सूर्य किरण चिकित्सा

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

Telephonic Consultation, face to face Consultation, best top remedy

सूर्य की रोशनी में सात रंग की किरणें होती हैं, ज्योतिषीय मतानुसार सूर्य की किरणों से अपने सातों ग्रहों को अनुकूल कर सकते हैं :-

जातक की कुंडली के प्रतिकूल ग्रहों को सूर्य की किरणों से चिकित्सा कर भाग्य को चमकाया जा सकता है, जन्म कुंडली द्वारा जब यह निश्चित हो जाता है कि कुंडली में कौन कौन से ग्रह कमजोर हैं, जिसे आप उस ग्रह के रंग से ठीक कर सकते हैं। तब उस ग्रह के लिए सूर्य की किरणों से उपचार करना सरल हो जाता है। सूर्य की सातों किरणों का प्रभाव अलग-अलग है, अपनी प्रकृति के अनुसार ये विभिन्न रोगों और मानसिक दोषों को दूर करने में सहायक सिद्ध होती हैं। सूर्य की सातों किरणों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। शरीर में तीन प्रकार के प्रमुख दोष होते हैं:- “वात, पित और कफ” जो ग्रह कमजोर होता है, उस रंग की कमी हो जाती है। जिसे आप जातक की कुंडली से जानकर उस का उपचार कर सकते हैं। जैसे अग्नितत्व कमजोर होगा तो लाल रंग से चिकित्सा करना होगा …

१. पीला (Yellow), नारंगी (Orange), लाल (Red),

2. हरा (Green)

3. बैंगनी (Voilet), नीला (Indigo), आसमानी (Blue)

औषधिय जल निर्माण :-

1. सूर्य किरण चिकित्सा के लिए जिस किरण (Violet, Indigo, Blue, Green, Yellow, Orange या Red) का औषधिय जल बनाना हो, उसी रंग की कांच की साफ़ बोतल ले लेनी चाहिए। यदि उस रंग की बोतल न हो तो उस कलर का BOPP ले कर बोतल पर लपेट दें, बोतलों को अच्छी तरह से धोकर साफ़ कर लें। उसके बाद उसमे साफ़ पीने का पानी भर दें। बोतल को ऊपर से तीन अंगुल खाली रखें, और ढक्कन लगाकर अच्छे से बंद कर दें।

2. पानी से भरी इन बोतलों को सूर्योदय के समय से 6 से 8 घंटे तक धूप में रख दें। बोतलें रखते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी बोतल की छाया दूसरी बोतल पर न पड़े। रात्रि को बोतल को घर के अंदर रख दें। इस प्रकार सूर्य किरण औषधि तैयार हो जाती है। यह औषधिय जल को रोगी को दिन में 3-4 बार पिलायें। एक बार तैयार किये गए औषधिय जल को 4 -5 दिन तक पी सकते हैं। औषधिय जल समाप्त होने के पश्चात पुनः बना लें।

औषधि सेवन कैसे करें : –

नारंगी रंग के औषधिय जल को भोजन करने के 15 मिनट बाद और 30 मिनट के अंदर लेना चाहिए। हरे या नीले रंग के औषधिय जल को खाली पेट या भोजन करने से एक घंटा पहले सेवन करना चाहिए। हरे रंग के औषधिय जल को प्रातः काल 200 मि. ली. तक ले सकते हैं। यह औषधिय जल शरीर से Toxins को बाहर निकालता है, एवं इसका कोई विपरीत प्रभाव भी नहीं है।

मात्रा :- एक बार में एक से दो चम्मच औषधिय जल लें, दिन में तीन या चार बार ले सकते हैं।

औषधीय जल सेवन से लाभ :

1. लाल (Red) रंग :- लाल रंग की बोतल का जल अत्यंत गर्म प्रकृति का होता है। अतः जिनकी प्रकृति गर्म हो उन्हें इसे नहीं लेना चाहिए। इसको पीने से खूनी दस्त या उलटी हो सकती है। इस जल का उपयोग केवल मालिश करने के लिए करना चाहिए। यह Blood और Nerves को उत्तेजित करता है। और शरीर में गर्मी बढ़ाता है। गर्मियों में इसका उपयोग नहीं करना चाहिए। यह सभी प्रकार के वात और कफ रोगों के लिए लाभ प्रदान करता है।

2. नारंगी (Orange) रंग :- नारंगी रंग की बोतल में तैयार किया गया जल Blood Circulation को बढ़ाता है, और मांसपेशियों को मजबूत करता है। यह औषधिय जल मानसिक शक्ति और इच्छाशक्ति को बढ़ाने वाला है। अतः यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में सूर्य या चन्द्रमा निर्बल है तो, उसे इस जल का उपयोग करके अत्यंत लाभ प्राप्त हो सकता है। यह औषधिय जल बुद्धि और साहस को भी बढ़ाता है। कफ सम्बंधित रोगों, खांसी, बुखार, निमोनिया, सांस से सम्बंधित रोग, Tuberculosis, पेट में गैस, हृदय रोग, गठिया, Anaemia, Paralysis आदि रोगों में लाभ देता है। यह औषधिय जल माँ के स्तनों में दूध की वृद्धि भी करता है।

3. पीला(Yellow) रंग :- शारीरिक एवं मानसिक स्वस्थता के लिए यह जल बहुत उपयोगी है परन्तु इस जल को थोड़ी मात्रा में लेना चाहिए। यह जल Digestive System को ठीक करता है अतः पेट दर्द, कब्ज आदि समस्यायों के निवारण हेतु इस जल का सेवन लाभकारी है। परन्तु पेचिश होने पर इस जल का प्रयोग वर्जित है। इसके अतिरिक्त हृदय, लीवर और Lungs के रोगों में भी इस जल को पीने से लाभ मिलता है।

4. हरा (Green) रंग :- यह औषधिय जल शारीरिक स्वस्थता और मानसिक प्रसन्नता देने वाला है। Muscles को regenerate करता है। Mind और Nervous system को स्वस्थ रखता है। इस जल को वात रोगों, Typhoid, मलेरिया आदि बुखार, Liver और Kidney में सूजन, त्वचा सम्बंधित रोगों, फोड़ा -फुन्सी, दाद, आँखों के रोग, डायबिटीज, सूखी खांसी, जुकाम, बवासीर, कैंसर, सिरदर्द, ब्लड प्रेशर, आदि में सेवन करना लाभप्रद है।

5. आसमानी (Blue) रंग: – यह जल शीतल औषधिय जल है। यह पित्त सम्बंधित रोगों में लाभप्रद है। प्यास को शांत करता है एवं बहुत अच्छा Antiseptic भी है। सभी प्रकार के बुखारों में सर्वोत्तम लाभकारी है। कफ वाले व्यक्तियों को इसका उपयोग नहीं करना चाहिए। यह बुखार, खांसी, दस्त, पेचिश, दमा, सिरदर्द, Urine सम्बन्धी रोग, पथरी, त्वचा रोग, नासूर, फोड़े -फुन्सी, आदि रोगों में अत्यंत लाभ प्रदान करता है।

6. नीला (Indigo) रंग:- यह औषधिय जल भी शीतल श्रेणी में आता है। इस औषधि को लेने में थोड़ी सी कब्ज की शिकायत हो सकती है, परन्तु यह शीतलता और मानसिक शान्ति प्रदान करता है। शरीर पर इस जल का प्रभाव बहुत जल्दी होता है। यह Intestine, Leucoria, योनिरोग आदि रोगों में विशेष लाभप्रद है। तथा शरीर में गर्मी के सभी रोगों को समाप्त करता है।

7. बैंगनी (Voilet) रंग :- इस औषधिय जल के गुण बहुतायत में नीले रंग के जल से मिलते जुलते हैं। इसके सेवन से Blood में RBC Count बढ़ जाता है। यही खून की कमी को दूर कर Anaemia रोग को ठीक करता है। Tuberculosis जैसे रोग को ठीक करता है। इस जल को पीने से नींद अच्छी आती है।

————————————————-

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, rbdhawan.wordpress.com पर।

मासिक धर्म

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

Telephonic Consultation, face to face Consultation, best top remedy

महिलाओं को मासिक धर्म या पीरियड्स 28 दिन में ही क्यों? :-

मासिक धर्म और चन्द्रमा दोनों के 28 दिवसीय चक्र का ज्योतिषीय सम्बन्ध है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 28 नक्षत्र (अभिजित सहित) होते हैं, जब किसी महिला के जन्म समय के नक्षत्र से वर्तमान चन्द्रमा का गोचर 28 नक्षत्रों पर पूर्ण होता है, तो नियमतः मासिक धर्म आरम्भ होता है। वस्तुत: मासिक धर्म महिलाओं के स्वास्थ्य का सूचक तंत्र है। जिसका ज्योतिषीय संबंध चंद्रमा ग्रह से होता है। इस चक्र में अनियमितता की वजह से महिलाओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जहां कुछ महिलाओं को पीरियड देरी से आते हैं तो, वहीं कुछ महिलाओं को मासिक चक्र पूरा होने से पहले ही पीरियड आ जाता है। समय से और नियमित माहवारी आना महिलाओं की सेहत के लिए बहुत अच्‍छा होता है। यदि कोई महिला लगातार अनियमित माहवारी का सामना कर रही है तो, उसको सावधान रहने की जरुरत है। अपने कुंडली के चंद्रमा और मंगल ग्रह पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आइए जानते हैं आखिर क्‍यों कई बार महिलाओं को अनियमित मासिक धर्म जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

एक या दो दिन देरी से पीरियड आना या जल्‍दी आना फिर भी सामान्‍य सी बात है। मासिक धर्म का च‍क्र 28 दिनों का होता है। अगर पीरियड एक हफ्ते देरी से आते हैं या पहले ही आते हैं तो यह महिला के लिए चिंताजनक स्थिति है, और इस अवधि में महिलाओं को असहनीय दर्द भी सहना पड़ता है। यहां हम बता रहे हैं कि जल्‍दी और देरी से मासिक धर्म आने का कारण क्‍या है? क्‍या यह स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्‍याएं पैदा कर सकता है?

