बथुआ

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बथुआ के गुण और लाभ :-

इन दिनों दिनों बाज़ार में खूब बथुए का साग आ रहा है, बथुआ संस्कृत भाषा में वास्तुक और क्षारपत्र के नाम से जाना जाता है, बथुआ एक ऐसी सब्जी या साग है, जो गुणों की खान होने पर भी बिना किसी विशेष परिश्रम और देखभाल के खेतों में स्वत: ही उग जाता है। एक डेढ़ फुट का यह हराभरा पौधा कितने ही गुणों से भरपूर है। बथुआ के परांठे और रायता तो लोग चटकारे लगाकर खाते हैं, बथुआ का शाक पचने में हल्का, रूचि उत्पन्न करने वाला, शुक्र तथा पुरुषत्व को बढ़ने वाला है। यह तीनों दोषों को शांत करके उनसे उत्पन्न विकारों का शमन करता है। विशेषकर प्लीहा का विकार, रक्तपित, बवासीर तथा कृमियों पर अधिक प्रभावकारी है।
– इसमें क्षार होता है, इसलिए यह पथरी के रोग के लिए बहुत अच्छी औषधि है, इसके लिए इसका 10-15 ग्राम रस सवेरे शाम लिया जा सकता है।
– यह कृमिनाशक मूत्रशोधक और बुद्धिवर्धक है।
-किडनी की समस्या हो जोड़ों में दर्द या सूजन हो ; तो इसके बीजों का काढ़ा लिया जा सकता है, इसका साग भी लिया जा सकता है।
– सूजन है, तो इसके पत्तों का पुल्टिस गर्म करके बाँधा जा सकता है, यह वायुशामक होता है।
– गर्भवती महिलाओं को बथुआ नहीं खाना चाहिए।
– एनीमिया होने पर इसके पत्तों के 25 ग्राम रस में पानी मिलाकर पिलायें।
– अगर लीवर की समस्या है, या शरीर में गांठें हो गई हैं तो, पूरे पौधे को सुखाकर 10 ग्राम पंचांग का काढ़ा पिलायें।
– पेट के कीड़े नष्ट करने हों या रक्त शुद्ध करना हो तो इसके पत्तों के रस के साथ नीम के पत्तों का रस मिलाकर लें, शीतपित्त की परेशानी हो, तब भी इसका रस पीना लाभदायक रहता है।
– सामान्य दुर्बलता बुखार के बाद की अरुचि और कमजोरी में इसका साग खाना हितकारी है।
– धातु दुर्बलता में भी बथुए का साग खाना लाभकारी है।
– बथुआ को साग के तौर पर खाना पसंद न हो तो इसका रायता बनाकर खाएं।
– बथुआ लीवर के विकारों को मिटा कर पाचन शक्ति बढ़ाकर रक्त बढ़ाता है। शरीर की शिथिलता मिटाता है। लिवर के आसपास की जगह सख्त हो, उसके कारण पीलिया हो गया हो तो छह ग्राम बथुआ के बीज सवेरे शाम पानी से देने से लाभ होता है।
– सिर में अगर जुएं हों तो बथुआ को उबालकर इसके पानी से सिर धोएं। जुएं मर जाएंगे और सिर भी साफ हो जाएगा।
– बथुआ को उबाल कर इसके रस में नींबू, नमक और जीरा मिलाकर पीने से पेशाब में जलन और दर्द नहीं होता।
– यह पाचनशक्ति बढ़ाने वाला, भोजन में रुचि बढ़ाने वाला पेट की कब्ज मिटाने वाला और स्वर (गले) को मधुर बनाने वाला है।
– पत्तों के रस में मिश्री मिला कर पिलाने से पेशाब खुल कर आता है।
– इसका साग खाने से बवासीर में लाभ होता है।
– कच्चे बथुआ के एक कप रस में थोड़ा सा नमक मिलाकर प्रतिदिन लेने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।

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बंग भस्म

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बंग भस्म :-

बंग भस्म धातु वृद्धि, वीर्य वर्धक, वीर्य वृद्धि की सर्वोत्तम आयुर्वेदिक औषधि है, जिसे सेवन करने से धातु क्षीणता, वीर्यस्त्राव, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन आदि रोग नष्ट होते हैं।
बंग भस्म से शुक्र संस्थान के लगभग सभी रोग नष्ट होते हैं, इस भस्म में यह गुण हैं कि यह शुक्र (वीर्य) की कमजोरी को दूर करती है, जब कोई पुरूष अधिक स्त्री सेवन अथवा अथवा अप्राकृतिक मैथुन या हस्तमैथुन करने से वातवाहिनी शिरा और मासपेशियां कमजोर होकर स्त्री प्रसंग करने में असमर्थ हो जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप मन में उत्तेजक विचार आते ही या किसी सुंदर युवती को देखने अथवा बात करने से, या अश्लील तस्वीर आदि देखने मात्र से शुक्रस्त्राव होने लगता है। एेसी दशा में बंग भस्म का सेवन करना अच्छा है। यह औषधि रोग की अवस्था के अनुसार डा. की देखरेख में लेनी चाहिए।

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बालरोग चिकित्सा

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बच्चों के रोग :-

बच्चों की चिकित्सा बड़ों की चिकित्सा से बहुत अलग होती है, क्योंकि बच्चे अपने रोग या पीड़ा को शब्दों से नहीं बता सकते, चिकित्सक को उसकी पीड़ा संकेतों से ही समझनी होती है। इसके अतिरिक्त माता-पिता को उसकी हर तकलीफ पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। बहुत मामलों में घरेलू नुस्खों से बहुत लाभ होता है, परंतु इसके लिए हर मां पिता को बच्चे के साधारण रोगों की या तकलीफ की जानकारी हो तो चिकित्सक के पास कम से कम जाना पड़ता है।
दस्त लगने पर : – 1. जायफल या सोंठ अथवा दोनों का मिश्रण पानी में घिसकर सुबह-शाम 3 से 6 रत्ती (करीब 400 से 750 मिलीग्राम) देने से हरे दस्त ठीक हो जाते हैं।

2. दो ग्राम खसखस पीसकर 10 ग्राम दही में मिलाकर देने से बच्चों की दस्त की तकलीफ दूर होती है।

पेट की गड़बड़ी या दर्द :- 5 ग्राम सोंफ लेकर थोड़ा कूट लें। एक गिलास उबलते हुए पानी में सोंफ लेकर थोड़ा कूट लें। एक गिलास उबलते हुए पानी में डालें व उतार लें और ढँककर ठण्डा होने के लिए रख दें। ठण्डा होने पर मसलकर छान लें। यह सोंफ का 1 चम्मच पानी 1-2 चम्मच दूध में मिलाकर दिन में 3 बार शिशु को पिलाने से शिशु को पेट फूलना, दस्त, अपच, मरोड़, पेटदर्द होना आदि उदरविकार नहीं होते हैं। दाँत निकलते समय यह सोंफ का पानी शिशु को अवश्य पिलाना चाहिए जिससे शिशु स्वस्थ रहता है।

अपचः- नागरबेल के पान के रस में शहद मिलाकर चाटने से छोटे बच्चों का आफरा, अपच तुरंत ही दूर होता है।

सर्दी-खाँसी :- 1. हल्दी का नस्य देने से तथा एक ग्राम शीतोपलादि चूर्ण पिलाने से अथवा अदरक व तुलसी का 2-2 मि.ली. रस 5 ग्राम शहद के साथ देने से लाभ होता है।

2. एक ग्राम सोंठ को दूध अथवा पानी में घिसकर पिलाने से बच्चों की छाती पर जमा कफ निकल जाता है।

