तृषा रोग

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

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तृषा रोग के कारण व निवारण शारीरिक श्रम करने पर तृषा अर्थात् प्यास की इच्छा होती है। तृषा होने पर सभी छोटे-बड़े के लिए जल पीना आवश्यक हो जाता है। जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। स्वास्थ्य के संतुलन को बनाये रखने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञ दिन में 15 से 20 गिलास पानी पीने का परामर्श देते हैं। जल भोजन की पाचन क्रिया को सरल बनाता है ओर मूत्र एवं पसीने के द्वारा शरीर के दुशित तत्त्वों को शरीर से निष्कासित करता है।

शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में तृषा की अधिक विकृति देखी जाती है। बार-बार शीतल जल पीने पर भी तृषा शांत नही होती। किसी भी स्त्री-पुरूष के साथ ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने का अर्थ होता है तृषा रोग। तृषा रोग में रोगी को बहुत प्यास लगती है। जल्दी-जल्दी जल पीने के बाद भी तृषा शान्त नही होती, तृषा के कारण रोगी बेचैन हो जाता है। तृषा के कारण रोगी का कण्ठ शुष्क होता है।

तृषा उत्पत्ति के कारण-
भोजन में कुछ उष्ण खाद्य पदार्थ होते हैं। पाचन क्रिया के समय शरीर में अधिक उष्णता पैदा होती है और उस गर्मी को शांत करने के लिए शरीर को पानी की आवश्यकता होती है। विभिन्न कारणों से तृषा की उत्पत्ति होती है। अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक प्यास लगती है। शुष्क व रूक्ष खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है।

चिकित्सा विशेषज्ञ शोक, चिंता और भय की परिस्थिति में अधिक प्यास लगने की बात करते हैं। गर्मियों में अधिक पसीने आने से शरीर में जल की कमी हो जाती है इसलिए अधिक प्यास लगती है। छोटे बच्चे जब दौडने का खेल खेलते हैं तब उन्हें अधिक प्यास लगती है।

अधिक उपवास किये जाने पर तृषा अधिक उत्पन्न होती है। अघिक उष्ण मिर्च-मसालों व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से अधिक प्यास लगती है। कुछ चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अग्नाशय की विकृति होने पर मधुमेह रोग की उत्पत्ति होती है तो रोगी को अधिक प्यास लगती है। बार बार पानी पीने से भी तृषा शान्त नहीं होती है।

भोजन में पित्त कारक खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करने से अधिक तृषा व जलन उत्पन्न होती है। अधिक उष्ण वातावरण में रहने और धूप में चलने फिरने से अधिक प्यास लगती है। मादक द्रव्यों व धूम्रपान करने वालों को अधिक प्यास लगती है।

तृषा के विभिन्न लक्षण-
जल पीने के बाद दो तीन घण्टों के लिए जल की इच्छा अर्थात तृषा शांत हो जाती है। लेकिन 30-40 मिनट बाद ही जल पीने की इच्छा होने लगे तो उसे तृषा रोग कहा जाता है। तृषा रोगी को 30-40 मिनट बाद जल पीने की इच्छा होती है तथा जल न मिले तो बेचैनी होने लगती है। उसका मुंह और कण्ठ सूखने लगता है, होंठ भी शुष्क होने लगते हैं।

रोगी को जल पीने के बाद भी बेचैनी बनी रहती है। जल पीने के कुछ देर बाद ही कण्ठ, होंठ, जीभ पर शुष्कता के लक्षण स्पष्ट होने लगते हैं। जल की इच्छा रोगी को बेचैन सी करने लगती है। ऐसे में रोगी को हृदय की निर्बलता भी अनुभव होने लगती है ग्रीष्म ऋतु में छोटे-बड़े सभी तृषा से अधिक पीडि़त दिखाई देते हैं। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता के कारण अधिक पसीने आने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में शरीर को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। जल की पूर्ति के लिए अधिक प्यास लगती हैं। लेकिन तृषा रोगी को शीत ऋतु में भी 30-40 मिनट के अंतराल पर बार-बार प्यास लगती है।

तृषा रोग के भेदः
आयुर्वेदाचार्यों ने तृषा के भेदों के अनुसार अलग-अलग लक्षणों का वर्णन किया है। वात, पित्त, कफ दोषों के अनुसार तृषा को वातज, पित्तज, कफज, क्षतज, आमन और भक्तज आदि भेदों में विभक्त किया है।

तृषा रोग की गुणकारी चिकित्सा-
तृषा की उत्पत्ति को जान लेने के बाद उसकी चिकित्सा सरल हो जाती है। ग्रीष्म ऋतु में उष्णता की अधिकता होने के कारण सभी छोटे-बड़े को तृषा अधिक पीडि़त करती है। शीतल जल के सेवन से प्यास शांत होती हैं। शीतल जल से हाथ-पांव और चेहरे को साफ करने से तृषा का प्रकोप कम होता है। शीतल जल में नीबू का रस और थोड़ी शक्कर मिलाकर, शिकंजी बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तृषा का निवारण होता है।

वातज तृषा की चिकित्साः
जब यह ज्ञात हो कि रोगी वातक तृषा से पीडि़त है तो उसको वात-पित्त शामक औशधियों का सेवन कराकर वातक तृषा का निवारण किया जाता हैं।
दो-दो तोले गिलोय का रस दो-दो घण्टे के अन्तराल से वातज तृषा से पीडि़त रोगी को पिलाने से तुरंत रोग का निवारण होता हैं। दिन में दो तीन बार पिला सकते हैं।
कुश, कास, शर, दर्भ और ईख, इन पंच तृणों की जड़ को उबाल कर कपडे से छान कर पिलाने से तृषा का अन्त होता हैं।

गुड़ और दही मिलाकर रोगी को सेवन कराने से वातज तृषा नष्ट होती हैं।

घी को हल्का सा गर्म करके रोगी को 10-10 ग्राम मात्रा में पिलाने से वातज तृषा के कारण तालु में उत्पन्न शुष्कता नष्ट होती हैं। तृषा की अधिकता से मुच्छित रोगी को घी नही पिलाना चाहिए।
मांस रस के सेवन से भी वातक तृषा नष्ट होती है।

तृषा नाशक कुछ गुणकारी औशधियां-
बिजौरे नीबू के फूलों को, केशर का चूर्ण, अनार का रस, मधु ओर सेंधा नमक, सबको अच्छी तरह मिलाकर सेवन करने से तृषा की निवृत्ति होती हैं।
लाल शालि (चावलों) का भात पकाकर, शीतल होने पर मधु मिलाकर खाने से जीर्ण तृषा का भी निवारण होता हैं।

रक्त पित्त रोग के कारण तृषा की उत्पत्ति होने पर चंद्रकला रस (आयुर्वेदिक औशधि) का सेवन करने से बहुत लाभ होता हैं।

सितोपलादि चूर्ण दिन में दो-तीन वार अनार के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा नष्ट होती है। ताम्र भस्म और बंग भस्म 1-1 रत्ती मात्रा में चंदन के शरबत के साथ सेवन करने से तृषा का निवारण होता है।

जल में मधु मिलाकर कुछ देर जल को मुँह में रोके रखने से तृषा की विकृति नष्ट होती है। शीतल जल में धनियां, जीरा और सौफ भिगोकर, उनको छानकर, उस जल में मिश्री मिला कर पीने से तृषा नष्ट होती है। गुलाब, चंदन, नीबू और अनार के रस का शरबत बनाकर पीने से ग्रीष्म ऋतु में तीव्र तृषा रोग नष्ट होता है।

आहार विहारः
भोजन में रूक्ष, गरिष्ठ व उष्ण मिर्च मसालों के खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिक उत्पत्ति होती है। ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। चाय- कॉफी से भी अधिक प्यास लगती है। ग्रीष्म ऋतु में बर्फ का अधिक सेवन करने से भी अधिक प्यास लगती है। सीधे जल में बर्फ डाल कर नही पीना चाहिए। बर्फ के साथ रखकर जल को शीतल करके पीने से तृषा का निवारण होता है।

नीबू के रस से बनी शिकंजी तृषा को जल्दी शांत करती है। नदी व तालाब में स्नान करने से तृषा की विकृति नष्ट होती है। संतरा, मौसमी, जौ के सत्तू, इमली से बने पेय पदार्थ, धनियां, जीरा, मिश्री, अनानास, नारियल का जल, गन्ने का रस, आँवले व आम का मुरब्बा, शीतल दूध, तक्र (मट्ठा) आदि तृषा को नष्ट करते हैं।

सूर्य की प्रचण्ड धूप में अधिक घूमने-फिरने ओर अधिक शारीरिक श्रम करने से अधिक तृषा की उत्पत्ति होती हैं। गुरू, उष्ण, घी, तेल में बने पकवान, अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थ, चटपटे, तीक्ष्ण पदार्थ, सोंठ, पीपल, लाल मिर्च, चाय- कॉफी आदि खाद्य पदार्थों के सेवन से तृषा की अधिकता होती हैं। इन खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए।

नेत्र रोग का समूल नाश करने वाली ‘चाक्षुषोपनिषद् विद्या’ नेत्र रोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली चाक्षुषी विद्या की व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्र रोग की निवृत्ति के लिए इसका जप होता है। यह विनयोग है।

नेत्रोपनिषद मंत्रः
ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करूणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा´छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।

ॐ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायँ। मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊं ( कृपया ) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें।

ॐ ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ॐ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ॐ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ॐ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ॐ ( सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले ) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। ( अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले ) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्णस्वरूप भगवान् सुर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं-उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।

जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा ( भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले ) हैं, जो ज्योतिः स्वरूप, हिरण्मय ( सुवर्ण के समान कान्तिमान् ) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्तिज्ञथान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं ( प्राणियों ) के समक्ष उदित हो रहे हैं।
ऊँ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।

ॐ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिए उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिए, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिए तथा तमोमय बन्धन में बधे हुए हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुश्प्करेक्शन को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।

नेत्र रोग से पीडि़त श्रद्धालु साधक को चाहिए कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी के रस) से अनार की शाखा की कलम के द्वारा काँसे के पात्र में निम्नलिखित विधि से यन्त्र को लिखें।