1. हार्मोनल असंतुलन :- यदि आपके पीरियड अनियमित हैं तो आपको जांच करने की जरुरत है कि कहीं हार्मोन में तो कुछ गड़बड़ नहीं हैं, क्‍योंकि हार्मोन अंसतुलन होने की वजह इसका असर सीधा मासिक धर्म में पड़ता है। एन्डोमीट्रीओसिस एंडोमीट्रीओसिस एक ऐसी स्थिति होती है, जहां गर्भाशय, योनि की दीवारों और फैलोपियन ट्यूबों के अस्तर में एक ऊतक का विकास होता है। जिसकी वजह से मासिक धर्म में अनियमिताएं होती हैं।

2. पोषक तत्वों की कमी :- पौषण की ओर ध्यान देना भी नि‍यमित मासिक धर्म के लिए आवश्यक है। यदि शरीर में निश्चित पोषक तत्‍वों की कमी होने लगती है तो भी इसका असर मासिक धर्म में दिखाई देता है।

3. तनाव :- कभी कभी स्‍ट्रेस का असर भी महिलाओं के मासिक धर्म पर देखने पर मिलता है। जब कोई महिला तनाव में होती है तो शरीर से कॉर्टिसॉल और एड्रेनालाईन हार्मोन शरीर से निकलते हैं, जिसके वजह से मासिक धर्म इफेक्‍ट होते हैं,
थाईराइड की समस्‍या चाहे हाइपरथायरॉडीज या हाइपोथायरायडिज्म हो, दोनों ही मामलों में मासिक धर्म के चक्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। थाइराइड का स्‍तर ज्‍यादा हो या कम लेकिन ये मासिक धर्म के लिए बिल्‍कुल भी ठीक नहीं है। हार्मोन्‍स की गड़बड़ी या असंतुलन की वजह से होता है। इस सिंड्रोम की वजह से ऑवरीज में अंडों का विकास होने में असफल हो जाता है। जिसकी वजह से मासिक धर्म में समस्‍या होती है। और संतान होने में भी समस्या आती है, जिसे आप दैनिक दिनचर्या में सुधार कर ठीक कर सकते हैं।

उपचार :-

1. कैल्शियम की मात्रा को संतुलित करें क्योंकि इसका सम्बन्ध चंद्रमा से है। माँ से संबंध मधुर रखें, पानी अपने वजन के अनुसार पियें। फ्रीज़ का सामान नहीं लें।

2. अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें। भाई से संबंध मधुर रखें, क्योंकि रक्त का संबंध मंगल से है, मासिक में रक्त डिस्चार्ज होता है।

3. लाल मिर्च व खट्टा नहीं खायें और न ही लाल वस्त्र पहनें।क्योकि इससे क्रोध बड़ेगा।

4. सोना नहीं पहने, चाँदी के आभूषणों का प्रयोग अधिक किया करें।

5. पीले वस्त्र अधिक धारण करें, हल्दी मिश्रित दूध का सेवन किया करें।

————————————————-

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, rbdhawan.wordpress.com पर।

बथुआ

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

Telephonic Consultation, face to face Consultation, best top remedy

बथुआ के गुण और लाभ :-

इन दिनों दिनों बाज़ार में खूब बथुए का साग आ रहा है, बथुआ संस्कृत भाषा में वास्तुक और क्षारपत्र के नाम से जाना जाता है, बथुआ एक ऐसी सब्जी या साग है, जो गुणों की खान होने पर भी बिना किसी विशेष परिश्रम और देखभाल के खेतों में स्वत: ही उग जाता है। एक डेढ़ फुट का यह हराभरा पौधा कितने ही गुणों से भरपूर है। बथुआ के परांठे और रायता तो लोग चटकारे लगाकर खाते हैं, बथुआ का शाक पचने में हल्का, रूचि उत्पन्न करने वाला, शुक्र तथा पुरुषत्व को बढ़ने वाला है। यह तीनों दोषों को शांत करके उनसे उत्पन्न विकारों का शमन करता है। विशेषकर प्लीहा का विकार, रक्तपित, बवासीर तथा कृमियों पर अधिक प्रभावकारी है।
– इसमें क्षार होता है, इसलिए यह पथरी के रोग के लिए बहुत अच्छी औषधि है, इसके लिए इसका 10-15 ग्राम रस सवेरे शाम लिया जा सकता है।
– यह कृमिनाशक मूत्रशोधक और बुद्धिवर्धक है।
-किडनी की समस्या हो जोड़ों में दर्द या सूजन हो ; तो इसके बीजों का काढ़ा लिया जा सकता है, इसका साग भी लिया जा सकता है।
– सूजन है, तो इसके पत्तों का पुल्टिस गर्म करके बाँधा जा सकता है, यह वायुशामक होता है।
– गर्भवती महिलाओं को बथुआ नहीं खाना चाहिए।
– एनीमिया होने पर इसके पत्तों के 25 ग्राम रस में पानी मिलाकर पिलायें।
– अगर लीवर की समस्या है, या शरीर में गांठें हो गई हैं तो, पूरे पौधे को सुखाकर 10 ग्राम पंचांग का काढ़ा पिलायें।
– पेट के कीड़े नष्ट करने हों या रक्त शुद्ध करना हो तो इसके पत्तों के रस के साथ नीम के पत्तों का रस मिलाकर लें, शीतपित्त की परेशानी हो, तब भी इसका रस पीना लाभदायक रहता है।
– सामान्य दुर्बलता बुखार के बाद की अरुचि और कमजोरी में इसका साग खाना हितकारी है।
– धातु दुर्बलता में भी बथुए का साग खाना लाभकारी है।
– बथुआ को साग के तौर पर खाना पसंद न हो तो इसका रायता बनाकर खाएं।
– बथुआ लीवर के विकारों को मिटा कर पाचन शक्ति बढ़ाकर रक्त बढ़ाता है। शरीर की शिथिलता मिटाता है। लिवर के आसपास की जगह सख्त हो, उसके कारण पीलिया हो गया हो तो छह ग्राम बथुआ के बीज सवेरे शाम पानी से देने से लाभ होता है।
– सिर में अगर जुएं हों तो बथुआ को उबालकर इसके पानी से सिर धोएं। जुएं मर जाएंगे और सिर भी साफ हो जाएगा।
– बथुआ को उबाल कर इसके रस में नींबू, नमक और जीरा मिलाकर पीने से पेशाब में जलन और दर्द नहीं होता।
– यह पाचनशक्ति बढ़ाने वाला, भोजन में रुचि बढ़ाने वाला पेट की कब्ज मिटाने वाला और स्वर (गले) को मधुर बनाने वाला है।
– पत्तों के रस में मिश्री मिला कर पिलाने से पेशाब खुल कर आता है।
– इसका साग खाने से बवासीर में लाभ होता है।
– कच्चे बथुआ के एक कप रस में थोड़ा सा नमक मिलाकर प्रतिदिन लेने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।

————————————————-

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, rbdhawan.wordpress.com पर।

गंगाजल

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

Telephonic Consultation, face to face Consultation, best top remedy

गंगाजल से स्नान का महत्व:-

आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर में 9 छिद्र होते हैं। वे रात में शयन करने से अपवित्र हो जाते हैं। अतः प्रातः स्नान अवश्य करे। तीर्थ में स्नान करना हो तो शौच वाला कपड़ा बदल देना चाहिये। स्नानादि के बाद ही तीर्थ-स्नान करना चाहिये; क्योंकि वह प्रशस्त तथा पुण्यजनक भी होता है। यदि गंगा में स्नान करे तो निम्नाकिंत मन्त्र से गंगाजी की प्रार्थना करे-

विष्णुपादाब्जसम्भूते गङ्गे त्रिपथगामिनि।
धर्मद्रवीति विख्याते पापं मे हर जाह्नवि।।
गङ्ग गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।
मुन्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।। (पुराण)

‘स्नान’ शब्द का अर्थ ही शुचिता है, और गंगाजल स्नान से तो शरीर और मन दोनों पवित्र होते हैं। हमारे शरीर में जो पसीना होता है, उसका जलीय अंश तो भाप बनकर उड़ जाता है, और पार्थिव अंश मैल बनकर जम जाता है। यदि नित्य स्नान करके उसे धोया न जाये तो शरीर में मैल की एक तह जम जायगी, जिससे रोमकूप के छिद्र बंद हो जायेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि भीतर का मल तथा दुषित वायु बाहर नहीं निकल पायेगी, जिससे शरीर में दुर्गन्ध और अनेक रोगों की उत्पत्ति हो जायेगी।