3. नागरबेल के पान में अरंडी का तेल लगाकर हल्का सा गर्म कर छोटे बच्चे की छाती पर रखकर गर्म कपड़े से हल्का सेंक करने से बालक की छाती में भरा कफ निकल जाता है।
वराधः (बच्चों का एक रोग हब्बा-डब्बा)- सर्दी जुखाम और छाती में कफ व खांसी अक्सर रहना।

1. इस के लिए आक के पौधे की रूई का छोटा सा गद्दा बना लिया जायेगा, उस पर बच्चे को सुलाने से यह रोग ठीक हो जाता है।

2. जन्म से 40 दिन तक कुल मिलाकर दो आने भर (1.5 – 1.5 ग्राम) सुबह-शाम शहद चटाने से बालकों को यह रोग नहीं होता।
3. मोरपंख की भस्म 1 ग्राम, काली मिर्च का चूर्ण 1 ग्राम, इनको घोंटकर छः मात्रा बनायें। जरूरत के अनुसार दिन में 1-1 मात्रा तीन-चार बार शहद से चटा दें।

4. बालरोगों में 2 ग्राम हल्दी व 1 ग्राम सेंधा नमक शहद अथवा दूध के साथ चटाने से बालक को उलटी होकर वराध में राहत मिलती है। यह प्रयोग एक वर्ष से अधिक की आयुवाले बालक पर और चिकित्सक की सलाह से ही करें।

न्यमोनिया में :- महालक्ष्मीविलासरस की आधी से एक गोली 10 से 50 मि.ली. दूध अथवा 2 से 10 ग्राम शहद अथवा अदरक के 2 से 10 मि.ली. रस के साथ देने से न्यूमोनिया में लाभ होता है।

फुन्सियाँ होने परः- 1. पीपल की छाल और ईंट पानी में एक साथ घिसकर लेप करने से फुन्सियाँ मिटती हैं।

2. हल्दी, चंदन, मुलहठी व लोध्र का पाऊडर मिलाकर या किसी एक का भी पाऊडर पानी में मिलाकर लगाने से फुन्सी मिटती हैं।

दाँत निकलने परः -1. तुलसी के पत्तों का रस शहद में मिलाकर मसूढ़े पर घिसने से बालक के दाँत बिना तकलीफ के निकल जाते हैं।

2. मुलहठी का चूर्ण मसूढ़ों पर घिसने से भी दाँत जल्दी निकलते हैं।

नेत्र रोग के लिये:- त्रिफला या मुलहठी का 5 ग्राम चूर्ण तीन घंटे से अधिक समय तक 100 मि.ली. पानी में भिगोकर फिर थोड़ा-सा उबालें व ठण्डा होने पर मोटे कपड़े से छानकर आँखों में डालें। इससे समस्त नेत्र रोगों में लाभ होता है। यह प्रतिदिन ताजा बनाकर ही प्रयोग में लें तथा सुबह का जल रात को उपयोग में न लेवें।

हिचकीः धीरे-धीरे प्याज सूँघने से लाभ होता है।

पेट के कीड़े:- 1. पेट में कृमि होने पर शिशु के गले में छिले हुए लहसुन की कलियों का अथवा तुलसी का हार बनाकर पहनाने से आँतों के कीड़ों से शिशु की रक्षा होती है।

2. सुबह खाली पेट एक ग्राम गुड़ खिलाकर उसके पाँच मिनट बाद बच्चे को दो काली मिर्च के चूर्ण में वायविडंग का दो ग्राम चूर्ण मिलाकर खिलाने से पेट के कृमि में लाभ होता है। यह प्रयोग लगातार 15 दिन तक करें तथा एक सप्ताह बंद करके आवश्यकता पड़ने पर पुनः आरंभ करें।

3. पपीते के 11 बीज सुबह खाली पेट सात दिन तक बच्चे को खिलायें। इससे पेट के कृमि मिटते हैं। यह प्रयोग वर्ष में एक ही बार करें।

4. पेट में कृमि होने पर उन्हें नियमित सुबह-शाम दो-दो चम्मच अनार का रस पिलाने से कृमि नष्ट हो जाते हैं।

5. गर्म पानी के साथ करेले के पत्तों का रस देने से कृमि का नाश होता है।

6. नीम के पत्तों का 10 ग्राम रस 10 ग्राम शहद मिलाकर पिलाने से उदरकृमि नष्ट हो जाते हैं।

7. तीन से पाँच साल के बच्चों को आधा ग्राम अजवायन के चूर्ण को समभाग गुड़ में मिलाकर गोली बनाकर दिन में तीन बार खिलाने से लाभ होता है।

8. चंदन, हल्दी, मुलहठी या दारुहल्दी का चूर्ण भुरभराएँ।

9. मुलहठी का चूर्ण या फुलाया हुआ सुहागा मुँह में भुरभुराएँ या उसके गर्म पानी से कुल्ले करवायें। साथ में 1 से 2 ग्राम त्रिफला चूर्ण देने से लाभ होता है।

मुँह से लार निकलना:- कफ की अधिकता एवं पेट में कीड़े होने की वजह से मुँह से लार निकलती है। इसलिए दूध, दही, मीठी चीजें, केले, चीकू, आइसक्रीम, चॉकलेट आदि न खिलायें। अदरक एवं तुलसी का रस पिलायें। कुबेराक्ष चूर्ण या ‘संतकृपा चूर्ण’ खिलायें।

तुतलापनः -1. सूखे आँवले के 1 से 2 ग्राम चूर्ण को गाय के घी के साथ मिलाकर चाटने से थोड़े ही दिनों में तुतलापन दूर हो जाता है।

2. दो रत्ती शंखभस्म दिन में दो बार शहद के साथ चटायें तथा छोटा शंख गले में बाँधें एवं रात्रि को एक बड़े शंख में पानी भरकर सुबह वही पानी पिलायें।

3. बारीक भुनी हुई फिटकरी मुख में रखकर सो जाया करें। एक मास के निरन्तर सेवन से तुतलापन दूर हो जायेगा।

यह प्रयोग साथ में करवायें- अन्तःकुंभक करवाकर, होंठ बंद करके, सिर हिलाते हुए ‘ॐ…’ का गुंजन कंठ में ही करवाने से तुतलेपन में लाभ होता है।

शैयापर मूत्र (Enuresis)- सोने से पूर्व ठण्डे पानी से हाथ पैर धुलायें।

औषधीय प्रयोगः- सोंठ, काली मिर्च, बड़ी पीपर, बडी इलायची, एवं सेंधा नमक प्रत्येक का 1-1 ग्राम का मिश्रण 5 से 10 ग्राम शहद के साथ देने से अथवा काले तिल एवं खसखस समान मात्रा में मिलाकर 1-1 चम्मच चबाकर खिलाने एवं पानी पिलाने से लाभ होता है। साथ में पेट के कृमि की चिकित्सा भी करें।

दमा (श्वास फूलना):- बच्चे के पैर के तलवे के नीचे थोड़ी लहसुन की कलियों को छीलकर थोड़ी देर रखें, एवं ऊपर से ऊन के गर्म मोजे पहना दें। ऐसा करने से दमा धीरे-धीरे मिट जाता है। साथ में 10 से 20 मि.ली. अदरक एवं 5 से 10 मि.ली. तुलसी का रस दें।

सिर में दर्द:- अरनी के फूल सुँघाने से अथवा अरण्डी के तेल को थोड़ा सा गर्म करके नाक में 1-1 बूँद डालने से बच्चों के सिरदर्द में लाभ होता है।

बालकों के शरीर पुष्टि के लिए:- 1. तुलसी के पत्तों का 10 बूँद रस पानी में मिलाकर रोज पिलाने से स्नायु एवं हड्डियाँ मजबूत होती हैं।

