तृषा रोग के कारण व निवारण

तृषा रोग के कारण व निवारण शारीरिक श्रम करने पर तृषा अर्थात् प्यास की इच्छा होती है। तृषा होने पर सभी छोटे-बड़े के लिए जल पीना आवश्यक हो जाता है। जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। स्वास्थ्य के संतुलन को बनाये रखने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञ दिन में 15 से 20 गिलास पानी पीने का परामर्श देते हैं। जल भोजन की पाचन क्रिया को सरल बनाता है ओर मूत्र एवं पसीने के द्वारा शरीर के दुशित तत्त्वों को शरीर से निष्कासित करता है।
शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में तृषा की अधिक विकृति देखी जाती है। बार-बार शीतल जल पीने पर भी तृषा शांत नही होती। किसी भी स्त्री-पुरूष के साथ ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने का अर्थ होता है तृषा रोग। तृषा रोग में रोगी को बहुत प्यास लगती है। जल्दी-जल्दी जल पीने के बाद भी तृषा शान्त नही होती, तृषा के कारण रोगी बेचैन हो जाता है। तृषा के कारण रोगी का कण्ठ शुष्क होता है।
तृषा उत्पत्ति के कारण-
भोजन में कुछ उष्ण खाद्य पदार्थ होते हैं। पाचन क्रिया के समय शरीर में अधिक उष्णता पैदा होती है और उस गर्मी को शांत करने के लिए शरीर को पानी की आवश्यकता होती है। विभिन्न कारणों से तृषा की उत्पत्ति होती है। अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक प्यास लगती है। शुष्क व रूक्ष खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है।
चिकित्सा विशेषज्ञ शोक, चिंता और भय की परिस्थिति में अधिक प्यास लगने की बात करते हैं। गर्मियों में अधिक पसीने आने से शरीर में जल की कमी हो जाती है इसलिए अधिक प्यास लगती है। छोटे बच्चे जब दौडने का खेल खेलते हैं तब उन्हें अधिक प्यास लगती है।
अधिक उपवास किये जाने पर तृषा अधिक उत्पन्न होती है। अघिक उष्ण मिर्च-मसालों व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है। कुछ चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अग्नाशय की विकृति होने पर मधुमेह रोग की उत्पत्ति होती है तो रोगी को अधिक प्यास लगती है। बार बार पानी पीने से भी तृषा शान्त नहीं होती है।
भोजन में पित्त कारक खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करने से अधिक तृषा व जलन उत्पन्न होती है। अधिक उष्ण वातावरण में रहने और धूप में चलने फिरने से अधिक प्यास लगती है। मादक द्रव्यों व धूम्रपान करने वालों को अधिक प्यास लगती है।
तृषा के विभिन्न लक्षण-
जल पीने के बाद दो तीन घण्टों के लिए जल की इच्छा अर्थात तृषा शांत हो जाती है। लेकिन 30-40 मिनट बाद ही जल पीने की इच्छा होने लगे तो उसे तृषा रोग कहा जाता है। तृषा रोगी को 30-40 मिनट बाद जल पीने की इच्छा होती है तथा जल न मिले तो बेचैनी होने लगती है। उसका मुंह और कण्ठ सूखने लगता है, होंठ भी शुष्क होने लगते हैं।
रोगी को जल पीने के बाद भी बेचैनी बनी रहती है। जल पीने के कुछ देर बाद ही कण्ठ, होंठ, जीभ पर शुष्कता के लक्षण स्पष्ट होने लगते हैं। जल की इच्छा रोगी को बेचैन सी करने लगती है। ऐसे में रोगी को हृदय की निर्बलता भी अनुभव होने लगती है ग्रीष्म ऋतु में छोटे-बड़े सभी तृषा से अधिक पीडि़त दिखाई देते हैं। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता के कारण अधिक पसीने आने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में शरीर को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। जल की पूर्ति के लिए अधिक प्यास लगती हैं। लेकिन तृषा रोगी को शीत ऋतु में भी 30-40 मिनट के अंतराल पर बार-बार प्यास लगती है।
तृषा रोग के भेदः
आयुर्वेदाचार्यों ने तृषा के भेदों के अनुसार अलग-अलग लक्षणों का वर्णन किया है। वात, पित्त, कफ दोषों के अनुसार तृषा को वातज, पित्तज, कफज, क्षतज, आमन और भक्तज आदि भेदों में विभक्त किया है।
तृषा रोग की गुणकारी चिकित्सा-
तृषा की उत्पत्ति को जान लेने के बाद उसकी चिकित्सा सरल हो जाती है। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता की अधिकता होने के कारण सभी छोटे-बड़े को तृषा अधिक पीडि़त करती है। शीतल जल के सेवन से प्यास शांत होती हैं। शीतल जल से हाथ-पांव और चेहरे को साफ करने से तृषा का प्रकोप कम होता है। शीतल जल में नीबू का रस और थोड़ी शक्कर मिलाकर, शिकंजी बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तृषा का निवारण होता है।
वातज तृषा की चिकित्साः
जब यह ज्ञात हो कि रोगी वातक तृषा से पीडि़त है तो उसको वात-पित्त शामक औशधियों का सेवन कराकर वातक तृषा का निवारण किया जाता हैं।
दो-दो तोले गिलोय का रस दो-दो घण्टे के अन्तराल से वातज तृषा से पीडि़त रोगी को पिलाने से तुरंत रोग का निवारण होता हैं। दिन में दो तीन बार पिला सकते हैं।
कुश, कास, शर, दर्भ और ईख, इन पंच तृणों की जड़ को उबाल कर कपडे से छान कर पिलाने से तृषा का अन्त होता हैं।
गुड़ और दही मिलाकर रोगी को सेवन कराने से वातज तृषा नष्ट होती हैं।
घी को हल्का सा गर्म करके रोगी को 10-10 ग्राम मात्रा में पिलाने से वातज तृषा के कारण तालु में उत्पन्न शुष्कता नष्ट होती हैं। तृषा की अधिकता से मुच्छित रोगी को घी नही पिलाना चाहिए।
मांस रस के सेवन से भी वातक तृषा नष्ट होती है।
तृषा नाशक कुछ गुणकारी औशधियां-
बिजौरे नीबू के फूलों को, केशर का चूर्ण, अनार का रस, मधु ओर सेंधा नमक, सबको अच्छी तरह मिलाकर सेवन करने से तृषा की निवृत्ति होती हैं।
लाल शालि (चावलों) का भात पकाकर, शीतल होने पर मधु मिलाकर खाने से जीर्ण तृषा का भी निवारण होता हैं।
रक्त पित्त रोग के कारण तृषा की उत्पत्ति होने पर चंद्रकला रस (आयुर्वेदिक औशधि) का सेवन करने से बहुत लाभ होता हैं।
सितोपलादि चूर्ण दिन में दो-तीन वार अनार के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा नष्ट होती है।
ताम्र भस्म और बंग भस्म 1-1 रत्ती मात्रा में चंदन के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा का निवारण होता है।
जल में मधु मिलाकर कुछ देर जल को मुँह में रोके रखने से तृषा की विकृति नष्ट होती है।
शीतल जल में धनियां, जीरा और सौफ भिगोकर, उनको छानकर, उस जल में मिश्री मिला कर पीने से तृषा नष्ट होती है।
गुलाब, चंदन, नीबू और अनार के रस का शरबत बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तीव्र तृषा रोग नष्ट होता है।
आहार विहारः
भोजन में रूक्ष, गरिष्ठ व उष्ण मिर्च मसालों के खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिक उत्पत्ति होती है। ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। चाय- कॉफी से भी अधिक प्यास लगती है। ग्रीष्म ऋतु में बर्फ का अधिक सेवन करने से भी अधिक प्यास लगती है। सीधे जल में बर्फ डाल कर नही पीना चाहिए। बर्फ के साथ रखकर जल को शीतल करके पीने से तृषा का निवारण होता है।
नीबू के रस से बनी शिकंजी तृषा को जल्दी शांत करती है। नदी व तालाब में स्नान करने से तृषा की विकृति नष्ट होती है। संतरा, मौसमी, जौ के सत्तू, इमली से बने पेय पदार्थ, धनियां, जीरा, मिश्री, अनानास, नारियल का जल, गन्ने का रस, आँवले व आम का मुरब्बा, शीतल दूध, तक्र (मट्ठा) आदि तृषा को नष्ट करते हैं।
सूर्य की प्रचण्ड धूप में अधिक घूमने-फिरने ओर अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक तृषा की उत्पत्ति होती हैं। गुरू, उष्ण, घी, तेल में बने पकवान, अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थ, चटपटे, तीक्ष्ण पदार्थ, सोंठ, पीपल, लाल मिर्च, चाय- कॉफी आदि खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिकता होती हैं। इन खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए।