स्नान ऐसी विधि से करना चाहिये, जिससे मैल अच्छी तरह छूट जाये। इसके लिये 2-4 चार लोटा पानी डाल लेना पर्याप्त नहीं, किंतु पर्याप्त जल लेकर शरीर को खूब रगड़ कर पानी से धोना चाहिये। यह कार्य अधिक जल वाले तालाब तथा बावड़ी में और सबसे अच्छा बहते हुए जल वाली नदियों में होता है; क्योंकि नदी में हमारे शरीर से निकलता हुआ मैल बहता जाता है और उसकी जगह नया स्वच्छ जल आता जाता है। इसीलिये धर्म शास्त्रों में घर की अपेक्षा तालाब, तालाब की अपेक्षा नदी और नदी की अपेक्षा गंगादि पवित्र जल वाली नदियों में स्नान को उत्तम माना है।

शास्त्रों में गंगाजल स्नान की पवित्रता का जो वर्णन है वह अंधविश्वास मात्र नहीं है। इस युग में भी गंगा के जल की पवित्रता को अपने अनेकों वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा परीक्षित भौतिक वैज्ञानिकों ने भी मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है। वैज्ञानिकों ने अति स्वच्छ गंगोत्री के जल का तथा अनेकों नदी-नाले, गंद मल-मूत्र के नाले। अति अस्वच्छ वाराणसी, कलकत्ते के गंगा जल का भी परीक्षण करके बताया है कि गंगा जल में रोग के कीटाणुओं को डालने पर वे दूसरे जलों की तरह वृद्धि को प्राप्त नहीं होते, प्रत्युत बहुत शीघ्र मर जाते हैं। वर्षों रखा रहने पर भी गंगा जल में कीड़े नहीं पड़ते। इसीलिये श्रद्धापूर्वक गंगाजल लाकर घर में रखते हैं और पूजा आदि कार्यो में तथा मृत्यु काल में मरते हुए प्राणी के मुख में डालते हैं। गंगा जल में कीड़े न पड़ने का गुण केवल गंगाजलत्व के कारण ही नहीं है, किंतु गंगाजी के पवित्र क्षेत्र का भी प्रभाव उसमें होता है। गंगाजी से निकली नहरों के विशुद्ध जल में तो कीड़े पड़ जाते हैं, परंतु गंगा क्षेत्र में बहती गंगाजी के अशुद्ध जल में कभी नहीं पड़ते!

दूसरी नदियों के जल की भाँति गंगाजल वर्षा-ऋतु में दूषित नहीं होता। प्रवाह में से निकाला हुआ गंगाजल बासी, ठंडा, गरम या अस्र्पशीय आदि से छू जाने पर भी दूषित नहीं होता। गंगाजी में रात्रि में भी स्नान करने से दोष नहीं होता। घर में लाकर गंगाजल स्नान करने पर भी अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। यह महात्म्य सर्वत्र शास्त्रों में निर्दिष्ट है। सर्व प्रथम सिर में जल डालना चाहिये; इससे सिर आदि की गर्मी पैरों से जाती है। इसके विपरीत पैरों में प्रथम गंगाजल डालने से पैर आदि अंगो की गर्मी मस्तिष्क (सिर) में पहुँच कर हानि पहुँचाती है। यही कारण है कि गंगा आदि जलाशयों पर पहुँचकर प्रथम सिर में गंगाजल धारण करके प्रणाम करने का शास्त्रों में विधान किया है। ऐसा करने से भौतिक विज्ञानानुसार उक्त लाभ तो होता ही है, किंतु असधिदैविक विज्ञानानुसार वरूण देवता तथा गंगा आदि देवियों का आदर भी हो जाता है। नदियों में जिधर से प्रवाह आ रहा हो उधर मुख करके स्नान करके स्नान करना चाहिये तथा बावड़ी, तालाब आदि में सूर्य की ओर मुख करके स्नान करना चाहिये। गंगाजल स्नान करते समय जल का स्पर्श पाते ही वाणी प्रफुल्लित हो जाती है, उसका सदुपयोग भगवान नाम का कीर्तन, स्तोत्रपाठ आदि द्वारा करना चाहिये। मनोविज्ञानानुसार गंगादि पवित्र तीर्थों के साथ मानसिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिये और आधिदैव विज्ञानानुसार साधारण जल को भी पवित्र जल बनाने के लिये निम्न श्लोक बोलना चाहिये-

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू।।

बीमारी में भोजन करने के बाद, अजीर्ण में 10 बजे से 3 बजे तक रात्रि में स्नान करने से शारीरिक हानि होती है। बहुत वस्त्रों को पहने हुए स्नान करने से शरीर मर्दन में बाधा होती है। अलंकार-आभूषण धारण करके स्नान करने से आभूषणों की क्षति होती है। नग्न होकर नहाना निर्लज्जता का द्योतक तो होता ही है, जल देवता का निरादर भी होता है। इन सब कारणों से शास्त्रों में उक्त प्रकार से स्नान करने का निषेध किया है।

नातुरो न भुक्त्वा नाजीर्णे न बहुवाससा न नग्नो नाश्नन् नालङ्कृतो न सस्त्रजो न निशायाम्।।
दातुन करने के बाद स्नान- ध्यान का विधान है। किंतु स्नान के अंगभूत दो कार्य और हैं- 1. तैलाभ्यंग या तैल-मर्दन। 2. व्यायाम।

तैलाभ्यङ्ग त्वागिन्द्रिय को स्निग्ध बनाता है, शरीर में स्फूर्ति लाता है और शरीर पर पानी का बुरा असर नहीं होने देता।

स्पर्श ने चाधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम्। त्वचश्च परमोऽभ्यङ्गस्तस्मात्तं शीलयेन्नरः।। (चरक)

अर्थात्-‘शरीर को स्वस्थ रखने के लिये अधिक वायु की आवश्यकता है। वायु का ग्रहण त्वचा के आधीन है, त्वचा के लिये अभ्यङ्ग (तेलमालिश) परमोपकारी है, इसलिये प्रतिदिन मालिश करनी चाहिये।

आयुर्वेदिक ग्रन्थों में तेलमालिश के बहुत गुण बताये गये हैं, जिनमें मुख्य ये हैं- बुढ़ापा, थकावट एवं वायुविकार का नाश करने के लिये तैलमालिश सिर, कान तथा पैरों में विशेष रूप में करनी चाहिये। इससे शरीर मजबूत होकर सुन्दर बनता है, वायुविकार शान्त होते हैं। नित्य तैलमालिश कराने वाला व्यक्ति क्लेश और श्रम को सहने योग्य हो जाता है। इससे मनुष्य कोमल स्पर्श वाला और पुष्ट अंगवाला तथा प्रियदर्शी होता है। इसमें बुढ़ापे के लक्षण कम होते हैं। सिर में प्रतिदिन तेल लगाने से शिरःशूल नहीं होता, बाल न तो झड़ते हैं और न गिरते ही हैं। शिरोऽस्थियों काो बल मिलता है। बाल मजबूत जड़ वाले, लम्बे और काले हो जाते हैं। सिर पर तेल लगाने से इन्द्रियाँ प्रसन्न (स्वच्छ) होती हैं और मुख का सौन्दर्य बढ़ जाता है। तेल लगा कर सोने से सुख की नींद आती है। इसी प्रकार कान को तेल से तर रखने से चरक के मतानुसार वातजन्य कान के रोग, मन्यास्तम्भ, हनुग्रह, ऊँचे सुनना और बहरापन नहीं होता है।

पैरों में तेल मालिश करने से पैरों की कठिनता, सूखापन, रूक्षता, थकावट और सुस्ती (त्वचा में स्पर्श ज्ञान न होना) इत्यादि-ये सब शीघ्र शान्त हो जाते हैं। पैरों में सुकुमारता, बल और स्थिरता बनी रहती है, नेत्रों की दृष्टि स्वच्छ होती है, और वायु शान्त होती है, किंतु तेलमालिश कुछ अवस्थाओं में वर्जित भी है। नये ज्वर में, अजीर्ण होने पर, विरेचन-वमन और निरूहण किये हुए मनुष्य को मालिश नहीं करनी चाहिये। इससे विविध हानियाँ होती हैं। शास्त्रों में सोमवार और शनिवार को तेल-मर्दन उत्तम और अन्य दिनों में निषिद्ध किया गया है; परंतु उन दिनों में तेल लगाने के लिये शास्त्रों ने इस उपाय से दोष-परिमार्जन बताया है-

रवौ पुष्पं गुरो दूर्वा भौमवारे च मृत्तिका। गोमयं शुक्रवारे च तैलाभ्यङ्गे न दोशभाक्।।

अर्थात्-‘रविवार को फूल, गुरूवार को दूर्वा, मंगलवार को मिट्टी और शुक्रवार को गोबर मिलाकर तेलमर्दन करने से दोष नहीं होता।’ ब्रह्मचारियों को तेल लगाना वर्जित है। ज्योतिषसार के अनुसार गृहस्थ को षष्टी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा को भी तेल नहीं लगाना चाहिये; किंतु सरसों का तेल, सुगन्ध युक्त तेल, फूलों से वासित तेल और अन्य द्रव्यों से युक्त तेल दोषयुयुक्त नहीं माने जाते, अतः इन्हें सब दिन लगा सकते हैं।

शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी। वेहव्यायामसंख्याता मात्रया तां समाचरेत्।।