फिर उसी यन्त्र पर ताँबे की कटोरी में चर्तुमुख ( चारो ओर चार बत्तीयो का ) घी का दीपक जलाकर रख दें। तदानन्तर गन्ध-पुष्पादि से यन्त्र का पूजन करें। फिर पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ‘ॐ ह्नीं हंसः’ इस बीज मंत्र की छः मालाएँ जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालाएँ जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अघ्र्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा। ऐसा करते रहने से इस उपनिषद् का नेत्ररोगनाशक अदभुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखने में आता है।

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गाय का दूध

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गाय का दुग्ध सर्वश्रेष्ठ औशधी भावना और भावुकता, दयालुता और मनुश्यता की बात यदि एक तरफ कर दी जाये तब भी गाय का दूध, घी इत्यादि सर्वगुणसम्पन्न है। विषैला प्रभाव नष्ट करने में गोघृत की तुलना में अन्य किसी पशु का घी उतना उपयोगी नहीं होता। दूध घी से सैकड़ों रोग-विकार दूर होते हैं, यहाँ कुछ रोगों के नाम के साथ उपचार की संक्षिप्त विधि बतायी जा रही है। इस अमृत की शक्ति को पहचान कर पाठक लंबी आयु तक स्वस्थ और युवा बने रह सकते हैं-

अजीर्णः– जब गरिष्ठ भोजन अनपचा रह जाता है, तब शरीर की आग ठंडी पड़ जाती है, अम्लता बढ़ती जाती है, पेट पत्थर-जैसा ठोस होने लगता है, इसके प्रभाव से गुर्दे भी कमजोर पड़ने लगते हैं। इस स्थिति में दूध में सोंठ और गुड़ औटाइये ताकि पेट की सड़ांध मल-मूत्रा के रास्ते बाहर निकल जाय।
250 ग्राम दुध में 100 ग्राम पानी मिलाइये, 25 ग्राम शक्कर या गुड़ डालिये, 10-12 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाइये, जब पानी जल जाय तो हल्का गर्म रह जाने पर घूँट-घूँट पानी शुरू कर दीजिये। अनपचा भोजन सोंठ की गर्मी से पचने लगेगा और मल-मूत्रा गल-पिघल कर निकलने लगेगा, प्यास लगे तो पानी भी हलका गर्म ही पियें, पेट साफ होते ही जलन, खट्टी डकार अफारा और बेचैनी के विकार भी शान्त हो जायँगे। अजीर्ण से छुटकारा पाने के बाद भी एक दिन दूध ही पीजिये ताकि आँतें और पेट की दीवारें तक निर्मल हो जायँ। कमजोरी से न घबरायें, क्योंकि दुध प्राणों का आधार है; यदि गर्भ से निकला बालक दूध पर जी सकता है तो हम दुर्बल नहीं होंगे, मूँग की पतली दाल से चपाती खाकर आप तीसरे दिन से हलके भोजन की शुरूआत कर सकते हैं, दोपहर को दूध में पका हुआ पतला दलिया एवं शाम को दूध में शहद मिलाकर पीजिये, रात को खिचड़ी खाइये चैथे दिन से सामान्य भोजन शुरू कर दें।

अतिसारः– आयुर्वेद के ग्रन्थों में अतिसार पर काबू पाने के लिये दूध के फेन (झाग) को परमौषधि बताया गया है। मलाई और रबड़ी खाने वालों को मालूम होना चाहिये कि 25 ग्राम दुग्ध फेन, 1/2 किलो मलाई के बराबर पौष्टिक है। झाग मुँह में पहुँचते ही टॉनिक बन जाता है, जबकि रबड़ी-खोया पचाने में कई घंटे लग जाते हैं, दूध दुहने के बाद बर्तन में जितना भी झाग हो, उसे एक बड़े कटोरे में कलछी से निकाल लें, इस झाग को चम्मच से स्वाद लेते हुए चूसना शुरू कर दें, वैसे तो झाग में चूसने वाला ठोस तत्त्व होता ही नहीं, किंतु इस विधि से पेट का संकुचन होता है, गोदुग्ध के झाग से पेट की आग भड़क उठेगी और भोजन के कच्चे रस पचने लगेंगे, दूध का झाग शरीर की पेशियों को भी फुला देता है और पाचन-क्रिया तीव्र हो जाती है, बदन को गठीला और पुष्ट करने में दुग्ध-फेन अत्युत्तम औशधि है।

आँखों में जलन-भावप्रकाश निघण्टु में गाय का दूध आँखों के लिये उत्तम अंजन माना गया है, यदि आप भैंस का दूध पीते हैं तो गाय का दूध पीना शुरू कर दें, यदि गाय का दूध पीते हैं तो वह एकदम ताजा-ताजा हो। गाय ब्यायी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि शुरू का दूध जलन पैदा करता है, दूध की मलाई लेकर अँगुली से रात को सोते समय पलकों पर लगा लें, सुबह तक जलन शान्त हो जायगी, नहाने के पहले गोदुग्ध का मक्खन लगा दें, आधे घंटे में जलन जाती रहेगी, यदि मलाई की चिकनाहट को मन न मानता हो तो 4 चम्मच दूध, 1 कटोरी पानी में मिलाकर उससे खुली आँखों में छींटे मारें और स्वच्छ कपड़े से आँखें पोछकर सो जायँ। सुबह तक सारी जलन निकल चुकी होगी, जिन्हें चिकनाई से प्यार हो तो उन्हें दूध की मलाई पलकों पर लेपकर गर्मी की सूजन निकाल देनी चाहिये।

आग से जलनाः- घाव कैसा भी हो, गाय के घी से उत्तम न कोई पेनिसिलिन आदि दवा है न मरहम, कुदरत ने गोघृत को इतनी विषनाशक शक्ति से भर रखा है कि इससे बढि़या क्रीम, मरहम या एंटीसेप्टिक दवा हो ही नहीं सकती, गोघृत में पट्ठी तर करके जली हुई त्वचा पर रखकर भगवान को याद करें, जिसने आप को गोघृत के रूप में अमृत-जैसी पौष्टिक दवा दे रखी है। दूध में घी डाल कर पियें, ताकि सप्ताह भर में घाव की जगह नयी त्वचा उग जाय। गाय का दूध शरीर को त्वचा भी देता है और मांस की कमी भी शीघ्र पूरी करता है।

आधासीसीः- आधे सिर का दर्द तभी होता है, जब उस हिस्से में रक्त के संचार में रूकावट पड़ गयी हो, उस रूकावट का कारण भोजन के वे कच्चे रस होते हैं, जो कफ, लेस आदि के रूप में जमा हो जाते हैं और जुकाम-नजला भी बन जाते हैं, अगर नासिका से दुशित जल न निकले तो माथे के किसी भी हिस्से में जोरों का दर्द उठने लगता है, माथा इतने भयंकर रूप में फटने लगता है जैसे टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ जायगा। 250 ग्राम दूध में 250 ग्राम पानी डालिये, 2 पीपली, 5 लौंग और दालचीनी के 4 छोटे टुकड़े पीसकर दूध में औटाइये।

जब केवल दूध ही बचे तो 2 चम्मच शहद मिलाकर पियें और कंबल ओढ़कर सो जायँ। घूँट इस तरह पियें जैसे गर्म वस्तु चूस रहे हों, जितना अधिक पसीना आयेगा उतनी जल्दी आराम मिलेगा, दिन में 3-4 बार ऐसा दूध पीने से माथे की श्लेष्मा जल बनकर नथनों से बह जायगी या पसीने और मल-मूत्रा के रास्ते निकल जायगी।

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यज्ञ चिकित्सा

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यज्ञ चिकित्सा से भी रोग नष्ट होते हैं सूक्ष्म में जो शक्ति है वह स्थूल में नहीं। सोने का एक रत्ती टुकड़ा किसी आदमी को खिला दो कोई लाभ न होगा। उसी को सूक्ष्म करके वर्क बनाकर खिलाओं पुष्टि देगा। पर जब उसे आग में फूँक कर भस्म बना लो तो केवल एक एक रत्ती खिलाने ही चेहरे पर लाली, शरीर में बल, मन में उत्साह उत्पन्न होकर वृद्ध भी युवा बन जायगा। वैद्यलोग जानते हैं कि एक माशे दवा की वैसे बहुत कम शक्ति होती है, उसी दवा को यदि एक सप्ताह तक घोटकर सूक्षम किया जाये तो उसकी शक्ति कई गुणा बढ़ जाती है। होमियोपैथी मे इसी नियम के आधार पर औशधियों की पोटैंसी तैयार की जाती है। जिसका प्रभाव करना अभीष्ट होता है तो खिलाने के स्थान मे औशधि सुँघाते हैं।

सुँघाने की अपेक्षा भी जली हुई औशधि का प्रभाव कितना बढ़ जाता है उसे उदारहण से समझिये। एक मिर्च सूँघने से कुछ न होगा। कूटने से पास बैठे लोगों को खाँसी आवेगी। पर यदि उसको आग में जलावें तो दूर-दूर तक के मनुश्य खांखने लगेंगे। कारण यह कि अब उसके परमाणु बहुत सूक्ष्म हो गये, अतः उनकी शक्ति बढ़ गयी। अब विचार कीजिये कि रोग के कीडे़ एक कतार में रक्खे जावें तो 25000 कीटाणु एक इच्ं स्थान घेरेगें। यदि उनको तौला जावे तो एक खस खस के दाने पर बीस अरब कीटाणु चढ़ जायँगे। इतनी सूक्ष्म वस्तु पर स्थूल कण वाली ओषधियों की बड़ी मात्राओं की पहुँच ही दुस्तर है, कीटाणुओं को समाप्त कर उन पर विजय पाना तो दूर की बात है। इसी नियम को समझने के कारण लोग तपेदिक की चिकित्सा में असफल रहते है, और उसे असाध्य समझते हैं। पर औशधियों का वह अत्यन्त सूक्ष्म भाग जो यज्ञ अग्नि द्वारा छिन्न भिन्न हुआ है कीटाणुओं को सुगमता से नष्ट कर रोग दूर कर सकता है।