नेत्र रोग का समूल नाश करने वाली ‘चाक्षुषोपनिषद् विद्या’
नेत्र रोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली चाक्षुषी विद्या की व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्र रोग की निवृत्ति के लिए इसका जप होता है। यह विनयोग है।
नेत्रोपनिषद मंत्रः
ऊँ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ऊँ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ऊँ नमः करूणाकरायामृताय। ऊँ नमः सूर्याय। ऊँ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा´छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।
ऊँ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायँ। मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊँ ( कृपया ) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें। ऊँ ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ऊँ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ऊँ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ऊँ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ ( सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले ) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। ( अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले ) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्णस्वरूप भगवान् सुर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं-उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।
जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा ( भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले ) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय ( सुवर्ण के समान कान्तिमान् ) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्तिज्ञथान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं ( प्राणियों ) के समक्ष उदित हो रहे हैं।
ऊँ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।
ऊँ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिए उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिए, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिए तथा तमोमय बन्धन में बधे हुए हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुश्प्करेक्शन को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।
नेत्र रोग से पीडि़त श्रद्धालु साधक को चाहिए कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी के रस) से अनार की शाखा की कलम के द्वारा काँसे के पात्र में निम्नलिखित विधि से यन्त्र को लिखें।
फिर उसी यन्त्र पर ताँबे की कटोरी में चर्तुमुख ( चारो ओर चार बत्तीयो का ) घी का दीपक जलाकर रख दें। तदानन्तर गन्ध-पुष्पादि से यन्त्र का पूजन करें। फिर पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ‘ऊँ ह्नीं हंसः’ इस बीज मंत्र की छः मालाएँ जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालाएँ जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अघ्र्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।
ऐसा करते रहने से इस उपनिषद् का नेत्ररोगनाशक अदभुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखने में आता है।

