तृषा रोग के कारण व निवारण

तृषा रोग के कारण व निवारण शारीरिक श्रम करने पर तृषा अर्थात् प्यास की इच्छा होती है। तृषा होने पर सभी छोटे-बड़े के लिए जल पीना आवश्यक हो जाता है। जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। स्वास्थ्य के संतुलन को बनाये रखने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञ दिन में 15 से 20 गिलास पानी पीने का परामर्श देते हैं। जल भोजन की पाचन क्रिया को सरल बनाता है ओर मूत्र एवं पसीने के द्वारा शरीर के दुशित तत्त्वों को शरीर से निष्कासित करता है।
शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में तृषा की अधिक विकृति देखी जाती है। बार-बार शीतल जल पीने पर भी तृषा शांत नही होती। किसी भी स्त्री-पुरूष के साथ ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने का अर्थ होता है तृषा रोग। तृषा रोग में रोगी को बहुत प्यास लगती है। जल्दी-जल्दी जल पीने के बाद भी तृषा शान्त नही होती, तृषा के कारण रोगी बेचैन हो जाता है। तृषा के कारण रोगी का कण्ठ शुष्क होता है।
तृषा उत्पत्ति के कारण-
भोजन में कुछ उष्ण खाद्य पदार्थ होते हैं। पाचन क्रिया के समय शरीर में अधिक उष्णता पैदा होती है और उस गर्मी को शांत करने के लिए शरीर को पानी की आवश्यकता होती है। विभिन्न कारणों से तृषा की उत्पत्ति होती है। अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक प्यास लगती है। शुष्क व रूक्ष खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है।
चिकित्सा विशेषज्ञ शोक, चिंता और भय की परिस्थिति में अधिक प्यास लगने की बात करते हैं। गर्मियों में अधिक पसीने आने से शरीर में जल की कमी हो जाती है इसलिए अधिक प्यास लगती है। छोटे बच्चे जब दौडने का खेल खेलते हैं तब उन्हें अधिक प्यास लगती है।
अधिक उपवास किये जाने पर तृषा अधिक उत्पन्न होती है। अघिक उष्ण मिर्च-मसालों व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है। कुछ चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अग्नाशय की विकृति होने पर मधुमेह रोग की उत्पत्ति होती है तो रोगी को अधिक प्यास लगती है। बार बार पानी पीने से भी तृषा शान्त नहीं होती है।
भोजन में पित्त कारक खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करने से अधिक तृषा व जलन उत्पन्न होती है। अधिक उष्ण वातावरण में रहने और धूप में चलने फिरने से अधिक प्यास लगती है। मादक द्रव्यों व धूम्रपान करने वालों को अधिक प्यास लगती है।
तृषा के विभिन्न लक्षण-
जल पीने के बाद दो तीन घण्टों के लिए जल की इच्छा अर्थात तृषा शांत हो जाती है। लेकिन 30-40 मिनट बाद ही जल पीने की इच्छा होने लगे तो उसे तृषा रोग कहा जाता है। तृषा रोगी को 30-40 मिनट बाद जल पीने की इच्छा होती है तथा जल न मिले तो बेचैनी होने लगती है। उसका मुंह और कण्ठ सूखने लगता है, होंठ भी शुष्क होने लगते हैं।
रोगी को जल पीने के बाद भी बेचैनी बनी रहती है। जल पीने के कुछ देर बाद ही कण्ठ, होंठ, जीभ पर शुष्कता के लक्षण स्पष्ट होने लगते हैं। जल की इच्छा रोगी को बेचैन सी करने लगती है। ऐसे में रोगी को हृदय की निर्बलता भी अनुभव होने लगती है ग्रीष्म ऋतु में छोटे-बड़े सभी तृषा से अधिक पीडि़त दिखाई देते हैं। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता के कारण अधिक पसीने आने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में शरीर को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। जल की पूर्ति के लिए अधिक प्यास लगती हैं। लेकिन तृषा रोगी को शीत ऋतु में भी 30-40 मिनट के अंतराल पर बार-बार प्यास लगती है।
