केले के गुण

केले के गुण केला एक बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक व गुणकारी फल है। केले की गिनती हमारे देश के उत्तम फलों में होती है और इसको मांगलिक कार्यो में भी विशेष स्थान दिया गया है। विदेशों में भी इसके गुणों के कारण इसे स्वर्ग का सेव और आदम की अंजीर नाम प्रदान किये गये हैं। आमतौर पर लोगों की यह धारणा होती है कि जब केले खूब पक जाते हैं या पिलपिले हो जाते हैं, तब उनमें कीटाणु पैदा हो जाते हैं, किन्तु यह गलतफहमी है। जब तक केले का छिलका उसके गूदे पर पूरी तरह चिपका होता है, तब तक वह कीटाणुरहित रहता है। इसलिए खूब पके हुए केले भी पूरी तरह खाने योग्य एवं हानिरहित हैं। कुछ लोगों की धारणा यह भी है कि केले पचने में भारी होते हैं। दरअसल कच्चे या अधपके केलों को खाने से ऐसा होता है, क्यों कि वह असानी से हमारे पेट में सरलता से पचने वाली शर्करा में परिवर्तित नहीं होते हैं, फिर भी केले खाने के बाद यदि भारीपन महसूस हो तो एक या दो इलायची ऊपर से खाने से तुरन्त पेट में हल्कापन आ जाता है। केले के छिलके का हरा रंग लुप्त होते ही वह खाने के योग्य हो जाते हैं, तथा उनके छिलके काले होने के पश्चात् तक खाने योग्य रहते हैं, बशर्ते उनका छिलका गूदे से चिपका हो। केले के पौधे हरे, 10 से 12 फीट ऊँचे तथा काष्ठहीन होते हैं। इनके पत्ते काफी बड़े होते हैं। इसके पौधे में शाखाएँ नहीं होती तथा स्तम्भ पर्तदार होता है। केले के गूदे में 1.5 प्रतिशत प्रोटीन, लगभग 3 प्रतिशत विटामिन्स, 20 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स और बाकी ज्यादातर जल तत्व होता है। इसलिए पके हुए केलों को खाने से अजीर्ण नहीं होता। भारतीय ग्रन्थों में भी केला और दूध साथ-साथ खाने को पूर्ण भोजन कहा गया है। यह तथ्य इसलिए भी स्पष्ट हो जाता है कि हमारे भोजन के जो घटक केले में नहीं होते, वे दूध से प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार दूध केले खा लेने के पश्चात् किसी भी व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती है। यह योग एक सन्तुलित आहार का कार्य करता है। छोटे बच्चों को नित्य कम से कम एक केला खिलाने से उनमें उत्तम विकास देखा जा सकता है। केले के भक्षण से शरीर में बल की वृद्धि होती है, केले में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, ताँबा, सीसा, आयोडीन, सोडीयम मैग्नीज आदि अनेक शरीरोपयोगी खनिज तत्व होते हैं। इस प्रकार हर दृष्टि ये यह उत्तम फल है।
पके केले के गुण- स्वादिष्ट, शीतल, वीर्यवर्धक, शरीर के लिए पुष्टिकारक, माँस को बढ़ाने वाला, भूख-प्यास को दूर करने वाला तथा नेत्र रोग और प्र्रमेह नाशक है।
कच्चे केले के गुण- शीतल, ग्राही एस्ट्रीजेन्ट्स–यानी जो अपनी क्रिया द्वारा शरीर के दोश, मल व धातु को सोख ले पाचन में भारी, रक्त, पित्त, वायु कफ विकार तथा क्षय को दूर करने वाला होता है।
केले का औशधीय महत्व
1 वजन बढ़ाने के लिए– एक पाव दूध के साथ नित्य दो केलों का सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और शरीर का वजन बढ़ता है।
2 आँत सम्बन्धी रोगों में– कई लोगों की आँतों में गड़बड़ी होने के कारण उन्हें दस्त पेचिश की शिकायतें बनी रहती हैं। ऐसे लोगों को दो केले उनके (केलों के) वजन से आधे वजन के दही के साथ सेवन करना लाभकारी है।
3 मुँह के छालों के लिए– कुछ लोगों को आये दिन मुँह में छाले हो जाते हैं। ऐसे लोगों को चाहिए कि वे गाय के दूध से निर्मित दही के साथ केला खायें। यह प्रयोग सात से दस दिन तक करना पड़ता है।
4 पेट के कीड़े मारने तथा खून शुद्ध करने के लिए– इसके लिए केलों की जड़ के अर्क का सेवन लाभदायक है। इस अर्क को बनाने के लिए लगभग एक किलो जल में 50 ग्राम केले की जड़ डालकर इतना गर्म करें कि जल की मात्रा आधी हो जाए। इसके बाद मिश्रण छान लें। यही छानन अर्क है। इसी अनुपात में ताजा अर्क बनाए। अर्क की दो तोला मात्रा एक बार में लें।