2. शुद्ध घी में बना हुआ हलुआ खिलाने से शरीर पुष्ट होता है।

मिट्टी खाने की आदत होने परः- बालक की मिट्टी खाने की आदत को छुड़ाने के लिए पके हुए केलों को शहद के साथ खिलायें।

स्मरणशक्ति बढ़ाने के लिए:- 1. तुलसी के पत्तों का 5 से 20 मि.ली. रस पीने से स्मरणशक्ति बढ़ती है।

2. पढ़ने के बाद भी याद न रहता हो सुबह एवं रात्रि को दो तीन महीने तक 1 से 2 ग्राम ब्राह्मी तथा शंखपुष्पी लेने से लाभ होता है।

3. पांच‌ से 10 ग्राम शहद के साथ 1 से 2 ग्राम भांगरा चूर्ण अथवा एक से दो ग्राम शंखावली के साथ उतना ही आँवला चूर्ण खाने से स्मरणशक्ति बढ़ती है।
4. बदाम की गिरी, चारोली एवं खसखस को बारीक पीसकर, दूध में उबालकर, खीर बनाकर उसमें गाय का घी एवं मिश्री डालकर पीने से दिमाग पुष्ट होता है।
5. दस ग्राम सौंफ को अधकूटी करके 100 ग्राम पानी में खूब उबालें। 25 ग्राम पानी शेष रहने पर उसमें 100 ग्राम दूध, 1 चम्मच शक्कर एवं एक चम्मच घी मिलाकर सुबह-शाम पियें। घी न हो तो एक बादाम पीसकर डालें। इससे दिमाग की शक्ति बढ़ती है।

बच्चे को नींद न आये तब :- 1. बालक को रोना बंद न होता हो तो जायफल पानी में घिसकर उसके ललाट पर लगाने से बालक शांति से सो जायेगा।

2. प्याज के रस की 5 बूँद को शहद में मिलाकर चाटने से बालक प्रगाढ़ नींद लेता है।

स्रोत :- आरोग्य निधि पुस्तक।

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अश्वगंधा 

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अश्वगंधा प्राश (निर्माण विधि) :-


अश्वगंधा का चूर्ण 500 ग्राम, सोंठ का चूर्ण 250 ग्राम, बड़ी पीपल का चूर्ण 125 ग्राम, काली मिर्च का चूर्ण 50 ग्राम। दालचीनी, इलायची, तेजपत्र, और लौंग सभी प्रत्येक पचास-पचास ग्राम बारीक़ पीस लेवें, तदन्तर सबको 6 किलो भैंस के दूध में उबालकर उसमे 3 किलो 500 ग्राम चीनी, और 1 किलो 500 ग्राम शुद्ध घी लेकर उन्हें मिलाकर मिट्टी के बर्तन में मन्दाग्नि पर पकावें। जब उबाल आ जाये तो अश्वगंधा आदि के उपरोक्त समस्त चूर्ण को थोड़े दूध के साथ पकाकर इसमें डाल दें, और उसके बाद अग्नि पर इतना पकावें कि वह करछी से लगने लगें । तदनन्तर उसमें दालचीनी, तेजपत्र, नागकेशर, और इलायची का 20 ग्राम चूर्ण डालकर पकावें । जब उसमें चावल के समान दाने पड़ने लगें और घी अलग होने लगे तब उतारकर पिपलामूल, जीरा, गिलोय, लौंग, तगर, जायफल, खश, सुगंधवाला, सफेद चंदन, बेलगिरी, कमल, धनिया, धाय के फूल, वंशलोचन, आमला, खेर, कर्पूर, पुनर्नवा, वन तुलसी, चिता, और शतावर, प्रत्येक द्रव्य को पांच पांच ग्राम लेकर महीन चूर्ण बनाकर मिलावें और एक बर्तन में फेला देवें। शीतल होने पर प्रमाण अनुसार टुकड़े कर लें।
शास्त्रोक्त गुण धर्म :-

इसके सेवन से कफ, श्वास, अजीर्ण, वातरक्त, प्लीहा, मेदरोग, दुर्जय आमवात, शोथ, शूल, पाण्डु रोग, और अन्य वात कफ विकार नष्ट होते है। इसका एक मास तक प्रयोग करने से वृद्ध भी जवान बन सकता है। मन्दाग्नि के लिए यह बहुत ही हितकर है। यह प्राश शक्ति उत्तपन्न करने वाला तथा बालकों के शरीरों को बढ़ाने वाला है। यह सर्व व्याधि नाशक पाक है।

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शंख

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शंख का औषधीय महत्व

शंख का अध्यात्मिक महत्व ही नहीं है, भैषज्य रूप में भी बड़ा महत्व है। यह अनेक प्रकार से गुणकारी है तथा मस्तिष्क, पाचन तन्त्र, उदर और रक्त पर भी इसकी उपयुक्त क्रिया देखी गयी है। औषधी शास्त्र में इसके अनेक अद्भुत प्रयोग देखने में आते हैं। इसकी भस्म, वटी आदि का सेवन अनेक रोगों पर कराया जाता है। इस विषय में प्रसंगवश परिचय देना अपेक्षित है।

शंखोदक के लाभ-
शंख में जल भर कर दो-तीन घंटे तक रहने दें। फिर यह जल किसी विशेष रोगों पर लाभकारी होता है। किन्तु शंख जितना उत्तम श्रेणी का होगा, उतना ही प्रभावकारी सिद्ध होगा। सामान्य प्रकार के शंख इस कार्य में अल्प प्रभाव वाले ठहरते हैं।

शंख का जल मन को प्रसन्न करने वाला, मस्तिष्क को शीतल करने वाला होता है। इसकी मात्रा लगभग चार चम्मच होनी चाहिए, दिन में तीन-चार बार चार-चार घंटे के अंतराल पर देना चाहिए। इसके सेवन से अनेक रोग दूर हो सकते है, जैसे मृगी (अपस्मार), अपतंत्रक (हिस्टीरिया), जी घबराना, जी मिचलाना, मानसिक अशांति, थकान आदि। रक्त-संचालन की अनियमित प्रक्रिया पर भी यह अनुकूल रूप से प्रभाव डालती है। शंखोदक का प्रभाव हृदय पर भी हितकर पड़ता है।
शंख-भस्म-
शंख की आयुर्वेदिक विधि से भस्म बनाई जाती है। यह भस्म पाचन तंत्र पर भी विशेष प्रभाव डालती है। अजीर्ण, अग्निमांद्य, संग्रहणी आदि में अधिक हितकर होती है। जिगर, तिल्ली, गुल्म, आमांश, आम्लपित आदि में भी उपयोगी है। इसकी भस्म स्वर्णमाक्षिक की विधि से या अन्य विधियों से बनाई जाती है। वस्तुतः बिजौरे नींबू के रस में तपा-तपा कर शंख को सिद्ध कर लिया जाता है और फिर उसे कुलथी-क्वाथ, छांछ या बकरी के मूत्र में घोंट कर जगपुट में आरने उपलों की आग दे कर फूँक लेते हैं। किंतु भस्म बनाने का कार्य अनुभव-प्राप्त व्यक्ति ही ठीक प्रकार से कर सकता है। नये आदमी को असफलता हो सकती है।