‘शरीर की जो चेष्टा देह को स्थिर करने एवं उसका बल बढ़ाने वाली हो उसे व्यायाम कहते हैं। उसे प्रतिदिन उचित मात्रा में करना चाहिये।’ (चरक) व्यायाम से कुछ ये लाभ हैं- शरीर की पुष्टि, कान्ति, शरीर के दीप्ताग्नि, आलस्य-हीनता (स्फूर्ति), स्थिरता, हल्कापन, शुद्धि, थकावट-सुस्ती, प्यास, गर्मी एवं ठंड आदि सहने की शक्ति और श्रेष्ठ आरोग्य प्राप्त होता है।

मोटापा को कम करने वाला कोई उपाय इस के समान दूसरा नहीं है। शत्रु का भय नहीं होता, बुढ़ापा सहसा आक्रमण नहीं करता। व्यायाम मर्दित और उद्वर्तित शरीर वाले के पास व्याधियाँ नहीं फटकने पातीं। व्यायाम से वय, रूप और गुण हीन मनुष्य भी देखने में सुन्दर लगता है। व्यायाम से विरूद्ध, कच्चा जला हुआ भोजन भी भली भाँति पच जाता है। व्यायाम एक नैत्यिक अनुष्ठेय कर्तव्य है।

नित्य स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान् लोगों को व्यायाम सर्वदा हितकर है। शीत एवं वसन्तकाल में तो वह विशेष लाभप्रद होता ही है, किंतु कामी मनुष्य को सभी ऋतुओं में प्रत्येक दिन अपने बल की आधी शक्ति से व्यायाम करना चाहिये। परन्तु अधिक मात्रा में व्यायाम घातक होता है। उससे क्षय, अधिक प्यास, अरूचि, वमन, रक्त-पित्त, चक्कर, सुस्ती, खाँसी, शोष, ज्वर और श्वास-कष्ट-जैसे रोग होते हैं। कुछ व्यक्तियों के लिये व्यायाम हितकर नहीं होता। रक्त-पित्त के रोगी, कृश, शोष, श्वास-कष्ट, खाँसी और उरः क्षत से पीडि़त, तुरंत भेजन किया हुआ, स्त्री-प्रसंग से क्षीण तथा चक्कर से पीडि़त मनुष्य व्यायाम न करे।

टहलना देह को अधिक पीडि़त करने वाला नहीं होता; वह आयु, बल, मेेेधा (धारण शक्ति) और अग्नि को बढ़ाने वाला एवं इन्द्रियों को जागृत (चैतन्य) करने वाला होता है। (अधिक रास्ता चलना इसके विपरीत होता है, वह बुढ़ापा एवं दुर्बलता करने वाला होता है।) आयुर्वेद में टहलने को ‘चङ्क्रमण’ कहते हैं। इसे आधुनिक चिकित्सक भी अत्यावश्यक बताते हैं। अतः वृद्धादि को अवश्य टहलना (घूमना) चाहिये।

————————————————-

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, rbdhawan.wordpress.com पर।

तृषा रोग

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

Telephonic Consultation, face to face Consultation, best top remedy

तृषा रोग के कारण व निवारण शारीरिक श्रम करने पर तृषा अर्थात् प्यास की इच्छा होती है। तृषा होने पर सभी छोटे-बड़े के लिए जल पीना आवश्यक हो जाता है। जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। स्वास्थ्य के संतुलन को बनाये रखने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञ दिन में 15 से 20 गिलास पानी पीने का परामर्श देते हैं। जल भोजन की पाचन क्रिया को सरल बनाता है ओर मूत्र एवं पसीने के द्वारा शरीर के दुशित तत्त्वों को शरीर से निष्कासित करता है।

शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में तृषा की अधिक विकृति देखी जाती है। बार-बार शीतल जल पीने पर भी तृषा शांत नही होती। किसी भी स्त्री-पुरूष के साथ ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने का अर्थ होता है तृषा रोग। तृषा रोग में रोगी को बहुत प्यास लगती है। जल्दी-जल्दी जल पीने के बाद भी तृषा शान्त नही होती, तृषा के कारण रोगी बेचैन हो जाता है। तृषा के कारण रोगी का कण्ठ शुष्क होता है।

तृषा उत्पत्ति के कारण-
भोजन में कुछ उष्ण खाद्य पदार्थ होते हैं। पाचन क्रिया के समय शरीर में अधिक उष्णता पैदा होती है और उस गर्मी को शांत करने के लिए शरीर को पानी की आवश्यकता होती है। विभिन्न कारणों से तृषा की उत्पत्ति होती है। अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक प्यास लगती है। शुष्क व रूक्ष खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है।

चिकित्सा विशेषज्ञ शोक, चिंता और भय की परिस्थिति में अधिक प्यास लगने की बात करते हैं। गर्मियों में अधिक पसीने आने से शरीर में जल की कमी हो जाती है इसलिए अधिक प्यास लगती है। छोटे बच्चे जब दौडने का खेल खेलते हैं तब उन्हें अधिक प्यास लगती है।

अधिक उपवास किये जाने पर तृषा अधिक उत्पन्न होती है। अघिक उष्ण मिर्च-मसालों व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है। कुछ चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अग्नाशय की विकृति होने पर मधुमेह रोग की उत्पत्ति होती है तो रोगी को अधिक प्यास लगती है। बार बार पानी पीने से भी तृषा शान्त नहीं होती है।

भोजन में पित्त कारक खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करने से अधिक तृषा व जलन उत्पन्न होती है। अधिक उष्ण वातावरण में रहने और धूप में चलने फिरने से अधिक प्यास लगती है। मादक द्रव्यों व धूम्रपान करने वालों को अधिक प्यास लगती है।

तृषा के विभिन्न लक्षण-
जल पीने के बाद दो तीन घण्टों के लिए जल की इच्छा अर्थात तृषा शांत हो जाती है। लेकिन 30-40 मिनट बाद ही जल पीने की इच्छा होने लगे तो उसे तृषा रोग कहा जाता है। तृषा रोगी को 30-40 मिनट बाद जल पीने की इच्छा होती है तथा जल न मिले तो बेचैनी होने लगती है। उसका मुंह और कण्ठ सूखने लगता है, होंठ भी शुष्क होने लगते हैं।

रोगी को जल पीने के बाद भी बेचैनी बनी रहती है। जल पीने के कुछ देर बाद ही कण्ठ, होंठ, जीभ पर शुष्कता के लक्षण स्पष्ट होने लगते हैं। जल की इच्छा रोगी को बेचैन सी करने लगती है। ऐसे में रोगी को हृदय की निर्बलता भी अनुभव होने लगती है ग्रीष्म ऋतु में छोटे-बड़े सभी तृषा से अधिक पीडि़त दिखाई देते हैं। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता के कारण अधिक पसीने आने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में शरीर को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। जल की पूर्ति के लिए अधिक प्यास लगती हैं। लेकिन तृषा रोगी को शीत ऋतु में भी 30-40 मिनट के अंतराल पर बार-बार प्यास लगती है।

तृषा रोग के भेदः
आयुर्वेदाचार्यों ने तृषा के भेदों के अनुसार अलग-अलग लक्षणों का वर्णन किया है। वात, पित्त, कफ दोषों के अनुसार तृषा को वातज, पित्तज, कफज, क्षतज, आमन और भक्तज आदि भेदों में विभक्त किया है।

तृषा रोग की गुणकारी चिकित्सा-
तृषा की उत्पत्ति को जान लेने के बाद उसकी चिकित्सा सरल हो जाती है। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता की अधिकता होने के कारण सभी छोटे-बड़े को तृषा अधिक पीडि़त करती है। शीतल जल के सेवन से प्यास शांत होती हैं। शीतल जल से हाथ-पांव और चेहरे को साफ करने से तृषा का प्रकोप कम होता है। शीतल जल में नीबू का रस और थोड़ी शक्कर मिलाकर, शिकंजी बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तृषा का निवारण होता है।

वातज तृषा की चिकित्साः
जब यह ज्ञात हो कि रोगी वातक तृषा से पीडि़त है तो उसको वात-पित्त शामक औशधियों का सेवन कराकर वातक तृषा का निवारण किया जाता हैं।
दो-दो तोले गिलोय का रस दो-दो घण्टे के अन्तराल से वातज तृषा से पीडि़त रोगी को पिलाने से तुरंत रोग का निवारण होता हैं। दिन में दो तीन बार पिला सकते हैं।
कुश, कास, शर, दर्भ और ईख, इन पंच तृणों की जड़ को उबाल कर कपडे से छान कर पिलाने से तृषा का अन्त होता हैं।

गुड़ और दही मिलाकर रोगी को सेवन कराने से वातज तृषा नष्ट होती हैं।

घी को हल्का सा गर्म करके रोगी को 10-10 ग्राम मात्रा में पिलाने से वातज तृषा के कारण तालु में उत्पन्न शुष्कता नष्ट होती हैं। तृषा की अधिकता से मुच्छित रोगी को घी नही पिलाना चाहिए।
मांस रस के सेवन से भी वातक तृषा नष्ट होती है।

तृषा नाशक कुछ गुणकारी औशधियां-
बिजौरे नीबू के फूलों को, केशर का चूर्ण, अनार का रस, मधु ओर सेंधा नमक, सबको अच्छी तरह मिलाकर सेवन करने से तृषा की निवृत्ति होती हैं।
लाल शालि (चावलों) का भात पकाकर, शीतल होने पर मधु मिलाकर खाने से जीर्ण तृषा का भी निवारण होता हैं।