 

यज्ञ चिकित्सा से भी रोग नष्ट होते हैं

यज्ञ चिकित्सा से भी रोग नष्ट होते हैं सूक्ष्म में जो शक्ति है वह स्थूल में नहीं। सोने का एक रत्ती टुकड़ा किसी आदमी को खिला दो कोई लाभ न होगा। उसी को सूक्ष्म करके वर्क बनाकर खिलाओं पुष्टि देगा। पर जब उसे आग में फूँक कर भस्म बना लो तो केवल एक एक रत्ती खिलाने ही चेहरे पर लाली, शरीर में बल, मन में उत्साह उत्पन्न होकर वृद्ध भी युवा बन जायगा। वैद्यलोग जानते हैं कि एक माशे दवा की वैसे बहुत कम शक्ति होती है, उसी दवा को यदि एक सप्ताह तक घोटकर सूक्षम किया जाये तो उसकी शक्ति कई गुणा बढ़ जाती है। होमियोपैथी मे इसी नियम के आधार पर औशधियों की पोटैंसी तैयार की जाती है। जिसका प्रभाव करना अभीष्ट होता है तो खिलाने के स्थान मे औशधि सुँघाते हैं।
सुँघाने की अपेक्षा भी जली हुई औशधि का प्रभाव कितना बढ़ जाता है उसे उदारहण से समझिये। एक मिर्च सूँघने से कुछ न होगा। कूटने से पास बैठे लोगों को खाँसी आवेगी। पर यदि उसको आग में जलावें तो दूर-दूर तक के मनुश्य खांखने लगेंगे। कारण यह कि अब उसके परमाणु बहुत सूक्ष्म हो गये, अतः उनकी शक्ति बढ़ गयी। अब विचार कीजिये कि रोग के कीडे़ एक कतार में रक्खे जावें तो 25000 कीटाणु एक इच्ं स्थान घेरेगें। यदि उनको तौला जावे तो एक खस खस के दाने पर बीस अरब कीटाणु चढ़ जायँगे। इतनी सूक्ष्म वस्तु पर स्थूल कण वाली ओषधियों की बड़ी मात्राओं की पहुँच ही दुस्तर है, कीटाणुओं को समाप्त कर उन पर विजय पाना तो दूर की बात है। इसी नियम को समझने के कारण लोग तपेदिक की चिकित्सा में असफल रहते है, और उसे असाध्य समझते हैं। पर औशधियों का वह अत्यन्त सूक्ष्म भाग जो यज्ञ अग्नि द्वारा छिन्न भिन्न हुआ है कीटाणुओं को सुगमता से नष्ट कर रोग दूर कर सकता है।
पदार्थ विज्ञान से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि कोई वस्तु नष्ट नहीं होती किन्तु रूप बदल जाता है। जो ओषधि मुँह से खायी जाती है, वह रस रक्त बनने के पश्चात् क्षयरोगी के फेफड़ों तक पहुँचेगी। पर अग्नि में जलायी हुई औशधि श्वास द्वारा सीधी फेफड़ो पर पहुँच कर तत्काल प्रभाव करेगी और बहुत सूक्ष्म होने के कारण स्थायी प्रभाव करेगी। गूगूल को ही लीजिये। आयुर्वेद में इसे अन्य गुणों के साथ रसायन, बलकारक, टूटे को जोड़ने वाला और कृमिनाशक बतलाया गया है।
अन्वेषण से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जितने प्राकृतिक पदार्थ हैं उनके सूक्ष्म परमाणु हर समय गतिशील रहते है, यद्यपि प्रत्यक्ष में वे दृष्टिगोचर नहीं होते। हमारे इस मनुश्य शरीर, घर की दीवार, मेज, कुर्सी इत्यादि का प्रत्येक परमाणु गति कर रहा है। यजुर्वेद के 40 वें अध्याय के पहले मन्त्र में संसार को जगत्यां जगत् कहकर इसी नियम को बताया है। और यह गति भी ऊटपटांग नहीं किन्तु नियम पूर्वक है। प्रत्येक परमाणु गति एक सी नहीं होती। किन्हीं की गति समान होती है। और किन्हीं की एक दूसरे के प्रतिकूल। प्रकृति का नियम है कि दो समान वस्तुयें एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है और विरुद्ध वस्तएं एक दूसरे को भगाती हैं। आपने देखा होगा कि एक श्रेणी में एक साथ पढ़ने वाले कई विद्याथियों में से किन्हीं दोमें विशेष मित्रता हो जाती है। शेष में वैसी नहीं होती। रेल में सैकड़ो यात्री साथ-साथ यात्रा करते हैं पर उनमें से किन्हीं दो में ऐसी घनिष्ठता हो जाती है। जो जीवन भर निभाते हैं किन्हीं पति पत्नियों में ऐसा गहरा प्रेम होता है कि वे एक दूसरे पर प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते हैं। यह सब कुछ भी इसी नियम के आधार पर है जिस मनुश्य के शरीर के परमाणु जैसी गति करते हैं। उसे वैसी गति वाले रोग या स्वास्थ्य के परमाणुओं को उसकी ओर खिंचाव हो जाता है। और जो उसके विपरीत होते हैं वे दूर भागते हैं।