आयुर्वेद की प्रसिद्ध शंखवटी-
इसमें मुख्य द्रव्य तो शंख ही है, जिसे नींबू स्वरस में तपा कर बुझाना होता है। यह वटी अजीर्ण, मंदाग्नि, ग्रहणी, उदर रोग तथा क्षय प्रभृति रोगों को दूर करने में उपयोगी है। पाठको की जनकारी के लिए इसका नुस्खा यहाँ लिखा जाता है- शंख, इमलीक्षार, पंचलवण समग्र, हिंग और त्रिकुट (सोंठ काली मिर्च, पीपल) 4-4 भाग, नींबू का स्वरस 20 भाग, पारा, गन्धक और वत्सनाभ 1-1 भाग।
बनाने कि विधि यह है कि नींबू के स्वरस में इमली खार और पाँचों नमक डाल कर घुलने दें तथा शंख को तपा-तपा कर इमलीक्षार नमक, नींबू के रस वाले घोल में कम से कम सात बार बुझायें। बुझाना अधिक पडता है। कुछ लोग इक्कीस बार तपा-तपा कर भी उचित मानते हैं। पारद-गंधक की कज्जली कर के मिलावें और शेष द्रव्य भी मिला कर एक प्रहर घोटते हुए नींबू के रस में ही एक-एक रत्तिप्रमाण गोलियाँ बना ले तथा आवश्यकता पड़ने पर लक्षणानुसार उचित अनुपान के साथ दवा का व्यवहार करना चाहिए। गंधक आदि द्रव्य को शुद्ध करके प्रयोग में लाने चाहिए।
महाशंख-वटि-
यह भी आयुर्वेद की एक प्रसिद्ध औषधी है। इसका व्यवहार उदरशुल, अर्जीण, मंदाग्नि आदि में अधिक होता है। यह गोलियाँ अन्न को पचाने वाली है। नियम निम्न प्रकार है- शंख, पंच लवन, हींग,इमली क्षार, त्रिकटु, गन्धक, पारद और वत्सनाभ। सभी समान मात्रा में लेने चाहिए। शंख को तपा-तपा कर शुद्ध कर लें। भावना द्रव्य चित्रक मूल क्वाथ, अपामार्ग पत्र स्वरस और नींबू का स्वरस। इन सब की सात-सात भावनाएँ देनी चाहियें। गंधक, पारद और वात्सनाम का प्रयोग भी शोधनोपरांत ही करें। क्योंकि यह द्रव्य भी अशुद्ध अवस्था में प्रयोग में नहीं लाये जाते। यह गोलियाँ दो-दो रत्ती की बना लेनी चाहियें। आवश्यकता होने पर उचित अनुमान से देने पर शीघ्र लाभ करती हैं। शंख का उपयोग इसी प्रकार अन्य अनेक रोगों में होता है। बहुत से आयुर्वेदिक नुस्खों में इसका उपयोग योगवाही रूप से भी होता है। किंतु भस्मादि के लिये भी शंख अच्छी किस्म का लेना चाहिए।

संदर्भ ग्रंथ- आयुर्वेद सार संग्रह

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गंगाजल

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गंगाजल से स्नान का महत्व:-

आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर में 9 छिद्र होते हैं। वे रात में शयन करने से अपवित्र हो जाते हैं। अतः प्रातः स्नान अवश्य करे। तीर्थ में स्नान करना हो तो शौच वाला कपड़ा बदल देना चाहिये। स्नानादि के बाद ही तीर्थ-स्नान करना चाहिये; क्योंकि वह प्रशस्त तथा पुण्यजनक भी होता है। यदि गंगा में स्नान करे तो निम्नाकिंत मन्त्र से गंगाजी की प्रार्थना करे-

विष्णुपादाब्जसम्भूते गङ्गे त्रिपथगामिनि।
धर्मद्रवीति विख्याते पापं मे हर जाह्नवि।।
गङ्ग गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।
मुन्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।। (पुराण)

‘स्नान’ शब्द का अर्थ ही शुचिता है, और गंगाजल स्नान से तो शरीर और मन दोनों पवित्र होते हैं। हमारे शरीर में जो पसीना होता है, उसका जलीय अंश तो भाप बनकर उड़ जाता है, और पार्थिव अंश मैल बनकर जम जाता है। यदि नित्य स्नान करके उसे धोया न जाये तो शरीर में मैल की एक तह जम जायगी, जिससे रोमकूप के छिद्र बंद हो जायेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि भीतर का मल तथा दुषित वायु बाहर नहीं निकल पायेगी, जिससे शरीर में दुर्गन्ध और अनेक रोगों की उत्पत्ति हो जायेगी।

स्नान ऐसी विधि से करना चाहिये, जिससे मैल अच्छी तरह छूट जाये। इसके लिये 2-4 चार लोटा पानी डाल लेना पर्याप्त नहीं, किंतु पर्याप्त जल लेकर शरीर को खूब रगड़ कर पानी से धोना चाहिये। यह कार्य अधिक जल वाले तालाब तथा बावड़ी में और सबसे अच्छा बहते हुए जल वाली नदियों में होता है; क्योंकि नदी में हमारे शरीर से निकलता हुआ मैल बहता जाता है और उसकी जगह नया स्वच्छ जल आता जाता है। इसीलिये धर्म शास्त्रों में घर की अपेक्षा तालाब, तालाब की अपेक्षा नदी और नदी की अपेक्षा गंगादि पवित्र जल वाली नदियों में स्नान को उत्तम माना है।

शास्त्रों में गंगाजल स्नान की पवित्रता का जो वर्णन है वह अंधविश्वास मात्र नहीं है। इस युग में भी गंगा के जल की पवित्रता को अपने अनेकों वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा परीक्षित भौतिक वैज्ञानिकों ने भी मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है। वैज्ञानिकों ने अति स्वच्छ गंगोत्री के जल का तथा अनेकों नदी-नाले, गंद मल-मूत्र के नाले। अति अस्वच्छ वाराणसी, कलकत्ते के गंगा जल का भी परीक्षण करके बताया है कि गंगा जल में रोग के कीटाणुओं को डालने पर वे दूसरे जलों की तरह वृद्धि को प्राप्त नहीं होते, प्रत्युत बहुत शीघ्र मर जाते हैं। वर्षों रखा रहने पर भी गंगा जल में कीड़े नहीं पड़ते। इसीलिये श्रद्धापूर्वक गंगाजल लाकर घर में रखते हैं और पूजा आदि कार्यो में तथा मृत्यु काल में मरते हुए प्राणी के मुख में डालते हैं। गंगा जल में कीड़े न पड़ने का गुण केवल गंगाजलत्व के कारण ही नहीं है, किंतु गंगाजी के पवित्र क्षेत्र का भी प्रभाव उसमें होता है। गंगाजी से निकली नहरों के विशुद्ध जल में तो कीड़े पड़ जाते हैं, परंतु गंगा क्षेत्र में बहती गंगाजी के अशुद्ध जल में कभी नहीं पड़ते!

दूसरी नदियों के जल की भाँति गंगाजल वर्षा-ऋतु में दूषित नहीं होता। प्रवाह में से निकाला हुआ गंगाजल बासी, ठंडा, गरम या अस्र्पशीय आदि से छू जाने पर भी दूषित नहीं होता। गंगाजी में रात्रि में भी स्नान करने से दोष नहीं होता। घर में लाकर गंगाजल स्नान करने पर भी अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। यह महात्म्य सर्वत्र शास्त्रों में निर्दिष्ट है। सर्व प्रथम सिर में जल डालना चाहिये; इससे सिर आदि की गर्मी पैरों से जाती है। इसके विपरीत पैरों में प्रथम गंगाजल डालने से पैर आदि अंगो की गर्मी मस्तिष्क (सिर) में पहुँच कर हानि पहुँचाती है। यही कारण है कि गंगा आदि जलाशयों पर पहुँचकर प्रथम सिर में गंगाजल धारण करके प्रणाम करने का शास्त्रों में विधान किया है। ऐसा करने से भौतिक विज्ञानानुसार उक्त लाभ तो होता ही है, किंतु असधिदैविक विज्ञानानुसार वरूण देवता तथा गंगा आदि देवियों का आदर भी हो जाता है। नदियों में जिधर से प्रवाह आ रहा हो उधर मुख करके स्नान करके स्नान करना चाहिये तथा बावड़ी, तालाब आदि में सूर्य की ओर मुख करके स्नान करना चाहिये। गंगाजल स्नान करते समय जल का स्पर्श पाते ही वाणी प्रफुल्लित हो जाती है, उसका सदुपयोग भगवान नाम का कीर्तन, स्तोत्रपाठ आदि द्वारा करना चाहिये। मनोविज्ञानानुसार गंगादि पवित्र तीर्थों के साथ मानसिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिये और आधिदैव विज्ञानानुसार साधारण जल को भी पवित्र जल बनाने के लिये निम्न श्लोक बोलना चाहिये-

