचक, रक्त-पित्त, नेत्र रोग व कुष्ट रोग को दूर करते हैं।

नीम के फूल– पित्तनाशक, कड़वे तथा कृमि और कफ को नष्ट करने वाले हैं।

कच्ची निबोरी– रस में कड़वी, स्निग्ध हल्की, गरम कोढ़, बवासीर, कृमि और प्रमेह को दूर करने वाली है।

नीम के डंठल- श्वास, खाँसी, बवासीर, कृमि और प्रमेह को नष्ट करते हैं।
निम्बोली की मगज- कृमि और कुष्ठ को दूर करता है।

नीम का तेल- नीम के बीजों का तेल कड़वा होता है, यह कृमि रोग तथा कुष्ठ को दूर करता है।

नीम का पंचांग– खुजली, वृण, कृष्ठ, पित्त तथा रुधिर विकार में लाभदायक और गुणकारी हाता है।

आयुर्वेदिक चमत्कार-
(1) दाद दूर करने में– दाद में नीम के पत्तों को दही में पीसकर लेप करने से दाद अच्छा होता है।

(2) फोड़े पर– घाव में बहने वाले फोड़े पर नीम की छाल की भस्म लगाने से लाभ होता है।

(3) दमा हेतु– दमा में नीम के बीज का तेल 30-40 बूँद तक पान में डालकर खाने से दमा में लाभ होता है।

(4) बवासीर में– बवासीर में नीम की निबोरी और एलीवे को मिलाकर 6 माशा खायें, कुछ ही दिनों में बवासीर के मस्से सूख जायेंगे।

(5) जोड़ों के दर्द में– जोड़ों के दर्द में नीम के अन्तरछाल को पानी भर चन्दन की भाँति घिस कर दर्द वाले स्थान पर गाढ़ा लेप करें, सूखने पर उतार दें, ऐसा 4-5 बार करें, दर्द से लाभ होगा।

(6) पेट में कीड़े पड़ने पर– पेट में कृमी होने पर सब्जी के साथ नीम पत्तियाँ का छोंक लगाकर खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं अथवा नीम की कोपल नित्य चबाकर सेवन करने से शरीर में रक्त के दोश दूर होते हैं।

(7) दाँतो के स्वास्थ्य हेतु– नित्य नीम का दातुन करना लाभदायक है।
(8) लकवे में– पक्षाघात वाले अंगों पर नीम के बीज का तेल मलने से लाभ होता है।

(9) बिच्छू काटने पर– बर्र और बिच्छू के काटने पर जिस स्थान पर बर्र या बिच्छू ने काटा हो, वहाँ नीम की पत्तियों को मसल कर मलने से लाभ होता है।

(10) संतति नियंत्रण में– संतति निरोध के लिए सहवास से पूर्व नीम के तेल में रूई का फोहा भिगोकर योनि में कुछ देर रखने से सहवास के समय योनि में प्रवेश करने वाले शुक्राणु मर जाते हैं, जिससे गर्भ ठहर नहीं पाता। फोहा भिगोने हेतु 2 बूँद तेल पर्याप्त है तथा इस प्रयोग को 4-6 दिन के लिए गर्भाधान काल में ही करें। नित्य करें।

(11) अश्मरी हेतु– नीम की पत्तियों की राख जल के साथ दो माशे की मात्रा में नियमित लेते रहने से पथरी होने पर वह धीरे-धीरे टूट-टूट कर पथरी पूरी की पूरी निकल जाती है तथा मरीज को लाभ मिल जाता है।

(12) संसर्ग पीड़ा हेतु– नीम के पत्तों को गर्म करके स्त्री यदि नाभि के नीचे बाँधे तो पुरूष संसर्ग के समय होने वाला दर्द या मासिक धर्म के समय होने वाला दर्द में फायदा होता है।

(13) रक्त शोधन में– नित्य नीम की पत्ती पीसकर पीना हितकर है।

नीम का ज्योतिष में महत्व-
नीम का ज्योतिष शास्त्र में एक महत्व विशेष कहा गया है। तद्नुसार घर में नीम की पत्ती, सर्प की केचुली, मोरपंख की चंद्रिका, शुद्ध घी, बिनौले, बकरी के बाल तथा शिवजी पर चढ़े हुए पुष्पों की धूनी देने से बालारिष्ट का नाश होता है।

नीम का तांत्रिक महत्व-
(1) जो व्यक्ति मेष राशि के सूर्य में एक मसूर तथा दो नीम की पत्तीयों को खाता है उसे एक वर्ष तक सर्प का भय नहीं रहता है।

(2) किसी भी व्यक्ति के दाढ़ में दर्द होने पर निम्न यंत्र को एक कोरे कागज पर पेन्सिल से बनायें तथा अमुक के स्थान पर व्यक्ति का नाम लिखकर नीम के झाड़ में लोहे के कील से ठोंक दें। ऐसा करने से दाढ़ दर्द में लाभ होता है।

(3) स्वाति नक्षत्र में निकाले गयें नीम के बांदे का प्राचीन काल मे अदृष्य होने के लिए उपयोग किया जाता है।

नीम का वास्तु में महत्व-
घर के वायव्य कोण में नीम के वृक्ष का होना अति शुभ है। इसी प्रकार जो व्यक्ति सात नीम के वृक्षों का रोपण करता है उसे मृत्योपरांत शिवलोक की प्राप्ति होती है अथवा जो व्यक्ति 3 नीम के वृक्षों का रोपन करता है वह सैकड़ों वर्षों तक सूर्य लोक में सुखों का भोग करता है।

शास्त्रों में कहा गया है-

निम्बत्रयं समारोप्य नयो धर्मविचक्षणाः।

सूर्यलोकं समासाद्य वसेदब्दायुतत्रयम्।।