मुद्राओं द्वारा रोगोपचार

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार साधना के क्षेत्र में मुद्राओं का विशिष्ठ महत्व सर्वविदित है। तंत्र के क्षेत्र में भी मुद्राओं का सुनियोजित और विस्तृत विवरण मिलता है। मुद्रा के अनेक अर्थ हैं, किन्तु साधारणतया साधनात्मक कार्यो में प्रयुक्त होने वाली मुद्राओं को, जो उंगलियों के माध्यम से देवता के प्रीत्यर्थ प्रकट की जाती हैं मुद्राएं कहा जाता है। इनका प्रयोग शक्ति साधक अनिवार्यतः करते हैं, लेकिन अन्य साधकों के लिए भी मुद्रा प्रदर्शन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि साधना क्रम में यह एक आवश्यक क्रिया मानी गई है। कुलावर्ण तंत्र में लिखा है- ‘‘मुद्राः कुर्वन्ति देवानां मनासि द्रावयन्यि च।’’
‘‘मुद्राओ को प्रदर्शित करने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा मुद्रा प्रदर्शित करने वाले भक्त पर द्रवित होकर कृपा करते हैं।’’ कुछ तंत्र शास्त्रों में स्पष्ट है, कि मुद्रा प्रदर्शित करने पर व्यक्ति को देवताओं की समीप्यता प्राप्त होती है; मुद्राओं के प्रदर्शित करने पर देवता पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रहते हैं तथा इन के प्रदर्शन से साधारण पूजा भी उत्तम हो जाती है, बिना मुद्राओं के सम्पत्र की हुई साधनाए, जप, देवाचार्वन, योग आदि निष्फल हो जाते हैं। मुद्राओं का केवल एक पक्ष नहीं -‘‘क्या मुद्रा द्वारा रोगों का उपचार भी सम्भव है?’’

निर्विषोऽपि भेवेत् क्षिप्रं यो जन्तुर्विषमूर्छितः। चत्वारिंशित् समाख्याता मुद्रा श्रेष्ठा महाधिकाः।।

‘‘मुद्रा प्रदर्शन से विष द्वारा मूच्र्छित व्यक्ति भी स्वस्थ्य लाभ प्राप्त करता है। व्याधि और मुत्यु तक का निवारण मुद्राओं द्वारा संभव है। मोक्ष, जो मनुश्य जीवन का सर्वोच्च सोपान है, वह भी मुद्रा प्रदर्शन से प्राप्त किया जा सकता है।’’ मुद्राओं के महत्व को जानकर यदि व्यक्ति चाहे, तो अनेक रोगों पर नियंत्रण कर सकता है। वर्तमान समय में तो इतने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोग है, जिनसे बचना मनुश्य के लिए कठिन हो गया है, न चाहते हुए भी अनेक प्रकार की औशधिओं का सेवन करना पड़ता है और जिसके कारण कभी-कभी अनेक प्रकार के साईड़ इफेक्ट हो जाते हैं, जैसे चेहरे पर अनेक प्रकार के दाने, फुंसियां निकल आती हैं, जिसकी वजह से सौन्दर्य क्षीण हो जाता है। इसके लिए ‘कुम्भ मुद्रा ’ का प्रयोग करें, तो चेहरा रोग रहित, कान्तियुक्त और चमकदार बनने लगेगा। कुम्भ मुद्रा में साधक अपने दाहिने हाथ से हल्की खुली सी मुट्ठी  बनावें, इसी प्रकार दूसरे हाथ से भी करें, दोनों हाथ के अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करते रहें बायें हाथ को दाहिने हाथ के ऊपर रखें। इसे कुम्भ मुद्रा कहते है। इसके नित्य प्रदर्शन से साधक का चेहरा आकर्षक बनता है तथा दाने व मुहासे साफ हो जाते है।
स्वर शोधक-
साधक यदि ‘प्राण मुद्रा’ सम्पन्न करें, तो स्वर से सम्बन्धित रोगों को नियंत्रित कर सकते है। प्राण मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक अपने अंगूठे से अनामिका और कनिष्ठका के पोरों को स्पर्श करें, बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखें, तो प्राण मुद्रा के प्रदर्शित करने से साधक के स्वर संस्थान पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उसका स्वर शुद्ध होता है। जिनका स्वर घरघराता हो या आवाज स्पष्ट न हो, उसे प्राण मुद्रा करने से बहुत लाभ होता है।
मुख शोधन-
व्यान मुद्रा’ प्रदर्शित करने से साधक के मुख से सम्बधित रोगों का शमन होता है। साधक बैठ कर अपने हाथ के अंगूठे से मध्यमा और अनामिका को स्पर्श करें, इससे व्यान मुद्रा प्रदर्शित होती है। इस मुद्रा के प्रदर्शन से साधक के मुख सम्बन्धी रोगों पर प्रभाव पड़ता है; जैसे यदि उसके मुंह से दुर्गन्ध आती है या उसके मुंह का स्वाद अक्सर बिगड़ा रहता है अथवा मुख में छाले निकलने लगते हो, तो इस मुद्रा को नित्य करने से बहुत लाभ मिलता है। गले के रोग- सर्दी या गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला अंग गला ही होता है। यह शीघ्र ही वातावरण से प्रभावित हो कर संक्रमित हो जाता है, जिसकी वजह से गला बैठना, गले में सूजन, दर्द या टॉन्सिल्स की शिकायत होने लगती है। यदि ऐसा व्यक्ति ‘उदान मुद्रा’ सम्पन्न करता है, तो उसे गले से सम्बन्धित रोग नहीं होते। इस मुद्रा को करते समय अपने हाथ के अंगूठे से तर्जनी अंगुली को स्पर्श करें और पूर्ण रूप से स्थिर होकर बैठें व मन ‘सौं’ बीज पर एकाग्र करें।
हृदय सम्बन्धी रोग-
‘आवाहनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से हृदय रोगों पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। आवाहनी मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक दोनों हाथों को मिलाकर अंजुली बना लें व अंगूठों से अनामिका के मूल को स्पर्श करें। ऐसा साधक नित्य स्थिर मन से जिस आसन में वह सुविधा अनुभव करे चाहे पद्यासन हो या सुखासन हो, बैठ कर करे। यह मुद्रा सम्पन्न करने से साधक हृदय के रोगों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। यदि साधक घबराहट का अनुभव कर रहा हो, तो वह थोड़ी देर इस मुद्रा को न करे, तो उसे लाभ अवश्य होगा।
पेट के रोग-
‘सम्मुखीकरण मुद्रा’ सम्पन्न करने से साधक पेट से सम्बधित रोगों पर विजय प्राप्त कर लेता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए साधक स्थिर बैठ जाये व अपने दोनों हाथों से मुट्ठी  बनाये, अंगूठे को मुट्ठी के अन्दर रखे तथा दोनों हाथों की मुट्ठी को परस्पर कनिष्ठिका उंगली से मिला ले। इसे सम्पन्न करने पर पेट में यदि कीड़े भी हों या पित्त अधिक बनता हो, तो व्यक्ति को राहत मिलती है। यह मुद्रा पेट से सम्बधित रोगों में अत्यन्त सहायक होती है, जिसे नित्य करने से व्यक्ति इन रोगों को नियंत्रित कर सकता है।
चर्मरोग-
खुजली होने या किसी वस्तु से खाने -पीने से एलर्जी हो जाने से पर चमड़ी से सम्बन्धित रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति असहजता अनुभव करता है। इस रोग के लिए ‘चक्र मुद्रा’ करने से नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। दोनों हाथों की उंगलियों को फैला लें व बायें हाथ की कनिष्का अंगुली से दाहिने हाथ की कनिष्किा को स्पर्श करें तथा बायें हाथ के अंगूठे से दाहिने हाथ के अंगूठे को परस्पर स्पर्श करें। इस प्रकार से चक्र मुद्रा प्रदर्शित होती है।
उच्च रक्तचाप-
उच्च रक्तचाप में ‘ज्ञान मुद्रा’ सहायक होती है। इस मुद्रा को करने से व्यक्ति को अपने रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। ज्ञान मुद्रा को करने के लिए अंगूठे और तर्जनी को परस्पर स्पर्श करें। यह मुद्रा शान्तचित होकर सम्पन्न करनी चाहिए और नियमित रूप से करनी चाहिए तभी राहत का अनुभव होता है।