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू।।

बीमारी में भोजन करने के बाद, अजीर्ण में 10 बजे से 3 बजे तक रात्रि में स्नान करने से शारीरिक हानि होती है। बहुत वस्त्रों को पहने हुए स्नान करने से शरीर मर्दन में बाधा होती है। अलंकार-आभूषण धारण करके स्नान करने से आभूषणों की क्षति होती है। नग्न होकर नहाना निर्लज्जता का द्योतक तो होता ही है, जल देवता का निरादर भी होता है। इन सब कारणों से शास्त्रों में उक्त प्रकार से स्नान करने का निषेध किया है।

नातुरो न भुक्त्वा नाजीर्णे न बहुवाससा न नग्नो नाश्नन् नालङ्कृतो न सस्त्रजो न निशायाम्।।
दातुन करने के बाद स्नान- ध्यान का विधान है। किंतु स्नान के अंगभूत दो कार्य और हैं- 1. तैलाभ्यंग या तैल-मर्दन। 2. व्यायाम।

तैलाभ्यङ्ग त्वागिन्द्रिय को स्निग्ध बनाता है, शरीर में स्फूर्ति लाता है और शरीर पर पानी का बुरा असर नहीं होने देता।

स्पर्श ने चाधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम्। त्वचश्च परमोऽभ्यङ्गस्तस्मात्तं शीलयेन्नरः।। (चरक)

अर्थात्-‘शरीर को स्वस्थ रखने के लिये अधिक वायु की आवश्यकता है। वायु का ग्रहण त्वचा के आधीन है, त्वचा के लिये अभ्यङ्ग (तेलमालिश) परमोपकारी है, इसलिये प्रतिदिन मालिश करनी चाहिये।

आयुर्वेदिक ग्रन्थों में तेलमालिश के बहुत गुण बताये गये हैं, जिनमें मुख्य ये हैं- बुढ़ापा, थकावट एवं वायुविकार का नाश करने के लिये तैलमालिश सिर, कान तथा पैरों में विशेष रूप में करनी चाहिये। इससे शरीर मजबूत होकर सुन्दर बनता है, वायुविकार शान्त होते हैं। नित्य तैलमालिश कराने वाला व्यक्ति क्लेश और श्रम को सहने योग्य हो जाता है। इससे मनुष्य कोमल स्पर्श वाला और पुष्ट अंगवाला तथा प्रियदर्शी होता है। इसमें बुढ़ापे के लक्षण कम होते हैं। सिर में प्रतिदिन तेल लगाने से शिरःशूल नहीं होता, बाल न तो झड़ते हैं और न गिरते ही हैं। शिरोऽस्थियों काो बल मिलता है। बाल मजबूत जड़ वाले, लम्बे और काले हो जाते हैं। सिर पर तेल लगाने से इन्द्रियाँ प्रसन्न (स्वच्छ) होती हैं और मुख का सौन्दर्य बढ़ जाता है। तेल लगा कर सोने से सुख की नींद आती है। इसी प्रकार कान को तेल से तर रखने से चरक के मतानुसार वातजन्य कान के रोग, मन्यास्तम्भ, हनुग्रह, ऊँचे सुनना और बहरापन नहीं होता है।

पैरों में तेल मालिश करने से पैरों की कठिनता, सूखापन, रूक्षता, थकावट और सुस्ती (त्वचा में स्पर्श ज्ञान न होना) इत्यादि-ये सब शीघ्र शान्त हो जाते हैं। पैरों में सुकुमारता, बल और स्थिरता बनी रहती है, नेत्रों की दृष्टि स्वच्छ होती है, और वायु शान्त होती है, किंतु तेलमालिश कुछ अवस्थाओं में वर्जित भी है। नये ज्वर में, अजीर्ण होने पर, विरेचन-वमन और निरूहण किये हुए मनुष्य को मालिश नहीं करनी चाहिये। इससे विविध हानियाँ होती हैं। शास्त्रों में सोमवार और शनिवार को तेल-मर्दन उत्तम और अन्य दिनों में निषिद्ध किया गया है; परंतु उन दिनों में तेल लगाने के लिये शास्त्रों ने इस उपाय से दोष-परिमार्जन बताया है-

रवौ पुष्पं गुरो दूर्वा भौमवारे च मृत्तिका। गोमयं शुक्रवारे च तैलाभ्यङ्गे न दोशभाक्।।

अर्थात्-‘रविवार को फूल, गुरूवार को दूर्वा, मंगलवार को मिट्टी और शुक्रवार को गोबर मिलाकर तेलमर्दन करने से दोष नहीं होता।’ ब्रह्मचारियों को तेल लगाना वर्जित है। ज्योतिषसार के अनुसार गृहस्थ को षष्टी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा को भी तेल नहीं लगाना चाहिये; किंतु सरसों का तेल, सुगन्ध युक्त तेल, फूलों से वासित तेल और अन्य द्रव्यों से युक्त तेल दोषयुयुक्त नहीं माने जाते, अतः इन्हें सब दिन लगा सकते हैं।

शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी। वेहव्यायामसंख्याता मात्रया तां समाचरेत्।।

‘शरीर की जो चेष्टा देह को स्थिर करने एवं उसका बल बढ़ाने वाली हो उसे व्यायाम कहते हैं। उसे प्रतिदिन उचित मात्रा में करना चाहिये।’ (चरक) व्यायाम से कुछ ये लाभ हैं- शरीर की पुष्टि, कान्ति, शरीर के दीप्ताग्नि, आलस्य-हीनता (स्फूर्ति), स्थिरता, हल्कापन, शुद्धि, थकावट-सुस्ती, प्यास, गर्मी एवं ठंड आदि सहने की शक्ति और श्रेष्ठ आरोग्य प्राप्त होता है।

मोटापा को कम करने वाला कोई उपाय इस के समान दूसरा नहीं है। शत्रु का भय नहीं होता, बुढ़ापा सहसा आक्रमण नहीं करता। व्यायाम मर्दित और उद्वर्तित शरीर वाले के पास व्याधियाँ नहीं फटकने पातीं। व्यायाम से वय, रूप और गुण हीन मनुष्य भी देखने में सुन्दर लगता है। व्यायाम से विरूद्ध, कच्चा जला हुआ भोजन भी भली भाँति पच जाता है। व्यायाम एक नैत्यिक अनुष्ठेय कर्तव्य है।

नित्य स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान् लोगों को व्यायाम सर्वदा हितकर है। शीत एवं वसन्तकाल में तो वह विशेष लाभप्रद होता ही है, किंतु कामी मनुष्य को सभी ऋतुओं में प्रत्येक दिन अपने बल की आधी शक्ति से व्यायाम करना चाहिये। परन्तु अधिक मात्रा में व्यायाम घातक होता है। उससे क्षय, अधिक प्यास, अरूचि, वमन, रक्त-पित्त, चक्कर, सुस्ती, खाँसी, शोष, ज्वर और श्वास-कष्ट-जैसे रोग होते हैं। कुछ व्यक्तियों के लिये व्यायाम हितकर नहीं होता। रक्त-पित्त के रोगी, कृश, शोष, श्वास-कष्ट, खाँसी और उरः क्षत से पीडि़त, तुरंत भेजन किया हुआ, स्त्री-प्रसंग से क्षीण तथा चक्कर से पीडि़त मनुष्य व्यायाम न करे।