पदार्थ विज्ञान से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि कोई वस्तु नष्ट नहीं होती किन्तु रूप बदल जाता है। जो ओषधि मुँह से खायी जाती है, वह रस रक्त बनने के पश्चात् क्षयरोगी के फेफड़ों तक पहुँचेगी। पर अग्नि में जलायी हुई औशधि श्वास द्वारा सीधी फेफड़ो पर पहुँच कर तत्काल प्रभाव करेगी और बहुत सूक्ष्म होने के कारण स्थायी प्रभाव करेगी। गूगूल को ही लीजिये। आयुर्वेद में इसे अन्य गुणों के साथ रसायन, बलकारक, टूटे को जोड़ने वाला और कृमिनाशक बतलाया गया है।

अन्वेषण से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जितने प्राकृतिक पदार्थ हैं उनके सूक्ष्म परमाणु हर समय गतिशील रहते है, यद्यपि प्रत्यक्ष में वे दृष्टिगोचर नहीं होते। हमारे इस मनुश्य शरीर, घर की दीवार, मेज, कुर्सी इत्यादि का प्रत्येक परमाणु गति कर रहा है। यजुर्वेद के 40 वें अध्याय के पहले मन्त्र में संसार को जगत्यां जगत् कहकर इसी नियम को बताया है। और यह गति भी ऊटपटांग नहीं किन्तु नियम पूर्वक है। प्रत्येक परमाणु गति एक सी नहीं होती। किन्हीं की गति समान होती है। और किन्हीं की एक दूसरे के प्रतिकूल। प्रकृति का नियम है कि दो समान वस्तुयें एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है और विरुद्ध वस्तएं एक दूसरे को भगाती हैं। आपने देखा होगा कि एक श्रेणी में एक साथ पढ़ने वाले कई विद्याथियों में से किन्हीं दोमें विशेष मित्रता हो जाती है। शेष में वैसी नहीं होती। रेल में सैकड़ो यात्री साथ-साथ यात्रा करते हैं पर उनमें से किन्हीं दो में ऐसी घनिष्ठता हो जाती है। जो जीवन भर निभाते हैं किन्हीं पति पत्नियों में ऐसा गहरा प्रेम होता है कि वे एक दूसरे पर प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते हैं। यह सब कुछ भी इसी नियम के आधार पर है जिस मनुश्य के शरीर के परमाणु जैसी गति करते हैं। उसे वैसी गति वाले रोग या स्वास्थ्य के परमाणुओं को उसकी ओर खिंचाव हो जाता है। और जो उसके विपरीत होते हैं वे दूर भागते हैं।

किसी भी रोग के कीटाणु जब मनुश्य के शरीर में प्रवेश करते हैं तो हमारे शरीर की रोगनिवारक शक्ति जिसे हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि सदा से जानते थे और प्राणयाम तथा ब्रह्मचर्य द्वारा नित्य बढ़ाया करते थे पर अब इस सम्बन्ध में वर्तमान विज्ञान में भी कुछ समय से खोज होने लगी है जिसे डाक्टरी में रोग निवारक शक्ति कहते है। रोग को दूर भगाने के लिये एक प्रकार का उफान खाया हुआ रस तथा रक्त के श्वेतकणों की सेना, जिसे डाक्टरी में चींहवबलजवेपे कहते है। भेजता है यदि ये लड़ाई में सफल हो जाते हैं तो रोग के कीटाणु वहीं समाप्त हो जाते हैं और हमें ज्ञात भी नहीं होता कि हम पर किसी रोग का आक्रमण हुआ था। हाँ, इनके निर्बल सिद्ध होने पर रोग हमारे शरीर पर अधिकार जमा लेता है। यह रोगनिवारक शक्ति कुछ तो जन्म काल से साथ आती है और कुछ मनुश्य को उत्तम भोजन, शुद्ध सुगन्धित वायु के मिलने से उत्पन्न होती है। अतः हवन यज्ञ से जहाँ रोगनिवारक शक्ति बढ़ेगी वहाँ वह उफान रस भी अधिक उत्पन्न होगा क्यूंकी गर्मी से उफान शीध्र आता ही है। इस प्रकार रोग के कृमि हवन करनेवाले पर आक्रमण करने पर भी रोग उत्पन्न करने में उसफल रहेंगे और रोग की अवस्था में हवन करने से शीध्र नष्ट हो जायँगे।

जिस प्रकार हमारे शरीर के ऊपर खाल का खोल चढ़ा है उसी प्रकार शरीर के भीतर की ओर एक मुलायम खाल का अस्तर भी लगा है। जो गले से लेकर आँतों के निचले भाग तक विशेष रूप से तर रहता है। जिस मनुश्य की यह खाल या अस्तर बिल्कुल ठीक है और उस पर कोई क्षत या खरोंच नहीं है वह स्वस्थ मनुश्य है और उस पर किसी भी संक्रामक रोग का आक्रमण नहीं हो सकता। इस वैज्ञानिक नियम को समझने वाले बुद्धिमान अनुभवी चिकित्सक सर्वदा रेचक दवा का निषेध करते हैं, क्योंकि इससे आँतों के अस्तर में खरोच उत्पन्न होती है। जब रोग-कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं तो इन्हीं खरोंच द्वारा रक्त में इस प्रकार फैल जाते हैं जिस प्रकार प्रवेश करायी हुई ओषधि। अब यदि किसी असुविधा से हमारी इस खाल या अस्तर में कोई खराश हो गयी है तो बाहर की खरोंच की चिकित्सा तो अन्य उपायों से भी सुगम है पर भीतर का प्रबन्ध कठिन है। हाँ जो ऐसी अवस्था में हवन करते हैं उनके भीतर जब घी, कपूर और गूगल इत्यादि के सूक्ष्म परमाणु पहुँचेंगे तो उस खरोंच को किस शीध्रता से भर देंगे इसको समझना कुछ कठिन नहीं है जब कि इन्हीं वस्तुओं से बाहर की खरोंच को भरने का अनुभव प्रत्येक मनुश्य करके देख सकता है।

युक्तियों के पश्चात् अब हम इस विषय में कुछ प्रमाण और अनुभव पेश करते है-
1. वेद भगवान् का प्रमाण- मूँचामि त्वा हविमा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत्र राजयक्ष्मात्।
ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्।।

हे व्याधिग्रस्त, मनुश्य तुझ को सुख के साथ चिरकालतक जीने के लिये गुप्त राजयक्ष्मा रोग से और सम्पूर्ण प्रकट राज्यक्ष्मा रोग से आहुति द्वारा छुड़ाता हूँ। जो इस समय में इस प्राणी को पीड़ाने या पुराने रोग ने ग्रहण किया है। उससे वायु तथा अग्नि देवता इसको अवश्य छुडावें।

इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि वेद भगवान् हर प्रकार के तपेदिक की चिकित्सा चाहे रोग अभी प्रकट हुआ हो या गुप्त हो, वायु और अग्निद्वारा बतलाते हैं और आहुति द्वारा रोग से छूटने का का आदेश करते हैं।
इससे अगला मन्त्र इस प्रकार है –

यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव।
तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्षमेनं शतशारदाय।।
यदि रोग के कारण न्यून आयु वाला हो, अथवा संसार के सुखों से दूर हो गया हो, चाहे मृत्यु के निकट पहुँच चुका हो – ऐसे रोगी को भी महारोग के पाश से छुड़ाता हूँ। इस रोगी को सौ शरद् ऋतुओं तक जीने के लिये प्रबल किया है। इससे यह विदित होता है कि खराब से खराब अवस्था को रोगी जिसे चिकित्सक लोग असाध्य कह देते हैं हवन यज्ञ से अच्छा हो सकता है।

2. आयुर्वेद के प्रामणिक ग्रन्थ चरक का प्रमाण- यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुरा जितः।
तां वेदविहितामिष्टिमारोग्या र्थी प्रयोजयेत्।।
जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था आरोग्य चाहने वाले मनुश्य को उसी वेदविहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये।

3. होमियोपैथिक से पृष्टि-
होमियोपैथिक चिकित्सा के आविष्कार कर्ता हैनीमान साहब अधिक निर्बल रोगियों को खिलाने के स्थान में केवल औशधि सुँघाने का परामर्श देते हैं और उसके लिये वह अपनी प्रसिद्ध पुस्तक की की धारा 190 में लिखते है जो औशधि के प्रभाव को शीध्र ग्रहण करता है। सबसे अधिक प्रभाव ओषधि का सूँघने और श्वास लेने से होता है। यदि हैनीमन साहब के समय जर्मनी में यज्ञ का प्रवाह हेाता तो अवश्य ही वे इसे चिकित्सा का प्रधान अंग बनाते ।

4. ऐलोपैथिकमत से पुष्टि-
एलोपैथिक डाक्टरी में तपेदिक के रोगी ज्ञतमवेवजम और म्नबंसलचजने वपस को इत्यादि का प्दींसंजपवद बनाकर सुँघाने हैं और इसका प्रभाव तत्काल होता है। वैसे वही ज्ञतमवेवजम खिलाया भी जाता हैं पर वह इतना शीध्र प्रभाव नहीं करता। ऐसा क्यों होता है। इसीलिये कि सूँधी हुई दवा के सूक्ष्म परमाणु सीधे फेफडे़ में पहुँचकर अपना प्रभाव करते हैं। पर उनमें वह शक्ति नहीं कि स्थायी प्रभाव रख सकें, जैसा कि अग्नि से छिन्न-भिन्न हुई ओषधि के परमाणु रख सकते है।

वैद्यक के अनुसार-
मैंने अपने कई वर्षों की चिकित्सा के अनुभव से निश्चय किया है, जो महारोग ओषधिभक्षण करने से दूर नहीं होते वे वेदोक्त यज्ञों द्वारा दूर हो जाते हैं।

विद्वानो के अनुभव
फ्रांस के विज्ञानवेत्ता प्रो. टिलवर्ट कहते हैं कि जलती हुई खाँड के धुएँ में वायु शुद्ध करने की वड़ी शक्ति है। इससे हैजा, तपेदिक, चेचक इत्यादि का विष शीध्र नष्ट हो जाता है।

डाक्टर टाटलिट साहब ने मुनक्का, किशमिश इत्यादि सूखे फलों को जला कर देखा है और मालूम किया है कि इनके धुँए से टाइफायड ज्वर के कीटाणु केवल आधे धण्टे में और दूसरे रोगों के कीटाणु धण्टे, दो घण्टें में समाप्त हो जाते हैं।

मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर डाक्टर कर्नल किंग त्ण्डण् ने कालि के विद्यार्थियों को बताया कि घी, चावल में केसर मिलाकर जलाने से रोग के कीटाणुओं का नाश होता है।

फ्रांस के डाक्टर हेफकिन, जिन्होंने चेचेक की टीका ईजाद किया, कहते हैं कि घी जलाने से रोगकृति मर जाते हैं।

केमिकल प्रारपटीज की राय-
जयफल, जावित्री, बड़ी इलायची, सूखा चन्दन इत्यादि अग्नि में जलाने से मुफीद हिस्से ज्यों के त्यों रहते हैं या सूक्ष्म हो जाते हैं। पहले पहल इनसे सुगन्धित तेल गैस बनकर निकलते हैं। हवन गैस मेंयह चीजें अपने असली रूप में मिलती हैं। अग्नि इन चीजों को गैस बना देती है। उड़ाने वाले तेलों के परमाणु 1, 0000 से 1, 10000000 सेंटीमीटर व्यासवाले देखे गये हैं। अतः हवन में इन चीजों के गुण बहुत बढ़ जाते हैं और ये आसानी से कीटाणुओं का नाश करते हैं।

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केले के गुण

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केले के गुण केला एक बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक व गुणकारी फल है। केले की गिनती हमारे देश के उत्तम फलों में होती है और इसको मांगलिक कार्यो में भी विशेष स्थान दिया गया है। विदेशों में भी इसके गुणों के कारण इसे स्वर्ग का सेव और आदम की अंजीर नाम प्रदान किये गये हैं। आमतौर पर लोगों की यह धारणा होती है कि जब केले खूब पक जाते हैं या पिलपिले हो जाते हैं, तब उनमें कीटाणु पैदा हो जाते हैं, किन्तु यह गलतफहमी है। जब तक केले का छिलका उसके गूदे पर पूरी तरह चिपका होता है, तब तक वह कीटाणुरहित रहता है। इसलिए खूब पके हुए केले भी पूरी तरह खाने योग्य एवं हानिरहित हैं। कुछ लोगों की धारणा यह भी है कि केले पचने में भारी होते हैं। दरअसल कच्चे या अधपके केलों को खाने से ऐसा होता है, क्यों कि वह असानी से हमारे पेट में सरलता से पचने वाली शर्करा में परिवर्तित नहीं होते हैं, फिर भी केले खाने के बाद यदि भारीपन महसूस हो तो एक या दो इलायची ऊपर से खाने से तुरन्त पेट में हल्कापन आ जाता है। केले के छिलके का हरा रंग लुप्त होते ही वह खाने के योग्य हो जाते हैं, तथा उनके छिलके काले होने के पश्चात् तक खाने योग्य रहते हैं, बशर्ते उनका छिलका गूदे से चिपका हो। केले के पौधे हरे, 10 से 12 फीट ऊँचे तथा काष्ठहीन होते हैं। इनके पत्ते काफी बड़े होते हैं। इसके पौधे में शाखाएँ नहीं होती तथा स्तम्भ पर्तदार होता है। केले के गूदे में 1.5 प्रतिशत प्रोटीन, लगभग 3 प्रतिशत विटामिन्स, 20 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स और बाकी ज्यादातर जल तत्व होता है। इसलिए पके हुए केलों को खाने से अजीर्ण नहीं होता। भारतीय ग्रन्थों में भी केला और दूध साथ-साथ खाने को पूर्ण भोजन कहा गया है। यह तथ्य इसलिए भी स्पष्ट हो जाता है कि हमारे भोजन के जो घटक केले में नहीं होते, वे दूध से प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार दूध केले खा लेने के पश्चात् किसी भी व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती है। यह योग एक सन्तुलित आहार का कार्य करता है। छोटे बच्चों को नित्य कम से कम एक केला खिलाने से उनमें उत्तम विकास देखा जा सकता है। केले के भक्षण से शरीर में बल की वृद्धि होती है, केले में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, ताँबा, सीसा, आयोडीन, सोडीयम मैग्नीज आदि अनेक शरीरोपयोगी खनिज तत्व होते हैं। इस प्रकार हर दृष्टि ये यह उत्तम फल है।

पके केले के गुण- स्वादिष्ट, शीतल, वीर्यवर्धक, शरीर के लिए पुष्टिकारक, माँस को बढ़ाने वाला, भूख-प्यास को दूर करने वाला तथा नेत्र रोग और प्र्रमेह नाशक है।
कच्चे केले के गुण- शीतल, ग्राही एस्ट्रीजेन्ट्स–यानी जो अपनी क्रिया द्वारा शरीर के दोश, मल व धातु को सोख ले पाचन में भारी, रक्त, पित्त, वायु कफ विकार तथा क्षय को दूर करने वाला होता है।

केले का औशधीय महत्व
1 वजन बढ़ाने के लिए– एक पाव दूध के साथ नित्य दो केलों का सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और शरीर का वजन बढ़ता है।

2 आँत सम्बन्धी रोगों में– कई लोगों की आँतों में गड़बड़ी होने के कारण उन्हें दस्त पेचिश की शिकायतें बनी रहती हैं। ऐसे लोगों को दो केले उनके (केलों के) वजन से आधे वजन के दही के साथ सेवन करना लाभकारी है।

3 मुँह के छालों के लिए– कुछ लोगों को आये दिन मुँह में छाले हो जाते हैं। ऐसे लोगों को चाहिए कि वे गाय के दूध से निर्मित दही के साथ केला खायें। यह प्रयोग सात से दस दिन तक करना पड़ता है।
4 पेट के कीड़े मारने तथा खून शुद्ध करने के लिए– इसके लिए केलों की जड़ के अर्क का सेवन लाभदायक है। इस अर्क को बनाने के लिए लगभग एक किलो जल में 50 ग्राम केले की जड़ डालकर इतना गर्म करें कि जल की मात्रा आधी हो जाए। इसके बाद मिश्रण छान लें। यही छानन अर्क है। इसी अनुपात में ताजा अर्क बनाए। अर्क की दो तोला मात्रा एक बार में लें।

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वनौषधियाँ

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चमत्कारी वनौषधियाँ भारतीय ज्योतिष शास्त्रों में सूर्य को जगदात्मा कहा गया है। यह सही भी है, क्योकि सृष्टि में बगैर सूर्य के विनाश सुनिश्चित है। वास्तव में सूर्य के प्रकाश में एक विशेष शक्ति निहित होती है। इसी जीवनी शक्ति के द्वारा पौधे अपने भोजन की प्राप्ति करते हैं तथा विभिन्न प्राणी भी इस पर आश्रित है। सृष्टि में जीवनचक्र को जहां सूर्य नियंत्रित करता है, वहीं दूसरी और वायुमंडल के विभिन्न गैसीय चक्र भी इसी के अधीन हैं। सूर्य की रश्मियों में सात प्रमुख रंगों (बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नांरगी और लाल) का एक संतुलित सम्मिश्रण होता हैं, इसलिए सृष्टि का निर्माण करने वाले पांचों तत्त्व अर्थात् जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी को सूर्य अपने ही रंग में समेटे हुए है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। सूर्य रश्मियों में विचित्र कीटाणुनाशक क्षमता भी है। इसीलिए जिस घर में सूर्य के प्रकाश का प्रवेश रहता है, उस घर के सभी प्राणी स्वस्थ रहते हैं। इसके विपरीत ऐसे कमरों में रहने वाले, जहां सूर्य का समूचित प्रकाश नहीं पहुंचता, अस्वस्थ तो रहते ही हैं, साथ ही उनकी बुद्धि-बल का भी पूर्ण विकास नहीं होता और न्यूनता दृष्टिगोचर होती है। हम यह भी देखते हैं, कि छाया में पड़ने वाले पौधे अच्छी फसल नहीं दे पाते और सूर्य के प्रकाश के अभाव में कोई भी पौधा पनप नही सकता। इसी प्रकार जिस जलाशय मे धूप नहीं पहुंचती उसमें कीड़े पैदा हो जाते हैं। इसके विपरीत सूर्य का प्रकाश का प्राप्त करने वाले जलाशयों का जल स्वच्छ तथा कीटाणुमुक्त तो होता ही है, इसके साथ ही साथ वह शक्ति का संचार करने वाला भी होता है। सूर्य के प्रकाश से समस्त सृष्टि लाभान्वित होती है। जड़ -चेतन सभी पर इसका समरूप प्रभाव पड़ता है। एक भारतीय महात्मा ‘स्वामी ज्ञानानन्द’ ने तो सूर्य-रश्मियों से तमाम पदार्थो को उत्पन्न कर संसार को चमत्कृत कर दिया था। सूर्य के इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण भारतीय ऋषि- मुनियों और वेदाचार्यो ने सूर्य को देवता कहा है। सूर्य-चमत्कार, संध्योपासना, सूर्य जल अर्पण आदि क्रियाओं के सम्पन्न करने के पीछे भी यही रहस्य हैं। हमारे पूर्वजों को सौर रश्यिमों की सहायता से अनेक औशधियों के निर्माण की जानकारी थी।
वनौषधियों के प्रयोग

मिर्गी के लिए– जायफल आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला फल है। इक्कीस ‘जायफल’ लाकर उनमें से सात जायफल ‘नीले रंग की बोतल में’ तथा सात जायफल हरे रंग की बोतल में सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक धूप में रखें। इस चैदह जायफल को शेष (बिना धूप में रखे), सात जायफल के साथ पिरोपकर एक माला बनाकर मिर्गी के रोग को पहनाने से उसे मिर्गी के दौरे आने बंद हो जाते हैं।

चेहरे की फुन्सियों को हटाने के लिएः– लगभग सौ मि0 ली0 ‘अंरडी के तेल’ को ‘लाल रंग की काँच की बोतल’ में सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखा रहने दें। लाल रंग की बोतल उपलब्ध न हो तो एक सफेद बोतल के चारों ओर लाल पारदर्शक पन्नी लपेट कर ऐसा किया जा सकता हैं। इस अरंडी के तेल में कपड़े से छना गया महीन ‘बेसन’ मिलाकर इससे बने उबटन को नियमित कुछ देर तक चेहरे पर लगाकर, तदुपरान्त चेहरा धोने से चेहरे पर विकसित होने वाली फुन्सियां दूर हो जाती हैं और चेहरा साफ हो जाता है। आवश्यकता हो, तो रात्रि पर्यन्त इस मिश्रण को चेहरे पर लगाये रहना चाहिए और सुबह-सुबह उसे धो लेना चाहिए। इस सम्बन्ध में अपने चिकित्सक से परामर्श ले लें।