तृषा रोग के भेदः
आयुर्वेदाचार्यों ने तृषा के भेदों के अनुसार अलग-अलग लक्षणों का वर्णन किया है। वात, पित्त, कफ दोषों के अनुसार तृषा को वातज, पित्तज, कफज, क्षतज, आमन और भक्तज आदि भेदों में विभक्त किया है।
तृषा रोग की गुणकारी चिकित्सा-
तृषा की उत्पत्ति को जान लेने के बाद उसकी चिकित्सा सरल हो जाती है। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता की अधिकता होने के कारण सभी छोटे-बड़े को तृषा अधिक पीडि़त करती है। शीतल जल के सेवन से प्यास शांत होती हैं। शीतल जल से हाथ-पांव और चेहरे को साफ करने से तृषा का प्रकोप कम होता है। शीतल जल में नीबू का रस और थोड़ी शक्कर मिलाकर, शिकंजी बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तृषा का निवारण होता है।
वातज तृषा की चिकित्साः
जब यह ज्ञात हो कि रोगी वातक तृषा से पीडि़त है तो उसको वात-पित्त शामक औशधियों का सेवन कराकर वातक तृषा का निवारण किया जाता हैं।
दो-दो तोले गिलोय का रस दो-दो घण्टे के अन्तराल से वातज तृषा से पीडि़त रोगी को पिलाने से तुरंत रोग का निवारण होता हैं। दिन में दो तीन बार पिला सकते हैं।
कुश, कास, शर, दर्भ और ईख, इन पंच तृणों की जड़ को उबाल कर कपडे से छान कर पिलाने से तृषा का अन्त होता हैं।
गुड़ और दही मिलाकर रोगी को सेवन कराने से वातज तृषा नष्ट होती हैं।
घी को हल्का सा गर्म करके रोगी को 10-10 ग्राम मात्रा में पिलाने से वातज तृषा के कारण तालु में उत्पन्न शुष्कता नष्ट होती हैं। तृषा की अधिकता से मुच्छित रोगी को घी नही पिलाना चाहिए।
मांस रस के सेवन से भी वातक तृषा नष्ट होती है।
तृषा नाशक कुछ गुणकारी औशधियां-
बिजौरे नीबू के फूलों को, केशर का चूर्ण, अनार का रस, मधु ओर सेंधा नमक, सबको अच्छी तरह मिलाकर सेवन करने से तृषा की निवृत्ति होती हैं।
लाल शालि (चावलों) का भात पकाकर, शीतल होने पर मधु मिलाकर खाने से जीर्ण तृषा का भी निवारण होता हैं।
रक्त पित्त रोग के कारण तृषा की उत्पत्ति होने पर चंद्रकला रस (आयुर्वेदिक औशधि) का सेवन करने से बहुत लाभ होता हैं।
सितोपलादि चूर्ण दिन में दो-तीन वार अनार के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा नष्ट होती है।
ताम्र भस्म और बंग भस्म 1-1 रत्ती मात्रा में चंदन के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा का निवारण होता है।
जल में मधु मिलाकर कुछ देर जल को मुँह में रोके रखने से तृषा की विकृति नष्ट होती है।
शीतल जल में धनियां, जीरा और सौफ भिगोकर, उनको छानकर, उस जल में मिश्री मिला कर पीने से तृषा नष्ट होती है।
गुलाब, चंदन, नीबू और अनार के रस का शरबत बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तीव्र तृषा रोग नष्ट होता है।
आहार विहारः