टहलना देह को अधिक पीडि़त करने वाला नहीं होता; वह आयु, बल, मेेेधा (धारण शक्ति) और अग्नि को बढ़ाने वाला एवं इन्द्रियों को जागृत (चैतन्य) करने वाला होता है। (अधिक रास्ता चलना इसके विपरीत होता है, वह बुढ़ापा एवं दुर्बलता करने वाला होता है।) आयुर्वेद में टहलने को ‘चङ्क्रमण’ कहते हैं। इसे आधुनिक चिकित्सक भी अत्यावश्यक बताते हैं। अतः वृद्धादि को अवश्य टहलना (घूमना) चाहिये।

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तृषा रोग

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तृषा रोग के कारण व निवारण शारीरिक श्रम करने पर तृषा अर्थात् प्यास की इच्छा होती है। तृषा होने पर सभी छोटे-बड़े के लिए जल पीना आवश्यक हो जाता है। जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। स्वास्थ्य के संतुलन को बनाये रखने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञ दिन में 15 से 20 गिलास पानी पीने का परामर्श देते हैं। जल भोजन की पाचन क्रिया को सरल बनाता है ओर मूत्र एवं पसीने के द्वारा शरीर के दुशित तत्त्वों को शरीर से निष्कासित करता है।

शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में तृषा की अधिक विकृति देखी जाती है। बार-बार शीतल जल पीने पर भी तृषा शांत नही होती। किसी भी स्त्री-पुरूष के साथ ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने का अर्थ होता है तृषा रोग। तृषा रोग में रोगी को बहुत प्यास लगती है। जल्दी-जल्दी जल पीने के बाद भी तृषा शान्त नही होती, तृषा के कारण रोगी बेचैन हो जाता है। तृषा के कारण रोगी का कण्ठ शुष्क होता है।

तृषा उत्पत्ति के कारण-
भोजन में कुछ उष्ण खाद्य पदार्थ होते हैं। पाचन क्रिया के समय शरीर में अधिक उष्णता पैदा होती है और उस गर्मी को शांत करने के लिए शरीर को पानी की आवश्यकता होती है। विभिन्न कारणों से तृषा की उत्पत्ति होती है। अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक प्यास लगती है। शुष्क व रूक्ष खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है।

चिकित्सा विशेषज्ञ शोक, चिंता और भय की परिस्थिति में अधिक प्यास लगने की बात करते हैं। गर्मियों में अधिक पसीने आने से शरीर में जल की कमी हो जाती है इसलिए अधिक प्यास लगती है। छोटे बच्चे जब दौडने का खेल खेलते हैं तब उन्हें अधिक प्यास लगती है।

अधिक उपवास किये जाने पर तृषा अधिक उत्पन्न होती है। अघिक उष्ण मिर्च-मसालों व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है। कुछ चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अग्नाशय की विकृति होने पर मधुमेह रोग की उत्पत्ति होती है तो रोगी को अधिक प्यास लगती है। बार बार पानी पीने से भी तृषा शान्त नहीं होती है।

भोजन में पित्त कारक खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करने से अधिक तृषा व जलन उत्पन्न होती है। अधिक उष्ण वातावरण में रहने और धूप में चलने फिरने से अधिक प्यास लगती है। मादक द्रव्यों व धूम्रपान करने वालों को अधिक प्यास लगती है।

तृषा के विभिन्न लक्षण-
जल पीने के बाद दो तीन घण्टों के लिए जल की इच्छा अर्थात तृषा शांत हो जाती है। लेकिन 30-40 मिनट बाद ही जल पीने की इच्छा होने लगे तो उसे तृषा रोग कहा जाता है। तृषा रोगी को 30-40 मिनट बाद जल पीने की इच्छा होती है तथा जल न मिले तो बेचैनी होने लगती है। उसका मुंह और कण्ठ सूखने लगता है, होंठ भी शुष्क होने लगते हैं।

रोगी को जल पीने के बाद भी बेचैनी बनी रहती है। जल पीने के कुछ देर बाद ही कण्ठ, होंठ, जीभ पर शुष्कता के लक्षण स्पष्ट होने लगते हैं। जल की इच्छा रोगी को बेचैन सी करने लगती है। ऐसे में रोगी को हृदय की निर्बलता भी अनुभव होने लगती है ग्रीष्म ऋतु में छोटे-बड़े सभी तृषा से अधिक पीडि़त दिखाई देते हैं। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता के कारण अधिक पसीने आने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में शरीर को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। जल की पूर्ति के लिए अधिक प्यास लगती हैं। लेकिन तृषा रोगी को शीत ऋतु में भी 30-40 मिनट के अंतराल पर बार-बार प्यास लगती है।

तृषा रोग के भेदः
आयुर्वेदाचार्यों ने तृषा के भेदों के अनुसार अलग-अलग लक्षणों का वर्णन किया है। वात, पित्त, कफ दोषों के अनुसार तृषा को वातज, पित्तज, कफज, क्षतज, आमन और भक्तज आदि भेदों में विभक्त किया है।

तृषा रोग की गुणकारी चिकित्सा-
तृषा की उत्पत्ति को जान लेने के बाद उसकी चिकित्सा सरल हो जाती है। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता की अधिकता होने के कारण सभी छोटे-बड़े को तृषा अधिक पीडि़त करती है। शीतल जल के सेवन से प्यास शांत होती हैं। शीतल जल से हाथ-पांव और चेहरे को साफ करने से तृषा का प्रकोप कम होता है। शीतल जल में नीबू का रस और थोड़ी शक्कर मिलाकर, शिकंजी बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तृषा का निवारण होता है।

वातज तृषा की चिकित्साः
जब यह ज्ञात हो कि रोगी वातक तृषा से पीडि़त है तो उसको वात-पित्त शामक औशधियों का सेवन कराकर वातक तृषा का निवारण किया जाता हैं।
दो-दो तोले गिलोय का रस दो-दो घण्टे के अन्तराल से वातज तृषा से पीडि़त रोगी को पिलाने से तुरंत रोग का निवारण होता हैं। दिन में दो तीन बार पिला सकते हैं।
कुश, कास, शर, दर्भ और ईख, इन पंच तृणों की जड़ को उबाल कर कपडे से छान कर पिलाने से तृषा का अन्त होता हैं।

गुड़ और दही मिलाकर रोगी को सेवन कराने से वातज तृषा नष्ट होती हैं।

घी को हल्का सा गर्म करके रोगी को 10-10 ग्राम मात्रा में पिलाने से वातज तृषा के कारण तालु में उत्पन्न शुष्कता नष्ट होती हैं। तृषा की अधिकता से मुच्छित रोगी को घी नही पिलाना चाहिए।
मांस रस के सेवन से भी वातक तृषा नष्ट होती है।

तृषा नाशक कुछ गुणकारी औशधियां-
बिजौरे नीबू के फूलों को, केशर का चूर्ण, अनार का रस, मधु ओर सेंधा नमक, सबको अच्छी तरह मिलाकर सेवन करने से तृषा की निवृत्ति होती हैं।
लाल शालि (चावलों) का भात पकाकर, शीतल होने पर मधु मिलाकर खाने से जीर्ण तृषा का भी निवारण होता हैं।

रक्त पित्त रोग के कारण तृषा की उत्पत्ति होने पर चंद्रकला रस (आयुर्वेदिक औशधि) का सेवन करने से बहुत लाभ होता हैं।

सितोपलादि चूर्ण दिन में दो-तीन वार अनार के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा नष्ट होती है। ताम्र भस्म और बंग भस्म 1-1 रत्ती मात्रा में चंदन के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा का निवारण होता है।