कमर के रोग-
‘सन्निरोधिनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से कमर के रोगों पर नियंत्रण होता है। इस मुद्रा के लिए व्यक्ति अपने दोनों हाथों से मुत्ठियाँ बना कर उन्हे आमने-सामने कर जोड़ दें तथा थोडी देर तक कमर सीधी कर सुखासन पर बैठ कर यह मुद्रा सम्पन्न करें। इससे साधक को अपने कमर से सम्बधित रोगों में लाभ मिलता है। इस से कमर का तनाव भी समाप्त हो जाता है, कमर से सम्बधित अन्य रोगों में भी लाभ मिलता है।
गुर्दे के रोग-
यदि कोई गुर्दे के रोग से पीडि़त है या गुर्दे से सम्बधित किसी रोग से ग्रस्त है, तो वह यदि ‘गदा मुद्रा’ का नियमित अभ्यास करता है, तो उसे सम्बधित रोग पर नियंत्रण प्राप्त होता है। इस मुद्रा को प्रदर्शित करने के लिए दोनों हाथों की उंगलियों को एक दूसरे में फंसा दें। इससे गदा मुद्रा प्रदर्शित होगी। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से व्यक्ति को यदि गुर्दे में सूजन है तो उसे अच्छे परिणाम की प्राप्ति होती है।
हाथ और पांव से सम्बधित रोग-
यदि सायंकाल खड़े होकर ‘सम्पुटी मुद्रा’ को सम्पन्न किया जाए, तो साधक को हाथ और पांव से सम्बन्धित रोगों में आराम मिलता है। यदि पावों में अक्सर दर्द रहता हो तथा घुटने मोड़ने में अत्यधिक कष्ट हो, तो यह मुद्रा आराम दिलाने में सहायक होती है। वजन उठाने पर दर्द का अनुभव हो, तो इस मुद्रा को करने से लाभ होता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए बायें हाथ को आकाश की ओर रखें तथा उस पर दाहिने हाथ से सम्पुट करें। यह मुद्रा साधक 5 मिनट तक नित्य करें।
वात रोग
‘शंख मुद्रा’ इस मुद्रा को नित्य करने से व्यक्ति यदि वात रोग से पीडि़त है, तो उसे इस रोग में आराम मिलता है। इस मुद्रा को साधक प्रातः काल स्थिर भाव से बैठ कर सन्ध्यादि से पूर्व प्रदर्शित करे। इस मुद्रा के लिए बायें हाथ के अंगूठे को दाहिने हाथ से मुट्ठी बनाकर पकडे़ं तथा मुट्ठी को दाहिने हाथ की अंगुलियों से स्पर्श करायें, तो शंख मुद्रा प्रकट होगी। यह मुद्रा यदि नियमित रूप से 5-7 मिनट तक सम्पन्नकी जाय, तो वात रोगों में आश्चर्य जनक लाभ होता है।