भोजन में रूक्ष, गरिष्ठ व उष्ण मिर्च मसालों के खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिक उत्पत्ति होती है। ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। चाय- कॉफी से भी अधिक प्यास लगती है। ग्रीष्म ऋतु में बर्फ का अधिक सेवन करने से भी अधिक प्यास लगती है। सीधे जल में बर्फ डाल कर नही पीना चाहिए। बर्फ के साथ रखकर जल को शीतल करके पीने से तृषा का निवारण होता है।
नीबू के रस से बनी शिकंजी तृषा को जल्दी शांत करती है। नदी व तालाब में स्नान करने से तृषा की विकृति नष्ट होती है। संतरा, मौसमी, जौ के सत्तू, इमली से बने पेय पदार्थ, धनियां, जीरा, मिश्री, अनानास, नारियल का जल, गन्ने का रस, आँवले व आम का मुरब्बा, शीतल दूध, तक्र (मट्ठा) आदि तृषा को नष्ट करते हैं।
सूर्य की प्रचण्ड धूप में अधिक घूमने-फिरने ओर अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक तृषा की उत्पत्ति होती हैं। गुरू, उष्ण, घी, तेल में बने पकवान, अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थ, चटपटे, तीक्ष्ण पदार्थ, सोंठ, पीपल, लाल मिर्च, चाय- कॉफी आदि खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिकता होती हैं। इन खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए।

नेत्र रोग का समूल नाश करने वाली ‘चाक्षुषोपनिषद् विद्या’
नेत्र रोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली चाक्षुषी विद्या की व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्र रोग की निवृत्ति के लिए इसका जप होता है। यह विनयोग है।
नेत्रोपनिषद मंत्रः
ऊँ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ऊँ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ऊँ नमः करूणाकरायामृताय। ऊँ नमः सूर्याय। ऊँ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा´छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।
ऊँ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायँ। मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊँ ( कृपया ) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें। ऊँ ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ऊँ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ऊँ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ऊँ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ ( सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले ) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। ( अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले ) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्णस्वरूप भगवान् सुर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं-उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।
जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा ( भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले ) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय ( सुवर्ण के समान कान्तिमान् ) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्तिज्ञथान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं ( प्राणियों ) के समक्ष उदित हो रहे हैं।
ऊँ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।