रक्त पित्त रोग के कारण तृषा की उत्पत्ति होने पर चंद्रकला रस (आयुर्वेदिक औशधि) का सेवन करने से बहुत लाभ होता हैं।

सितोपलादि चूर्ण दिन में दो-तीन वार अनार के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा नष्ट होती है। ताम्र भस्म और बंग भस्म 1-1 रत्ती मात्रा में चंदन के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा का निवारण होता है।

जल में मधु मिलाकर कुछ देर जल को मुँह में रोके रखने से तृषा की विकृति नष्ट होती है। शीतल जल में धनियां, जीरा और सौफ भिगोकर, उनको छानकर, उस जल में मिश्री मिला कर पीने से तृषा नष्ट होती है। गुलाब, चंदन, नीबू और अनार के रस का शरबत बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तीव्र तृषा रोग नष्ट होता है।

आहार विहारः
भोजन में रूक्ष, गरिष्ठ व उष्ण मिर्च मसालों के खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिक उत्पत्ति होती है। ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। चाय- कॉफी से भी अधिक प्यास लगती है। ग्रीष्म ऋतु में बर्फ का अधिक सेवन करने से भी अधिक प्यास लगती है। सीधे जल में बर्फ डाल कर नही पीना चाहिए। बर्फ के साथ रखकर जल को शीतल करके पीने से तृषा का निवारण होता है।

नीबू के रस से बनी शिकंजी तृषा को जल्दी शांत करती है। नदी व तालाब में स्नान करने से तृषा की विकृति नष्ट होती है। संतरा, मौसमी, जौ के सत्तू, इमली से बने पेय पदार्थ, धनियां, जीरा, मिश्री, अनानास, नारियल का जल, गन्ने का रस, आँवले व आम का मुरब्बा, शीतल दूध, तक्र (मट्ठा) आदि तृषा को नष्ट करते हैं।

सूर्य की प्रचण्ड धूप में अधिक घूमने-फिरने ओर अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक तृषा की उत्पत्ति होती हैं। गुरू, उष्ण, घी, तेल में बने पकवान, अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थ, चटपटे, तीक्ष्ण पदार्थ, सोंठ, पीपल, लाल मिर्च, चाय- कॉफी आदि खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिकता होती हैं। इन खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए।

नेत्र रोग का समूल नाश करने वाली ‘चाक्षुषोपनिषद् विद्या’ नेत्र रोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली चाक्षुषी विद्या की व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्र रोग की निवृत्ति के लिए इसका जप होता है। यह विनयोग है।

नेत्रोपनिषद मंत्रः
ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करूणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा´छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।

ॐ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायँ। मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊं ( कृपया ) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें।

ॐ ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ॐ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ॐ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ॐ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ॐ ( सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले ) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। ( अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले ) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्णस्वरूप भगवान् सुर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं-उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।

जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा ( भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले ) हैं, जो ज्योतिः स्वरूप, हिरण्मय ( सुवर्ण के समान कान्तिमान् ) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्तिज्ञथान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं ( प्राणियों ) के समक्ष उदित हो रहे हैं।
ऊँ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।

ॐ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिए उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिए, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिए तथा तमोमय बन्धन में बधे हुए हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुश्प्करेक्शन को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।

नेत्र रोग से पीडि़त श्रद्धालु साधक को चाहिए कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी के रस) से अनार की शाखा की कलम के द्वारा काँसे के पात्र में निम्नलिखित विधि से यन्त्र को लिखें।

फिर उसी यन्त्र पर ताँबे की कटोरी में चर्तुमुख ( चारो ओर चार बत्तीयो का ) घी का दीपक जलाकर रख दें। तदानन्तर गन्ध-पुष्पादि से यन्त्र का पूजन करें। फिर पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ‘ॐ ह्नीं हंसः’ इस बीज मंत्र की छः मालाएँ जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालाएँ जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अघ्र्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा। ऐसा करते रहने से इस उपनिषद् का नेत्ररोगनाशक अदभुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखने में आता है।

————————————————-

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, rbdhawan.wordpress.com पर।

गाय का दूध

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

Telephonic Consultation, face to face Consultation, best top remedy

गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी भावना और भावुकता, दयालुता और मनुश्यता की बात यदि एक तरफ कर दी जाये तब भी गाय का दूध, घी इत्यादि सर्वगुणसम्पन्न है। विषैला प्रभाव नष्ट करने में गोघृत की तुलना में अन्य किसी पशु का घी उतना उपयोगी नहीं होता। दूध घी से सैकड़ों रोग-विकार दूर होते हैं, यहाँ कुछ रोगों के नाम के साथ उपचार की संक्षिप्त विधि बतायी जा रही है। इस अमृत की शक्ति को पहचान कर पाठक लंबी आयु तक स्वस्थ और युवा बने रह सकते हैं-

अजीर्णः– जब गरिष्ठ भोजन अनपचा रह जाता है, तब शरीर की आग ठंडी पड़ जाती है, अम्लता बढ़ती जाती है, पेट पत्थर-जैसा ठोस होने लगता है, इसके प्रभाव से गुर्दे भी कमजोर पड़ने लगते हैं। इस स्थिति में दूध में सोंठ और गुड़ औटाइये ताकि पेट की सड़ांध मल-मूत्रा के रास्ते बाहर निकल जाय।
250 ग्राम दुध में 100 ग्राम पानी मिलाइये, 25 ग्राम शक्कर या गुड़ डालिये, 10-12 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाइये, जब पानी जल जाय तो हल्का गर्म रह जाने पर घूँट-घूँट पानी शुरू कर दीजिये। अनपचा भोजन सोंठ की गर्मी से पचने लगेगा और मल-मूत्रा गल-पिघल कर निकलने लगेगा, प्यास लगे तो पानी भी हलका गर्म ही पियें, पेट साफ होते ही जलन, खट्टी डकार अफारा और बेचैनी के विकार भी शान्त हो जायँगे। अजीर्ण से छुटकारा पाने के बाद भी एक दिन दूध ही पीजिये ताकि आँतें और पेट की दीवारें तक निर्मल हो जायँ। कमजोरी से न घबरायें, क्योंकि दुध प्राणों का आधार है; यदि गर्भ से निकला बालक दूध पर जी सकता है तो हम दुर्बल नहीं होंगे, मूँग की पतली दाल से चपाती खाकर आप तीसरे दिन से हलके भोजन की शुरूआत कर सकते हैं, दोपहर को दूध में पका हुआ पतला दलिया एवं शाम को दूध में शहद मिलाकर पीजिये, रात को खिचड़ी खाइये चैथे दिन से सामान्य भोजन शुरू कर दें।

अतिसारः– आयुर्वेद के ग्रन्थों में अतिसार पर काबू पाने के लिये दूध के फेन (झाग) को परमौषधि बताया गया है। मलाई और रबड़ी खाने वालों को मालूम होना चाहिये कि 25 ग्राम दुग्ध फेन, 1/2 किलो मलाई के बराबर पौष्टिक है। झाग मुँह में पहुँचते ही टॉनिक बन जाता है, जबकि रबड़ी-खोया पचाने में कई घंटे लग जाते हैं, दूध दुहने के बाद बर्तन में जितना भी झाग हो, उसे एक बड़े कटोरे में कलछी से निकाल लें, इस झाग को चम्मच से स्वाद लेते हुए चूसना शुरू कर दें, वैसे तो झाग में चूसने वाला ठोस तत्त्व होता ही नहीं, किंतु इस विधि से पेट का संकुचन होता है, गोदुग्ध के झाग से पेट की आग भड़क उठेगी और भोजन के कच्चे रस पचने लगेंगे, दूध का झाग शरीर की पेशियों को भी फुला देता है और पाचन-क्रिया तीव्र हो जाती है, बदन को गठीला और पुष्ट करने में दुग्ध-फेन अत्युत्तम औशधि है।

आँखों में जलन-भावप्रकाश निघण्टु में गाय का दूध आँखों के लिये उत्तम अंजन माना गया है, यदि आप भैंस का दूध पीते हैं तो गाय का दूध पीना शुरू कर दें, यदि गाय का दूध पीते हैं तो वह एकदम ताजा-ताजा हो। गाय ब्यायी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि शुरू का दूध जलन पैदा करता है, दूध की मलाई लेकर अँगुली से रात को सोते समय पलकों पर लगा लें, सुबह तक जलन शान्त हो जायगी, नहाने के पहले गोदुग्ध का मक्खन लगा दें, आधे घंटे में जलन जाती रहेगी, यदि मलाई की चिकनाहट को मन न मानता हो तो 4 चम्मच दूध, 1 कटोरी पानी में मिलाकर उससे खुली आँखों में छींटे मारें और स्वच्छ कपड़े से आँखें पोछकर सो जायँ। सुबह तक सारी जलन निकल चुकी होगी, जिन्हें चिकनाई से प्यार हो तो उन्हें दूध की मलाई पलकों पर लेपकर गर्मी की सूजन निकाल देनी चाहिये।