किसी भी रोग के कीटाणु जब मनुश्य के शरीर में प्रवेश करते हैं तो हमारे शरीर की रोगनिवारक शक्ति जिसे हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि सदा से जानते थे और प्राणयाम तथा ब्रह्मचर्य द्वारा नित्य बढ़ाया करते थे पर अब इस सम्बन्ध में वर्तमान विज्ञान में भी कुछ समय से खोज होने लगी है जिसे डाक्टरी में रोग निवारक शक्ति कहते है। रोग को दूर भगाने के लिये एक प्रकार का उफान खाया हुआ रस तथा रक्त के श्वेतकणों की सेना, जिसे डाक्टरी में चींहवबलजवेपे कहते है। भेजता है यदि ये लड़ाई में सफल हो जाते हैं तो रोग के कीटाणु वहीं समाप्त हो जाते हैं और हमें ज्ञात भी नहीं होता कि हम पर किसी रोग का आक्रमण हुआ था। हाँ, इनके निर्बल सिद्ध होने पर रोग हमारे शरीर पर अधिकार जमा लेता है। यह रोगनिवारक शक्ति कुछ तो जन्म काल से साथ आती है और कुछ मनुश्य को उत्तम भोजन, शुद्ध सुगन्धित वायु के मिलने से उत्पन्न होती है। अतः हवन यज्ञ से जहाँ रोगनिवारक शक्ति बढ़ेगी वहाँ वह उफान रस भी अधिक उत्पन्न होगा क्यूंकी गर्मी से उफान शीध्र आता ही है। इस प्रकार रोग के कृमि हवन करनेवाले पर आक्रमण करने पर भी रोग उत्पन्न करने में उसफल रहेंगे और रोग की अवस्था में हवन करने से शीध्र नष्ट हो जायँगे।
जिस प्रकार हमारे शरीर के ऊपर खाल का खोल चढ़ा है उसी प्रकार शरीर के भीतर की ओर एक मुलायम खाल का अस्तर भी लगा है। जो गले से लेकर आँतों के निचले भाग तक विशेष रूप से तर रहता है। जिस मनुश्य की यह खाल या अस्तर बिल्कुल ठीक है और उस पर कोई क्षत या खरोंच नहीं है वह स्वस्थ मनुश्य है और उस पर किसी भी संक्रामक रोग का आक्रमण नहीं हो सकता। इस वैज्ञानिक नियम को समझने वाले बुद्धिमान अनुभवी चिकित्सक सर्वदा रेचक दवा का निषेध करते हैं, क्योंकि इससे आँतों के अस्तर में खरोच उत्पन्न होती है। जब रोग-कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं तो इन्हीं खरोंच द्वारा रक्त में इस प्रकार फैल जाते हैं जिस प्रकार प्रवेश करायी हुई ओषधि। अब यदि किसी असुविधा से हमारी इस खाल या अस्तर में कोई खराश हो गयी है तो बाहर की खरोंच की चिकित्सा तो अन्य उपायों से भी सुगम है पर भीतर का प्रबन्ध कठिन है। हाँ जो ऐसी अवस्था में हवन करते हैं उनके भीतर जब घी, कपूर और गूगल इत्यादि के सूक्ष्म परमाणु पहुँचेंगे तो उस खरोंच को किस शीध्रता से भर देंगे इसको समझना कुछ कठिन नहीं है जब कि इन्हीं वस्तुओं से बाहर की खरोंच को भरने का अनुभव प्रत्येक मनुश्य करके देख सकता है।
युक्तियों के पश्चात् अब हम इस विषय में कुछ प्रमाण और अनुभव पेश करते है-
1. वेद भगवान् का प्रमाण- मूँचामि त्वा हविमा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत्र राजयक्ष्मात्।
ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्।।
हे व्याधिग्रस्त, मनुश्य तुझ को सुख के साथ चिरकालतक जीने के लिये गुप्त राजयक्ष्मा रोग से और सम्पूर्ण प्रकट राज्यक्ष्मा रोग से आहुति द्वारा छुड़ाता हूँ। जो इस समय में इस प्राणी को पीड़ाने या पुराने रोग ने ग्रहण किया है। उससे वायु तथा अग्नि देवता इसको अवश्य छुडावें।
इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि वेद भगवान् हर प्रकार के तपेदिक की चिकित्सा चाहे रोग अभी प्रकट हुआ हो या गुप्त हो, वायु और अग्निद्वारा बतलाते हैं और आहुति द्वारा रोग से छूटने का का आदेश करते हैं।