ऊँ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिए उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिए, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिए तथा तमोमय बन्धन में बधे हुए हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुश्प्करेक्शन को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।
नेत्र रोग से पीडि़त श्रद्धालु साधक को चाहिए कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी के रस) से अनार की शाखा की कलम के द्वारा काँसे के पात्र में निम्नलिखित विधि से यन्त्र को लिखें।
फिर उसी यन्त्र पर ताँबे की कटोरी में चर्तुमुख ( चारो ओर चार बत्तीयो का ) घी का दीपक जलाकर रख दें। तदानन्तर गन्ध-पुष्पादि से यन्त्र का पूजन करें। फिर पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ‘ऊँ ह्नीं हंसः’ इस बीज मंत्र की छः मालाएँ जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालाएँ जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अघ्र्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।
ऐसा करते रहने से इस उपनिषद् का नेत्ररोगनाशक अदभुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखने में आता है।

 

गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी

गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी भावना और भावुकता, दयालुता और मनुश्यता की बात यदि एक तरफ कर दी जाये तब भी गाय का दूध, घी इत्यादि सर्वगुणसम्पन्न है। विषैला प्रभाव नष्ट करने में गोघृत की तुलना में अन्य किसी पशु का घी उतना उपयोगी नहीं होता। दूध घी से सैकड़ों रोग-विकार दूर होते हैं, यहाँ कुछ रोगों के नाम के साथ उपचार की संक्षिप्त विधि बतायी जा रही है। इस अमृत की शक्ति को पहचान कर पाठक लंबी आयु तक स्वस्थ और युवा बने रह सकते हैं-
अजीर्णः– जब गरिष्ठ भोजन अनपचा रह जाता है, तब शरीर की आग ठंडी पड़ जाती है, अम्लता बढ़ती जाती है, पेट पत्थर-जैसा ठोस होने लगता है, इसके प्रभाव से गुर्दे भी कमजोर पड़ने लगते हैं। इस स्थिति में दूध में सोंठ और गुड़ औटाइये ताकि पेट की सड़ांध मल-मूत्रा के रास्ते बाहर निकल जाय।
250 ग्राम दुध में 100 ग्राम पानी मिलाइये, 25 ग्राम शक्कर या गुड़ डालिये, 10-12 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाइये, जब पानी जल जाय तो हल्का गर्म रह जाने पर घूँट-घूँट पानी शुरू कर दीजिये। अनपचा भोजन सोंठ की गर्मी से पचने लगेगा और मल-मूत्रा गल-पिघल कर निकलने लगेगा, प्यास लगे तो पानी भी हलका गर्म ही पियें, पेट साफ होते ही जलन, खट्टी डकार अफारा और बेचैनी के विकार भी शान्त हो जायँगे। अजीर्ण से छुटकारा पाने के बाद भी एक दिन दूध ही पीजिये ताकि आँतें और पेट की दीवारें तक निर्मल हो जायँ। कमजोरी से न घबरायें, क्योंकि दुध प्राणों का आधार है; यदि गर्भ से निकला बालक दूध पर जी सकता है तो हम दुर्बल नहीं होंगे, मूँग की पतली दाल से चपाती खाकर आप तीसरे दिन से हलके भोजन की शुरूआत कर सकते हैं, दोपहर को दूध में पका हुआ पतला दलिया एवं शाम को दूध में शहद मिलाकर पीजिये, रात को खिचड़ी खाइये चैथे दिन से सामान्य भोजन शुरू कर दें।