आग से जलनाः- घाव कैसा भी हो, गाय के घी से उत्तम न कोई पेनिसिलिन आदि दवा है न मरहम, कुदरत ने गोघृत को इतनी विषनाशक शक्ति से भर रखा है कि इससे बढि़या क्रीम, मरहम या एंटीसेप्टिक दवा हो ही नहीं सकती, गोघृत में पट्ठी तर करके जली हुई त्वचा पर रखकर भगवान को याद करें, जिसने आप को गोघृत के रूप में अमृत-जैसी पौष्टिक दवा दे रखी है। दूध में घी डाल कर पियें, ताकि सप्ताह भर में घाव की जगह नयी त्वचा उग जाय। गाय का दूध शरीर को त्वचा भी देता है और मांस की कमी भी शीघ्र पूरी करता है।

आधासीसीः- आधे सिर का दर्द तभी होता है, जब उस हिस्से में रक्त के संचार में रूकावट पड़ गयी हो, उस रूकावट का कारण भोजन के वे कच्चे रस होते हैं, जो कफ, लेस आदि के रूप में जमा हो जाते हैं और जुकाम-नजला भी बन जाते हैं, अगर नासिका से दुशित जल न निकले तो माथे के किसी भी हिस्से में जोरों का दर्द उठने लगता है, माथा इतने भयंकर रूप में फटने लगता है जैसे टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ जायगा। 250 ग्राम दूध में 250 ग्राम पानी डालिये, 2 पीपली, 5 लौंग और दालचीनी के 4 छोटे टुकड़े पीसकर दूध में औटाइये।

जब केवल दूध ही बचे तो 2 चम्मच शहद मिलाकर पियें और कंबल ओढ़कर सो जायँ। घूँट इस तरह पियें जैसे गर्म वस्तु चूस रहे हों, जितना अधिक पसीना आयेगा उतनी जल्दी आराम मिलेगा, दिन में 3-4 बार ऐसा दूध पीने से माथे की श्लेष्मा जल बनकर नथनों से बह जायगी या पसीने और मल-मूत्रा के रास्ते निकल जायगी।

————————————————-

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, rbdhawan.wordpress.com पर।

यज्ञ चिकित्सा

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

Telephonic Consultation, face to face Consultation, best top remedy

यज्ञ चिकित्सा से भी रोग नष्ट होते हैं सूक्ष्म में जो शक्ति है वह स्थूल में नहीं। सोने का एक रत्ती टुकड़ा किसी आदमी को खिला दो कोई लाभ न होगा। उसी को सूक्ष्म करके वर्क बनाकर खिलाओं पुष्टि देगा। पर जब उसे आग में फूँक कर भस्म बना लो तो केवल एक एक रत्ती खिलाने ही चेहरे पर लाली, शरीर में बल, मन में उत्साह उत्पन्न होकर वृद्ध भी युवा बन जायगा। वैद्यलोग जानते हैं कि एक माशे दवा की वैसे बहुत कम शक्ति होती है, उसी दवा को यदि एक सप्ताह तक घोटकर सूक्षम किया जाये तो उसकी शक्ति कई गुणा बढ़ जाती है। होमियोपैथी मे इसी नियम के आधार पर औशधियों की पोटैंसी तैयार की जाती है। जिसका प्रभाव करना अभीष्ट होता है तो खिलाने के स्थान मे औशधि सुँघाते हैं।

सुँघाने की अपेक्षा भी जली हुई औशधि का प्रभाव कितना बढ़ जाता है उसे उदारहण से समझिये। एक मिर्च सूँघने से कुछ न होगा। कूटने से पास बैठे लोगों को खाँसी आवेगी। पर यदि उसको आग में जलावें तो दूर-दूर तक के मनुश्य खांखने लगेंगे। कारण यह कि अब उसके परमाणु बहुत सूक्ष्म हो गये, अतः उनकी शक्ति बढ़ गयी। अब विचार कीजिये कि रोग के कीडे़ एक कतार में रक्खे जावें तो 25000 कीटाणु एक इच्ं स्थान घेरेगें। यदि उनको तौला जावे तो एक खस खस के दाने पर बीस अरब कीटाणु चढ़ जायँगे। इतनी सूक्ष्म वस्तु पर स्थूल कण वाली ओषधियों की बड़ी मात्राओं की पहुँच ही दुस्तर है, कीटाणुओं को समाप्त कर उन पर विजय पाना तो दूर की बात है। इसी नियम को समझने के कारण लोग तपेदिक की चिकित्सा में असफल रहते है, और उसे असाध्य समझते हैं। पर औशधियों का वह अत्यन्त सूक्ष्म भाग जो यज्ञ अग्नि द्वारा छिन्न भिन्न हुआ है कीटाणुओं को सुगमता से नष्ट कर रोग दूर कर सकता है।

पदार्थ विज्ञान से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि कोई वस्तु नष्ट नहीं होती किन्तु रूप बदल जाता है। जो ओषधि मुँह से खायी जाती है, वह रस रक्त बनने के पश्चात् क्षयरोगी के फेफड़ों तक पहुँचेगी। पर अग्नि में जलायी हुई औशधि श्वास द्वारा सीधी फेफड़ो पर पहुँच कर तत्काल प्रभाव करेगी और बहुत सूक्ष्म होने के कारण स्थायी प्रभाव करेगी। गूगूल को ही लीजिये। आयुर्वेद में इसे अन्य गुणों के साथ रसायन, बलकारक, टूटे को जोड़ने वाला और कृमिनाशक बतलाया गया है।

अन्वेषण से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जितने प्राकृतिक पदार्थ हैं उनके सूक्ष्म परमाणु हर समय गतिशील रहते है, यद्यपि प्रत्यक्ष में वे दृष्टिगोचर नहीं होते। हमारे इस मनुश्य शरीर, घर की दीवार, मेज, कुर्सी इत्यादि का प्रत्येक परमाणु गति कर रहा है। यजुर्वेद के 40 वें अध्याय के पहले मन्त्र में संसार को जगत्यां जगत् कहकर इसी नियम को बताया है। और यह गति भी ऊटपटांग नहीं किन्तु नियम पूर्वक है। प्रत्येक परमाणु गति एक सी नहीं होती। किन्हीं की गति समान होती है। और किन्हीं की एक दूसरे के प्रतिकूल। प्रकृति का नियम है कि दो समान वस्तुयें एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है और विरुद्ध वस्तएं एक दूसरे को भगाती हैं। आपने देखा होगा कि एक श्रेणी में एक साथ पढ़ने वाले कई विद्याथियों में से किन्हीं दोमें विशेष मित्रता हो जाती है। शेष में वैसी नहीं होती। रेल में सैकड़ो यात्री साथ-साथ यात्रा करते हैं पर उनमें से किन्हीं दो में ऐसी घनिष्ठता हो जाती है। जो जीवन भर निभाते हैं किन्हीं पति पत्नियों में ऐसा गहरा प्रेम होता है कि वे एक दूसरे पर प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते हैं। यह सब कुछ भी इसी नियम के आधार पर है जिस मनुश्य के शरीर के परमाणु जैसी गति करते हैं। उसे वैसी गति वाले रोग या स्वास्थ्य के परमाणुओं को उसकी ओर खिंचाव हो जाता है। और जो उसके विपरीत होते हैं वे दूर भागते हैं।

किसी भी रोग के कीटाणु जब मनुश्य के शरीर में प्रवेश करते हैं तो हमारे शरीर की रोगनिवारक शक्ति जिसे हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि सदा से जानते थे और प्राणयाम तथा ब्रह्मचर्य द्वारा नित्य बढ़ाया करते थे पर अब इस सम्बन्ध में वर्तमान विज्ञान में भी कुछ समय से खोज होने लगी है जिसे डाक्टरी में रोग निवारक शक्ति कहते है। रोग को दूर भगाने के लिये एक प्रकार का उफान खाया हुआ रस तथा रक्त के श्वेतकणों की सेना, जिसे डाक्टरी में चींहवबलजवेपे कहते है। भेजता है यदि ये लड़ाई में सफल हो जाते हैं तो रोग के कीटाणु वहीं समाप्त हो जाते हैं और हमें ज्ञात भी नहीं होता कि हम पर किसी रोग का आक्रमण हुआ था। हाँ, इनके निर्बल सिद्ध होने पर रोग हमारे शरीर पर अधिकार जमा लेता है। यह रोगनिवारक शक्ति कुछ तो जन्म काल से साथ आती है और कुछ मनुश्य को उत्तम भोजन, शुद्ध सुगन्धित वायु के मिलने से उत्पन्न होती है। अतः हवन यज्ञ से जहाँ रोगनिवारक शक्ति बढ़ेगी वहाँ वह उफान रस भी अधिक उत्पन्न होगा क्यूंकी गर्मी से उफान शीध्र आता ही है। इस प्रकार रोग के कृमि हवन करनेवाले पर आक्रमण करने पर भी रोग उत्पन्न करने में उसफल रहेंगे और रोग की अवस्था में हवन करने से शीध्र नष्ट हो जायँगे।