इससे अगला मन्त्र इस प्रकार है – यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव।
तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्षमेनं शतशारदाय।।
यदि रोग के कारण न्यून आयु वाला हो, अथवा संसार के सुखों से दूर हो गया हो, चाहे मृत्यु के निकट पहुँच चुका हो – ऐसे रोगी को भी महारोग के पाश से छुड़ाता हूँ। इस रोगी को सौ शरद् ऋतुओं तक जीने के लिये प्रबल किया है। इससे यह विदित होता है कि खराब से खराब अवस्था को रोगी जिसे चिकित्सक लोग असाध्य कह देते हैं हवन यज्ञ से अच्छा हो सकता है।
2. आयुर्वेद के प्रामणिक ग्रन्थ चरक का प्रमाण- यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुरा जितः।
तां वेदविहितामिष्टिमारोग्या र्थी प्रयोजयेत्।।
जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था आरोग्य चाहने वाले मनुश्य को उसी वेदविहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये।
3. होमियोपैथिक से पृष्टि-
होमियोपैथिक चिकित्सा के आविष्कार कर्ता हैनीमान साहब अधिक निर्बल रोगियों को खिलाने के स्थान में केवल औशधि सुँघाने का परामर्श देते हैं और उसके लिये वह अपनी प्रसिद्ध पुस्तक की की धारा 190 में लिखते है जो औशधि के प्रभाव को शीध्र ग्रहण करता है। सबसे अधिक प्रभाव ओषधि का सूँघने और श्वास लेने से होता है। यदि हैनीमन साहब के समय जर्मनी में यज्ञ का प्रवाह हेाता तो अवश्य ही वे इसे चिकित्सा का प्रधान अंग बनाते ।
4. ऐलोपैथिकमत से पुष्टि-
एलोपैथिक डाक्टरी में तपेदिक के रोगी ज्ञतमवेवजम और म्नबंसलचजने वपस को इत्यादि का प्दींसंजपवद बनाकर सुँघाने हैं और इसका प्रभाव तत्काल होता है। वैसे वही ज्ञतमवेवजम खिलाया भी जाता हैं पर वह इतना शीध्र प्रभाव नहीं करता। ऐसा क्यों होता है। इसीलिये कि सूँधी हुई दवा के सूक्ष्म परमाणु सीधे फेफडे़ में पहुँचकर अपना प्रभाव करते हैं। पर उनमें वह शक्ति नहीं कि स्थायी प्रभाव रख सकें, जैसा कि अग्नि से छिन्न-भिन्न हुई ओषधि के परमाणु रख सकते है।
वैद्यक के अनुसार-
मैंने अपने कई वर्षों की चिकित्सा के अनुभव से निश्चय किया है, जो महारोग ओषधिभक्षण करने से दूर नहीं होते वे वेदोक्त यज्ञों द्वारा दूर हो जाते हैं।
विद्वानो के अनुभव
फ्रांस के विज्ञानवेत्ता प्रो. टिलवर्ट कहते हैं कि जलती हुई खाँड के धुएँ में वायु शुद्ध करने की वड़ी शक्ति है। इससे हैजा, तपेदिक, चेचक इत्यादि का विष शीध्र नष्ट हो जाता है।
डाक्टर टाटलिट साहब ने मुनक्का, किशमिश इत्यादि सूखे फलों को जला कर देखा है और मालूम किया है कि इनके धुँए से टाइफायड ज्वर के कीटाणु केवल आधे धण्टे में और दूसरे रोगों के कीटाणु धण्टे, दो घण्टें में समाप्त हो जाते हैं।
मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर डाक्टर कर्नल किंग त्ण्डण् ने कालि के विद्यार्थियों को बताया कि घी, चावल में केसर मिलाकर जलाने से रोग के कीटाणुओं का नाश होता है।
फ्रांस के डाक्टर हेफकिन, जिन्होंने चेचेक की टीका ईजाद किया, कहते हैं कि घी जलाने से रोगकृति मर जाते हैं।
केमिकल प्रारपटीज की राय-
जयफल, जावित्री, बड़ी इलायची, सूखा चन्दन इत्यादि अग्नि में जलाने से मुफीद हिस्से ज्यों के त्यों रहते हैं या सूक्ष्म हो जाते हैं। पहले पहल इनसे सुगन्धित तेल गैस बनकर निकलते हैं। हवन गैस मेंयह चीजें अपने असली रूप में मिलती हैं। अग्नि इन चीजों को गैस बना देती है। उड़ाने वाले तेलों के परमाणु 1, 0000 से 1, 10000000 सेंटीमीटर व्यासवाले देखे गये हैं। अतः हवन में इन चीजों के गुण बहुत बढ़ जाते हैं और ये आसानी से कीटाणुओं का नाश करते हैं।