अतिसारः– आयुर्वेद के ग्रन्थों में अतिसार पर काबू पाने के लिये दूध के फेन (झाग) को परमौषधि बताया गया है। मलाई और रबड़ी खाने वालों को मालूम होना चाहिये कि 25 ग्राम दुग्ध फेन, 1/2 किलो मलाई के बराबर पौष्टिक है। झाग मुँह में पहुँचते ही टॉनिक बन जाता है, जबकि रबड़ी-खोया पचाने में कई घंटे लग जाते हैं, दूध दुहने के बाद बर्तन में जितना भी झाग हो, उसे एक बड़े कटोरे में कलछी से निकाल लें, इस झाग को चम्मच से स्वाद लेते हुए चूसना शुरू कर दें, वैसे तो झाग में चूसने वाला ठोस तत्त्व होता ही नहीं, किंतु इस विधि से पेट का संकुचन होता है, गोदुग्ध के झाग से पेट की आग भड़क उठेगी और भोजन के कच्चे रस पचने लगेंगे, दूध का झाग शरीर की पेशियों को भी फुला देता है और पाचन-क्रिया तीव्र हो जाती है, बदन को गठीला और पुष्ट करने में दुग्ध-फेन अत्युत्तम औशधि है।
आँखों में जलन-भावप्रकाश निघण्टु में गाय का दूध आँखों के लिये उत्तम अंजन माना गया है, यदि आप भैंस का दूध पीते हैं तो गाय का दूध पीना शुरू कर दें, यदि गाय का दूध पीते हैं तो वह एकदम ताजा-ताजा हो। गाय ब्यायी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि शुरू का दूध जलन पैदा करता है, दूध की मलाई लेकर अँगुली से रात को सोते समय पलकों पर लगा लें, सुबह तक जलन शान्त हो जायगी, नहाने के पहले गोदुग्ध का मक्खन लगा दें, आधे घंटे में जलन जाती रहेगी, यदि मलाई की चिकनाहट को मन न मानता हो तो 4 चम्मच दूध, 1 कटोरी पानी में मिलाकर उससे खुली आँखों में छींटे मारें और स्वच्छ कपड़े से आँखें पोछकर सो जायँ। सुबह तक सारी जलन निकल चुकी होगी, जिन्हें चिकनाई से प्यार हो तो उन्हें दूध की मलाई पलकों पर लेपकर गर्मी की सूजन निकाल देनी चाहिये।
आग से जलनाः- घाव कैसा भी हो, गाय के घी से उत्तम न कोई पेनिसिलिन आदि दवा है न मरहम, कुदरत ने गोघृत को इतनी विषनाशक शक्ति से भर रखा है कि इससे बढि़या क्रीम, मरहम या एंटीसेप्टिक दवा हो ही नहीं सकती, गोघृत में पट्ठी तर करके जली हुई त्वचा पर रखकर भगवान को याद करें, जिसने आप को गोघृत के रूप में अमृत-जैसी पौष्टिक दवा दे रखी है। दूध में घी डाल कर पियें, ताकि सप्ताह भर में घाव की जगह नयी त्वचा उग जाय। गाय का दूध शरीर को त्वचा भी देता है और मांस की कमी भी शीघ्र पूरी करता है।
आधासीसीः- आधे सिर का दर्द तभी होता है, जब उस हिस्से में रक्त के संचार में रूकावट पड़ गयी हो, उस रूकावट का कारण भोजन के वे कच्चे रस होते हैं, जो कफ, लेस आदि के रूप में जमा हो जाते हैं और जुकाम-नजला भी बन जाते हैं, अगर नासिका से दुशित जल न निकले तो माथे के किसी भी हिस्से में जोरों का दर्द उठने लगता है, माथा इतने भयंकर रूप में फटने लगता है जैसे टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ जायगा। 250 ग्राम दूध में 250 ग्राम पानी डालिये, 2 पीपली, 5 लौंग और दालचीनी के 4 छोटे टुकड़े पीसकर दूध में औटाइये।
जब केवल दूध ही बचे तो 2 चम्मच शहद मिलाकर पियें और कंबल ओढ़कर सो जायँ। घूँट इस तरह पियें जैसे गर्म वस्तु चूस रहे हों, जितना अधिक पसीना आयेगा उतनी जल्दी आराम मिलेगा, दिन में 3-4 बार ऐसा दूध पीने से माथे की श्लेष्मा जल बनकर नथनों से बह जायगी या पसीने और मल-मूत्रा के रास्ते निकल जायगी।

एनीमिया कारण और निवारण

एनीमिया कारण और निवारण शरीर में खून का नहीं होना या कम मात्रा में होनाएनीमिया कहलाता है। वास्तव में यह खून की कमी न हो कर लाल रक्त कणों ; भ्ंमउवहसवइपदद्ध की कमी होती है। लाल रक्त कणों का मुख्य कार्य ऑक्सीजन को शरीर में स्थित विभिन्न कोशिकाओं तक पहुँचाना है, जिससे प्रत्येक कोशिका को आक्सीजन मिल सके। इसकी कमी से शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीजन कम मिल पाती है, जिससे वे कोशिकाएं ठीक ढ़ंग से काम नहीं कर पातीं।