जल में मधु मिलाकर कुछ देर जल को मुँह में रोके रखने से तृषा की विकृति नष्ट होती है। शीतल जल में धनियां, जीरा और सौफ भिगोकर, उनको छानकर, उस जल में मिश्री मिला कर पीने से तृषा नष्ट होती है। गुलाब, चंदन, नीबू और अनार के रस का शरबत बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तीव्र तृषा रोग नष्ट होता है।

आहार विहारः
भोजन में रूक्ष, गरिष्ठ व उष्ण मिर्च मसालों के खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिक उत्पत्ति होती है। ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। चाय- कॉफी से भी अधिक प्यास लगती है। ग्रीष्म ऋतु में बर्फ का अधिक सेवन करने से भी अधिक प्यास लगती है। सीधे जल में बर्फ डाल कर नही पीना चाहिए। बर्फ के साथ रखकर जल को शीतल करके पीने से तृषा का निवारण होता है।

नीबू के रस से बनी शिकंजी तृषा को जल्दी शांत करती है। नदी व तालाब में स्नान करने से तृषा की विकृति नष्ट होती है। संतरा, मौसमी, जौ के सत्तू, इमली से बने पेय पदार्थ, धनियां, जीरा, मिश्री, अनानास, नारियल का जल, गन्ने का रस, आँवले व आम का मुरब्बा, शीतल दूध, तक्र (मट्ठा) आदि तृषा को नष्ट करते हैं।

सूर्य की प्रचण्ड धूप में अधिक घूमने-फिरने ओर अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक तृषा की उत्पत्ति होती हैं। गुरू, उष्ण, घी, तेल में बने पकवान, अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थ, चटपटे, तीक्ष्ण पदार्थ, सोंठ, पीपल, लाल मिर्च, चाय- कॉफी आदि खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिकता होती हैं। इन खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए।

नेत्र रोग का समूल नाश करने वाली ‘चाक्षुषोपनिषद् विद्या’ नेत्र रोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली चाक्षुषी विद्या की व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्र रोग की निवृत्ति के लिए इसका जप होता है। यह विनयोग है।

नेत्रोपनिषद मंत्रः
ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करूणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा´छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।

ॐ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायँ। मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊं ( कृपया ) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें।

ॐ ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ॐ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ॐ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ॐ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ॐ ( सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले ) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। ( अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले ) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्णस्वरूप भगवान् सुर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं-उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।

जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा ( भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले ) हैं, जो ज्योतिः स्वरूप, हिरण्मय ( सुवर्ण के समान कान्तिमान् ) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्तिज्ञथान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं ( प्राणियों ) के समक्ष उदित हो रहे हैं।
ऊँ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।

ॐ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिए उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिए, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिए तथा तमोमय बन्धन में बधे हुए हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुश्प्करेक्शन को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।

नेत्र रोग से पीडि़त श्रद्धालु साधक को चाहिए कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी के रस) से अनार की शाखा की कलम के द्वारा काँसे के पात्र में निम्नलिखित विधि से यन्त्र को लिखें।

फिर उसी यन्त्र पर ताँबे की कटोरी में चर्तुमुख ( चारो ओर चार बत्तीयो का ) घी का दीपक जलाकर रख दें। तदानन्तर गन्ध-पुष्पादि से यन्त्र का पूजन करें। फिर पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ‘ॐ ह्नीं हंसः’ इस बीज मंत्र की छः मालाएँ जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालाएँ जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अघ्र्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा। ऐसा करते रहने से इस उपनिषद् का नेत्ररोगनाशक अदभुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखने में आता है।

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गाय का दूध

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गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी भावना और भावुकता, दयालुता और मनुश्यता की बात यदि एक तरफ कर दी जाये तब भी गाय का दूध, घी इत्यादि सर्वगुणसम्पन्न है। विषैला प्रभाव नष्ट करने में गोघृत की तुलना में अन्य किसी पशु का घी उतना उपयोगी नहीं होता। दूध घी से सैकड़ों रोग-विकार दूर होते हैं, यहाँ कुछ रोगों के नाम के साथ उपचार की संक्षिप्त विधि बतायी जा रही है। इस अमृत की शक्ति को पहचान कर पाठक लंबी आयु तक स्वस्थ और युवा बने रह सकते हैं-

अजीर्णः– जब गरिष्ठ भोजन अनपचा रह जाता है, तब शरीर की आग ठंडी पड़ जाती है, अम्लता बढ़ती जाती है, पेट पत्थर-जैसा ठोस होने लगता है, इसके प्रभाव से गुर्दे भी कमजोर पड़ने लगते हैं। इस स्थिति में दूध में सोंठ और गुड़ औटाइये ताकि पेट की सड़ांध मल-मूत्रा के रास्ते बाहर निकल जाय।
250 ग्राम दुध में 100 ग्राम पानी मिलाइये, 25 ग्राम शक्कर या गुड़ डालिये, 10-12 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाइये, जब पानी जल जाय तो हल्का गर्म रह जाने पर घूँट-घूँट पानी शुरू कर दीजिये। अनपचा भोजन सोंठ की गर्मी से पचने लगेगा और मल-मूत्रा गल-पिघल कर निकलने लगेगा, प्यास लगे तो पानी भी हलका गर्म ही पियें, पेट साफ होते ही जलन, खट्टी डकार अफारा और बेचैनी के विकार भी शान्त हो जायँगे। अजीर्ण से छुटकारा पाने के बाद भी एक दिन दूध ही पीजिये ताकि आँतें और पेट की दीवारें तक निर्मल हो जायँ। कमजोरी से न घबरायें, क्योंकि दुध प्राणों का आधार है; यदि गर्भ से निकला बालक दूध पर जी सकता है तो हम दुर्बल नहीं होंगे, मूँग की पतली दाल से चपाती खाकर आप तीसरे दिन से हलके भोजन की शुरूआत कर सकते हैं, दोपहर को दूध में पका हुआ पतला दलिया एवं शाम को दूध में शहद मिलाकर पीजिये, रात को खिचड़ी खाइये चैथे दिन से सामान्य भोजन शुरू कर दें।

अतिसारः– आयुर्वेद के ग्रन्थों में अतिसार पर काबू पाने के लिये दूध के फेन (झाग) को परमौषधि बताया गया है। मलाई और रबड़ी खाने वालों को मालूम होना चाहिये कि 25 ग्राम दुग्ध फेन, 1/2 किलो मलाई के बराबर पौष्टिक है। झाग मुँह में पहुँचते ही टॉनिक बन जाता है, जबकि रबड़ी-खोया पचाने में कई घंटे लग जाते हैं, दूध दुहने के बाद बर्तन में जितना भी झाग हो, उसे एक बड़े कटोरे में कलछी से निकाल लें, इस झाग को चम्मच से स्वाद लेते हुए चूसना शुरू कर दें, वैसे तो झाग में चूसने वाला ठोस तत्त्व होता ही नहीं, किंतु इस विधि से पेट का संकुचन होता है, गोदुग्ध के झाग से पेट की आग भड़क उठेगी और भोजन के कच्चे रस पचने लगेंगे, दूध का झाग शरीर की पेशियों को भी फुला देता है और पाचन-क्रिया तीव्र हो जाती है, बदन को गठीला और पुष्ट करने में दुग्ध-फेन अत्युत्तम औशधि है।