 

 

महा औशधि पीपल

महा औशधि पीपल पीपल वृक्ष की उपस्थिति व उपयोग की जानकारी वैदिक काल से ही मिलती है, अनेक प्राचीन ग्रन्थों में इसके उदाहरण मिलते है, पीपल का वृक्ष सम्पूर्ण जलीय प्रदेश तथा साधारण भूमि में आसानी से मिल जाता है तथा मरूभूमि में भी यह स्वयं को जीवित रखता है। आयुर्वेद के ग्रन्थों व संहिताओं में औशधि के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। चिकित्सा की दृष्टि से रोग निवारण के लिए पीपल के अनेक औशधीय  प्रयोग मिलते हैं, जिनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत है-

  1. सर्पदंश पर विषनाशक प्रयोग
    जब किसी को सर्पदश हो गया हो, शीघ्र ही डंठल की तरफ से पीपल के ताजे पत्ते को रोगी के कान में थोड़ा सा ड़ालें इसे कसकर पकड़े रहें, क्योकि विष के प्रभाव से रोगी को वेदना होती है तथा डंठल का खिंचाव अन्दर की ओर होता है, यदि डंठल अधिक अन्दर चला जाता है, तो कान का पर्दा छिद्रयुक्त हो सकता है, अतरू पत्ते को पकडे़ रहना चाहिए। तथा जब पत्ता कुछ विवर्ण (नीला या पीला) हो जाए व डंठल कुछ फूल जाए तब पत्ते को बदल देना चाहिए अर्थात् नवीन पत्ता लगाना चाहिए। इस क्रिया से विष का आचूषण होता है तथा जब विष का पूरा आचूषण हो जाता है, तब डंठल का अन्दर की ओर खिंचाव तथा रोगी को वेदना होनी बन्द हो जाती है। तब उल्टी (वमन) करानी चाहिए ताकि आमाशय में कोई विषाक्त द्रव एकत्रित हो, तो निकल जाए। इसके पश्चात् दुग्धपान कराना चाहिए।
  2. पीपल के द्वारा चिकित्सा के अनेक योग आयुर्वेदीय योग मिलते हैं जैसे– संग्रहणीय कषाय (चरक), पंचवल्कल कषाय आदि।
    3. आमजप्रवाहिका (एमेबिक डीसेन्ट्री) में पीपल की गोंद का शुष्क चुर्ण 2-3 ग्राम प्रतिदिन लेने से जीर्ण प्रवाहिका ठीक हो जाती है। साथ ही पथ्यापथ्य का पालन आवश्यक है।
    4. मधुमेह रोग में दो पत्ते पीपल के, चार पत्ते तुलसी के, चार पत्ते नीम के, चार पत्ते बिल्प पत्र के तथा आठ पत्र नींबू के एवं पाँच काली मिर्च को मुख में चबा-चबाकर रस चूसना चाहिए, शेष बचे हुए तंतुओं को फेंक देना चाहिए। औषध का सेवन करने के साथ-साथ रोगी को यथा-शक्ति पैदल भ्रमण भी करते रहना चाहिए, इससे कुछ ही दिनों में रक्त शर्करा की मात्रा न्यून हो जाती है।
    5. आयुर्वेद की अनेक भस्मों के निर्माण में भी पीपल के अंगों का प्रयोग किया जाता हैं– जैसे नाग भस्म, वंग भस्म, यशद भस्म, अभ्रक भस्म आदि।

नोट- यह सभी औधिय प्रयोग आप अपने चिकित्सक से परामर्श करके ही करें।

पीपल के मांत्रिक प्रयोग
1. विषम ज्वर
जिस रोगी को ठण्ड लगकर बुखार आता हो या तीन दिन के अन्तर से ज्वर आता हो, उस रोगी को स्नान कराके, शुद्ध जल में तिल व थोड़ा दूध मिलाकर पूर्वाभिमुख खडे़ होकर पीपल वृक्ष पर उस तिलोदक को सात बार मंत्र बोलते हुए धारा बद्ध चढ़ा देने से ज्वर आना बन्द हो जाता है। यह प्रयोग सात दिन तक या ज्वर शांत होने तक किया जाता है। मंत्र इस प्रकार से है- विषमज्वर गच्छत्वं तस्मै तिलोदकं नमरू
2. पुराना ज्वर
 नमः शिवाय’ को ग्यारह बार उच्चारण करते हुए जल अर्पित करें तथा रोगी के रोग निवृत्ति हेतु प्रार्थना करें। इससे पुराना ज्वर, जो अनेक औशधियों के सेवन से भी ठीक न होता हो तब इस मंत्रोपचार से लाभ होता है।\शनिवार के दिन प्रातरूकाल स्नानादि करके रोगी स्वयं या रोगी की ओर से कोई अन्य व्यक्ति रोगी का नाम लेकर एक ताम्र के पात्र में शुद्ध जल व थोड़ा चिरायता, दुग्ध, कुछ शर्करा व कुशा डालकर उत्तर की ओर मुख कर के भगवान शंकर को स्मरण करते हुए शिव पंचाक्षरी मंत्र ‘