एनीमिया होने के मुख्यतरू दो कारण है-
1. रक्त स्त्राव- अधिक रक्त का बहना।
2. लाल रक्त कणों का नष्ट होना।

एनीमिया के लक्षण;

  1. निर्बलता
    2. बैठे-बैठे ही साँस फूलना।
    3. चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा होना।
    4. सुनाई कम पड़ना, कानों में सीटी बजना।
    5. सिर दर्द।
    6. नजर का कम होना।
    7. नींद का कम होना।
    8. पैरों में सूजन होना।
    9. हाथ और पैर की उंगलियों में चींटी सी चलना या झनझनाहट होना।
    10. बच्चों की शारीरिक वृद्धि या वजन बढ़ना रूक जाना।

एनीमिया के इन लक्षणों में से कोई एक या सारे लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं। लक्षणों का प्रकट होना इस बात पर निर्भर करते हैं, कि कितने समय में हीमोग्लोबिन कम हुआ। जैसे किसी के रक्त में लाल रक्त कणों की मात्रा एक सप्ताह में 12 ग्राम से 8 ग्राम हुई, तो लक्षण अधिक होंगें। यदि किसी व्यक्ति में लाल रक्त कणों की संख्या एक वर्ष में कम हुई, तो ऐसे व्यक्ति में लक्षण कम होंगे, क्योकि लाल रक्त कणों की संख्या एक साल में 12 ग्राम से 8 ग्राम हुई। एनीमिया किन कारणों से होता हैं? एनीमिया होने के विभिन्न कारणं हो सकते है, परन्तु प्रायरू लौह तत्व की कमी से होने वाला एनीमिया प्रमुख है, दूसरे प्रकार के एनीमिया दुर्लभ होते हैं। यहाँ लौह तत्व की कमी से उत्पन्न होने वाले एनीमिया के विषय में ही बताया जा रहा है। दिन भर के भोजन में लौह तत्व की केवल 1 मिलीग्राम की मात्रा आवश्यक होती है। गर्भावस्था में व स्तनपान कराने वाली महिलाओं में इसकी आवश्यकता अधिक होती है।
लौह तत्व की कमी से उत्पन्न एनीमिया के तीन मुख्य कारण हैं –
1. रक्त स्त्राव
2. भोजन में लौह तत्व की कमी
3. भोजन से प्राप्त लौह तत्व का पाचन न होना।
इनमें भी पहला कारण ही मुख्य है। जब भी रक्त स्त्राव से उत्पन्न लौह तत्व की कमी भोजन में उपलब्ध लौह तत्व की मात्रा से ज्यादा होती है, तो एनीमिया हो जाता है। यदि आयु बढ़ने पर बच्चे को दूसरा आहार देने में देरी हो जाती है और वह लम्बे समय तक केवल दूध पर ही निर्भर रहता है, तो बालक को लौह तत्व की कमी अवश्य हो जायेगी। ऐसा आहार, जिसमें लौह तत्व की मात्रा अधिक हो, बच्चे को देते ही यह कमी तुरन्त दूर हो जाती है। जब शरीर में तेजी से विकास होता है और लौह की आवश्यकता बढ़ जाती है, जो भोजन से उपलब्ध नहीं हो पाती, क्योंकि इस उम्र में युवाओं का रूझान संतुलित आहार की अपेक्षा ‘फास्ट फूड’ पर ज्यादा होता है।
रजस्वला स्त्री के शरीर को भी लौह तत्व की अधिक आवश्यकता होती है, उसे 2 मिलीग्राम लौह प्रतिदिन के भोजन के द्वारा प्राप्त होना चाहिए। यद्यपि गर्भावस्था में रजस्त्राव से होने वाली लौह तत्व की कमी तो रूक जाती है, परन्तु शिशु और माँ के शरीर की आवश्यकता बढ़ जाती है। गर्भावस्था के समय के साथ ही साथ लौह तत्व की आवश्यकता में भी वृद्धि होती जाती है। गर्भावस्था के दूसरे तीसरे माह के पश्चात् माँ के शरीर को लौह तत्व की आवश्यकता अधिक होती है और यह आवश्यकता इतनी अधिक बढ़ जाती है, कि दैनिक भोजन में भी उसकी पूर्ति नहीं हो पाती। इसीलिए चिकित्सक गर्भावस्था में लौह व कैल्शियम लेने की सलाह देते हैं। ज्यादातर यह पाया गया है, कि महिलायें इस विषय की गम्भीरता पर ध्यान न दे कर दवायें नियमित रूप से नहीं लेतीं, जिसका दुष्प्रभाव बच्चे व मां दोनों पर पड़ता है। बवासीर, पेट का अल्सर, आदि से भी जो रक्त स्त्राव होता है, उससे भी एनीमिया हो जाता है।