आँखों में जलन-भावप्रकाश निघण्टु में गाय का दूध आँखों के लिये उत्तम अंजन माना गया है, यदि आप भैंस का दूध पीते हैं तो गाय का दूध पीना शुरू कर दें, यदि गाय का दूध पीते हैं तो वह एकदम ताजा-ताजा हो। गाय ब्यायी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि शुरू का दूध जलन पैदा करता है, दूध की मलाई लेकर अँगुली से रात को सोते समय पलकों पर लगा लें, सुबह तक जलन शान्त हो जायगी, नहाने के पहले गोदुग्ध का मक्खन लगा दें, आधे घंटे में जलन जाती रहेगी, यदि मलाई की चिकनाहट को मन न मानता हो तो 4 चम्मच दूध, 1 कटोरी पानी में मिलाकर उससे खुली आँखों में छींटे मारें और स्वच्छ कपड़े से आँखें पोछकर सो जायँ। सुबह तक सारी जलन निकल चुकी होगी, जिन्हें चिकनाई से प्यार हो तो उन्हें दूध की मलाई पलकों पर लेपकर गर्मी की सूजन निकाल देनी चाहिये।

आग से जलनाः- घाव कैसा भी हो, गाय के घी से उत्तम न कोई पेनिसिलिन आदि दवा है न मरहम, कुदरत ने गोघृत को इतनी विषनाशक शक्ति से भर रखा है कि इससे बढि़या क्रीम, मरहम या एंटीसेप्टिक दवा हो ही नहीं सकती, गोघृत में पट्ठी तर करके जली हुई त्वचा पर रखकर भगवान को याद करें, जिसने आप को गोघृत के रूप में अमृत-जैसी पौष्टिक दवा दे रखी है। दूध में घी डाल कर पियें, ताकि सप्ताह भर में घाव की जगह नयी त्वचा उग जाय। गाय का दूध शरीर को त्वचा भी देता है और मांस की कमी भी शीघ्र पूरी करता है।

आधासीसीः- आधे सिर का दर्द तभी होता है, जब उस हिस्से में रक्त के संचार में रूकावट पड़ गयी हो, उस रूकावट का कारण भोजन के वे कच्चे रस होते हैं, जो कफ, लेस आदि के रूप में जमा हो जाते हैं और जुकाम-नजला भी बन जाते हैं, अगर नासिका से दुशित जल न निकले तो माथे के किसी भी हिस्से में जोरों का दर्द उठने लगता है, माथा इतने भयंकर रूप में फटने लगता है जैसे टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ जायगा। 250 ग्राम दूध में 250 ग्राम पानी डालिये, 2 पीपली, 5 लौंग और दालचीनी के 4 छोटे टुकड़े पीसकर दूध में औटाइये।

जब केवल दूध ही बचे तो 2 चम्मच शहद मिलाकर पियें और कंबल ओढ़कर सो जायँ। घूँट इस तरह पियें जैसे गर्म वस्तु चूस रहे हों, जितना अधिक पसीना आयेगा उतनी जल्दी आराम मिलेगा, दिन में 3-4 बार ऐसा दूध पीने से माथे की श्लेष्मा जल बनकर नथनों से बह जायगी या पसीने और मल-मूत्रा के रास्ते निकल जायगी।

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केले के गुण

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केले के गुण केला एक बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक व गुणकारी फल है। केले की गिनती हमारे देश के उत्तम फलों में होती है और इसको मांगलिक कार्यो में भी विशेष स्थान दिया गया है। विदेशों में भी इसके गुणों के कारण इसे स्वर्ग का सेव और आदम की अंजीर नाम प्रदान किये गये हैं। आमतौर पर लोगों की यह धारणा होती है कि जब केले खूब पक जाते हैं या पिलपिले हो जाते हैं, तब उनमें कीटाणु पैदा हो जाते हैं, किन्तु यह गलतफहमी है। जब तक केले का छिलका उसके गूदे पर पूरी तरह चिपका होता है, तब तक वह कीटाणुरहित रहता है। इसलिए खूब पके हुए केले भी पूरी तरह खाने योग्य एवं हानिरहित हैं। कुछ लोगों की धारणा यह भी है कि केले पचने में भारी होते हैं। दरअसल कच्चे या अधपके केलों को खाने से ऐसा होता है, क्यों कि वह असानी से हमारे पेट में सरलता से पचने वाली शर्करा में परिवर्तित नहीं होते हैं, फिर भी केले खाने के बाद यदि भारीपन महसूस हो तो एक या दो इलायची ऊपर से खाने से तुरन्त पेट में हल्कापन आ जाता है। केले के छिलके का हरा रंग लुप्त होते ही वह खाने के योग्य हो जाते हैं, तथा उनके छिलके काले होने के पश्चात् तक खाने योग्य रहते हैं, बशर्ते उनका छिलका गूदे से चिपका हो। केले के पौधे हरे, 10 से 12 फीट ऊँचे तथा काष्ठहीन होते हैं। इनके पत्ते काफी बड़े होते हैं। इसके पौधे में शाखाएँ नहीं होती तथा स्तम्भ पर्तदार होता है। केले के गूदे में 1.5 प्रतिशत प्रोटीन, लगभग 3 प्रतिशत विटामिन्स, 20 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स और बाकी ज्यादातर जल तत्व होता है। इसलिए पके हुए केलों को खाने से अजीर्ण नहीं होता। भारतीय ग्रन्थों में भी केला और दूध साथ-साथ खाने को पूर्ण भोजन कहा गया है। यह तथ्य इसलिए भी स्पष्ट हो जाता है कि हमारे भोजन के जो घटक केले में नहीं होते, वे दूध से प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार दूध केले खा लेने के पश्चात् किसी भी व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती है। यह योग एक सन्तुलित आहार का कार्य करता है। छोटे बच्चों को नित्य कम से कम एक केला खिलाने से उनमें उत्तम विकास देखा जा सकता है। केले के भक्षण से शरीर में बल की वृद्धि होती है, केले में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, ताँबा, सीसा, आयोडीन, सोडीयम मैग्नीज आदि अनेक शरीरोपयोगी खनिज तत्व होते हैं। इस प्रकार हर दृष्टि ये यह उत्तम फल है।

पके केले के गुण- स्वादिष्ट, शीतल, वीर्यवर्धक, शरीर के लिए पुष्टिकारक, माँस को बढ़ाने वाला, भूख-प्यास को दूर करने वाला तथा नेत्र रोग और प्र्रमेह नाशक है।
कच्चे केले के गुण- शीतल, ग्राही एस्ट्रीजेन्ट्स–यानी जो अपनी क्रिया द्वारा शरीर के दोश, मल व धातु को सोख ले पाचन में भारी, रक्त, पित्त, वायु कफ विकार तथा क्षय को दूर करने वाला होता है।

केले का औशधीय महत्व
1 वजन बढ़ाने के लिए– एक पाव दूध के साथ नित्य दो केलों का सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और शरीर का वजन बढ़ता है।

2 आँत सम्बन्धी रोगों में– कई लोगों की आँतों में गड़बड़ी होने के कारण उन्हें दस्त पेचिश की शिकायतें बनी रहती हैं। ऐसे लोगों को दो केले उनके (केलों के) वजन से आधे वजन के दही के साथ सेवन करना लाभकारी है।

3 मुँह के छालों के लिए– कुछ लोगों को आये दिन मुँह में छाले हो जाते हैं। ऐसे लोगों को चाहिए कि वे गाय के दूध से निर्मित दही के साथ केला खायें। यह प्रयोग सात से दस दिन तक करना पड़ता है।
4 पेट के कीड़े मारने तथा खून शुद्ध करने के लिए– इसके लिए केलों की जड़ के अर्क का सेवन लाभदायक है। इस अर्क को बनाने के लिए लगभग एक किलो जल में 50 ग्राम केले की जड़ डालकर इतना गर्म करें कि जल की मात्रा आधी हो जाए। इसके बाद मिश्रण छान लें। यही छानन अर्क है। इसी अनुपात में ताजा अर्क बनाए। अर्क की दो तोला मात्रा एक बार में लें।

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