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार साधना के क्षेत्र में मुद्राओं का विशिष्ठ महत्व सर्वविदित है। तंत्र के क्षेत्र में भी मुद्राओं का सुनियोजित और विस्तृत विवरण मिलता है। मुद्रा के अनेक अर्थ हैं, किन्तु साधारणतया साधनात्मक कार्यो में प्रयुक्त होने वाली मुद्राओं को, जो उंगलियों के माध्यम से देवता के प्रीत्यर्थ प्रकट की जाती हैं मुद्राएं कहा जाता है। इनका प्रयोग शक्ति साधक अनिवार्यतः करते हैं, लेकिन अन्य साधकों के लिए भी मुद्रा प्रदर्शन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि साधना क्रम में यह एक आवश्यक क्रिया मानी गई है। कुलावर्ण तंत्र में लिखा है- ‘‘मुद्राः कुर्वन्ति देवानां मनासि द्रावयन्यि च।’’
‘‘मुद्राओ को प्रदर्शित करने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा मुद्रा प्रदर्शित करने वाले भक्त पर द्रवित होकर कृपा करते हैं।’’ कुछ तंत्र शास्त्रों में स्पष्ट है, कि मुद्रा प्रदर्शित करने पर व्यक्ति को देवताओं की समीप्यता प्राप्त होती है; मुद्राओं के प्रदर्शित करने पर देवता पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रहते हैं तथा इन के प्रदर्शन से साधारण पूजा भी उत्तम हो जाती है, बिना मुद्राओं के सम्पत्र की हुई साधनाए, जप, देवाचार्वन, योग आदि निष्फल हो जाते हैं। मुद्राओं का केवल एक पक्ष नहीं -‘‘क्या मुद्रा द्वारा रोगों का उपचार भी सम्भव है?’’

निर्विषोऽपि भेवेत् क्षिप्रं यो जन्तुर्विषमूर्छितः। चत्वारिंशित् समाख्याता मुद्रा श्रेष्ठा महाधिकाः।।

‘‘मुद्रा प्रदर्शन से विष द्वारा मूच्र्छित व्यक्ति भी स्वस्थ्य लाभ प्राप्त करता है। व्याधि और मुत्यु तक का निवारण मुद्राओं द्वारा संभव है। मोक्ष, जो मनुश्य जीवन का सर्वोच्च सोपान है, वह भी मुद्रा प्रदर्शन से प्राप्त किया जा सकता है।’’ मुद्राओं के महत्व को जानकर यदि व्यक्ति चाहे, तो अनेक रोगों पर नियंत्रण कर सकता है। वर्तमान समय में तो इतने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोग है, जिनसे बचना मनुश्य के लिए कठिन हो गया है, न चाहते हुए भी अनेक प्रकार की औशधिओं का सेवन करना पड़ता है और जिसके कारण कभी-कभी अनेक प्रकार के साईड़ इफेक्ट हो जाते हैं, जैसे चेहरे पर अनेक प्रकार के दाने, फुंसियां निकल आती हैं, जिसकी वजह से सौन्दर्य क्षीण हो जाता है। इसके लिए ‘कुम्भ मुद्रा ’ का प्रयोग करें, तो चेहरा रोग रहित, कान्तियुक्त और चमकदार बनने लगेगा। कुम्भ मुद्रा में साधक अपने दाहिने हाथ से हल्की खुली सी मुट्ठी  बनावें, इसी प्रकार दूसरे हाथ से भी करें, दोनों हाथ के अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करते रहें बायें हाथ को दाहिने हाथ के ऊपर रखें। इसे कुम्भ मुद्रा कहते है। इसके नित्य प्रदर्शन से साधक का चेहरा आकर्षक बनता है तथा दाने व मुहासे साफ हो जाते है।
स्वर शोधक-
साधक यदि ‘प्राण मुद्रा’ सम्पन्न करें, तो स्वर से सम्बन्धित रोगों को नियंत्रित कर सकते है। प्राण मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक अपने अंगूठे से अनामिका और कनिष्ठका के पोरों को स्पर्श करें, बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखें, तो प्राण मुद्रा के प्रदर्शित करने से साधक के स्वर संस्थान पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उसका स्वर शुद्ध होता है। जिनका स्वर घरघराता हो या आवाज स्पष्ट न हो, उसे प्राण मुद्रा करने से बहुत लाभ होता है।
मुख शोधन-
व्यान मुद्रा’ प्रदर्शित करने से साधक के मुख से सम्बधित रोगों का शमन होता है। साधक बैठ कर अपने हाथ के अंगूठे से मध्यमा और अनामिका को स्पर्श करें, इससे व्यान मुद्रा प्रदर्शित होती है। इस मुद्रा के प्रदर्शन से साधक के मुख सम्बन्धी रोगों पर प्रभाव पड़ता है; जैसे यदि उसके मुंह से दुर्गन्ध आती है या उसके मुंह का स्वाद अक्सर बिगड़ा रहता है अथवा मुख में छाले निकलने लगते हो, तो इस मुद्रा को नित्य करने से बहुत लाभ मिलता है। गले के रोग- सर्दी या गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला अंग गला ही होता है। यह शीघ्र ही वातावरण से प्रभावित हो कर संक्रमित हो जाता है, जिसकी वजह से गला बैठना, गले में सूजन, दर्द या टॉन्सिल्स की शिकायत होने लगती है। यदि ऐसा व्यक्ति ‘उदान मुद्रा’ सम्पन्न करता है, तो उसे गले से सम्बन्धित रोग नहीं होते। इस मुद्रा को करते समय अपने हाथ के अंगूठे से तर्जनी अंगुली को स्पर्श करें और पूर्ण रूप से स्थिर होकर बैठें व मन ‘सौं’ बीज पर एकाग्र करें।
हृदय सम्बन्धी रोग-
‘आवाहनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से हृदय रोगों पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। आवाहनी मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक दोनों हाथों को मिलाकर अंजुली बना लें व अंगूठों से अनामिका के मूल को स्पर्श करें। ऐसा साधक नित्य स्थिर मन से जिस आसन में वह सुविधा अनुभव करे चाहे पद्यासन हो या सुखासन हो, बैठ कर करे। यह मुद्रा सम्पन्न करने से साधक हृदय के रोगों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। यदि साधक घबराहट का अनुभव कर रहा हो, तो वह थोड़ी देर इस मुद्रा को न करे, तो उसे लाभ अवश्य होगा।
पेट के रोग-
‘सम्मुखीकरण मुद्रा’ सम्पन्न करने से साधक पेट से सम्बधित रोगों पर विजय प्राप्त कर लेता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए साधक स्थिर बैठ जाये व अपने दोनों हाथों से मुट्ठी  बनाये, अंगूठे को मुट्ठी के अन्दर रखे तथा दोनों हाथों की मुट्ठी को परस्पर कनिष्ठिका उंगली से मिला ले। इसे सम्पन्न करने पर पेट में यदि कीड़े भी हों या पित्त अधिक बनता हो, तो व्यक्ति को राहत मिलती है। यह मुद्रा पेट से सम्बधित रोगों में अत्यन्त सहायक होती है, जिसे नित्य करने से व्यक्ति इन रोगों को नियंत्रित कर सकता है।
चर्मरोग-
खुजली होने या किसी वस्तु से खाने -पीने से एलर्जी हो जाने से पर चमड़ी से सम्बन्धित रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति असहजता अनुभव करता है। इस रोग के लिए ‘चक्र मुद्रा’ करने से नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। दोनों हाथों की उंगलियों को फैला लें व बायें हाथ की कनिष्का अंगुली से दाहिने हाथ की कनिष्किा को स्पर्श करें तथा बायें हाथ के अंगूठे से दाहिने हाथ के अंगूठे को परस्पर स्पर्श करें। इस प्रकार से चक्र मुद्रा प्रदर्शित होती है।
उच्च रक्तचाप-
उच्च रक्तचाप में ‘ज्ञान मुद्रा’ सहायक होती है। इस मुद्रा को करने से व्यक्ति को अपने रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। ज्ञान मुद्रा को करने के लिए अंगूठे और तर्जनी को परस्पर स्पर्श करें। यह मुद्रा शान्तचित होकर सम्पन्न करनी चाहिए और नियमित रूप से करनी चाहिए तभी राहत का अनुभव होता है।