उपचार-
लौह तत्व की कमी को दूर करने के लिए भोजन में पाये जाने वाले लौह तत्व की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिये, इसी लिए लौह तत्व वाला भोजन निरन्तर लेने की सलाह दी जाती है। जब शरीर में लाल रक्त कणों की संख्या बहुत कम होती है, तब इस कमी को पूरा करने के लिए आयरन टेबलेट या कैपसूल के द्वारा शरीर को लौह तत्व की आपूर्ति की जाती है। लौह तत्व की पर्याप्त मात्रा लेने से से लाल रक्त कणों की संख्या बढ़ने लगती है।

नोट- कब, क्या और कितनी अधिक मात्रा माँ लौह तत्व लेना है, यह हमेशा अपने अनुभवी चिकित्सक से परामर्श करने के उपरान्त ही लें।

लौह तत्व से युक्त भोजन लेते रहना चाहिए, जिससे कि शरीर के लौह भण्डार फिर से भर जायें। लौह तत्व की अधिक मात्रा वाले आहार शाकाहारी भोजन में अनाज, हरी पत्तियों की सब्जियां जैसे पालक आदि, तेल बाले बीज जैसे तिल, सरसों, मूंगफली, सोयाबीन, सूखे मेवे व गुड़ आदि में लौह तत्व की मात्रा पर्याप्त होती है। यदि सामान्य भोजन को भी लोहे के बर्तन में पकाया जाय, तो उसमें लौह तत्व की मात्रा बढ़ जाती है। कुछ आहार शरीर द्वारा लौह तत्व की पाचन क्षमता को भी प्रभावित करते हैं। नीबू लौह तत्व की पाचन क्षमता में वृद्धि करता है, जबकि चाय में पाया जाने वाला टैनिन, सब्जियों में पाया जाने वाला ऑक्सालेट आदि तत्व इस पाचन क्षमता में बाधा डालते हैं। एनीमिया होने पर चिकित्सकीय दृष्टि से शरीर को लौह तत्व की अधिक मात्रा या कवेम की आवश्यकता होती है। चिकित्सक ऊपर बताये गए लक्षणों को देख कर तथा जिह्ना, हथेली, नाखून, अन्दर से पलकों में पीलापन देख कर एनीमिया को पहचानते हैं तथा लैबोरेटरी जांच की सहायता से एनीमिया की मात्रा तथा इसके प्रकार की जांच करते हैं। हृदय के कुछ रोगों का कारण एनीमिया ही होता है।
आयुर्वेदिक उपचार-
अदरक जहाँ एक खांसी या कफ में लाभदायक औशधि है, वहीं अयुवेदीय ग्रर्थो मे इसे रक्त की कमी को समाप्त करने के लिए एक श्रेष्ठ औशधि कहा गया हैं। इस औशधि का प्रयोग धैर्यपूर्वक करने पर ही सफलता प्राप्त होती है। चार-पाँच ग्राम अदरक तथा शहद मिलाकर रोज प्रातरू पीयें। महीने भर तक नियमित प्रयोग से खून बनने की प्रक्रिया में तेजी आयेगी तथा चेहरे का सौन्दर्य भी निखर उठेगा। एक तथ्य यह भी ध्यान रखने योग्य है, कि रक्तदान करने वाले व्यक्ति का पहले ‘हीमाग्लोबिन टेस्ट’ किया जाता है और हीमाग्लोबिन के कम होने पर रक्त लिया ही नहीं जाता। रक्तदान के समय एक व्यक्ति से करीब 300 मिलीलिटर रक्त ही लिया जाता है। लौह तत्व युक्त संतुलित भोजन करने पर कुछ ही दिनों में इसकी पूर्ति हो जाती है। एक स्वथ्य व्यक्ति को भी समय-समय पर अपने शरीर में हीमोग्लोबिन की जांच कराते रहना चाहिए। वर्ष में एक बार या कभी भी संदेहात्मक स्थिति आने पर अपने चिकित्सक से तत्काल सलाह ले