लकवा दूर करने के लिएः– इसके लिए 100 मि0 ली0 ‘सरसो का शुद्ध तेल’ लें, इस तेल में एक तोला ‘काली मिर्च’ का कपड़े की सहायता से छना चूर्ण मिलावें। इसी प्रकार दस ग्राम ‘भांग’ का चूर्ण भी इसमें मिलाकर इस मिश्रण को 10 मिनट तक उबालें। ठंडा होने पर इस तेल को छानकर एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर उसके चारों ओर एक लाल पन्नी लपेट कर सूर्योदय तक सूर्य के प्रकाश में रखें। इस तेल की मालिश लकवे वाले भाग में करने से सम्बन्धित भाग में रक्त का प्रवाह आरम्भ हो जाता है।

कांच निकलना रोकने के लिए– कुछ लोगों को मलत्याग के समय थोड़ी या अधिक आंत्र बाहर निकल आती है, इसे कांच निकलना कहते हैं। इसके लिए थोड़ी सी ‘फिटकारी’ एक नीली बोतल’ में भरकर उसे सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखें। इस बोतल को रख लें। नियमित शौच के समय इस फिटकारी की थोड़ी सी मात्रा जल में घोलकर उस जल से गुदा प्रक्षालन करने से कांच निकलना बंद हो जाता है।
श्वेत कुष्ठ निवारणः– सफेद दाग अथवा फूलबहरी दूर करने के लिए ‘बावची का तेल’ एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर उस बोतल के चारों ओर एक लाल पन्नी लपेट कर इस बोतल को दस दिन तक नियमित सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप में रखें। रात्रि में इसे घर के अंदर रखें। इस तेल को फूलबहरी पर लगाने से वह ठीक हो जाती है। अधिक प्रसारित दागों पर यह उपचार काफी समय लेता है।

जोड़ो का दर्दः– लगभग दो सौ मि0 ली0 उपयोग किया हुआ घी लें इसमें एक तोला ‘शुद्ध कपूर’ एक तोला ‘तारपीन का तेल’ तथा एक तोला ‘गिरनार का तेल मिलाकर इस मिश्रण को ‘लाल पन्नी युक्त बोतल’ में भरकर सूर्योदय से सूर्यास्त तक दस दिन तक धूप में रखें। रात्रि में इसे चांदनी में न रखें। दस दिन बाद इस मिश्रण में दस मिलीमीटर ‘मिथाइल सेलीसिलेट’ मिला दें (प्राचीन काल में इसके स्थान पर ‘बाम का पौधा’ मिलाया जाता था)।

इस तेल की समय-समय पर घुटनों तथा जोड़ों पर मालिश करने से दर्द का शमन होता हैं।
त्वचा रोग – ‘नीम के तेल’ की वांछित मात्रा ‘हरी बोतल’ में भरकर दस दिन तक उसे सूर्योदय तक धूप में रखें। त्वचा रोगों में विशेष रूप से फोड़े-फुंसी तथा खुजली, एक्जीमा आदि में यह तेल प्रभावशाली है, इसे सम्बन्धित स्थान पर लगाया जाता हैं।

इन्द्रिय दौर्बल्य हेतु – इसके लिए शुद्व ‘तिल का तेल’, एक स्वच्छ ‘सफेद बोतल’ में भरकर उस बोतल के चारों ओर लाल पन्नी लपेट कर दस दिनों तक उसे सुबह से लेकर शाम तक धूप में रखें। इस तेल को इन्द्रिय पर नियमित लगाने से उसकी दुर्बलता समाप्त होती हैं।

टॉन्सिल्स के लिएः– बड़ी कटेली को समूचा ही उखाड़ लावें, घर लाकर इसे पानी से भली प्रकार से धोकर एक बड़े बर्तन में रखकर उसमें इतना पानी डालें, कि पौधा आधा डूब जाय। अब इसें उबालें, जब पानी आधा या इससे कुछ कम रह जाय, तो इसे उतार कर छान लें इस छानन को एक ‘सफेद बोतल’ में भरकर लगभग दो घंटे धूप दिखायें। इस छानन से गरारे करने पर बढ़े हुए टान्सिल्स तुरंत बैठ जाते हैं। अनेक आयुर्वेदिक औशधियां हैं जो हम अपने दैनिक खाद्य पदार्थो के साथ में प्रयोग करते हैं जिनका मानव अपने जीवन में सन्तुलित उपयोग कर अपने स्वास्थ्य को अच्छा बनाये रख सकता हैं, वे क्रमशः इस प्रकार हैं-

  1. धनिया
  2. मिर्च
  3. सौंफ।

धनिया– धनिया से तो सभी लोग परिचित हैं, नित्य अपनी दाल सब्जी में हम इसे मसाले के रूप में प्रयोग करते हैं, जिससे खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट बन पाता है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औशधि है, जिसमें मानव स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त गुण, धर्म पाये जाते हैं। धनिया मुख्यतः भारत तथा विशेषकर रूस, मोरक्को आदि में प्रमुखता से पैदा होती है। यह एक छोटा सा पौधा होता हैं, जिसमें बीज युक्त छोटे-छोटे फल लगते हैं। बाद में सूख जाने पर उन्हें मसाले के रूप में उपयोग में लाते हैं।
प्रमुख तत्वः– धनिया में मुख्यतः बोलाटाईट तेल तथा प्रमुख तत्व लिनालोन पाया जाता है, जिसके कारण इसमें सुगन्ध बनी रहती हैं। इसके अतिरिक्त इसमें पाईनीन तथा थाईमोल, फिक्सआयल एवं प्रोटीन पाया जाता हैं।

उपयोगः– यह पाचन संस्थान के लिए अत्यन्त उपयोगी है। इसके सेवन से भोजन का अत्यधिक दबाव आन्तरिक अंगो पर नहीं पड़ पाता है, जिससे पाचन क्रिया सुगमता पूर्वक सम्पन्न होती है। यह पेट की दर्द में अत्यन्त लाभकारी औशधि है, जिससे पेट में अपच, गैस आदि की सम्भावना नहीं रहती है। इसका सीमित उपयोग खाद्य पदार्थो में करना उपयुक्त रहता हैं।
मिर्च– मिर्च से प्रायः सभी परिचित है। यह देश के प्रत्येक भाग में पाई जाती है, विशेषतः लाल होने पर इसे मसालों में प्रयोग में लाया जाता हैं। वनस्पति विज्ञान में इसका नाम ‘कैपसीकम’ मिनीमम है। यह जापान, अफ्रीका, एवं भारत में प्रचूर मात्रा में पाई जाती हैं।

प्रमुख तत्व – इसमें मुख्यतः केपसीयासन, विटामिन सी तथा कैराटिन नामक तत्व पाया जाता है, जिसके कारण रंग लाल होता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन बी भी पाया जाता है।

उपयोग– यह भी खाद्य पदार्थो में मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता हैं, जिससे भोजन में स्वाद के गुण आते हैं। यह विशेषतर जोड़ों के दर्द में, सूजन तथा पेट में पाचन क्रिया में पाचक के रूप में सहायक होता हैं। यदि इसे उचित मात्रा में नित्य प्रयोग किया जाए, तो व्यक्ति में पाचन संस्थान एवं शरीर में जोड़ों आदि की तकलीफ एवं दर्द नही होता है।

सौंफ -सौंफ प्रायः भारत तथा अन्य देशों में भी पाई जाती है। विदेशों में यह यूरोप, जापान तथा जापान तथा जर्मनी में पाई जाती है। वनस्पति शास्त्र में इसका नाम ‘फोरनिकुलमबलगेर’ हैं, इसका पौधा दो या तीन फीट लम्बा होता हैं इसमें जो फल लगता हैं सूखने पर उसे प्रयोग में लाते हैं।

प्रमुख तत्व – सौंफ में एनथोल तथा फैनकोन नामक तत्व पाया जाता है, जिसके कारण इसमें सुगन्ध एवं मीठा स्वाद होता हैं। इसके अतिरिक्त इसमें फिक्स तेल तथा प्रोटीन भी पाया जाता है।

गुण– यह श्वसन संस्थान के लिए अत्यन्त उपयोगी औशधि है, विशेषकर खाँसी में यह अच्छा कार्य करता है। इसके अतिरिक्त पाचन संस्थान में अपचन की स्थिति में पाचक के रूप में अच्छा कार्य करता हैं। इसके साथ ही लोग इसका उपयोग घर में माउथ वाश आदि के रूप प्रयोग करते है, जिससे व्यक्ति सुन्दर एवं स्वस्थ बना रहता है।

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आक का पौधा

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साधारण पौधा आक आक अथवा मदार पूरे भारत में सरलता से उपलब्ध होने वाला एक महत्वपूर्ण पौधा है। यह दो प्रकार का होता है। एक वह जिसके फूल बैंगनी रंग लिये हुए होते हैं और दूसरा वह, जिसके फूल सफेद होते हैं। इसके फल देखने में कच्चे आम के समान होते हैं। ये ज्येष्ट माह में पक जाते हैं। इनके अंदर काले रंग के दाने तथा रूई जैसी निकलती हैं। यह झाड़ी नुमा होता है। इसकी पत्तियाँ मोटी तथा शिराओं वाली होती हैं। पत्तियों और हरे तने व शाखाओं को देखने पर ऐसा लगता है, मानो उन पर पाउडर छिड़का हुआ हो। पत्ती अथवा डण्डी को तोड़ने पर इसमें से दूध जैसा पदार्थ निकलता है।

आक के विभिन्न भाषाओं में नाम:-
श्वेत आक को संस्कृत में श्वेतार्क, मन्दार, सदापुश्प, बालार्क, प्रतापस आदि कहते हैं, जबकि बैंगनी फूल वाले आक को रक्तार्क, के नाम से पुकारते हैं। दोनों ही प्रकार के आक को हिन्दी में आक, अकवन या मदार (सफेद या लाल) व सफेद या लाल अकौआ भी कहते हैं।