औषधी (वनस्पति) तंत्र

औषधी (वनस्पति) तंत्र आज मानव भौतिक विज्ञान के शिखर पर पहुँच कर भी प्रकृति के सम्मुख बौना ही है। वह प्रकृति के रहस्यों का उदघाटन करने के बावजूद, भी सृष्टि के अंशमात्र से भी परिचित नहीं हो पाया है।
पृथ्वी पर कितने ही प्रकार के पेड़- पौधे, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु तथा वनस्पतियाँ हैं, किन्तु उनका पूर्ण विवरण आज तक तैयार नहीं किया जा सका। प्रत्येक जीव-जन्तु और वनस्पति के अपने कुछ गुण-दोश हैं।

तंत्र के प्रारम्भिक- युग में, जिज्ञासु-साधकों के द्वारा किये गये अनुसन्धान के फलस्वरूप हमें वनस्पति शास्त्र और पदार्थ-विज्ञान तथा इनके मिश्रित रूप आयुर्वेद-शास्त्र सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। वह विपुल साहित्य और वे ग्रन्थ-प्रकृति की रहस्यमता पर पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। महर्षियों के अपनी दीर्घकालीन-शोध और अनुभवों के आधार पर विभिन्न वानस्पतिक-पदार्थो के जो बहु-उपयोगी प्रयोग-परिणाम घोषित किये हैं, उसमें से दो-एक का आंशिक-विवरण (तन्त्र-सन्दर्भ में) यहाँ प्रस्तुत है।
ये प्रयोग विभिन्न प्रकार की समस्याओं के निराकरण हेतु निश्चित किये गये हैं। एक समय इनका देश-व्यापी प्रचार था। काल के प्रभाव से ये लुप्तप्रायः हो गये और आज इनके ज्ञाता साधक गिने-चुने ही रह गये हैं। उनमें भी जो वास्तविक ममज्र्ञ और समर्थ हैं, वे एकान्त सेवी, निस्पृहः और विशुद्ध साधक हैं, पर जो अल्पज्ञ, प्रशंसा-लोलुप, अर्थकामी और विवेक-शून्य हैं, वे डंके की चोट पर अपना प्रचार करते हुए, आडम्बर के जाल में आस्थावान लोगों को फँसाकर लूटने का कार्य कर रहे हैं।
उनके इस आचरण का भेद खुलने पर जन-सामान्य में इन विषयों के प्रति अनास्था ही उत्पन्न होती है, फलस्वरूप नैतिकता, अध्यात्म और संस्कृति का ह्रास होकर अनैतिकता, अराजकता, विभ्रम और पतन का वातावरण निर्मित होता है। मैं मंत्र- तंत्र पर अनुसंन्धानरत बुद्धिमान साधकों से आशा करता हूँ कि वह इन को पहचानें और इन की पोल खोंलें।
लगभग सभी नगण्य प्रतीत होने वाली वनस्पतियों की आश्चर्यजनक उपयोग- विधियों का उल्लेख करते हुए, महर्षियों ने इस सत्य को प्रतिपादित किया है कि सृष्टि का एक कण भी व्यर्थ नहीं है, सबकी ही कुछ न कुछ उपयोगिता है। आवश्यकता है केवल उन्हें परखने और प्रयुक्त करने की। सृष्टि में जहां एक ओर आम, अमरूद, केला, कटहल, नींबू और नारियल जैसे फल हैं। गेहूँ, जौ, चना, धान आदि जैसे अनाज हैं। वहीं घास-पात कही जाने वाली जड़ी-बूटियों में भी अद्भुत गुण समाहित हैं।

अद्भुत गुणों से युक्त्त– अपामार्ग पौधे का विवरण प्रस्तुत है। अपामार्ग, लटजीरा, अंझाझार, ओंगा, चिरचिटा- यह सब एक ही पौधे के नाम है। यह समग्र भारतवर्ष तथा एशिया के उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में पाया जाता है। वर्षा का प्रथम पानी पड़ते ही आपामार्ग के पौधे अंकुरित होते हैं।