जिस प्रकार हमारे शरीर के ऊपर खाल का खोल चढ़ा है उसी प्रकार शरीर के भीतर की ओर एक मुलायम खाल का अस्तर भी लगा है। जो गले से लेकर आँतों के निचले भाग तक विशेष रूप से तर रहता है। जिस मनुश्य की यह खाल या अस्तर बिल्कुल ठीक है और उस पर कोई क्षत या खरोंच नहीं है वह स्वस्थ मनुश्य है और उस पर किसी भी संक्रामक रोग का आक्रमण नहीं हो सकता। इस वैज्ञानिक नियम को समझने वाले बुद्धिमान अनुभवी चिकित्सक सर्वदा रेचक दवा का निषेध करते हैं, क्योंकि इससे आँतों के अस्तर में खरोच उत्पन्न होती है। जब रोग-कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं तो इन्हीं खरोंच द्वारा रक्त में इस प्रकार फैल जाते हैं जिस प्रकार प्रवेश करायी हुई ओषधि। अब यदि किसी असुविधा से हमारी इस खाल या अस्तर में कोई खराश हो गयी है तो बाहर की खरोंच की चिकित्सा तो अन्य उपायों से भी सुगम है पर भीतर का प्रबन्ध कठिन है। हाँ जो ऐसी अवस्था में हवन करते हैं उनके भीतर जब घी, कपूर और गूगल इत्यादि के सूक्ष्म परमाणु पहुँचेंगे तो उस खरोंच को किस शीध्रता से भर देंगे इसको समझना कुछ कठिन नहीं है जब कि इन्हीं वस्तुओं से बाहर की खरोंच को भरने का अनुभव प्रत्येक मनुश्य करके देख सकता है।

युक्तियों के पश्चात् अब हम इस विषय में कुछ प्रमाण और अनुभव पेश करते है-
1. वेद भगवान् का प्रमाण- मूँचामि त्वा हविमा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत्र राजयक्ष्मात्।
ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्।।

हे व्याधिग्रस्त, मनुश्य तुझ को सुख के साथ चिरकालतक जीने के लिये गुप्त राजयक्ष्मा रोग से और सम्पूर्ण प्रकट राज्यक्ष्मा रोग से आहुति द्वारा छुड़ाता हूँ। जो इस समय में इस प्राणी को पीड़ाने या पुराने रोग ने ग्रहण किया है। उससे वायु तथा अग्नि देवता इसको अवश्य छुडावें।

इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि वेद भगवान् हर प्रकार के तपेदिक की चिकित्सा चाहे रोग अभी प्रकट हुआ हो या गुप्त हो, वायु और अग्निद्वारा बतलाते हैं और आहुति द्वारा रोग से छूटने का का आदेश करते हैं।
इससे अगला मन्त्र इस प्रकार है –

यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव।
तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्षमेनं शतशारदाय।।
यदि रोग के कारण न्यून आयु वाला हो, अथवा संसार के सुखों से दूर हो गया हो, चाहे मृत्यु के निकट पहुँच चुका हो – ऐसे रोगी को भी महारोग के पाश से छुड़ाता हूँ। इस रोगी को सौ शरद् ऋतुओं तक जीने के लिये प्रबल किया है। इससे यह विदित होता है कि खराब से खराब अवस्था को रोगी जिसे चिकित्सक लोग असाध्य कह देते हैं हवन यज्ञ से अच्छा हो सकता है।

2. आयुर्वेद के प्रामणिक ग्रन्थ चरक का प्रमाण- यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुरा जितः।
तां वेदविहितामिष्टिमारोग्या र्थी प्रयोजयेत्।।
जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था आरोग्य चाहने वाले मनुश्य को उसी वेदविहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये।

3. होमियोपैथिक से पृष्टि-
होमियोपैथिक चिकित्सा के आविष्कार कर्ता हैनीमान साहब अधिक निर्बल रोगियों को खिलाने के स्थान में केवल औशधि सुँघाने का परामर्श देते हैं और उसके लिये वह अपनी प्रसिद्ध पुस्तक की की धारा 190 में लिखते है जो औशधि के प्रभाव को शीध्र ग्रहण करता है। सबसे अधिक प्रभाव ओषधि का सूँघने और श्वास लेने से होता है। यदि हैनीमन साहब के समय जर्मनी में यज्ञ का प्रवाह हेाता तो अवश्य ही वे इसे चिकित्सा का प्रधान अंग बनाते ।

4. ऐलोपैथिकमत से पुष्टि-
एलोपैथिक डाक्टरी में तपेदिक के रोगी ज्ञतमवेवजम और म्नबंसलचजने वपस को इत्यादि का प्दींसंजपवद बनाकर सुँघाने हैं और इसका प्रभाव तत्काल होता है। वैसे वही ज्ञतमवेवजम खिलाया भी जाता हैं पर वह इतना शीध्र प्रभाव नहीं करता। ऐसा क्यों होता है। इसीलिये कि सूँधी हुई दवा के सूक्ष्म परमाणु सीधे फेफडे़ में पहुँचकर अपना प्रभाव करते हैं। पर उनमें वह शक्ति नहीं कि स्थायी प्रभाव रख सकें, जैसा कि अग्नि से छिन्न-भिन्न हुई ओषधि के परमाणु रख सकते है।

वैद्यक के अनुसार-
मैंने अपने कई वर्षों की चिकित्सा के अनुभव से निश्चय किया है, जो महारोग ओषधिभक्षण करने से दूर नहीं होते वे वेदोक्त यज्ञों द्वारा दूर हो जाते हैं।

विद्वानो के अनुभव
फ्रांस के विज्ञानवेत्ता प्रो. टिलवर्ट कहते हैं कि जलती हुई खाँड के धुएँ में वायु शुद्ध करने की वड़ी शक्ति है। इससे हैजा, तपेदिक, चेचक इत्यादि का विष शीध्र नष्ट हो जाता है।

डाक्टर टाटलिट साहब ने मुनक्का, किशमिश इत्यादि सूखे फलों को जला कर देखा है और मालूम किया है कि इनके धुँए से टाइफायड ज्वर के कीटाणु केवल आधे धण्टे में और दूसरे रोगों के कीटाणु धण्टे, दो घण्टें में समाप्त हो जाते हैं।

मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर डाक्टर कर्नल किंग त्ण्डण् ने कालि के विद्यार्थियों को बताया कि घी, चावल में केसर मिलाकर जलाने से रोग के कीटाणुओं का नाश होता है।

फ्रांस के डाक्टर हेफकिन, जिन्होंने चेचेक की टीका ईजाद किया, कहते हैं कि घी जलाने से रोगकृति मर जाते हैं।

केमिकल प्रारपटीज की राय-
जयफल, जावित्री, बड़ी इलायची, सूखा चन्दन इत्यादि अग्नि में जलाने से मुफीद हिस्से ज्यों के त्यों रहते हैं या सूक्ष्म हो जाते हैं। पहले पहल इनसे सुगन्धित तेल गैस बनकर निकलते हैं। हवन गैस मेंयह चीजें अपने असली रूप में मिलती हैं। अग्नि इन चीजों को गैस बना देती है। उड़ाने वाले तेलों के परमाणु 1, 0000 से 1, 10000000 सेंटीमीटर व्यासवाले देखे गये हैं। अतः हवन में इन चीजों के गुण बहुत बढ़ जाते हैं और ये आसानी से कीटाणुओं का नाश करते हैं।

————————————————-

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, rbdhawan.wordpress.com पर।

केले के गुण

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

Telephonic Consultation, face to face Consultation, best top remedy

केले के गुण केला एक बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक व गुणकारी फल है। केले की गिनती हमारे देश के उत्तम फलों में होती है और इसको मांगलिक कार्यो में भी विशेष स्थान दिया गया है। विदेशों में भी इसके गुणों के कारण इसे स्वर्ग का सेव और आदम की अंजीर नाम प्रदान किये गये हैं। आमतौर पर लोगों की यह धारणा होती है कि जब केले खूब पक जाते हैं या पिलपिले हो जाते हैं, तब उनमें कीटाणु पैदा हो जाते हैं, किन्तु यह गलतफहमी है। जब तक केले का छिलका उसके गूदे पर पूरी तरह चिपका होता है, तब तक वह कीटाणुरहित रहता है। इसलिए खूब पके हुए केले भी पूरी तरह खाने योग्य एवं हानिरहित हैं। कुछ लोगों की धारणा यह भी है कि केले पचने में भारी होते हैं। दरअसल कच्चे या अधपके केलों को खाने से ऐसा होता है, क्यों कि वह असानी से हमारे पेट में सरलता से पचने वाली शर्करा में परिवर्तित नहीं होते हैं, फिर भी केले खाने के बाद यदि भारीपन महसूस हो तो एक या दो इलायची ऊपर से खाने से तुरन्त पेट में हल्कापन आ जाता है। केले के छिलके का हरा रंग लुप्त होते ही वह खाने के योग्य हो जाते हैं, तथा उनके छिलके काले होने के पश्चात् तक खाने योग्य रहते हैं, बशर्ते उनका छिलका गूदे से चिपका हो। केले के पौधे हरे, 10 से 12 फीट ऊँचे तथा काष्ठहीन होते हैं। इनके पत्ते काफी बड़े होते हैं। इसके पौधे में शाखाएँ नहीं होती तथा स्तम्भ पर्तदार होता है। केले के गूदे में 1.5 प्रतिशत प्रोटीन, लगभग 3 प्रतिशत विटामिन्स, 20 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स और बाकी ज्यादातर जल तत्व होता है। इसलिए पके हुए केलों को खाने से अजीर्ण नहीं होता। भारतीय ग्रन्थों में भी केला और दूध साथ-साथ खाने को पूर्ण भोजन कहा गया है। यह तथ्य इसलिए भी स्पष्ट हो जाता है कि हमारे भोजन के जो घटक केले में नहीं होते, वे दूध से प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार दूध केले खा लेने के पश्चात् किसी भी व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती है। यह योग एक सन्तुलित आहार का कार्य करता है। छोटे बच्चों को नित्य कम से कम एक केला खिलाने से उनमें उत्तम विकास देखा जा सकता है। केले के भक्षण से शरीर में बल की वृद्धि होती है, केले में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, ताँबा, सीसा, आयोडीन, सोडीयम मैग्नीज आदि अनेक शरीरोपयोगी खनिज तत्व होते हैं। इस प्रकार हर दृष्टि ये यह उत्तम फल है।