वनस्पति जगत के एसक्लेपीडेसी ;। बेसमचपकंबमंमद्ध कुल का यह सदस्य है।

औषधिक चमत्कार

  1. वात रोगों में–श्वेत आक की जड़ को तिल के तेल में डालकर खूब उबाल लें। फिर इस तेल से रोगग्रस्त अंग की मालिश करें। नियमित रूप से इस तेल की मालिश करने से वातव्याधी के कारण हाथ, पैर, कमर में होने वाले दर्द से छुटकारा मिलता है।
  2. गठिया, और मोच में— आक के पत्तों पर मीठे तेल को चुपड़कर उसे हल्का सा सेंक कर गठिया ग्रस्त अंग पर बाँधने से लाभ होता है। घी में चुपड़कर यही प्रयोग करने से मोच के दर्द से मुक्ति मिलती है।
  3. शरीर में यदि छोटे-छोटे सफेद दाग हों तो— श्वेत आक के दूध में सेंधा नमक घिसकर छोटे-छोटे सफेद दागों पर लगाने से वे ठीक हो जाते हैं।
  4. एक्जिमा में– आक के दूध में समान मात्रा में तिल का तेल मिलाकर इस मिश्रण को एक्जिमा पर मलने से सात-आठ दिन में एक्जिमा से मुक्ति मिल जाती है।
  5. कुत्ता या बिच्छु के काटने पर— यदि किसी को कुत्ता या बिच्छु काट ले तो दंश-स्थान (जिस जगह काटा हो) पर आक का दूध लगाने से इनके विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
  6. बवासीर में— बवासीर में आक के दूध में अफीम घोलकर, मस्सों पर लगाने से उनका दर्द दूर होता है।
  7. अण्डकोश बढ़ने पर–सफेद आक की जड़ घिसकर लेप करने से अण्डकोश सामान्य अवस्था में आ जाते हैं।
  8. हाथी पाँव में— आक के जड़ की छाल तथा अडूसे की छाल को पीसकर लेप करने से हाथीपाँव रोग दूर होता है।
  9. अन्दरूनी चोट में— आक के पत्तों को सरसों के तेल में उबालकर मालिश करने से गिरने या किसी ठोस वस्तु के आघात से लगी चोट में लाभ होता है।
  10. सूजन में– आक के पत्तों में अरण्डी का तेल लगाकर गरम करके बाँधने से सूजन तथा दर्द कम हो जाता है।————————————————मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.com, aapkabhavishya.in, rbdhawan.wordpress.com पर।

महा औषधि पीपल

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant),

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महा औषधि पीपल पीपल वृक्ष की उपस्थिति व उपयोग की जानकारी वैदिक काल से ही मिलती है, अनेक प्राचीन ग्रन्थों में इसके उदाहरण मिलते है, पीपल का वृक्ष सम्पूर्ण जलीय प्रदेश तथा साधारण भूमि में आसानी से मिल जाता है तथा मरूभूमि में भी यह स्वयं को जीवित रखता है। आयुर्वेद के ग्रन्थों व संहिताओं में औषधि के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। चिकित्सा की दृष्टि से रोग निवारण के लिए पीपल के अनेक औषधीय प्रयोग मिलते हैं, जिनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत है-

  1. सर्पदंश पर विषनाशक प्रयोग
    जब किसी को सर्पदश हो गया हो, शीघ्र ही डंठल की तरफ से पीपल के ताजे पत्ते को रोगी के कान में थोड़ा सा ड़ालें इसे कसकर पकड़े रहें, क्योकि विष के प्रभाव से रोगी को वेदना होती है तथा डंठल का खिंचाव अन्दर की ओर होता है, यदि डंठल अधिक अन्दर चला जाता है, तो कान का पर्दा छिद्रयुक्त हो सकता है, अतरू पत्ते को पकडे़ रहना चाहिए। तथा जब पत्ता कुछ विवर्ण (नीला या पीला) हो जाए व डंठल कुछ फूल जाए तब पत्ते को बदल देना चाहिए अर्थात् नवीन पत्ता लगाना चाहिए। इस क्रिया से विष का आचूषण होता है तथा जब विष का पूरा आचूषण हो जाता है, तब डंठल का अन्दर की ओर खिंचाव तथा रोगी को वेदना होनी बन्द हो जाती है। तब उल्टी (वमन) करानी चाहिए ताकि आमाशय में कोई विषाक्त द्रव एकत्रित हो, तो निकल जाए। इसके पश्चात् दुग्धपान कराना चाहिए।
  2. पीपल के द्वारा चिकित्सा के अनेक योग आयुर्वेदीय योग मिलते हैं जैसे– संग्रहणीय कषाय (चरक), पंचवल्कल कषाय आदि।
    3. आमजप्रवाहिका (एमेबिक डीसेन्ट्री) में पीपल की गोंद का शुष्क चुर्ण 2-3 ग्राम प्रतिदिन लेने से जीर्ण प्रवाहिका ठीक हो जाती है। साथ ही पथ्यापथ्य का पालन आवश्यक है।
    4. मधुमेह रोग में दो पत्ते पीपल के, चार पत्ते तुलसी के, चार पत्ते नीम के, चार पत्ते बिल्प पत्र के तथा आठ पत्र नींबू के एवं पाँच काली मिर्च को मुख में चबा-चबाकर रस चूसना चाहिए, शेष बचे हुए तंतुओं को फेंक देना चाहिए। औषध का सेवन करने के साथ-साथ रोगी को यथा-शक्ति पैदल भ्रमण भी करते रहना चाहिए, इससे कुछ ही दिनों में रक्त शर्करा की मात्रा न्यून हो जाती है।
    5. आयुर्वेद की अनेक भस्मों के निर्माण में भी पीपल के अंगों का प्रयोग किया जाता हैं– जैसे नाग भस्म, वंग भस्म, यशद भस्म, अभ्रक भस्म आदि।

नोट- यह सभी औधिय प्रयोग आप अपने चिकित्सक से परामर्श करके ही करें।

पीपल के मांत्रिक प्रयोग
1. विषम ज्वर
जिस रोगी को ठण्ड लगकर बुखार आता हो या तीन दिन के अन्तर से ज्वर आता हो, उस रोगी को स्नान कराके, शुद्ध जल में तिल व थोड़ा दूध मिलाकर पूर्वाभिमुख खडे़ होकर पीपल वृक्ष पर उस तिलोदक को सात बार मंत्र बोलते हुए धारा बद्ध चढ़ा देने से ज्वर आना बन्द हो जाता है। यह प्रयोग सात दिन तक या ज्वर शांत होने तक किया जाता है। मंत्र इस प्रकार से है- विषमज्वर गच्छत्वं तस्मै तिलोदकं नमरू
2. पुराना ज्वर
नमः शिवाय’ को ग्यारह बार उच्चारण करते हुए जल अर्पित करें तथा रोगी के रोग निवृत्ति हेतु प्रार्थना करें। इससे पुराना ज्वर, जो अनेक औशधियों के सेवन से भी ठीक न होता हो तब इस मंत्रोपचार से लाभ होता है।\शनिवार के दिन प्रातरूकाल स्नानादि करके रोगी स्वयं या रोगी की ओर से कोई अन्य व्यक्ति रोगी का नाम लेकर एक ताम्र के पात्र में शुद्ध जल व थोड़ा चिरायता, दुग्ध, कुछ शर्करा व कुशा डालकर उत्तर की ओर मुख कर के भगवान शंकर को स्मरण करते हुए शिव पंचाक्षरी मंत्र ‘

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एनीमिया कारण और निवारण

एनीमिया कारण और निवारण शरीर में खून का नहीं होना या कम मात्रा में होनाएनीमिया कहलाता है। वास्तव में यह खून की कमी न हो कर लाल रक्त कणों ; भ्ंमउवहसवइपदद्ध की कमी होती है। लाल रक्त कणों का मुख्य कार्य ऑक्सीजन को शरीर में स्थित विभिन्न कोशिकाओं तक पहुँचाना है, जिससे प्रत्येक कोशिका को आक्सीजन मिल सके। इसकी कमी से शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीजन कम मिल पाती है, जिससे वे कोशिकाएं ठीक ढ़ंग से काम नहीं कर पातीं।
एनीमिया होने के मुख्यतरू दो कारण है-
1. रक्त स्त्राव- अधिक रक्त का बहना।
2. लाल रक्त कणों का नष्ट होना।

एनीमिया के लक्षण;

  1. निर्बलता
    2. बैठे-बैठे ही साँस फूलना।
    3. चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा होना।
    4. सुनाई कम पड़ना, कानों में सीटी बजना।
    5. सिर दर्द।
    6. नजर का कम होना।
    7. नींद का कम होना।
    8. पैरों में सूजन होना।
    9. हाथ और पैर की उंगलियों में चींटी सी चलना या झनझनाहट होना।
    10. बच्चों की शारीरिक वृद्धि या वजन बढ़ना रूक जाना।