कमर के रोग-
‘सन्निरोधिनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से कमर के रोगों पर नियंत्रण होता है। इस मुद्रा के लिए व्यक्ति अपने दोनों हाथों से मुत्ठियाँ बना कर उन्हे आमने-सामने कर जोड़ दें तथा थोडी देर तक कमर सीधी कर सुखासन पर बैठ कर यह मुद्रा सम्पन्न करें। इससे साधक को अपने कमर से सम्बधित रोगों में लाभ मिलता है। इस से कमर का तनाव भी समाप्त हो जाता है, कमर से सम्बधित अन्य रोगों में भी लाभ मिलता है।
गुर्दे के रोग-
यदि कोई गुर्दे के रोग से पीडि़त है या गुर्दे से सम्बधित किसी रोग से ग्रस्त है, तो वह यदि ‘गदा मुद्रा’ का नियमित अभ्यास करता है, तो उसे सम्बधित रोग पर नियंत्रण प्राप्त होता है। इस मुद्रा को प्रदर्शित करने के लिए दोनों हाथों की उंगलियों को एक दूसरे में फंसा दें। इससे गदा मुद्रा प्रदर्शित होगी। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से व्यक्ति को यदि गुर्दे में सूजन है तो उसे अच्छे परिणाम की प्राप्ति होती है।
हाथ और पांव से सम्बधित रोग-
यदि सायंकाल खड़े होकर ‘सम्पुटी मुद्रा’ को सम्पन्न किया जाए, तो साधक को हाथ और पांव से सम्बन्धित रोगों में आराम मिलता है। यदि पावों में अक्सर दर्द रहता हो तथा घुटने मोड़ने में अत्यधिक कष्ट हो, तो यह मुद्रा आराम दिलाने में सहायक होती है। वजन उठाने पर दर्द का अनुभव हो, तो इस मुद्रा को करने से लाभ होता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए बायें हाथ को आकाश की ओर रखें तथा उस पर दाहिने हाथ से सम्पुट करें। यह मुद्रा साधक 5 मिनट तक नित्य करें।
वात रोग
‘शंख मुद्रा’ इस मुद्रा को नित्य करने से व्यक्ति यदि वात रोग से पीडि़त है, तो उसे इस रोग में आराम मिलता है। इस मुद्रा को साधक प्रातः काल स्थिर भाव से बैठ कर सन्ध्यादि से पूर्व प्रदर्शित करे। इस मुद्रा के लिए बायें हाथ के अंगूठे को दाहिने हाथ से मुट्ठी बनाकर पकडे़ं तथा मुट्ठी को दाहिने हाथ की अंगुलियों से स्पर्श करायें, तो शंख मुद्रा प्रकट होगी। यह मुद्रा यदि नियमित रूप से 5-7 मिनट तक सम्पन्नकी जाय, तो वात रोगों में आश्चर्य जनक लाभ होता है।