पके केले के गुण- स्वादिष्ट, शीतल, वीर्यवर्धक, शरीर के लिए पुष्टिकारक, माँस को बढ़ाने वाला, भूख-प्यास को दूर करने वाला तथा नेत्र रोग और प्र्रमेह नाशक है।
कच्चे केले के गुण- शीतल, ग्राही एस्ट्रीजेन्ट्स–यानी जो अपनी क्रिया द्वारा शरीर के दोश, मल व धातु को सोख ले पाचन में भारी, रक्त, पित्त, वायु कफ विकार तथा क्षय को दूर करने वाला होता है।

केले का औशधीय महत्व
1 वजन बढ़ाने के लिए– एक पाव दूध के साथ नित्य दो केलों का सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और शरीर का वजन बढ़ता है।

2 आँत सम्बन्धी रोगों में– कई लोगों की आँतों में गड़बड़ी होने के कारण उन्हें दस्त पेचिश की शिकायतें बनी रहती हैं। ऐसे लोगों को दो केले उनके (केलों के) वजन से आधे वजन के दही के साथ सेवन करना लाभकारी है।

3 मुँह के छालों के लिए– कुछ लोगों को आये दिन मुँह में छाले हो जाते हैं। ऐसे लोगों को चाहिए कि वे गाय के दूध से निर्मित दही के साथ केला खायें। यह प्रयोग सात से दस दिन तक करना पड़ता है।
4 पेट के कीड़े मारने तथा खून शुद्ध करने के लिए– इसके लिए केलों की जड़ के अर्क का सेवन लाभदायक है। इस अर्क को बनाने के लिए लगभग एक किलो जल में 50 ग्राम केले की जड़ डालकर इतना गर्म करें कि जल की मात्रा आधी हो जाए। इसके बाद मिश्रण छान लें। यही छानन अर्क है। इसी अनुपात में ताजा अर्क बनाए। अर्क की दो तोला मात्रा एक बार में लें।

————————————————-

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, rbdhawan.wordpress.com पर।

टाईफाइड बुखार और आयुर्वेद

टाईफाइड अर्थात “मियादि बुखार” किसी ज़माने में टाईफाइड को मियादि बुखार इस लिये कहा जाता था क्योंकि इसकी कोई एन्टीबायोटिक नही बनी थीं। यह बुखार अपनी मियाद से ही जाता था। 7, 14, 21, 28, 35 या 42 दिन का चक्र इसके रोगाणुओं का होता है। लगभग 30 – 35 वर्ष पूर्व ही इसके लिए एंटीबाोटिक्स बनी है, ये दावा रोग के रोगाणु तो मर देती है, परन्तु फिर भी रोगाणु  दुर्बल होकर आंतों में पड़े रहते हैं। यदि आपको कभी टाइफाइड बुखार हुआ हो और आपने 7 दिन या 14 दिन एलोपैथ की गोलियां खाकर उसे ठीक कर लिया हो तो, ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसके रोगाणु दुर्बल होकर अंतड़ियों में पड़े रहते हैं। जैसे ही शरीर जरा कमजोर हुआ ये फिर हमला कर देते हैं।

क्योंकि एलोपैथ (अंग्रेजी) दवा केवल उसे दबाती है, शरीर से आँतों से निकालती नहीं। इस लिए इस रोग के लिए आयुर्वेद की शरण लेनी चाहिए। आयुर्वेदिक चिकित्सा भले ही समय अधिक लगाती है, परंतु रोग को जड़ से मिटाती है।

मियादी बुखार की आयुर्वेदिक चिकित्सा:-  किसी भी मेडिकल स्टोर से ‘महासुदर्शन घनवटी’ का 30 गोलियों वाला पत्ता ल लीजिए, और साथ में गिलोय सत्व ले लीजिए। महासुदर्शन घन वटी की एक गोली प्रात और एक शाम को 40 दिन खाइये, और फिर निश्चित हो जाइए आपको जीवन में कभी भी टाइफाइड तो क्या सामान्य बुखार भी नहीं होगा ।

जबर्दस्त कड़वी यह गोली टाइफाइड को तो डंडे मार मारकर खदेड़ ही देगी, और जब तक आप जियेंगे आपको टाइफाइड नहीं हो सकता।

जो भी इस गोली को लेता है, वह इसका गुणगान जीवन भर करता है । यह गोली इतनी कड़वी है कि मुँह में लेते ही तुरंत गुनगुने पानी से निगल जाइये तब भी हल्का सा कड़वा तो कर ही देती है मुंह को। यह गोली आयुर्वेद के ‘महासुदर्शन चूर्ण’ का ही घनसत्व गोली रूप में है, ताकि कड़वापन न झेलना पड़े ।

यह गोली थोड़ी सी गर्म होती है, इसलिए रात को हल्की सी बेचैनी भी कर सकती है, और हो सकता है आपको नींद थोड़ा विलंब से आए । सर्दियों में रात को कोई दिक्कत नहीं । गर्मियों में एक दो गोली खाली पेट केवल सुबह लें गुनगुने पानी से । पाँच साल से ऊपर के बच्चों को एक गोली दे सकते हैं ।

यह गोली घर रखिये और जैसे ही किसी को कोई भी बुखार चाहे वाइरल फीवर लगे हल्का सा भी शक लगे तो रात को दो गोली लेकर सो जाएं । सुबह आप ऐसे उठएंगे जैसे किसी अच्छे मिस्त्री खराब मोटरसाइकिल की बहुत अच्छे से सर्विस कर दी हो । यह गोली पेट की सफाई भी करती है । इस गोली को किसी भी मेडिकल स्टोर से या आयुर्वेदिक स्टोर से खरीद सकते है, जिसमें 30 गोलियां होती हैं ।

यह गोली खून भी साफ़ करती है । तभी तो यह जीवन भर बुखार होने की गारंटी है । टाइफाइड की तो यह दुश्मन है । जिसने इसे प्रयोग कर लिया वो जीवन भर केवल केवल इसी का गुणगान करेगा ।

Dr. R.B.Dhawan (आयुर्वेदिक चिकित्सक)

 Top Astrologer in Delhi

Experience astrologer in Delhi

Best Astrologer in India

रोगी

by:-  dr. r.b.dhawan

किस-किस श्रेणी के रोगी होते हैं? : –

१. बुद्धिमान ?

२. अबुध? 

३. दुर्मति ?

४. मुर्ख ?

प्राज्ञो रोगे समुत्पन्ने बाह्येनाभ्यन्तरेण वा। 

कर्मणा लभते शर्म शस्त्रोपक्रमणेन वा।।

च. सू . ११/५६ 

बालस्तु खलु मोहाद्वा प्रमादाद्वा न बुध्यते। 

उत्पद्यमानं प्रथमं रोगं शत्रुमिवाबुधः।।

च. सू . ११/५७ 

अणुर्हि प्रथमं भूत्वा रोगः पश्चाद्विवर्धते। 

स जातमूलो मुष्णाति बलमायुश्च दुर्मतेः।।

च. सू . ११/५८ 

न मूढो लभते सञ्ज्ञां तावद्यावन्न पीड्यते। 

पीडितस्तु मतिं पश्चात् कुरुते व्याधिनिग्रहे।।

च. सू . ११/५९ 
बुद्धिमान मनुष्य रोग के उत्पन्न होते ही बाह्य वा अभ्यन्तर वा शस्त्र कर्म रूप चिकित्सा ले कर कल्याण को प्राप्त होता है। 

अबुध ( बालक बुद्धि ) ही है वो वास्तव में जो अज्ञान वा प्रमाद वस् अपने शत्रु रूप उत्पन्न हुए रोग को प्रारम्भ में ही नहीं समझता। 

कुबुद्धि वाला – दुर्मति द्वारा नहीं समजा गया वो रोग प्रारम्भ में अणु रूप – अल्प ही होता है जो पीछे से बढ़ जाता है और बढने से बलवान हुआ रोग दुर्मति मनुष्य के बल एवं आयुष्य को नष्ट करता है। 

मूढ़ – मुर्ख व्यक्ति जब तक बलवान रोग से अधिक पीड़ित नहीं होता तब तक उसे दूर करने के लिए संज्ञान नहीं लेता। जब रोग बढ़ जाता है तब अधिक दुखी होता है तत पश्चात  व्याधि को दूर करने में अपनी बुद्धि लगाता है। 

प्रायः रोगी जो हमारे पास आते है वह अंतिम श्रेणी के होते है, कोई कोई द्वितीय या तृतीय श्रेणी के होते है, परन्तु प्रथम श्रेणी में आने वाले तो विरले ही होते है।

Top Astrologer in Delhi

Best Astrologer in India

Experience astrologer in Delhi