एनीमिया के इन लक्षणों में से कोई एक या सारे लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं। लक्षणों का प्रकट होना इस बात पर निर्भर करते हैं, कि कितने समय में हीमोग्लोबिन कम हुआ। जैसे किसी के रक्त में लाल रक्त कणों की मात्रा एक सप्ताह में 12 ग्राम से 8 ग्राम हुई, तो लक्षण अधिक होंगें। यदि किसी व्यक्ति में लाल रक्त कणों की संख्या एक वर्ष में कम हुई, तो ऐसे व्यक्ति में लक्षण कम होंगे, क्योकि लाल रक्त कणों की संख्या एक साल में 12 ग्राम से 8 ग्राम हुई। एनीमिया किन कारणों से होता हैं? एनीमिया होने के विभिन्न कारणं हो सकते है, परन्तु प्रायरू लौह तत्व की कमी से होने वाला एनीमिया प्रमुख है, दूसरे प्रकार के एनीमिया दुर्लभ होते हैं। यहाँ लौह तत्व की कमी से उत्पन्न होने वाले एनीमिया के विषय में ही बताया जा रहा है। दिन भर के भोजन में लौह तत्व की केवल 1 मिलीग्राम की मात्रा आवश्यक होती है। गर्भावस्था में व स्तनपान कराने वाली महिलाओं में इसकी आवश्यकता अधिक होती है।
लौह तत्व की कमी से उत्पन्न एनीमिया के तीन मुख्य कारण हैं –
1. रक्त स्त्राव
2. भोजन में लौह तत्व की कमी
3. भोजन से प्राप्त लौह तत्व का पाचन न होना।
इनमें भी पहला कारण ही मुख्य है। जब भी रक्त स्त्राव से उत्पन्न लौह तत्व की कमी भोजन में उपलब्ध लौह तत्व की मात्रा से ज्यादा होती है, तो एनीमिया हो जाता है। यदि आयु बढ़ने पर बच्चे को दूसरा आहार देने में देरी हो जाती है और वह लम्बे समय तक केवल दूध पर ही निर्भर रहता है, तो बालक को लौह तत्व की कमी अवश्य हो जायेगी। ऐसा आहार, जिसमें लौह तत्व की मात्रा अधिक हो, बच्चे को देते ही यह कमी तुरन्त दूर हो जाती है। जब शरीर में तेजी से विकास होता है और लौह की आवश्यकता बढ़ जाती है, जो भोजन से उपलब्ध नहीं हो पाती, क्योंकि इस उम्र में युवाओं का रूझान संतुलित आहार की अपेक्षा ‘फास्ट फूड’ पर ज्यादा होता है।
रजस्वला स्त्री के शरीर को भी लौह तत्व की अधिक आवश्यकता होती है, उसे 2 मिलीग्राम लौह प्रतिदिन के भोजन के द्वारा प्राप्त होना चाहिए। यद्यपि गर्भावस्था में रजस्त्राव से होने वाली लौह तत्व की कमी तो रूक जाती है, परन्तु शिशु और माँ के शरीर की आवश्यकता बढ़ जाती है। गर्भावस्था के समय के साथ ही साथ लौह तत्व की आवश्यकता में भी वृद्धि होती जाती है। गर्भावस्था के दूसरे तीसरे माह के पश्चात् माँ के शरीर को लौह तत्व की आवश्यकता अधिक होती है और यह आवश्यकता इतनी अधिक बढ़ जाती है, कि दैनिक भोजन में भी उसकी पूर्ति नहीं हो पाती। इसीलिए चिकित्सक गर्भावस्था में लौह व कैल्शियम लेने की सलाह देते हैं। ज्यादातर यह पाया गया है, कि महिलायें इस विषय की गम्भीरता पर ध्यान न दे कर दवायें नियमित रूप से नहीं लेतीं, जिसका दुष्प्रभाव बच्चे व मां दोनों पर पड़ता है। बवासीर, पेट का अल्सर, आदि से भी जो रक्त स्त्राव होता है, उससे भी एनीमिया हो जाता है।
उपचार-
लौह तत्व की कमी को दूर करने के लिए भोजन में पाये जाने वाले लौह तत्व की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिये, इसी लिए लौह तत्व वाला भोजन निरन्तर लेने की सलाह दी जाती है। जब शरीर में लाल रक्त कणों की संख्या बहुत कम होती है, तब इस कमी को पूरा करने के लिए आयरन टेबलेट या कैपसूल के द्वारा शरीर को लौह तत्व की आपूर्ति की जाती है। लौह तत्व की पर्याप्त मात्रा लेने से से लाल रक्त कणों की संख्या बढ़ने लगती है।

नोट- कब, क्या और कितनी अधिक मात्रा माँ लौह तत्व लेना है, यह हमेशा अपने अनुभवी चिकित्सक से परामर्श करने के उपरान्त ही लें।

लौह तत्व से युक्त भोजन लेते रहना चाहिए, जिससे कि शरीर के लौह भण्डार फिर से भर जायें। लौह तत्व की अधिक मात्रा वाले आहार शाकाहारी भोजन में अनाज, हरी पत्तियों की सब्जियां जैसे पालक आदि, तेल बाले बीज जैसे तिल, सरसों, मूंगफली, सोयाबीन, सूखे मेवे व गुड़ आदि में लौह तत्व की मात्रा पर्याप्त होती है। यदि सामान्य भोजन को भी लोहे के बर्तन में पकाया जाय, तो उसमें लौह तत्व की मात्रा बढ़ जाती है। कुछ आहार शरीर द्वारा लौह तत्व की पाचन क्षमता को भी प्रभावित करते हैं। नीबू लौह तत्व की पाचन क्षमता में वृद्धि करता है, जबकि चाय में पाया जाने वाला टैनिन, सब्जियों में पाया जाने वाला ऑक्सालेट आदि तत्व इस पाचन क्षमता में बाधा डालते हैं। एनीमिया होने पर चिकित्सकीय दृष्टि से शरीर को लौह तत्व की अधिक मात्रा या कवेम की आवश्यकता होती है। चिकित्सक ऊपर बताये गए लक्षणों को देख कर तथा जिह्ना, हथेली, नाखून, अन्दर से पलकों में पीलापन देख कर एनीमिया को पहचानते हैं तथा लैबोरेटरी जांच की सहायता से एनीमिया की मात्रा तथा इसके प्रकार की जांच करते हैं। हृदय के कुछ रोगों का कारण एनीमिया ही होता है।
आयुर्वेदिक उपचार-
अदरक जहाँ एक खांसी या कफ में लाभदायक औशधि है, वहीं अयुवेदीय ग्रर्थो मे इसे रक्त की कमी को समाप्त करने के लिए एक श्रेष्ठ औशधि कहा गया हैं। इस औशधि का प्रयोग धैर्यपूर्वक करने पर ही सफलता प्राप्त होती है। चार-पाँच ग्राम अदरक तथा शहद मिलाकर रोज प्रातरू पीयें। महीने भर तक नियमित प्रयोग से खून बनने की प्रक्रिया में तेजी आयेगी तथा चेहरे का सौन्दर्य भी निखर उठेगा। एक तथ्य यह भी ध्यान रखने योग्य है, कि रक्तदान करने वाले व्यक्ति का पहले ‘हीमाग्लोबिन टेस्ट’ किया जाता है और हीमाग्लोबिन के कम होने पर रक्त लिया ही नहीं जाता। रक्तदान के समय एक व्यक्ति से करीब 300 मिलीलिटर रक्त ही लिया जाता है। लौह तत्व युक्त संतुलित भोजन करने पर कुछ ही दिनों में इसकी पूर्ति हो जाती है। एक स्वथ्य व्यक्ति को भी समय-समय पर अपने शरीर में हीमोग्लोबिन की जांच कराते रहना चाहिए। वर्ष में एक बार या कभी भी संदेहात्मक स्थिति आने पर अपने चिकित्सक से तत्काल सलाह ले

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार

मुद्राओं द्वारा रोगोपचार साधना के क्षेत्र में मुद्राओं का विशिष्ठ महत्व सर्वविदित है। तंत्र के क्षेत्र में भी मुद्राओं का सुनियोजित और विस्तृत विवरण मिलता है। मुद्रा के अनेक अर्थ हैं, किन्तु साधारणतया साधनात्मक कार्यो में प्रयुक्त होने वाली मुद्राओं को, जो उंगलियों के माध्यम से देवता के प्रीत्यर्थ प्रकट की जाती हैं मुद्राएं कहा जाता है। इनका प्रयोग शक्ति साधक अनिवार्यतः करते हैं, लेकिन अन्य साधकों के लिए भी मुद्रा प्रदर्शन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि साधना क्रम में यह एक आवश्यक क्रिया मानी गई है। कुलावर्ण तंत्र में लिखा है- ‘‘मुद्राः कुर्वन्ति देवानां मनासि द्रावयन्यि च।’’
‘‘मुद्राओ को प्रदर्शित करने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा मुद्रा प्रदर्शित करने वाले भक्त पर द्रवित होकर कृपा करते हैं।’’ कुछ तंत्र शास्त्रों में स्पष्ट है, कि मुद्रा प्रदर्शित करने पर व्यक्ति को देवताओं की समीप्यता प्राप्त होती है; मुद्राओं के प्रदर्शित करने पर देवता पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रहते हैं तथा इन के प्रदर्शन से साधारण पूजा भी उत्तम हो जाती है, बिना मुद्राओं के सम्पत्र की हुई साधनाए, जप, देवाचार्वन, योग आदि निष्फल हो जाते हैं। मुद्राओं का केवल एक पक्ष नहीं -‘‘क्या मुद्रा द्वारा रोगों का उपचार भी सम्भव है?’’

निर्विषोऽपि भेवेत् क्षिप्रं यो जन्तुर्विषमूर्छितः। चत्वारिंशित् समाख्याता मुद्रा श्रेष्ठा महाधिकाः।।

‘‘मुद्रा प्रदर्शन से विष द्वारा मूच्र्छित व्यक्ति भी स्वस्थ्य लाभ प्राप्त करता है। व्याधि और मुत्यु तक का निवारण मुद्राओं द्वारा संभव है। मोक्ष, जो मनुश्य जीवन का सर्वोच्च सोपान है, वह भी मुद्रा प्रदर्शन से प्राप्त किया जा सकता है।’’ मुद्राओं के महत्व को जानकर यदि व्यक्ति चाहे, तो अनेक रोगों पर नियंत्रण कर सकता है। वर्तमान समय में तो इतने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोग है, जिनसे बचना मनुश्य के लिए कठिन हो गया है, न चाहते हुए भी अनेक प्रकार की औशधिओं का सेवन करना पड़ता है और जिसके कारण कभी-कभी अनेक प्रकार के साईड़ इफेक्ट हो जाते हैं, जैसे चेहरे पर अनेक प्रकार के दाने, फुंसियां निकल आती हैं, जिसकी वजह से सौन्दर्य क्षीण हो जाता है। इसके लिए ‘कुम्भ मुद्रा ’ का प्रयोग करें, तो चेहरा रोग रहित, कान्तियुक्त और चमकदार बनने लगेगा। कुम्भ मुद्रा में साधक अपने दाहिने हाथ से हल्की खुली सी मुट्ठी  बनावें, इसी प्रकार दूसरे हाथ से भी करें, दोनों हाथ के अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करते रहें बायें हाथ को दाहिने हाथ के ऊपर रखें। इसे कुम्भ मुद्रा कहते है। इसके नित्य प्रदर्शन से साधक का चेहरा आकर्षक बनता है तथा दाने व मुहासे साफ हो जाते है।
स्वर शोधक-
साधक यदि ‘प्राण मुद्रा’ सम्पन्न करें, तो स्वर से सम्बन्धित रोगों को नियंत्रित कर सकते है। प्राण मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक अपने अंगूठे से अनामिका और कनिष्ठका के पोरों को स्पर्श करें, बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखें, तो प्राण मुद्रा के प्रदर्शित करने से साधक के स्वर संस्थान पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उसका स्वर शुद्ध होता है। जिनका स्वर घरघराता हो या आवाज स्पष्ट न हो, उसे प्राण मुद्रा करने से बहुत लाभ होता है।
मुख शोधन-
व्यान मुद्रा’ प्रदर्शित करने से साधक के मुख से सम्बधित रोगों का शमन होता है। साधक बैठ कर अपने हाथ के अंगूठे से मध्यमा और अनामिका को स्पर्श करें, इससे व्यान मुद्रा प्रदर्शित होती है। इस मुद्रा के प्रदर्शन से साधक के मुख सम्बन्धी रोगों पर प्रभाव पड़ता है; जैसे यदि उसके मुंह से दुर्गन्ध आती है या उसके मुंह का स्वाद अक्सर बिगड़ा रहता है अथवा मुख में छाले निकलने लगते हो, तो इस मुद्रा को नित्य करने से बहुत लाभ मिलता है। गले के रोग- सर्दी या गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला अंग गला ही होता है। यह शीघ्र ही वातावरण से प्रभावित हो कर संक्रमित हो जाता है, जिसकी वजह से गला बैठना, गले में सूजन, दर्द या टॉन्सिल्स की शिकायत होने लगती है। यदि ऐसा व्यक्ति ‘उदान मुद्रा’ सम्पन्न करता है, तो उसे गले से सम्बन्धित रोग नहीं होते। इस मुद्रा को करते समय अपने हाथ के अंगूठे से तर्जनी अंगुली को स्पर्श करें और पूर्ण रूप से स्थिर होकर बैठें व मन ‘सौं’ बीज पर एकाग्र करें।
हृदय सम्बन्धी रोग-
‘आवाहनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से हृदय रोगों पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। आवाहनी मुद्रा सम्पन्न करने के लिए साधक दोनों हाथों को मिलाकर अंजुली बना लें व अंगूठों से अनामिका के मूल को स्पर्श करें। ऐसा साधक नित्य स्थिर मन से जिस आसन में वह सुविधा अनुभव करे चाहे पद्यासन हो या सुखासन हो, बैठ कर करे। यह मुद्रा सम्पन्न करने से साधक हृदय के रोगों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। यदि साधक घबराहट का अनुभव कर रहा हो, तो वह थोड़ी देर इस मुद्रा को न करे, तो उसे लाभ अवश्य होगा।
पेट के रोग-
‘सम्मुखीकरण मुद्रा’ सम्पन्न करने से साधक पेट से सम्बधित रोगों पर विजय प्राप्त कर लेता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए साधक स्थिर बैठ जाये व अपने दोनों हाथों से मुट्ठी  बनाये, अंगूठे को मुट्ठी के अन्दर रखे तथा दोनों हाथों की मुट्ठी को परस्पर कनिष्ठिका उंगली से मिला ले। इसे सम्पन्न करने पर पेट में यदि कीड़े भी हों या पित्त अधिक बनता हो, तो व्यक्ति को राहत मिलती है। यह मुद्रा पेट से सम्बधित रोगों में अत्यन्त सहायक होती है, जिसे नित्य करने से व्यक्ति इन रोगों को नियंत्रित कर सकता है।
चर्मरोग-
खुजली होने या किसी वस्तु से खाने -पीने से एलर्जी हो जाने से पर चमड़ी से सम्बन्धित रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति असहजता अनुभव करता है। इस रोग के लिए ‘चक्र मुद्रा’ करने से नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। दोनों हाथों की उंगलियों को फैला लें व बायें हाथ की कनिष्का अंगुली से दाहिने हाथ की कनिष्किा को स्पर्श करें तथा बायें हाथ के अंगूठे से दाहिने हाथ के अंगूठे को परस्पर स्पर्श करें। इस प्रकार से चक्र मुद्रा प्रदर्शित होती है।
उच्च रक्तचाप-
उच्च रक्तचाप में ‘ज्ञान मुद्रा’ सहायक होती है। इस मुद्रा को करने से व्यक्ति को अपने रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। ज्ञान मुद्रा को करने के लिए अंगूठे और तर्जनी को परस्पर स्पर्श करें। यह मुद्रा शान्तचित होकर सम्पन्न करनी चाहिए और नियमित रूप से करनी चाहिए तभी राहत का अनुभव होता है।

कमर के रोग-
‘सन्निरोधिनी मुद्रा’ सम्पन्न करने से कमर के रोगों पर नियंत्रण होता है। इस मुद्रा के लिए व्यक्ति अपने दोनों हाथों से मुत्ठियाँ बना कर उन्हे आमने-सामने कर जोड़ दें तथा थोडी देर तक कमर सीधी कर सुखासन पर बैठ कर यह मुद्रा सम्पन्न करें। इससे साधक को अपने कमर से सम्बधित रोगों में लाभ मिलता है। इस से कमर का तनाव भी समाप्त हो जाता है, कमर से सम्बधित अन्य रोगों में भी लाभ मिलता है।
गुर्दे के रोग-
यदि कोई गुर्दे के रोग से पीडि़त है या गुर्दे से सम्बधित किसी रोग से ग्रस्त है, तो वह यदि ‘गदा मुद्रा’ का नियमित अभ्यास करता है, तो उसे सम्बधित रोग पर नियंत्रण प्राप्त होता है। इस मुद्रा को प्रदर्शित करने के लिए दोनों हाथों की उंगलियों को एक दूसरे में फंसा दें। इससे गदा मुद्रा प्रदर्शित होगी। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से व्यक्ति को यदि गुर्दे में सूजन है तो उसे अच्छे परिणाम की प्राप्ति होती है।
हाथ और पांव से सम्बधित रोग-
यदि सायंकाल खड़े होकर ‘सम्पुटी मुद्रा’ को सम्पन्न किया जाए, तो साधक को हाथ और पांव से सम्बन्धित रोगों में आराम मिलता है। यदि पावों में अक्सर दर्द रहता हो तथा घुटने मोड़ने में अत्यधिक कष्ट हो, तो यह मुद्रा आराम दिलाने में सहायक होती है। वजन उठाने पर दर्द का अनुभव हो, तो इस मुद्रा को करने से लाभ होता है। इस मुद्रा को सम्पन्न करने के लिए बायें हाथ को आकाश की ओर रखें तथा उस पर दाहिने हाथ से सम्पुट करें। यह मुद्रा साधक 5 मिनट तक नित्य करें।
वात रोग
‘शंख मुद्रा’ इस मुद्रा को नित्य करने से व्यक्ति यदि वात रोग से पीडि़त है, तो उसे इस रोग में आराम मिलता है। इस मुद्रा को साधक प्रातः काल स्थिर भाव से बैठ कर सन्ध्यादि से पूर्व प्रदर्शित करे। इस मुद्रा के लिए बायें हाथ के अंगूठे को दाहिने हाथ से मुट्ठी बनाकर पकडे़ं तथा मुट्ठी को दाहिने हाथ की अंगुलियों से स्पर्श करायें, तो शंख मुद्रा प्रकट होगी। यह मुद्रा यदि नियमित रूप से 5-7 मिनट तक सम्पन्नकी जाय, तो वात रोगों में आश्चर्य जनक लाभ होता है।

कालसर्प योग

कालसर्प योग कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है। पं. जवाहर लाल जी की कुण्डली में देश भर में हजारों की संख्या में हमारे पाठक वर्ग की ओर से निरंतर पत्र प्राप्त हो रहे थे की कालसर्प योग पर ‘आप का भविष्य‘ का एक विशेषांक प्रकाशित किया जाये। अब जब ईष्ट की प्रेरणा और प्रभु की इच्छा हुई तब यह कालसर्प योग विशेषांक’ पाठकों से समक्ष प्रस्तुत है।

पाठको कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है। पं. जवाहर लाल जी की कुण्डली में भी इसी प्रकार से अनेक राजयोग तथा एक कालसर्प योग बना है। इन दोनो का ही फल उनके जीवन में घटित भी हुआ है। वह लम्बे समय तक जेल में भी रहे थे। उन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति भी नहीं मिली थी। क्योकि उनके पिता ने सारी सम्पत्ति देश को दान दी थी। इस प्रकार वह अपनी पैतृक संपत्ति से वंचित हुये। परंतु कुण्डली में एक से अधिक राजयोगों का निर्माण होने के कारण उन्हें ‘‘शासक’’ का पद भी प्राप्त हुआ।

मैने अपने जीवन में अनेक ऐसे उच्चकोटी के संतों की कुण्डली में भी कालसर्प योग देखा है। परंतु उन सभी संतों का जीवन राष्ट्र के लिये आज भी समर्पित है। यह बिलकुल सत्य है कि वह सभी व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नही कर पाये परंतु जब वह समाज और देश के लिये समर्पित हुये तब उच्चकोटी का सम्मान आज भी उन्हें मिल रहा है। वह सभी किसी न किसी रूप से ट्रस्ट बनाकर संचित धन का राष्ट्र के लिये प्रयोग कर रहे हैं। अतः यह स्पष्ट है कि यह कालसर्प नामक योग व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नहीं करने देता। परंतु देश के लिये या समाज के लिये संकल्पित होने पर यह योग बहुविख्यात करता है।

मैं पाठकों को यह भी बताना चाहता हूँ कि प्रत्येक वह ‘‘कालसर्प योग’’ कालसर्प योग नहीं होता जिस कुण्डली में राहु या केतु के साथ कोई अन्य ग्रह भी विराजमान हों। क्योंकि यदि वह अन्य ग्रह यदि राहु या केतु से डिग्रीयों में इनसे एक डिग्री भी बाहर है तब इस योग का वह प्रभाव मेरे अनुभव में कालसर्प योग जैसा कभी नहीं देखा गया। अतः पहले कुण्डली में इस प्रकार की ग्रहदशा होने पर राहु या केतु के साथ वाले ग्रहों को डिग्रीयों का अवश्य जांच लें।